इक दिन क्या सौ दिन भी कम पढ़ते हैं,
माँ के अभिनंदन में जितना कहो कम है!!
सागर सा आचल हैं आसमाँ सा प्यार,
स्वर्ग सा एहसास हैं सुखमय सा संसार!!
इक दिन क्या सौ दिन भी कम पढ़ते हैं,
माँ के अभिनंदन में जितना कहो कम हैं!!
रक्त से बना हूँ दुग्ध से सीचा है मुझको,
गीले में सोकर रूखे में सुलाया है मुझको!
मल मूत्र को धोया सीने से लिपटाया मुझको!!
अश्क की वेदना करूण पुकार माँ ने समझा मुझको,
दर्द से कहरा रही माँ चोट लगी है मुझको!
इक दिन क्या सौ दिन भी कम पढ़ते हैं,
माँ के अभिनंदन में जितना कहो कम है!!
निकले कभी हाट पर तपी खुद आँचल की छाँव मुझको!
हट कर मे किये ख़र्च खुद ली न हो बरसो से परिधान!!
पेट काटकर अपना भाग भी अर्पित मुझको!!
मैं आगे आगे माँ पीछे पीछे कैसे कैसे मैने भगाया!
खाने की रुचिकर कब कब रसोई में बदलाया!!
मैं माँ के लिए प्यारी प्यारा दुलारा और कोई न भाया!!
मनमोहिनी बातों में माँ को कैसे करता सम्मोहित !!
अपनी तिजोरी के सिक्के मेरे लिए बन गये मोती!!
नादानियाँ मेरी माँ को देती कैसी मुस्कराटे!!
रात को जागजाग कर मेरे साथ अनौखी करे तपस्यायें!!
नीद से जो होती आँखे बंद चाय झट से माँ बनाती!
जो भी पाया माँ का आसीस बन कर ऐसा छाया!!
मैं क्या दे पाऊँगी उम्र कम माँ का प्यार बहुत गहराया!
इक दिन क्या सौ दिन भी कम पढ़तें हैं!
माँ के अभिनंदन में जितना कहो कम हैं!!
ईश्वर का रूप माँ तुझमें समाया हैं,
मेरी हर नादानियाँ को माफ़ कराया हैं!
माँ के अभिनंदन में जितना कहो कम है!!
सागर सा आचल हैं आसमाँ सा प्यार,
स्वर्ग सा एहसास हैं सुखमय सा संसार!!
इक दिन क्या सौ दिन भी कम पढ़ते हैं,
माँ के अभिनंदन में जितना कहो कम हैं!!
रक्त से बना हूँ दुग्ध से सीचा है मुझको,
गीले में सोकर रूखे में सुलाया है मुझको!
मल मूत्र को धोया सीने से लिपटाया मुझको!!
अश्क की वेदना करूण पुकार माँ ने समझा मुझको,
दर्द से कहरा रही माँ चोट लगी है मुझको!
इक दिन क्या सौ दिन भी कम पढ़ते हैं,
माँ के अभिनंदन में जितना कहो कम है!!
निकले कभी हाट पर तपी खुद आँचल की छाँव मुझको!
हट कर मे किये ख़र्च खुद ली न हो बरसो से परिधान!!
पेट काटकर अपना भाग भी अर्पित मुझको!!
मैं आगे आगे माँ पीछे पीछे कैसे कैसे मैने भगाया!
खाने की रुचिकर कब कब रसोई में बदलाया!!
मैं माँ के लिए प्यारी प्यारा दुलारा और कोई न भाया!!
मनमोहिनी बातों में माँ को कैसे करता सम्मोहित !!
अपनी तिजोरी के सिक्के मेरे लिए बन गये मोती!!
नादानियाँ मेरी माँ को देती कैसी मुस्कराटे!!
रात को जागजाग कर मेरे साथ अनौखी करे तपस्यायें!!
नीद से जो होती आँखे बंद चाय झट से माँ बनाती!
जो भी पाया माँ का आसीस बन कर ऐसा छाया!!
मैं क्या दे पाऊँगी उम्र कम माँ का प्यार बहुत गहराया!
इक दिन क्या सौ दिन भी कम पढ़तें हैं!
माँ के अभिनंदन में जितना कहो कम हैं!!
ईश्वर का रूप माँ तुझमें समाया हैं,
मेरी हर नादानियाँ को माफ़ कराया हैं!