मंगलवार, 29 अगस्त 2017

'प' का देखो कारनामा

'प' का देखो कारनामा,
जब2 हद से गुजरता है,
आखों में आसू और,
हृदय पर प्रहार करता है!!
आधा प और हे घातक,
क्या 2कौतक करवाता है!!
प्यास लगें जन सबको,
जन सग्राम करवाता हैं!!
राजा रंक हे अधीर सब,
नत मस्तिक झुकवाता हैं!!
प्यास की ऐसी तृष्णा,राजा को
रंक चौखट पर झुकवाता है!!
प्यार का ढाई आक्षर क्या2,
अपनो से ही विद्रोह करवाता हैं!!
भूल के कर्मानंद होके बसीभूत,
प्यार का रोगी जन बन जाता है!!
छिङ जाते हे युद्ध महा संग्राम,
लाशो के अम्बार लगवाता है!!
कुल के कुल मिट जाते हैं सब,
प्यार की गाथाये अमर करवाता हैं!!
अब एक कढी और जुङी है,
प्याज भी संग्राम करवाता हैं!!
नेताओ का बनके मुद्दा देखो?
सत्ता चौकीदारो को गिरवाता हैं!!
मुद्दा लेके अखाङे सज जाते है,
गिराके खुद राजा बन जाता हैं!!
आधा प जख्मी शेर शा घातक,
खूखार' प 'बन तब जाता हे !!
प का देखो कारनामा,
जब2 हद से गुजरता है!!
आखो में आसू और,
हृदय पर प्रहार करता हैं!!

जिदंगी की रेल हे रिस्तो का मेल हैं

अजब ये खेल हे गजब ये खेल है!
जिदंगी की रेल हे रिस्तो का मेल हैं!!
प्रिया और लाल में कौन करीब हैं!
असमज्स्य में सबकी कैसी प्रीत है!!
जिंदगी का नया पङाव अंजान  है,
थाम के हाथ होता संगम हैं!!
छोङ के मायके की किलकारी,
जिदंगी के बुनते ताने बाने हैं!!
नई पहल को पल पल समझना ,
मन को एक डोर से जोङना है!!
प्रिया की कोई अनछुई बात भी,
जख्म की बजह बन जाती है!!
धीरे धीरे ये तकरार जाने कब,
खुसियो की चाबी बन जाती हैं!!
आगन में आती हे जब खुशी,
मात्रतृत्व का तब सुख देती है!!
वेटे की अठखेली में हम तब,
परम सुख में डूब जाते हैं!!
लाल की हर आकाक्षो में हम,
नत मस्तिक होकर जीते जाते है!!
बचपन में कोई भी बात हमको,
जख्म नहीं सुख की अनुभूती करती है!!
लाख शिकायते आती हे तब,
मेरे लाल को यूही करते बदनाम है!!
पत्ती की अन्जानी बलाओ से बात,
हृदय पर जख्म करती जाती है!!
घर से बाहर जाते हे काम काज ,
डर लग जाता हे अंजानी अनीती से है!!
प्रिया और लाल की आँख मिचौली में,
लाल जीतता हे तो जिया खुश होता हैं!!
समय का चक्र बढता जाता है,
प्रिया का रस गुण बन जाता है!!
लाल बाते छुपाना सीख गया ,
झूठ बोलके बहलाना आता हैं!!
माँ फिक्र करती दिन रात है,
लाल को माँ की स्नेह की नहीं चिंता है!!
प्रिया को अब मेरे झीक पर भी,
डाँक्टर के पास ले जाते है!!
हो अगर कोई पीङा अब तो,
रात जाग कर मेरे साथ काटते है!!
जो चोट देती हे मुझको वो काम,
अब नहीं करते करना चाहते है!!
मेरे कहने से पहले ही सब अब,
इशारो में ही समझते जाते है!!
लाल हो रहा दूर मेरे खेल में,
ममता में कोई नहीं कमी है!!
दुनिया के रंग में रच गया लाल,
आई बहु तो और भी रंग बदला है!!
माना पत्नी संगिनी तुम्हारी है,
कर्तव्य हे सुख दुख को साँझा करना है!!
जितना हे फर्ज लाल का निभाता हैं,
बनता बुढापे की ज्योति लाल है!!
निकळता कोई जालिम लाल है,
तो बीतता बुढाप बृद्धा आश्रम है!!
पर प्रिया बुढापे में हम सफर है,
हम हृदय हे काया रूप प्रिया हैं!!
ज्योति बनाया हे लाल को हमने,
कब छोड दे साथ हमारा है!!
ममता फिर ही निस्वार्थ माँगती,
लाल की सलामत की दुआ हैं!!
प्रिया से बढा न कोई हे हमराज है,
बुढापा देता हे सबसे एसहास है!!
अजब ये खेल हे गजब ये खेल है!
जिदगीं की रेल हे रिस्तो का मेल है!!

बुधवार, 16 अगस्त 2017

कहने को आजाद हूँ,

कहने को आजाद हूँ,
मगर आजाद हूँ कहाँ?
नापने को आकाश हैं,
मगर जमीं का मोहताज हूँ!!
ये कैसा पक्षपात हैं?
आरक्षण की भेट चङता,
सामान्य युगुल समाज है!!
कहने को आजाद हूँ,
मगर आरक्षण विष हैं!!
आज भी हम पर,
कोई करता राज है?
घूस का महाजाल हैं,
हर तमगा बेहाल हैं!!
कहने को आजाद हूँ,
मगर घूस महाजाल है!!
धर्म की औट कर,
दंगा फसाद हैं करते?
सत्ता की रंगरलियाँ ,
जनता पर प्रतिघात करते!!
कहने को आजाद हूँ,
मगर धर्म ही कहर हैं!!
अपृश्यता का बोलवाला,
गरीब का भी कोण भाया?
बाहुवली करते हे राज,
कानून का करते परित्याग!!
कहने को आजाद हूँ,
मगर वाहुवली का राज हैं!!
आंतक का नया हे रूप,
नक्सल आतकवादी कहर हैं?
कब जन बने शमशान ,
हर पल डर का साया है!!
कहने को आजाद हूँ,
मगर दशसत का गुलाम हूँ!!
नारी की दैयनीय दशा ,
हर वर्ग पर प्रहार है?
दहेज भूड हत्या करते पाप,
अश्मत पर होते प्रहार है!!
कहने को आजाद हूँ,
मगर नारी उपभोग है”!!
गरीब की आवाज लुप्त,
अमीन की आवाज झनकार?
पैसे का रूतवा हे आज,
कानून को करे विमुख!!
कहने को आजाद हूँ,
मगर अमीरो का राज हैं!!
अन्न राज हे किसान,
कर्ज बना जी जंजाल हैं?
आत्मदाह करते हैं किसान,
भूमि अधिग्रहण की फास!!
कहने को आजाद हूँ,
मगर किसान बेहाल है!!
कहने को आजाद हूँ,
मगर आजाद हूँ कहाँ?
नापने को आकाश हे ,
मगर जमीं का मोहताज हूँ!!
(आकाँक्षा जादौंन)

मंगलवार, 1 अगस्त 2017

गाँव की छवि

पौ फटते ही पंछीसुर में राग सुनाते है,
खेत खलियानो से खुशबू मंद2 आती है!!
बीगी 2 खुसबू की दस्तक मन को हरसाते है!!
गाँव की छबी मनोरम मन को मोहते है!!
हर घर आगन में तुलसी का पौधा औषधि की याद दिलाती है!!
पंचायत का लगता जमघट भेदभाव भूलजाते है!!
संस्कृति की कल्पनाओ का साक्षातकार रूब रूह देखते है!
धोती कुर्ता सिर पर पंगढी और पाव में जूता देखते है!!
सिर पर पल्लू साडीं में लजाती बलायें लाजबंती देखते है!!
मिट्टी में धमाचौकडी करते बच्चे खूब हरसाते है!!
पेङो से लहराती हवा और कोपले पीयु2  धून सुनाते है!!
कड कड से आती हे सुंगन्ध छाप हृदय में बस जाति है!!
दूध दही छाँच की सरिता घर आगन बहती जाति है!!
आ जाये कोई शहरी बाबु तो दामाद शी खातिर पाते है!!
मातम हो या खुशिया भाईचारा हर बिधि को मिल वाँटते है!!
सध्या बाती की आवाज भी मिठास रस घोलती है!!
खुले आकाश में सोना तारों से बतलाना चाँद को देखते है!!
दादी नानी से किस्से कहाणी सबको खूब भाते है!!
गाँव के बिना भारत की किलकारी अधूरी है!!
खेत खलियान के बिना जीवन का आधार अधूरा है!!
किसान तेरे बिना हर प्राणी ही अधूरा है!!
तुझे करू बंदना बार बार तुझ बिन सब हे सूना सूना,,,,,,!!
(आकाँक्षा जादौन)www.samajakanksha.com