सोमवार, 18 दिसंबर 2017

याद बहुत आते है वीते पल





जव से एन एन एस( राष्ट्रीय सेवा योजना) का टूरकैम्प’ की भनक काँन में पढी तव से सव लङकियों में फुसफुसाहट शुरू हो गई। वार्षिक टूर पर नहीं गये तो अंक नहीं मिलेगे। इसका महत्व आने वाले समय में पता चलता है।किसी प्रशासनिक नौकरी के लिए पहले कदम में इसका महत्व दिखता हैं। अंक रूप में विद्धार्थी के लिए जल रूपी संरक्षण हैं। अंक के रूप में नौकरी में तय मानक रूपी में यह अनुदान का काम करता हैं। स्नातक के प्रथम वर्ष में प्रवेश के लिए फार्म भरा जाता है, जिसमें कुछ नियम होते है अगर आपने श्रम के रूप में प्रत्येक रविवार को आठ घंटे के रूप में कार्य किया तो विद्धार्थी को  3 से 5 अंक और दो वर्ष में 10  दिन का टूर किया तो 8 से 10 अंक का प्रमाणित रुप में अंक पत्र दिया जायेगा। आठ घंटे के रूप में प्रत्येक रविवार को भाग लेकर श्रम तो कर ही रहे थे, जिसमें पोलियो दवा पिलाना कालेज की साफ सफाई, शिक्षा का महत्व बताना, नशा से हानियों के प्रति जागरूक कराना। इस प्रकार के कार्यक्रम से विद्धार्थी में श्रंम के प्रति चेतना जागती है और भेदभाव का खण्डन होता हैं। सदभावना,सदविचार का उदय होता है। शर्म और अपने विचारो को विना झिझक के  व्याख्या रूप में प्रस्तुति करना ,जिसके लिए सांस्कृति रूप का मंचन किया जाता है। प्रत्येक रविवार को लतीफे, कविता पाठ, कोई नाटक रूप में अपने विचार प्रस्तुति करना ,गीत गजल से अपने सुरो को पहचानना, अपने विचारो को खुले रूप में समाज के सामने प्रस्तुति करना जैसे, निवन्ध, कला के रूप में अपने अंदर के विचारो को रंगो के माध्यम से पटल पर विखेर देना जैसे कार्यक्रम होते थे। इतने सारे विकल्प थे जिससे अपने आप को पहचानना अपने अंदर छुपी प्रतिभा से साक्षात्कार कर सकते थे। पर यह दौर आत्म मंथन का नहीं होता है शर्म और लाज के घूघट में लजाते वाल वालाये है। यह दोर खुद से द्व्द आकृषित मनोदशा में विचलित करने वाले रहस्य से भरा होता हैं।विपरीत की तरफ झुकाव प्रेम में प्रफुल्लित धारावाहिक देखना, फिल्म के गीत गुनगुनाना, फिल्म देखना, अपने सपनो मॆं खोये रहना होता है। कोई लक्ष्य निर्धारित नही होता है क्या करना हैं.कभी यह करना है तो कभी वो करना है। जो दृढं संकल्प से लक्ष्य निर्धारित कर लेते है उनके लिए सुनहरा भविष्य वाँये फैलाके स्वागत करता है। जो भटका होता है उसके लिए भविष्य में कदम कदम पर मुश्किलो का सामना करना पढता हैं।
   इसवार 10 दिन का टूर कैम्प का आयोजंन वृंदावन में होना था जिसमें पाँच कालेज के विद्धार्थी भाग लेना था। उस पाँच में नारायण महाविद्धाल का नाम भी अंकित हुआ। सर ने जव से बताया कि कैम्प में जाना आवश्यक है अगर नहीं गये तो अंक के अनुदान में कटौती की जायेगीं।जितनी सफलता मिलनी चाहिए अपने श्रमदान से वो नहीं मिल पायेगी। छोटे से कसवे में जहाँ अकेले आगरा तक जाने की अनुमति नहीं थी, न स्वयं जा सकते थे वहाँ 10 दिन के कैम्प के लिए कैसे अनुमति मिले? लङको के लिए कोई समस्या नहीं है पर लडकियों के लिए आने वाले भविष्य निर्माण में योगदान देने के लिए पहली सीढी है। अपने परिवार से दूर अकेले अपने मित्रो के साथ 10 दिन के कैम्प में अपने आप को भाग ही नही वल्कि अपने आप को प्रस्तुति भी करना था। हजारो विद्धार्थियो के वीच में अपनी प्रतिभा का अनुसरण भी करना था। सर ने जव कहाँ तव से एक ही वात चल रही थी कि परिवार वाले जाने की अनुसति देगे, या वस लङकी होने का समझोता करना पढेगा।हम सव जो सोंच रहे थे वैसा कोई भी अडचन नहीं हुई वल्कि सहज ही माता पिता से जाने की अनुमति मिल गई। शायद माता पिता जानते थे अंक का अनुदान भविष्य में क्या महत्व रखता है। जहाँ सामान्य वर्ग में कठिनाई से नौकरी मिल पाती है वहाँ यह अंक का अनुदान भविष्य का स्तम्भ है। जिसकी जव आवश्यकता हो तव सिर्फ एक कारण के कारण उम्रभर पछतावा न रह जायें। शायद माता पिता जानते थे, हम सवको जाने की अनुमति मिल गई थी। हम सव सहेलियों में उत्साह भी था और एक अनकहाँ डर भी था जितने विश्वास से माता पिता ने जाने की अनुमति दी है उस विश्वास को वनायें रखना है। जहाँ छोटी छोटी वातो का वतगड वनाके समाज में प्रसाद वितरण कर दिया जाता है वहाँ पर अपने अपने अनुसार मीठे में मसाले मिलाकर चटकारे लेकर वाते कही और सुनी जाती हैं। आज के दौर के सी सी टी कैमरे के रूप में जगह जगह व्यक्ति खुद मिल जायेगे। जिनका यही काम है लडके लडकियो की गतविधियो पर नजर रखना। लोगो का क्या है वस माता पिता पर अपने बच्चो पर विश्वास रखना चाहिए। वही विश्वास को लेकर हम सव वस में वैढकर वृंदावन के रोमाचिंत वृतांत्त पर निकल गये। सहेलियों के साथ पहला और शायद आखरी 10 दिन का जीने और दुनियाँ को अपने अनुसार समझने का मौका था। खुलकर विचारो पर अवव्यक्ति प्रकिया देना, वहस करना तो शामिल ही नहीं था, वस अपने सहेलियों के वीच वाते करना किसी की टाँग खिचाई करना कभी कभी किसी को लेकर परिहास करना तक ही सीमित था। दुनियाँ में क्या हो रहा है क्या सही है क्या गलत है इससे कोई लेना देना नहीं था। शर्म लज्जा तो इस दौर के घूधट है जिससे कभी निकले ही नही कभी निकलने की कौशिश भी करते पर वदनाम के डर के कारण खुद की सुंन्दरता को निखारा ही नही। खुले वाल आँखो में काजल मंद मंद मुस्कान को कभी सामने लाये ही नहीं। हम सव सहेलियाँ एक से एक महान थी अपनी सौंन्दर्य को निखारने की वजाय दवाके छुपाके रखते थे ...अगर सुंदर दिखाई दिये तो कालेज जाना मुश्किल हो जायेगा। मनचले लडके कैसे शव्दो को कह कह के आना जाना दुर्भर कर देगें। अगर किसी तरह की दुराचार की खवर घर पर पढी तो कालेज ही वंद हो जायेगा। हम सव ऐसी भेष भूषा वनाते थे कोई देखे भी नहीं...वालो में तेल डालकर गुथी चौटी ,दुप्पटे को लहजे में सभालके पिनअप करके डालना। सूट सलवार मे कोई विषेश तरह की डिजाईन नहीं वस साधा सूट,वालो को विषेश तरह से कभी सभारा नहीं न कटे न छल्ले निकालना, न हाथो में कंगन वस एक घङी सोभा देती थी। इस तरह का सभारा और इसी रुप में पूरी पढाई कर दी। एक वात जानते थे सजने सभरने के लिए पूरी उम्र पढी है। अव सवकी शादी के वाद व्यक्तत्व में वदलाव है। देखने वाले यही कहते है सव वदल गये है। पोषाक ,अपने सौन्दर्य को कैसे निखारा जाता है, कोई इनसे सीखे। जव जो समय की माँग तव वो करना हमेशा फायदा ही होता हैं।
    हम सव और भी सहपाठी के साथ 10 दिन के कैम्प पर निकल पढे। आर्ट वर्ग और साईस वर्ग के विद्धार्थियो का सम्मिलित कैम्प था। सवके अपने अपने मन में विचारो का आना जाना तो क्रियाशीलता है। वस अपने सफर पर थे हम सव उसके हमसफर लङके लडकियो का संयुक्त रूप से कैम्प था दोनो ही वैठे अपने ही धुन में आंन्नद के साथ सफर पर वढ रहे थे। सिरसागंज से वृंदावन की दूरी 160 किलोमीटर है,आगरा 80 किलोमीटर पढता हैं। आगरा के वाद मथुरा उसके वाद वृंदावन। हम सवकी मंजिल भी वृंदावन में जाके रूक गई।
          वृंदावन के फोगला आश्रम में सवके ठहरने के लिए जगह सुनचित की गई। फोगला आश्रम में जितने भी कमरे थे, सव कमरें राष्ट्रीय सेवा योजना के माध्यम से श्रंमदान विद्धार्थियो के लिए और उनके साथ आये प्रोफेसर के लिए सुनचित की गई थी। एक कमरे में पाँच विद्धार्थी ठहर सकते थे। हमारा कमरा क्रम एक सौ ग्याहर था । यादें जो जुडी थी इसलिए भूलना और भुलाना मुश्किल हैं। लङकियों के लिए अलग और लङको के लिए अलग व्यवस्था थी। एक तरफ लङकियों के लिए क्रम अनुसार आश्रम के दूसरे हिस्से में लङको के लिए। अगर कहाँ जायें कार्य के उपरान्त कोई भी लङका या लङकी एक तरफ से दूसरी तरफ आ जा नहीं सकता था। अनुशासन का पहला पाठ यही था। जितना सरल हम समझ रहे थे उससे कठिन अनुशासन होने वाला था।
      सव महाविद्धालय के विद्धार्थियों को प्रागण में वुलाया गया। 10 दिन की कार्य तालिका और अनुशासन के प्रति नियम वताना था, उन सव नियम का अनुशरण करना था।अनुशासन का पालन नहीं किया तो सजा तो कुछ नहीं थी पर फिर भी भुगतान करना पढता था। अनुशासन और नियम इस प्रकार थे....सुवह की चाय विस्तर पर नहीं मिलेगी इसी प्रागङ में प्रार्थना के उपरान्त चाय नाश्ता मिलेगा। 8 वजे तक सवको उस प्रांगङ में उपस्थित होना था। 9 वजे जो कार्य दिया जायेगा उसका अनुशरण करना था। 2 वजे द्रोपहर का भोजन ....4 वजे कार्य प्रणाली ...6 वजे शाम की चाय, 8 वजे शाम का भोजन,9वजे सांस्कृतिक कार्यक्रम में प्रत्येक महाविद्धालय के विद्धार्थी को भाग लेना था। कैसे कौन कव लेगा इसके लिए एक दिन एक विद्धालय के विद्धार्थी प्रदर्शन करेगे। अपने अपने विद्धालय की तरफ से एक लङकी और एक लङका को संचालन कर्ता की तौर पर नियुक्त किया गया। हमारे विद्धालय की तरफ से माधवी को संडालन कर्ता वनाया गया। जिसका दायत्व था कि समय से प्रागड में उपस्थित रहने के लिए सवको कहना। कहाँ जाये तो अर्लाम का काम करना था। कोई वात अपने विद्धालय के प्रोफेसर से कह सके ...उस संचालन कर्ता से वाकी लोग अपनी वात को रख रखे और उस  समस्या का समाधान किया जा सकें। प्रागंङ में समय का पालन नहीं किया तो सजा के तोर पर चाय के उपरान्त चाय नहीं मिलेगी, भोजन के उपरान्त भोजन नही मिलेगा। समय का विषेश ध्यान रखना था। यह अनुशासन जीवन में हर चींज का महत्व दर्शाने ने लिए व्याप्त थे।
      पहला दिन तो एसे ही वीत कहाँ, दूसरे दिन का आगाज हुआ। सुवह 8वजे प्रागङ में समय से पहुँना था। सव जोश के साथ उठे अपने दैनिक कार्य से पूर्ण होके सवसे पहले पहुँच गयें। सवसे पहले मै उठ गई क्योकि मुझको स्नान करना होता था...वरसो से एक नियम था विना स्नान किए अन्न न ग्रहण करती थी। अव कोई नियम वना लिया है तो उसका पालन करना स्वयं पर होता है। अपने सुविधा के लिए वना लिया अपनी सुविधा अनुसार तोङ लिया। जीवन में कोई संकल्प न करो अगर करो तो उस संकल्प को पूर्ण करना उतना कठिन है जिस प्रकार हिमालय पर चढना। मेरा कोई संकल्प नहीं था वस इतना था स्नान तो रोजाना करना है तो स्नान करके के उपरान्त ही भोजन किया जायें। वस उसका की पालन कर रही थी। आस्था का दीपक कही प्रज्जलित किया जा सकता हैं। वस आस्था होनी चाहिए..यह हमारी आस्था थी कि नवम्वर के महीने में ठण्ङे पानी से सुवह सुवह स्नान करना। जोश के साथ सव प्रागङ में एकत्रित हो गये। प्रार्थना हुई सवको टीम रूपी एक एक दिन प्रार्थना करनी थी। प्रार्थना के उपरान्त चाय नाश्ता किया। 9वजे पंक्तिवंद हाथो मे झाङू लिए, गली गली सङक सङक निकल पढे. यह नजारा देखने वाले की कमी नहीं थी।2002 में अगर मोदी जी प्रधान मंत्री होते तो हम सवका नाम भी स्वच्छता मिशन में अंकित हो जाता। स्वच्छता जैसा कार्य भी किया था। गंधगी से लिप्त गोविद कुंङ को कहाँ जाये तो जीण उद्धार करने का दायत्व हम सवके ऊपर ही था। जिस कुंङ में मिट्टी और कचङे से पटा पढा था उसमें पानी संरक्षण के उद्देश्य से कार्य किया जा रहा था। सव टीम वनाके कार्य कर रहे थे। चैन वनाके तशले में मिट्टी और कचङा वाहर निकाला जाता था। फवङा कुदाल से खुदाई की जाती थी। आश्रम से तो स्वेटर पहनके आते थे और यहाँ मेहनत रुपी पसीने से पहने हुए कपङे भीग जाते थे। पहली वार मजदूर का एहसास हुआ वह कितनी मेहनत करते है और यहाँ थोङी सी मेहनत में माथा पकङ के वैठ गयें। कुंङ का तो पहला ही दिन था तव यह हाल हो गई थी। द्रोपहर के भोजन के समय अनुसार आश्रम में पहुँच गयें। जिसको स्नान करना था जो भी करना था करे। पर आराम का कोई समय नहीं मिलना था। 4 वजे कोई न कोई अतिथि का आगमन होता था, अपने विचारो से चेतना जगाना चाहते थे पर यहाँ सवको उनके गलत समय पर भाषण झुलझुलाहट ही लाते थे।
        भोजन का प्रवंध तो अच्छा था। हर दिन नया नाश्ता,द्रोपहर के भोजन में और शाम के भोजन में अलग अलग सूची अनुसार वनाने का आदेश था। थकान और भूख से व्याकुल भोजन देखकर  पहले पाने की चाह में अनुशासन भूल जाते थे। यह दृश्य शादी समारोह से कम नहीं लगता था। मेहनत करने के वाद का भोजन का स्वाद क्या होता है ,इससे सव भली भाति परिचित हुए थे।
रात्रि को सांस्कृति समारोह में अपने विद्धालय को उच्च दिखाने की प्रतियोगता जन्म ले चुकी थी। हमारे विद्धालय की प्रतिदिव्द्धी आगरा विद्धालय के सेनजोंश से था। हमारे पास कोई अभिनय प्रस्तुति करने के लिए साज सामान नहीं था। उनके पास उस अभिनय को प्रस्तुति करने के लिए साज सामान था। शायद उन्होने पहले से ही रूपरेखा तय करके ही आये थे या साज सामान मंगाया था। अपने विद्धालय को उच्च विजय वनाने के लिए सोये हुए अभिनय जागने लगे, चुप्पी तोङके वोलने लगें। इस तरह के अभिनय निकलने लगे थे जिसको देखकर पहली वार देखने वाले दाँतो तले उँगली दवा लें। अभिनय प्रस्तुति के वाद खुद पर यकीन करना मुश्किल होता था। सरस्वती वंदना, कविता पाठ, गीत ,नाटक प्रस्तुति ,पागल का अभिनय,शरावी का अभिनय। उस वक्त तक मेरी कोई चेतना जागृति ही नही हुई थी अगर हुई होती तो स्वयं रचित कविता पाठ या नाटक की रूप रेखा से परिचय कराते। तव मेरे मन में एक अनयास, डर, शर्म, झिझक ने अपना कव्जा कर रखा था और आज कोई डर नहीं है मेरे यह करने से परिहास का पात्र वनूँगी, या शावाशी का वस अपने अंदर वसते शैलाव, करूणा, मात्रत्व, दोष को शव्दो मे पियोके प्रस्तुति कर देते हैं। जैसे जिसने सांस्कृति के रूप मॆं परिचय दिया आज भी सवके ह्रदय में न मिटने वाली छवि वनके वस गई है।
     अनुशासन ने सवको लाचार वना दिया था। वेचेनी चिङचिङापन सिरदर्द क्रोध ने अपना वसेरा वनाना सुरू कर दिया। गोविंन्द कुंड की सफाई के दोरोन पसीना के दुवारा पानी वाहर निकल जाता है ,ऊपर से गर्मी मेहनत करने के वाद थकान ,न आराम के लिए समय मिलना वस समय प्रणाली के दुवारा कोई न कोई कार्य होता रहता था।जिसके कारण अचेत होते विद्धार्थी की हालत खराव हो रही थी। 2 वजे वाद  थक के चूर हो जाते थे कि आराम मिल जाये थोङा सो लिया जायें पर  कहाँ आराम था। किसी न किसी अतिथि का आगमन होता था, मस्तिष्क को पकाने वाले कोई न अमल करने वाले भाषण से रूवरूह होना पढता था। न भूलने वाली घटना ने अपनी दोस्त से झगङा करक लिया। एक तो सिर में दर्द हो रहा था मेरी वार्तालाप में हिन्दी के समावेश के साथ ग्राम की भाषा का मिलना एक कारण है। मेरी सहेली शुभचिन्तक हमें सुधारने के लिए कहती भी है पर वह समय न सोंचने का न सुधरने का होता है । जव क्रोध पर अंकुश न हो तो सही कथन भी गलत ही लगता है। यह भी तो गलत है हमको कैसी भाषा मे वार्तालाप करनी है. क्षेत्रीय भाषा हमारे शरीर पर रंग रूप के समान है खुद को सुंदर दिखाने के लिए चहरे को सौन्दर्य प्रसाधन दुवारा छुपा लेने से क्या सत्य को छुपाया जा सकता हैं। नही भोजपुरी हरियाणवी जैसी मिठास नही इसलिए व्यक्तत्व निखरने की वजय उस ग्रामीण रुपी भाषा के कारण दव जाता हैं। वह दौर था ही किसी की न सुनना जो हम है वैसे ही खुश है। आज भी जव हम वादविवाद के लय में आते है तव ग्रामीण भाषा का ही प्रयोग करते है। हमको वातों की चाशनी में हिन्दी और अग्रेजी के शव्दो का मिश्रण करके परोशना नहीं आता हैं। इसलिए पहली वार मुझसे मेरी वातो से प्रभावित न होनो स्वाभाभिक है। दिन प्रतिदिन सम्पर्क में रहने से शायद मेरी वातो के साथ जीने की मजवूरी होती है या मेरी आदत से समझोता कर लेते है। मै भी मानती हूँ अपने व्यक्तत्व को निखारना है तो शव्दो की चाशनी में मिश्रण करना ही पढेगा। हमारी वातो में चाशनी न होने के कारण नमकीन मठरी सवको खानी पढती है कोई मीठी खाना चाये उसके लिए मीठी नही है। खा इसलिए कभी नमक का स्वाद वनके रह गई ।  सव शुभचिन्तक होने के वावजूद अकेला महसूस होता हैं। अव यह सव सोंचना छोङ दिया हैं। हमें कोई स्वीकार करे तो ग्रामीण रूप  के साथ न कि रूप पर पर लेप लगाके। हमारी वार्तालाप का क्या स्थर है उसी स्थर के साथ। हमें आज भी पढे लिखे उच्च दिखाने के लिए  हिन्दी कम अग्रेजी का अधिक प्रयोग करते है,या दिखावा करते है कि हम आज के वातावरण के साथ मेल जोल करते है। हिन्दी में वोलना लिखना नीचता दिखना जैसा समझते हैं। अगर ग्रामीण भाषा में वोलने लगे तो उसको जाहिल गवार की उपाधी से सम्मान करते है। यह हमारे देश की सवसे वङी समस्या है इसी के कारण प्रतिभाये पहचान के वावजूद खो जाती हैं। हम भी झूठे दिखावा के वीच में अपने आपको को जकङा सा महसूस करते है। सवके पास सामने को पढने की दृष्ठी है यह तो आप खुद जान सकते है कि सामने वाला कितनी आपको इज्जत दे रहा हैं या अपको नीचता दिखाने की कोशिश कर रहा हैं। हमें अपनी भाषा के कारण अपनी सहेली से झगङा भी करना पढा। वात इसके उपरान्त कुछ और भी थी .. अपनी दोस्त से ही अपेक्षा करते है कि वह समझे, घर पर वंदिश हो,न समझने वाला हो  दोस्त से ही उम्मीद रखते है। जव वह भी परिवार की तरह करने लगे तो क्रोध आ ही जाता है। उसी क्रोध की अग्नि में  अश्को के सैलाव उमङ पढा था । हम दोनो को और सहेली मना रही थी, पर इतना जरूर था किसी ने किसी की गलती नही वताई न किसी का पक्ष लिया। वैसे हम में कभी भी झगडा नहीं होता है। यह भी एक यादगार पल है। मुझे कोद्ध बहुत जल्दी आ जाता है जिससे रिश्ते विगङ जाते है पर दूसरी तरफ धैर्य, शाहस,अपनत्व की कला में पारगंत रूची है सवको मोहने वाली हैं। उसकी वातो से ही लोग प्रभावित हो जाते हैं। मैने कभी उसके चेहरे पर क्रोध की रेखाऐ नही देखी हैं। जहाँ भी जायें सवको मन मुग्ध करने वाली अनौखी छवि है।रश्मी के पास वातो का पिटारा है पर उन वातों में भी एक कला है सवको अपनी तरफ आकृषित करने की। उस दौर में सुनना नई चीजो को जानने की जिज्ञाशा रहती है। सवको उन वातो में वाँध कर रखना। यह एक कला है जो आज कही खो गई है। माधवी वस हाँ में हाँ मिलाने वाली है किसी के प्रति न वढा चिढाकर वयान करना न भडकाना एक दूसरो की गलती नहीं निकालती वल्कि पर्दा डालकर आगे वडती है। सवको  प्रेम से वाँध कर रखना,अलग ही निराला ढग हैं। सीमा अपने नाम के प्रति ही ही कभी सीमा का उंलघन नहीं किया,अपने ऊपर विश्वास का स्थर वरकरार रखा है,चाये वो दोस्ती के प्रति या घर परिवार के प्रति आदार की भावना रही है। अंजुल ने अपने पढाई के क्षेत्र में हर साल उच्च अंक  के कारण प्रतीक रूप में चाँदी के सिक्का के रूप मे सजोके रखे है। हम सव में कभी भी प्रतियोगता किसी भी कार्य के लिए नहीं रही । पढाई के लिए साज सामान में एक दूसरे की मदत के लिए विना कहे खडे रहते थे। पीठ पीछे चुगली करना उसके मुँह पर उसकी तारीफ और उसके मुहँ पर उसकी तारीफ किसी और की चुगली करना, कभी जाना ही नहीं। किसी अन्य को हमारे मध्य हस्तक्षेप करने पर उसको मुहँ की खानी पडती थी । हम सव एक दूसरे की तागत थे। कोई भी एक दिन न कोई आये तो कालेज में मन नहीं लगता था। इन्ही पलो के कारण वीते पल वहुत याद आते हैं। सवको एक दूसरे को सभालने के लिए हम मिलके खङे रहते थे। इसी के कारण कोई सैध न लगा सका, तो आज कैसे अकेले रह सकते थे। हमको और रूची को मनाया गया दोस्ती में जायदा देर तक नाराजगी ठीक नहीं हैं।
        अनुशासन ने जीना दुर्वर कर दिया था पर हमको सीखना जरूरी था कि मजदूर दो वक्त की रोटी के लिए कितनी मेहनत करते है। मेहनत के वाद भोजन का स्वाद वङ जाता हैं।सैनिक अनुशासन का पालन गम्भीरता से करते है उनके सामने तो यह कुछ भी नहीं हैं।
कही कही प्रेम के अंकुर भी फूट रहे थे, पर यह उम्र ही ऐसी है। सवकी अपनी अपनी सोंच है उसको नजर अंदाज करके आगे वढते है या प्रेम के कल्पनाओ में गोते खाते है। घर से अलग रहने की पहली विदाई का एहसास था। कहता कोई नहीं था पर रात को छुप छुपके नीर रिसते जरूर थे। आज के जमाने के फोन की आजादी तो  नहीं थी, टेलीफोन से ही भवनाओ का आदान प्रदान होता था। पर यह सुविधा भी हर घर में सुलभ नहीं थी। आस पङोस या टेलीफोन वूथ का प्रयोग करके ही की जाती थी। जिसके घर पर टेलीपोन था ,उन सवने टेलीफोन वूथ पर जाकर वात की। वात करते करते भावनाओ के नीर रिस कर टप टप गिरने लगें। सबने एक दूसरे को सभाला फिर हँसी के गप्पे वातचीत, टाँग खिचाई मंजाक करने लगें। दिन भर की थकान तो होती थी पर देर रात जागते रहते थे, यह पल जी लेना चाहते थे, कल फिर या दुवारा साथ साथ गुजारने का मौका मिले न मिलें। एक एक कर के दिन गुजरने लगें। आखरी के दो दिन  शेष थे।
         सुवह से शाम तक अनुशासन और समय के अनुकूल सारणी का अनुसरण किया। प्रोफेसर सर ने कहाँ किसी को रंगोली वनानी आती है। हम रंगोली वनाने का प्रयोजन समझ न पायें. सवने मना कर दिया इससे पहले झाडू हाथ में लेकर नारे लगाके गली गली गुजरते थे। नारे लिखने के लिए कहाँ गया था. सिलोगन क्या वला होती है इससे अनभिग्र थे। आज दीवाली पर रंगोली सवसे अलग और सुंदर दिखने के लिए तरह तरह की डिजाईन वनाते है। सिलोगन  वच्चो के कार्यकिय्रा में यह सव सामिल हो चुका है अव कुछ भी नयापन नहीं है। वस हमारे जमाने में नया था। दो लाईन के नारे भी न दे पायें वस हँसना और टाँगखिचाई अपने दिवा स्वप्नो में ही खोये रहते थे। अच्छी तरह सांस्कृतिक कार्यक्रम में भाग लेने के वावजूद दूसरा स्थान प्राप्त कर सकें। आने वाले अतिथि के स्वागत में हमने रंगोली नहीं वनाई वल्कि आगरा विद्धालय से जोन्स के विद्धार्थी ने रंगोली भी वनाई और सिलोगन भी नारे भी लिखे। इसी वजय से उनका प्रथम स्थान आया। कौन अतिथि आने वाला है इन सवसे हम अनभिग्र थें। हम एक दूसरी जगह जाने का आदेश मिला, जहाँ सामने सुंदर सा पार्क था ...पर हमको इधर उधर भटकने की आजादी नहीं थी। एक कक्ष में जाकर वैठ गयें। रोज की तरह अनचाये भाषण सुरू हो गये। इतना कहाँ गया आने वाली अतिथि मान्य उमा भारती है , किसी को भी फोटो खीचने की सक्त मना थी। हम भी कैमरा ले गये थे पर सव फोटो नि किय्र हो गये। तव रील लगाई जाती थी फोटो खीचते समय कैमरा जमीन पर गिर गया और रील वाहर के वातावरण के सम्पर्क में आ कर खराव हो गई। कैम्प की गतिविधी के लिए फोटोग्रापर और रिकोडिग भी होती थी । सव विद्धालय के विद्धार्थी को ग्रुप फोटो खीची गई थी।
      देर तक इंतजार करने के वाद मान्य उमा भारती आई..आते ही अभिन्नदन में सव खङे हो गये फिर अपनी अपनी जगह पर वैठ गये। शांत होने का आदेश और अनुशासन में रहना था। उमा भारती ने सव में से किसी एक को खङे होने का आदेश दिया. यह देखकर हम सव भी नजर चुराने लगे कि हमको खङा न कर दें। कुछ सवाल पूँछे शायद कुछ कार्य चल रहा था उसकी जानकारी के लिए खङा किया था कि कैसा काम चल रहा है। यह सव जाने के वाद पता चला, किसलिए खङा किया था। अव सवको प्रमाण पत्र देने थे.. सवसे अच्छा काम करने के लिए वही प्रमाण पत्र दिया गया। एक उस लङकी को जो काम के दोरान अचेत हो गई थी । दूसरा गुंजन को जव हमने सुना तो दंग रह गये सवके मन में प्रश्न था ऐसा क्या अच्छा कार्य किया जिसके कारण प्रमाण पत्र मिला है। तव मेरी सहेली ने वताया इसके पापा देतागिरी में रहते है। हम जव आश्रम में थे , तव साँझ को इसके पापा यहाँ के संचालन से मिलने आये थे। उस वक्त पहली वार राजनीति का दाँव समझमें आया। अच्छा कार्य नही वाहूवली रूपी नेता की चाकरी से वहुत कुछ वदला जाता है। उसी वदलाव का प्रमाण मेरे नजरो के सामने है नेता आये अपना परिचय दिया और वाह वाह लूटी सर्वोच्च का प्रमाण पत्र  दिलवा दिया।  कभी तो वच्चो को खुद कुछ कमाने दिया करो ...क्या हर जगह राजनीति ठीक नहीं है। हमारे घर से या किसी और के घर से तो कोई आया नहीं था फिर यह क्यो आयें? मौका को भुनाने तो नेता ही जानते है। इतना वढा कार्यक्रम अधिकारी की देखरेख में किया जाता है ऐसे आयोजन सरकार ही कराती है जहाँ कुछ सीखने को मिले सदभावना जागृति हो एक अच्छे इंसान वन सकें। पर हर जगह नेतागिरी बहुत से सवाल छोङ जाती हैं। जो हुआ सो हुआ पर हम सवको इन प्रमाण पत्र से मतलव नही था। वस पल दो पल मायूसी फिर से मुस्कान,इसी के साथ कार्यक्रम की भी समाप्ति हो गई। इतने दिन अनुशासन के दायरे में रहकर सीखा ही था ,वक्त की कदर सिखाती है कल पर नही टालना जो करना है आज ही करो,कल पर टाल दिया तो मुट्ठी से रेत फिसल जाने जैसा अनुभव होता हैं।
             वृंदावन में आये है और मंदिरो के दर्शन न करे तो ऐसे कैसे हो सकता है। वृजवासी होने का आज खुद सजोने का मौका था। थकान और अनुशासन की वेङियो से आज पंछी आजाद हो गया था। कही भी किसी को जाने की अनुमति नहीं थी। संचालन कार्य प्रणाली पर हम सवकी जिम्मेदारी थी। यह दौर ही था मन मर्जियो से जीने का उचित अनुचित में फर्क नहीं कर पाते है वस सव इसमें फँस जाते है एक वार करना तो चाहिए फिर चायें उसका परिणाम उचित हो या अनुचित। इसी को ध्यान में रखकर वृंदावन में घूमने यहाँ वहाँ जाने के अनुमति नहीं था। आज अनुशासन से आजाद है निकल पढे वृंदावन राधा कृष्ण के पावन कण कण से धुन गूजने जैसा महसूस होता है। अव प्रश्न होगा हम तो कही वार गये है हमको तो ऐसा सुनाई नहीं दिया। जव मन में भक्ती की चरम सीमा का आलंघन हो, जग में व्याप्त हर जीव में कृष्ण राधे की अनुभूति होती है तो फिर वस काँनो में एक नाम ही गूंजता है श्री राधे राधे ...... वृंदावन के वासी राधे राधे कह कर ही आभार,सम्वोधन प्रकट करते थे। हाय हैलो नमस्कार, हाथ मिलाना जैसा प्रकट नहीं करते थे। राधे राधे कहने में वृजवासी होने का अपना ही आन्नद है ऐसा लगता है  बहुत कुछ वदल रहे है पर सुंगध तो वही है जिसको कैसे वदला जा सकता है। गुलाव को किसी में सम्मलित करो पर खुशवू को वदला खुद से छलावा करना जैसा है। हम सवके सामने अपने वास्तविक को छुपाके आज के परिवेश में जीने की कोशिश करते ,पर हिन्दुस्तानी ही रहेगे जिसकी पहचान कण कण में ईश्वर वसते है। वृजवासी है तो राधे राधे, रघुवासी है जय श्री राम....राम राम की ध्वनि रोम रोम में वसती ही है। ढोलक मजीरे के संग राधे राधे के कीर्तन गान तो गली गली की सोभा हैं। अग्रेजो ने निर्माण कराया मंदिर प्रसिद्ध है अग्रेज भी वहुत थे जो हमारी संस्कृति में खोते देखे राधे राधे के गान में खुद को सम्मोहित करते देखा। लम्वा टीका केसरिया धोती कुर्ता रंग गोरे से पहचान होती थी कि यह अग्रेज है ....मन में एक अटूट विश्वास की चेतना जाग रही थी ...मुरली वाले की छलिया आकृषित आभा में एक वार कोई आयें तो अपने छलिया में अपना ही वना लेते है इसका प्रमाण हम मंदिर में देख रहे थे। वैसे तो गली गली में मंदिर है ..पर जो हमें विशेष अपनी गाथा कहते थे वहाँ वहाँ गयें। गोविंद कुंड से कही कुंड थे उनमें जल था। हर मंदिर में एक वात थी मंदिर के पट समय समय पर खुलते थे। रास लीला की पोषाको से एक घर शोभामान हो रहा था वहाँ पर हर सामान रखा हुआ था। कठपुतली का सामान वढा सा नगाडा, रंगमच का वङा सा मंच। सवको अपनी और आकृषित करता था। दुकानो पर वाल गोपाल के पोषाको से सजी थी दुकाने, प्रसाद और पूजा सामग्री से गली गली सुंगधित हो रही थी। वृंदावन प्राणी को भक्तिमय के अथार्य सागर में लेती चली जाती है....उस भक्ती को कुछ शव्दो में कहना वेईमाने होगी।

         अव घर लोटने का समय आ गया था, पर जाने क्यों ऐसा लग रहा था जैसे कुछ छूट रहा हैं। ऐसे पल अव कभी नहीं लोट के आयेगे। यह पल जीवन के सवसे खूवसूरत यादे होती है...न कमाने की,न कल के लिए वचत की वस खुद के सपनो में जिये रहते है। घर से जायदा स्कूल कालेज में अच्छा लगता हैं। खुद के अंदर झाँकने का मोका मिलता है, खुद से मिलते हैं। नये परिवेश में जीने का पहला पढाव यही है। अच्छे साथी मिले तो जीवन सार्थक होता हैं। यही संगत गलत हो तो जीवन नासूर वन जाता हैं।बहुत कुछ सीखते है पर यही पल याद आते है। दायत्व के माया जाल मे इस कदर जकड जाते कभी फुरसत के पल भी जी सकें। कभी विछङे मित्र से सामना हो जायें तो वस देखकर यही लगता है काश कोई छडी होती घुमाकर वीते पल मे चले जाते। इस माया चक्र के दायत्व में ऐसे फँसे है कि सुगम सरल नेट के दुवारा भी वातचीत नही हो पाती हैं। बहुत कुछ वदल गया है,सोंच विचार. परिवार माहोल.....इसी वीच में जी भर के हँसना ,टाँग खिचाई,मजाक एक दायरा वन गया है...उस दायरे से निकल कर परिहास किया तो कही रिश्तो में दूरी न आ जायें। इतने सालों मे बहुत कुछ वदल गया है। जो पहले चुप चुप रहती थी वो वोलना सीख गई,सवाल जवाव करना,तर्क वितर्क, सही गलत कहना सीख गई। सवका व्यक्तगति पहले से वदल गया है। भाग दोड की जिंदगी में दोस्तो को याद करने का समय भी नहीं हैं। पर आज खुलके विचारो को कह सकते है पर फिर भी सीख देना दूरी को वढाती हैं। किसी को अपनी वात को थोपना नहीं चाहिए वस आज की यही चाह है। सवको अपने अनुसार जीने का हक है अपने अनुसार वोलने का हक हैं। जो जैसे परिवेश में रहता है उसे वैसे ही आदत हो जाती है। जो तुम अपना समझ के कह रहे हो उसको वही वात गलत लगें। यहाँ शुभचिन्तक का दृष्ठी कोण इतना है जैसे भी हो जहाँ है वहाँ खुश रहो..कोई भी वला न आयें।  साथ में हँसना जीना वो जाने कहाँ गये पल........