रविवार, 13 नवंबर 2016

राजनीति जाल

कीर्तिभान  जिन्दावाद ... कीर्तिभान  जिन्दावाद की आवाज़  वातावरण में गूँज रही थीं ..... फूलों के हार कागज़ से बने फूलों के हार से गर्दन झुकी जा रही थीं पर फूलों की माला एक के बाद एक गले में  पड़ती जा रही थीं। पटाखो की लड़ी पर लड़ी चलाई जा रही थीं। मिठाई से एक दूसरे के मुँह मीठा किया जा रहा था। दूसरी वार प्रधान पद की वहुविजयी की ख़ुशी जो थीं। जनता जनार्दन ने बहुमत के साथ विजयी जो बनाया था.दूसरी वार जीतना पांच साल के कामकाज का प्रतिफ़ल होता है। यह सावित करता हे कि  जनता की कसौटी पर  खरा उतरकर  दूसरी वार जीतकर कीर्तिभान ने विपक्ष को जता दिया कि जनता ने कियो  चुना है ?जनता के लिए और परिवार के लिए हर्ष और उल्लास का पर्व था। घर पर अभिनन्दन के लिए राह निहारी जा रही थीं। वोट की गिनती के वाद वाहर का नजारा था, विजयी घोष के रथ रूपी जनता के साथ ट्रेक्टर में सवार हो कर घर की तरफ़  काफला   चल पड़ा। कीर्तिभान के भाई ने  वैगनार गाड़ी में चलने क़ो कहा,"कि विजयी की रात हे ट्रेक्टर में बैठकर जाना ठीक नही हे ",विपक्ष पर हार का सदमा है कोइ अप्रिय घटना क़ो  निमन्त्रण न दे दे। इतना समझाने के वावजूद भी कीर्तिभान न माने और कहाँ ,'ये मेरी जीत अकेली नही हे ग्रामवासी की जीत है, हम ग्रामवासी के साथ जायेगे और  काफले के साथ चल पडे।
                        रात अपने आँचल में सितारे के जगमगाते  फूलों  की छाव सबके ऊपर बरसा रही थीं ,किसी से कोई वैरभाव नही सबपर घटता हुआ कृष्ण पक्ष का  चाँद शीतलता दे रहा था। ऊवड़ खावड़ जगह जगह गड्ढे रेगरेग कर चलता ट्रेक्टर ट्राली में बैठे ग्रामवासी  की कसरत खूब हो रही थीं ,गड्डा आता तो 6 इच जितना ऊपर उठ जाते फिर धड़ाम से नीचे आ जाते ,ट्रेक्टर में बैठकर सफ़र का रोमांच अद्भुत है ,हिलोरे खाती नाव में बैठे ऐसा एहसास  ट्रॉली में अनुभव होता है जो कभी नाव में बैठे ही न हो उनके लिये होले होले धीरे धीरे झूले में झूलने का एहसास का  अनुभव किया जा सकता है। चालक ने स्थाई रास्ता न जाकर दूसरा  कच्चे रास्ते से ले जाने लगा,शंका की दृष्ठी से सबने एक साथ एक स्वर में प्रश्न करने लगें ?काये इधर से ले जा रहे हो ?चालक ने उत्तर दिया ,"तुम सब तो पीके मस्त मल्हार गान लगें हो ,काऊ बात की चिता है ?हमसे बड़े भइया ने दूसरे रास्ते से आने की कही है,बात कह ही रहे थे कि सामने से बेगनार आती देखी जो पहले निकल गई थीं रास्ते पर कोई घात तो न लगाये हे ?जो शंका थी अनयास नही थीं।बड़े भईया ने धीरे स्वर में  कहा ,"कीर्तिभान अब तुम हमारे साथ चलोगे. स्तम्भ पूरी गेंग और हसला के साथ घात लगाये बैठा है ,ये रास्ता ख़तरे से भरा हे ,तुम सब इस रास्ते से चलो हम भी साथ चलते हे ,,जो मल्हार गायें जा रहे थें, सब चुप हों गये ,जैसे साप क़ो देखकर चुप्पी साध लेते हे। धीरे धीरे ट्रेक्टर अपनी मन्जिल पर पहुँच ही गया। स्वागत से जायदा स्तम्भ की हार के चर्चे कहाँ ?किस किस के साथ घात लगाये था। घर वालों ने ज़ोर दार स्वागत किया ,आख़िर दूसरी वार बहुत अंतराल से विजयी का तिलक जो हुआ था,,,... पूरी रात बातो में काना फूसी में हार की मज़ाक नाटकीय अभिनय प्रस्तुती में ही बीत गई।

                 सुबह होते ही पूरे ग़ांव में घूम घूम कर जुलूस निकालने की तैयारी ज़ोर सोर से होने लगीं। बड़े बुजर्ग ने रात  अनहोनी घटना से बचके निकल आने के कारण जुलूस न निकालने की सलाह दी ,,,पर नये ख़ून की पीढ़ी नये उवाल कहा मानने क़ो तैयार थे ,ढोल नगाड़े पटाख़े  डीजे साउंड सब सजा लिया था ,,,,इस वार जुलूस शानदार होगा ,पिछली जीत के मुकाबले इस वार भारी बहुमत से विजयी हुये है। बढ़े बुजर्ग की सला मसुवरा को बन्दिश समझते हे ,दुनियां क़ो समझने का तजुर्वा और नई सोंच मिलती हे तब नवप्रकाशित उज्ज्वल भविष्य निर्माण होता है ,बिना एक को साथ लिये अधूरी शिक्षा के समान हे। यहाँ पर भी बड़े बुजर्ग की बात क़ो नज़र अंदाज किये विजयी घोष का उत्थान दिखाने पूरे ग़ाव में चल पड़े,....कीर्तिभान जिन्दावाद,,,,,,जव तक सूर्य चाँद रहे तब तक  कीर्तिभान का नाम रहेगा,,,,,,,जोरसोर से डीजे के साउंड पर  नाचते गुलार उड़ाते जा रहे ,महिलाये  पुरूष फूलों की मालाओं से अभिनन्दन कर रही  हे। चारों तरफ़ विजय घोष के नारों से गुजयवान वातावरण था ,जव पास में स्तम्भ का घर आया तो नये यवुकों ने चिढ़ाने के उद्देश्य से ज़ोर ज़ोर से गले की जितनी क्षमता थीं उस क्षमता से नारे लगाने लगें अब तो नारे के वोल भी बदल गये थे ,,,,,कीर्तिभान की कीर्ति फैल रही ,,,,स्तम्भ चला शून्य की और,,,,, ख़ुले शब्दों के प्रहार से हार के आक्रोश को ये शव्द भड़की आग में घी का काम करने लगें जिससे आग और भड़क गई,,,,,स्तम्भ घर में ही था ख़ुशी के माहौल में अचानक मातम छा गया,,,स्तम्भ आँखों में हार का प्रतिशोध  लिये सब्जी काटने वाला चाकू लिये चहरे को गमछे से ढक लिया भीड़ क़ो चीरते हुये ,,,चाकू को कीर्तिभान के पेट में भोंक दिया ,,और वार कर पाता इससे पहले आस पास समर्थन के लोगों ने स्तम्भ को दबोचा पर बचके भाग गया पर जाते जाते गमछा खुल गया और पूरे  काफले में सोर हो गया ,,,,,,,,,,स्तम्भ ने कीर्तिभान को चाकू भोंक  दिया।                  
                   पेट में चाकू गड़ा हुआ देखकर जानकारों ने किसी क़ो भी छूने से रोका और निकालने से भी ,,,,ताकि डॉक्टर ऑपरेशन से निकाल सकें .असहनीय दर्द की पीड़ा और रक्त रिसरिस कर निकल रहा था खून से लथपथ था ,अगर चाकू निकल लेते तो रक्त क़ो रोकना असम्भव और बचाने के सारे उपाय निष्फल हों जाते ..तत्काल एक पल को गवाये हॉस्पीटल ले गये , परिवार के सदस्य औऱ हितेशी  शोकाकुल में डूव गये,,,,कीर्तिभान की भागिनी ह्र्दयथा  और माँ अचेत अवस्था में पहुँच गई... जब ये खबर सुनी।हास्पीटल में डाँक्टर ऑप्रेशन थ्रेटर में सर्जरी के दुवारा चाक़ू निकालने की   कोशिश कर रहे है .वाहर परिवार के सदस्य और हास्पीटल के वाहर जनता का मेला जुड़ा,सुभ चिंतक ठीक होने की कामना कर रहे तो कोई मुस्कान का मखोटा पहने जलन की पीड़ा क़ो शांत होने का  मौका मिला उसका पूरा फ़ायदा उठा रहे थे ,इस कामना से कि अब तो मौत की खबर ही मिले। स्तम्भ बिल्कुल सही किया है जायदा ही घमंड आ गया था ,प्रधान क्या बन गया अपने आप क़ो राजा समझने लगा है , सीघ्र से सीघ्र मौत की खबर सुनने क़ो मिले तो हमें सकून मिले,जो बेरी थे अच्छे बनने का ढोंग करते थे वो सव यही दुआ मांग रहे थे। स्तम्भ फ़रार हों गया जिसको पुलिस हर उस जगह तलाश कर रही जहाँ होने की उम्मीद हो सकती थीं।
                            ह्र्दयथा  को जब होश आया तो हास्पीटल को जाने लगी जव अचेत हुई तो घर पर रोक रखा था ,व्याकुल थीं और सहमी दूसरी तरफ़ ख़ुद क़ो होशला भी दे रही थीं अगर में हिम्मत खोने लगीं तो सवको कौन सवालेगा ?भानजी हमेशा मेरे हौशले और हिम्मत की सहारना करते थे पूरे परिवार क़ो  एक सूत्र में पियोंके रखा हे कितनी ही मुश्किल कियो न आ जाये अपनी हिम्मत न खोना क्योकिं एक बात हमेशा कहते थे जिसने मुश्किलों के समय मस्तिष्क क़ो शून्य किया तो जीत की उम्बीद दिखने से पहले ही हार हों जायेगी ,मस्तिष्क क़ो क्रियाशील बनाके रखा तो कोई ना कोई उपाय जरूर निकलेगा ,,,,,,,ऐसी सारी बातें मस्तिष्क में फिल्म की तरह चलने लगीं।
                        पाँच साल पहले की यादों में चली गई ,जव बिना प्रधान पद के रहते ग्रामवासियो की सेवा करते रहते। रात क़ो गाँव में कोई भी बीमार हो जाता या किसी भी तरह की परेशानी हों तो बिना कुछ लिये मदद करते जैसे कि ट्रेक्टर की मदद से हास्पीटल पहुँचा देते ,पैसे न होते तो पैसे की मदद कर देते ,वेटियों की शादी  में सिलाई मशीन उपहार के रूप में देते ,बहुत जायदा गरीव हे तो दावत का खर्च भी उठाते ,गांव की जनता इन्ही अच्छाई के कारण चहेते बन गये थे। भविष्य रूप में स्तम्भ प्रधान था उसके अनैतिक व्यवहार के कारण जनता नकार रही थीं। राशन आता तो उसकी काला बाजारी कर देता एक चौथाई लोगों क़ो ही मिल पाता ,घास लेट और चीनी के दर्शन तो तीज़ त्यौहार पर ही हों पाते .गांव विकाश के लिये जो जो पैसा आता वो पैसा अपने महल बनाता ,कामकाज एक चौथाई ही करता सरकारी कर्मचारी क़ो घूस देकर सब मामला शान्त कर देता ,एक साल से कोई काम नही किया आने वाले चुनाव के लिये पैसा जमा करके रखा। ग्रामवासी इस प्रधान से तंग आ चुकी थीं क्योकि ग्रामवासी की जगह को अपने कव्जे में लेके अपना दबदवा कायम रखता था जो भी आवाज़ उठाता उसकी  सरकार दुवारा सेवाओ को बन्द कर देता। कीर्तिभान का  परिवार खटकता था रसूकदार नोकरशाही थे बिना प्रधान के पद पर रहते हुये जिला कार्यालय में पहचान थीं ,स्तम्भ के ख़िलाफ़ कोई शिकायत करता तो सेवाओ पर प्रतिबंद लगा देता तो कोई डर के कारण कीर्तिभान से शिकायत नही करता ,ग्रामवासी ने पहले भी ग्रामप्रधान के चुनाव के लिए साफ़ मना कर देता ,कहता हम ,'ग्रामवासी की बिना पद के ही सेवा करते रहेंगे ,इस वार के प्रधान चुनाव के लिए ग्रामवासी ने बहुत कहा पर मना कर दिया। कीर्तिभान ने अपनी आँखों से ऐसा देखा जिससे फैसला बदलना पड़ा ,स्तम्भ क़ो भला समझता था उसका पर्दा उतर गया .जव खेत में काम करने वाला मजदूर अचेत हो गया ,डॉक्टर ने बताया भूखे पेट रहने के कारण अचेत बताया ,कीर्तिभान ने घर जाकर देखा तो वहा की हालत देखकर आंसू बह निकले ,बच्चे भूख से व्याकुल थे कामकाज के पैसे नही मिले थे. मुफ्त राशन मिलना बन्द था और कोई साधन नही था। हमारे गाँव में आज ये दिन भी देखना पड़ेगा .. ,ग्रामवासी ने इस हालत का जिम्मेदार स्तम्भ क़ो बताया .विस्तार से क्या क्या  यातनाये दी   हर दर्द को बताया। स्तम्भ ग्रामवासियो के हक़ क़ो अपना हक़ समझ खा रहा था ,सबकी बाते सुनकर फैसला किया इस वार प्रधान का चुनाव लड़ेगे ,इस वार  महिला सीट थीं तो ह्रदयथा क़ो प्रत्यासी बनाके चुनाव मैं उतार दिया ,
             
                                             ग्रामप्रधान के चुनाव में वोटरों क़ो खरीदा जाता है। विपक्ष के हितेशी ग्राम के सदस्य नोकरी शहर में करते हे उनके वोट को काटके अपने वोट बढ़ाये जाते हे चाये उनके पक्ष के शहर में ही क्यों नही रहते हों। नावालिक के भी वोट बनवा दिये जाते हे .वोट बढ़ाना और काटना हार जीत का अहम हिस्सा होता है। देशी शराब के ठेके घर ही खोल दिये जाते हे पिवक्कडो की सुबह शाम लाइन लग जाती .एक वोट की क़ीमत शराब से खरीद लेते .कही कही  पिवक्कड़  दोनों जगह ही अपनी पौ बारह करते .इस चुनाव में एक बड़े गाँव में खर्चा करोड़ के ऊपर पहुचँ जाता है। मतदान पड़ने की एक रात पहले नोट देकर वोट ख़रीदे जाते है ,हलवाई ऐसे लगाये जाते जैसे घर में शादी हों.रणनीति की तह फर्जी वोट का भी प्रबन्ध किया जाता है जो मतदाता शहर रहते उनके वोट डाले जाते जैसे लड़कियों क़ो अपने रिस्तेदारों दुवारा लम्बी लाज का घूघट डाल के किसी की बहू किसी क़ो बताके  डाले जाते ,विपक्ष भी तीसरी आँख के तोर पर अपनी  सेना खड़ी कर देते ताकि कोई फर्जी वोट न पड़ जाये जव पहचान लिये जाये तो मुहजवानी लड़ाई शुरू हो जाती ये लड़ाई विस्तार रूप भी धारण कर लेती जो हाथापाई डण्डे तलवार घरेलू बम्ब के रूप में देखने क़ो मिल जाती।पेप्सी कोक की काँच की बोतल में पेट्रोल भरके मुँह क़ो कपड़े की परत दर परत गट्टर बनाके शीशी बन्द कर देते उस कपड़े में आग लगाके भीड़ के बीच ज़ोरदार धमाका का रूप लेके अफरा तफ़री सा माहौल बना देते। पता चल जाये कि कि मतदान पेटी में दूसरे प्रत्यासी के वोट बहुत पड़े हों तो उस बॉक्स में स्याही डाल देते या बॉक्स क़ो लेकर भाग जाते .स्तम्भ ने भी यही काम किया पर निसफल रहा और पकड़ा गया .जनता के चहेते कीर्तिभान की ह्रदया को विजयी बना दिया।


                                      पति की सफ़लता के पीछे फूल में छुपे खुसबू की भूमिका निभाती है जो पतिनी की सोच समझ क़ो मूल्य समझे अपनी बात कहने का मौका दे. ये न समझे तुम्हारा काम चौखट के अंदर तक की सोच है ग्रहस्थी की रसोई में क्या खत्म हो गया हे ?किस कार्य के लिये पैसे चाहिए बच्चों की देखवाल बस इतना ही कार्य है वाहर क्या करता हूँ  इससे कोई मतलव नही हे ?ऐसी सोच वाले बहुत मिल जायेगे पतिनी क़ो कुछ भी नही बताते हे  ये ग़लत हे। दोनों को ही घर के वारे में और वाहर के कार्यो के वारे में जानकारी होनी चाहिए ये बात अलग हे कि रुचि न ले.,जब पति पत्नी अपने अपने काम के वारे में बताते रहे तो बुद्धि का विकाश ही होता हे और सीखना चलता रहता है .सोच एक सी भली दो की जायदा कार्यगाह होती जो हल ख़ुद न कर सके क्या पता दूसरे की सोच हल ख़ोज दे। कीर्तिभान और ह्रदयथा  एक दूसरे को बहुत अच्छे तरह समझते थे .दोनों के बीच क़भी भी  ग़ुस्सा लड़ाई मन मुटाव नही हुआ .सब लोग उनके समझदारी अच्छे पति पतिनी होने का उदाहरण देते थे।

                                  प्रधान पद के साथ ज़िम्मेदारी और बढ़ गई उद्देश्य एक था ग्रामवासी के समस्याओं क़ो दूर करना जितना सरल सोच रखा था, उतना ही कठिन था .यहाँ प्रधान के ईमानदारी होने से सिर्फ ग्रामवासी की सेवा तो की जाती हे पर बिना धन के कैसे ?गाँव के विकास के लिये जो पैसा आता उस पर कितनो की नज़र गड़ी रहती जैसे इन घूस खोरों ने अपनी सरकारी नोकरी का अधिकार बना रखा हो। सेकेट्ररी, चपरासी ,कर्मचारी ,ऑफीसर सब एक ही थाली के चट्टे बट्टे है । पहले तो दोनों घूस देने के लिए राजी नही थे पर जब विचार निर्माणधीस हों उत्थान के लिये अग्रसर हों तो धर्म को धर्म विजयी बनाने के लिये महाभारत का चिंतन करना और गीता पाठ स्मरण करना चाहिये .दोनों  ने ये भी  ठान रखा था घूस लेने वालों का पर्दा पास करना हे। गॉव क़ो सम्रद्ध उत्थान प्रग्रतिशील की प्रेणा और गाँव के लिये बन गई। कोई भूखा नही सोता कोई वेरोजगार नही हर बच्चा स्कूल जाता जो जो योजनाये सरकार ने बनाई उन सबका लाभ ग्रामवासी तक पहुँचाया .जो कर्मचारी घूस ख़ोरी थे उन सबकी वीडियो बनाके नोकरी से ही बर्खास्त करवा दिया। अच्छे काम के लिये जहाँ जयकारा भी लगता हे वही ईर्ष्या के कारण दुश्मन भी बन गये ,जो मौके की फ़िराक में रहते थे कब मौका मिले और कीर्तिभान क़ो अपने रास्ते से हटा दूँ ,वो मौका दूसरी वार हार  के वाद मिला।

                            राजनीति जाल हे नेता मकड़ी चाये छोटी इकाई ग्राम प्रधान राज्य के मुखमंत्री या प्रधानमंत्री सब मकड़ी इसमें आने के वाद कोई वाहर निकल नही सकता ,अपने दुश्मन क़ो जाल में फ़साके मृत्यु के आग़ोश में सुलादेते है पर ख़ुद भी उस जाल से बच नही पाते। आज़ कीर्तिभान भी उसी राजनीति का शिकार हों गया ,हास्पीटल के ऑपरेशन थ्रेटर में ज़िन्दगी और मौत के बीच झूल रहा है।राजनीति भी जाल के समान इर्द गिर्द घूमती रहती है ,नेता अपनी तागत से अपने बनाये जाल में फ़साके तागत का वर्चस्व दिखाता पर ख़ुद भी बच नही पाता है।

                              

शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2016

दिवाली मेरे घर का पता दें दो

बता दो बता दो ख़ुशी को पता दे दो,
इस दिवाली मेरे घर का पता दें दो।।
हर कारीगर की नज़र डूडँती हैं,
आशा अभिलाषा से पूछती है ।।
दमक की ज्योति मुस्कान की झङी देदो,
बता दो बता दो खुसी को पता दें दो।।
एक प्रश्न हम सबसे पूछते है ?
व्यापारी नौकरशाही वोनस की आस करें,
दिवाली पर हर घर अरमान हैं सजतें।।
भारी छूट का पासा फैकें हैं व्यापारी ,
लक्ष्मी जी सब आगमन हैं करते।।
नौकरशाही को मिला वोनस तो,
लक्ष्मी जी की अनुभूती सब है करते।।
फिर हम क्यों? कारीगार ख़ुशी से दूर....
बता दो बता दो ख़ुशी को पता दें दो,
इस दिवाली मेरे घर का पता दें दो।।
फ़ुटपाथ चौराहा पर लगाई है फैरी,
आशा की नज़र हर राहगीर को देखती।।
कुम्हार के दीपको को दें दो बसेरा,
धुनकर की रूही को दें दो उजाला ।।
तेल के कीप को बुलालो घर आगन,
मिट्टी की प्रतिमाओ से चौकी सजालों।।
लताओ वेलो लङियो से दरवाज़ा सजालों,
रंगो से बनाके रंगोली अलख को जगालों।।
बता बता ख़ुशी को पता दें दो................
इस दिवाली मेरे घर का पता दं दो.........।।
ऊँची दुकानो के मेहमान जरा,
फ़ुटपाथ पर दर्शन तो दें दो।।
चीनी लडझडियो से भी आगें,
मेरे दीपको को भी घर का पता दें दो।।
फ़ुटपाथ पर सजें सामानो को साहिब,
अपने घर की मेम शोभा बढ़ा लो ।।
परम्पराओ में हमारी भी अरज कर लों,
फ़ुटपाथ से सब दिवाली की आस कर लो।।
बता दो बता दो ख़ुशी को पता दें दो,
इस दिवाली मेरे घर का पता दें दो..........।।
हर कारीगर की नज़र डूडती हैं,
आशा अभिलाषा से पूछँती है।।
दमक की ज्योति मुस्कान की झङी दें दो,
बता दो बता दो ख़ुशी को पता दें दो।।  

शनिवार, 24 सितंबर 2016

शर्तो पर जीना


शर्तो पर जीना छोङ दो

सह सकते है अनगिनत जख्म,  
तो शर्तो में जीना छोड़ दो!
पी सकते है अश्को का सैवाल,
तो शर्तो में जीना छोङ दो!
सरकार को कायर की संज्ञा देते,
शहीद के शहादत का हिसाब लेते!
कूटनीति राजनीति बेजोड जबङा,
पाक को चारो खोने चित है करना!!
युद्ध हर समस्या का समाधान नही,
घर घर से शहीदो की उठेकी अर्थी,
कितनो की उजङेगी माँग का सिन्दूर, कितनो की गोद होगी यूही सूनी!
सम्पति का कितना होगा विलाप,
पश्चमी से 20पीछे है आज हम,
और 20साल हो जायेगे ऐसे पीछे,
सोचो क्या मिलेगा होकर हमको!
परिमाणु बम्ब हुआ जो विध्वन्स,
देखना है इसका जो प्रतिफल,
जापान में जाकर कर लो साक्षात्कार!
रूस का प्रकोप आज भी झेलती पीणी!!
युद्ध पहला नहीं आखरी है विक्लप,
पाक के कमज़ोर नज्ब ली पकङ,
पाक के अंदर गृहकलह कराना ,
खण्ड खण्ड करके जख्म है देना!
बोखलाहट है पिछडने की उसकी,
देश बन रहे है मित्र हमारे सब,
विकाश के पथ पर कार्यशील ,
बोखलाहट निकलती ओछी हरकत कर!
गेहूँ में कंकड चुन चुन निकाल रहे ,
करता है घुसपैठ मार मार गिरा रहे, 
सीजफाईर का बराबर देते है जवाव,
पाक की हर प्रहार का करते प्रतिकार!
युद्ध चाहते है सब जनआधार तो,
मैसेज से खून उवाल लाते हो,
सिर पर बाँधकर निकलो तिरंगा,
सीमाओ पर दिखला दो उवाल!
हर वार सैनिक ही क्यों है शहीद,
तुम भी दिखला दो जौहर का उवाल,
मैसेज पर करते बेधङक प्रतिकार,
आज मांगता है देश तुमसे हिसाव!
सब देखने सहने को हो तैयार,
तो युद्ध हो जाने दो आर या पार,
नौ जवान सजालो देश करे पुकार,
छेङा है युद्ध का ऐसा अलाप!
शहीद का हिसाव हम सब उधार,
दिलेर शहीदो के परिवार को सलाम,
चाहत है यहीं पाक को दिखादे औकात,
 अपने देश के घर घर आँसू पी सकते है,
तो शर्तो पर जीना छोङ दो!
शस्कतीकरण हो रहा देश का ऐसा,
मित्रो का मिल रहा है समर्थन अपार,
पाक का नापाक पर्दा दिया उतार,
 आंतकवादी देश घोषित करने पर विचार!
 सह सकते है अनगिनत ज़ख़्म ,
तो शर्तो पर जीना छोङ दो,
पी सकते है अश्को का सैलाव,
तो शर्तो पर जीना छोङ दो!

मंगलवार, 20 सितंबर 2016

तपस्या का फल

 हल्के आसमानी रंग का घेर वाला सूट चूड़ीदार पजामी ,सूट के रंग में गहरे सिलेटी रंग की बाजू और घेर पर लगी किनारी रंग को निखार रही  है ,गले की डोरी में बधे घुघरु की आवाज छन छन मैं उसकी तरफ़ देखने को ललचा ही गया .हवा में लहराता दुप्पट्टा बिखरे बालों की घटाओ  में, मै सुध बुध खो गया .अपने हाथों से कही दुप्पट्टा सभालती तो कही घुमड़ घुमड़ आती जुल्फे चहरे पर उसको सभालती ,नटखट सा खेल खेल रही थीं मैंने ऐसे पहले कभी किसी को नही देखा क्यों मेरे मन में उसके रूप को देखने की तीव्र लालसा जाग रही थीं ?,क्यों इस प्रेम रूपी सरिता में बहने क़ो लालायत था ?दूर से उसकी मोहित कर देने वाली क्रियाये  देख पा रहा था .बच्चों क़ो क्या निर्देशन दे रही थी या कुछ कह रही थी मुझे कुछ याद नही बस उसको देखे ही जा रहा था.. प्रेम सरिता में बहे ही जा रहा था.मैं  खिड़की वाली शीट पर वेठा टकटकी लगाये उसको देख रहा था,चालक वार वार हार्न दुवारा  चलने का संकेत दिये जा रहा था  ,मै लालायत हो रहा था उसके रूप क़ो देखने के लिये पर चालक महोदय धीरे धीरे बस क़ो आगे बड़ा रहे थे ,मुझसे वो दूर हो रही थीं मै बेचैन हों रहा था, आज से पहले मेरे साथ कभी ऐसा नही हुआ. मन ने किया उतरके उसका दीदार कर लू पर न जाने क्यों नही उठा और वो बस के चलने के साथ ओझल हो गई। मै  बहुत दुःखी था अव कव दीदार होंगे या यही आख़री दीदार था  पर अचानक मेरी शीट पर कोई बैठा मै तो वाहर ही उसे खोज रहा चालक ने जोर से ब्रेक दवाये, अपने आपको सभालने के चक्कर में मेरा हाथ उसके हाथ से टकराया जो मैं  वाहर ही उसको खोज रहा मोह भंग हुआ उसकी तरफ नजर घुमाई तो हैरान था जिसको वाहर ख़ोज रहा था वो मेरे पास ही बैठी थी. उसको मैने आसमानी सूट से पहचाना ,मै बहुत खुश हुआ ,चाह तो रहा था कि उसको देखता रहूँ पर कही वो मुझको ग़लत न समझ बैठे कि उसको घूर रहा हूँ,उससे नज़र बचाके उसके रूप की सरिता में बह गया......... कानों में लीड लगाके गाने सुनने लगा। ...                                                 पास बैठी हे मेरे  मैं कितना खुश नसीव हूँ
 थम जाये वक़्त यही तो खुश नसीव हूँ..
.
  प्रीत क्या होतीं है आज मैने जाना है ..

  बैठी हो  तो नज़र तुमसे  चुराता हूँ ....
.                                                        
  वैसे एक पल नज़र हटाता ही नही हूँ

  भुला बैठा हूँ खुदको तुझमें भुलाके,,,

 थम जाये वक़्त यही तो खुश नसीव हूँ......

     आसमानी रंग का सूट चूड़ीदार पजामी,,,
                                                                                                       
 बलखाती जुल्फे लहराता दुप्पट्टा,,,,,,,,

                                                                                                            
 छनछन करते घुघरू खनखन करती चूड़ी
                                                                                                       
 प्रेम सरिता में बह चला खुशनशीब हूँ ,,,,
,                                                                                                       
 जादू भरी आँखों में काजल इतराता ,,,,,
                                                                                                         
 गुलाब सी  झलकती गालो से  लाली ,,,,
,                                                                                                          
मोती झरते मुस्कान जो उसकी भोली ,,, 
                                                                                                        
 कानों की वाली दमके गिरती हे विजली ,,,,,,
                                                                                                     
थम जाये वक़्त यही तो खुशनसीव हूँ .....
                                                                                                           
कहना हे बहुत कुछ नज़र चुराता हूँ ,,,,,
                                                                                                         
 ख़ुद से रहा दूर फिर क्यों ख़ुद से मिलता हूँ 
                                                                                                     
दुनियां क्या देखूं सब तुझमे नज़र आता हूँ 
                                                                                                       
जादू किया तूने तुझमे खोना चाहता हूँ ,,,,,, 
                                                                                                    
 थम जाये वक़्त यही तो खुश नसीव हूँ ,,,,,,,
                                                                                                      
पास बैठी हे मेरे मैं कितना खुश नसीव हूँ ,,,,, 
                                                                         

 अचानक चालक ने ब्रेक लगाये ,मैंने सभाला कही गिर न पढू  कही वो कुछ और न समझ बैठे मैं  जान बूझ कर गिरा हूँ ......पर मेरी नज़र उसकी नज़र से टकराई वो भी टकटकी लगाये मुझको देख रही थीं .आँखों आँखों में बाते हों रही थीं शायद जो अगन मेरे ह्रदय में उठी थीं वो अगन उधर भी थीं . सब कुछ बुलाके एक दूसरे क़ो निहारे जा रहे थे,अचानक  चालक ने उतरने का संकेत रूपी हॉर्न बजाया हमने अपने आप को सभाला उसने भी सभाला और कालेज की और जाने लगीं.. मैं  भी ठहर  कर देखता रहा और खुश हुआ कि दोनों की मंजिल एक ही थीं। कुछ दूर जाके वो रूकी पता नही क्यों?उसने पलट के देखा और मुस्कराके चली गई। मै बहुत खुश हुआ जैसे उसनें भी संकेत दिया हो और आगे बढ़ने का ,मैं उत्सुक था उसके बारे में कोन सी क्लास में पड़ती हे? कहाँ  रहती हैं ? क्या नाम है ?  मै उसको देखें ही जा रहा था कि दोस्त ने मेरे मन की बात पड़ ली। ये तो आठवाँ अजूबा हो गया जो कभी लड़की क़ो नज़र उठाके नही देखता था वो लड़की को देखें ही जा रहा हैं ,अरे यार इतना मत देख नज़र लग जायेगी ,   तू मुझसे उसके वारे में पूछे,'मै ही बता देता हूँ . इसका नाम स्पर्श हे ये हमारी ही क्लास में है,पर तुझको कितावो से फुरसत मिले तव तो प्रकृति के सौन्दर्य को देखे  .अपने आस पास कितने तरह तरह के फूल हे पर तू तो आई ए एस तपस्या का विश्र्वामित्र जिसकी तपस्या स्पर्श ने भंग कर दी। विसवा मन में सोच रहा था मेरी ही क्लास में,मैं अनभिज्ञ  था। यार क्या सोचने लगा?तू ख़ुशनसीब हे जो मुड़कर देखा किसी को भाव नही देतीं है .सब कव से उसकी एक मुस्कान के लिये तरस रहे हे.ये ख़ामोश सुध बुध सी रहती हे पता नही क्यों ?                                                                                                                        विसवा  अब हम स्पर्श के चहरे पर मुस्कान लाके ही रहेगे पर कैसे ?                                                                   शुचित ने विसवा की तरफ़ चुटकी लेते कहाँ ,"जा रहने दे पहले कितावो से तो निकलो जो खुद ही  मुस्कराता न हो वो मुस्कान क्या ख़ाक लायेगा।                                                                                                            विसवा :-यार तो सही कह  रहा हे पर उसके स्पर्श ने क्या जादू किया हे ?   एक पल के लिये भी ओझल नही हो रही है।                                                                                                                                                 शुचित :-ठीक हे मै कुछ करता हूँ।                                                                                                                  शुचित ने स्पर्श क़ो मैडम बुला रही हैं इस  बहाने से पुस्कालय में बुलाया .....उसके मन में कही सवाल थे, मैडम ने  क्यों बुलाया ?शायद नोट्स के वारे में बताना हों ?यही सोंचती जा रही थीं कि अचानक नज़र विसवा पर गई वैसे ही पीछे क़दम लिये और चलने लगीं।                                                                                                                      विसवा ने पुकारा :-रुक जाओ स्पर्श,मै कुछ कहना चाहता हूँ ,                                                                       स्पर्श ने बीच में  रोकते हुये कहाँ ,'कुछ मत कहो ,हर बात कहके नही की जाती ,कुछ हाल हालत भाव को देखकर बात समझ लेनी चाहिये ,जो लड़का पढ़ाई के सिवा कुछ और नही सोचता अपनी क्लास के क्लासफैलो के वारे में नही पता है. वो आज हमारा  इतज़ार कर रहा क्यों ?तुम शब्द कहोगे तव ही जान पायेगे ,नही...  प्रेम  हे ही ऐसा जिसे शब्द की नही एहसास की आवश्यकता होती हे। . हम अपने विसवा की तपस्या भंग नही करना चाहते हे। मुझसे पहले माता पिता का सपना पहले हैं । आधार भी उन्ही का है पहले उनका सम्मान  सपना बाद में कुछ और  ..    तुम यही सोच रहे हो? मैं  सब कुछ कैसे जानती  हूँ ? तो तुमने तो आज़ जाना हे मै तो क्लास की पहली साल से ही प्रेम  करती हूँ। हाँ मै खामोश क्यों रहती हूँ मुस्कराती क्यों नही   ... जब तुम अपनी तपस्या में  इतने लीन तलीन रहते हो तो फ़िर किसके लिये मुस्कराये?                                                                                                विसवा ; मेरे लिये मैने आज जाना और तुम बरसो से पर क्यों? मुझमें ऐसा क्या देखा ?                                      
 स्पर्श ; तुम्हारी सादगी अपने काम में लगन यही भा गई कब ?कैसे? कहाँ ?सिर्फ़ तुम में ही खो गई.  मैं बहुत खुश हुई थीं जव आपके पास मुझे बैठने का मौका मिला. चाहती हूँ कि आपकी अर्द्धागिनी बन हर सुख दुःख की भागीदार बनूँ  .  मैं और मेरा प्रेम इतना निवर्ल नही है जो माँ बाप के सपनो के बीच आ जाये। मुझको घर के वारे मैं आपके बारे मैं सब पता है। मेरा तो हक़  बाद में हैं पहले उनका हक़ पहले हैं। अधूरे सपने हैं आई ए एस  के रूप मैं वेटे को देखे। इस समाज ने असफलताओ के कारण माथे पर बट्टा लगा दिया है कि जो ढीगें हाँकने बाला क़भी कुछ नही कर सकता हैं। हमारी नज़र में आदर्श हैं जिन्होंने कभी भी बखान नही किया जो अधूरा रह गया हे आपको पूरा करना हैं। जिस तरह ज़मीन जायदाद कर्ज लेना या देना सब बच्चों को मिलता हैं वैसे ही  उनका सपना जो पूरा न हो पाया ,आपको करना हैं। मै अपने विसवा की तपस्या भंग नही कर सकती हूँ।               विसवा :-आपके कारण मेरी तपस्या कैसे भंग हों सकती हे ?अगर न मिली तो सब कुछ बिख़र जायेगा.जव से देखा तब से  एक पल भी और कही  मन नही लगा पाया हूँ. पढ़ाई में स्थिर न रह सका हर जगह तुम ही तुम नज़र आ रही थीं. अव कैसे हो पायेगा तुम्हारे बिना? तुमसे ही हर सपना हे और तुम ही हर सपने को पूरा करोगी। सच मेरा मन कही नही लगेगा .बस तुम मेरी हो जाओ मैं मम्मी पापा से बात करूँगा वो कभी मना नही करेंगे।            विसवा :-पता हे नही मना करेंगे पर मैं उनका सपना नही तोड़ना चाहती हूँ। प्रेम निर्वल बनाता हे कैसे सोंच लिया,राधे श्याम का  प्रेम  मिसाल है फिर हम आपसे दूर कहा हे आपके पास हे बस सच्चा एहसास होना चाहिए ,मुझको शक्ति बनाओ मैं आपके साथ हूँ हर पल पल.. मिलना लिखा हे तो हम जरूर मिलेंगे नही तो प्रेम बनके मेरे रोम रोम में बसे हो जिसको कोई आपसे दूर नही सकता हे। आप मम्मी पापा का सपना पूरा करो इसी बीच मैं आपका इतज़ार करूगी।  मैं  भी अपने माँ बाप के आँखो में भी आँसू नही देख सकती हूँ, उनका मेरे लिये सर्वमान्य  हैं  .इस शरीर पर कोई अधिकार जता सकता पर मेरे ह्रदय पर आपका ही प्रेम हे और जन्मान्तर रहेगा। मुझको कभी बेवफा मत समझना ,संसार के प्रिति दायत्व हे उनका भी निर्वाह करना हे। श्याम को राधे ने संसार के दायत्व  में प्रेम को बन्धन नही बनाया बल्कि शक्ति बनाया हे   .                                                                    स्पर्श :-तुम इतनी प्यारी प्यारी बाते करती हो मुझको मोह लिया हे, मै वचन देता हूँ, अपने प्रेम को शक्ति बनाऊँगा ,सबका सपना पूरा करूँगा तब अपने प्रेम क़ो  लेने आऊँगा।                                                                                                  दोनों ही अपने अपने रास्ते चले गये वक़्त क्या दिखायेगा ये तो वक़्त ही बतायेगा। विसवा  ने प्रेम क़ो शक्ति बना कर सबका एक सपना पूरा करने में लग गया। कव दिन महीने में और महीने साल में गुजरे दिन रात एक कर आखिर कार पाँच साल के बाद सपना सच हुआ। सब बहुत खुश थे विसवा ने अपने ह्रदय की बात मम्मी पापा को बता दी। मम्मी तो बहू के आगमन की तैयारी करने लगीं और मम्मी पापा के साथ   स्पर्श को बहू बनाने स्पर्श के घर को निकले। स्पर्श के घर की सजावट गाने बजाने शादी जैसा माहोल देखकर सबकी समझ से परेह था। सब सोच रहे थे आख़िर  किसकी शादी है जाने कैसे कैसे बाते मन में आ रही थीं। घर से दूर  ये दृश्य नज़र आ रहा था. विसवा अरमानों क़ो सजोये स्पर्श के लिये  पुष्प गुच्छ लिया जिसकी बातों ने प्रेम की शक्ति का अवलोकन कराया था। जव तक सपना पूरा न हों जाये तव तक न मिलना हे, न सम्पर्क रखना है ,इन पांच  वर्षो में एक पल भी स्पर्श को भूला नही था ब्लकि जब समस्या का समाधान न मिलता तो उसका निदान करती थीं। आत्मा का आत्मा से मिलन पहली मुलाक़ात में हों गया था आज तो औपचारिक रूप से प्रेम को सांसारिक नाम देना था. जव  मिलने का सोचा तव से स्पर्श दूर हों गई जो हर वक़्त साथ नज़र आती थी, आज क्यों नही ?विसवा समझ नही पा रहा था.जो देखा उसको  देखकर चौक...  गया पैरो तले ज़मीन ख़िसक गई जव स्पर्श क़ो फूलों से सजीं कार मै लाल जोड़े में दुल्हन बनीं जाते देखा तो मानो सबकुछ खो गया। यादों क़ो हक़ीक़त बनाके पांच  साल बिता दिये और आज किसी की दुल्हन बन चुकी  है  .....
                                                                                         
 आज़ फिर दिल रोया हे जिसको पल पल देख जिया खिलजाता था ...
                                                              
 आज़ हुई दूर दिल रोया हे दुल्हन बनी किसी की जिया दुखता है ......
                                                             
 आज़ फ़िर दिल रोया हे ..........................................................                                                                 कसूर तुम्हारा नही कसूर मेरा भी नही किस्मत का खेला है ,,,,,
                                                                      
 वफा मैने निभाया वेवफ़ा तू भी तो नही किस्मत का खेला है ,,,,
                                                                      
 जहाँ तेरा भी जहाँ मेरा भी मिलन नही किस्मत का खेला है ,,,,
                                                                        
 सपना तेरा भी सपना मेरा भी सच न हुआ किस्मत का खेला है ,,,,                                                                      आज़ फिर दिल रोया हे ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
                                                                     
 जन्म जन्म का नाता हे मिलना हे हमको किस्मत क़ो  हराना है ,,,
                                                                   
 टूटा न अब तक टूटने न दूँगा हौसला बदकिस्मत को झुकना है ,,
                                                                   
 इतज़ार कर रहा था इतज़ार करूँगा किस्मत  क़ो पलटना हे ,,,,,
                                                                 
 आना हे तुझको मिलना हे हमको किस्मत क़ो बदलना है ,,,,,,,,
,                                                                      
अब दिल को न रुलाना हे तेरे साथ  जीना हे ,,,,,,,,,,,,,,
                                            स्पर्श ने भी विसवा को देख लिया पर किससे कहे एक एक पल राह देखते देखते काटी थीं। ,उदाश चहरे क़ो माँ बाप बखूबी पड़ लेते हे जो नज़र में होते हुए कही और खोये रहते हे.स्पर्श की हालत जीता जागता पुतला थीं उसके मन की विग्न क़ो देखकर माँ ने कह दिया।,"वेटी तेरी ये दशा हम सबको कचोड़ती हे मेरे सपने तेरे लिए सर्वोपय  मेरे ह्रदय क़ो दुखाये बिना कोई कार्य नही करेंगी। चाये तू प्रीत की ज्वाला में झुलसती रहे... मै कितना भी पूछू पर तू कुछ नही बतायेगी, मुझसे तेरी ऐसी हालत देखी नही जा रही, मैने ख़ुद पता लगाया ,कि तेरी हालत क्यों  हुई हे ?,तुम यही सोंचती थीं हमको पता चलेगा तो ठेस लगेंगी मन दुःखी होगा।  वेटी मेरा सपना तो पूरा कर दिया .प्रोफेसर  बन अपने पैरो पर खड़ी हे भविष्य कैसा भी  तू मजवूत रहेंगी .आगे की जिंदगी तुम्हें किसके साथ बितानी हे  ये तुम्हारा फैसला होना चाहिये .बस मुझे तो लड़के के वारे में  जानकारी होनी चाहिए  कैसा हैं ? क्या करता है ?मैंने सब पता कर लिया है। वो भी तुम्हारी तरह अपने माँ बाप का सपना सच करने मैं लगा है। हम इतंजार कर सकते हैं ,स्पर्श को माँ की स्वीकृति मिल गई तो शादी के सपने बुनने लगीं जो हर लड़की बुनती है , पर किस्मत क़ो कुछ और ही मंजूर था..  सडक़ दुर्घटना में माँ बाप दोनों ही चल बसे .जाते जाते अपनी अकेली वेटी क़ो इस संसार में  कैसे छोड़ जाये,? इस संसार में अकेली लड़की खुली तिज़ोरी के सिवा कुछ और नही समझते है।  वेटी का हाथ अपनी सहेली के वेटे के हाथ में सोप गई जो विसवा का दोस्त शुचित के साथ शादी  हो गई।
                                                                                                                                                            
 आते आते बहुत देर कर दी  आज फिर दिल रोया हे .......
                                                                              
 पल पल गुजरा इतजार में पर किस्मत ने हराया हे .......

,                                                                                  
वेवफा न समझना दिल में तुमको ही बसाया हे ........

                                                                                   
 जन्म जन्म का बन्धन मैने तुमसे ही बाधा हे
,                                                                                    
 आज फ़िर दिल रोया हे तेरा जिया मैने दुखाया हे........

                                                                                   
हों सके तो माफ़ करना महको किस्मत ने

 हराया हे                                      
 यहाँ से फिर एक वार दूर हो गये क्या कभी क़िस्मत बदलेंगी या बस क़िस्मत के हाथों की कठपुतली बन वार वार  दूर होते रहेगे ?माँ बाप का आसीस था जो विफ़ल कैसे हो सकता था? कभी ठेस नही पहुँचाई थीं ,अपने बच्चों की आँखों में अधूरे सपने को साकार करना था, बस प्रभू से बन्दना करते थे. ये प्रभू मेरे बच्चे क़ो उसकी ख़ुशी दे दो।  विसवा अन्दर से टूट चुका था पर क़भी भी सामने नही आने देता था। ,धीरे धीरे बरस बीतने लगें आठ बरस बीत गये। संसार कभी थमता हे ये तो चलता जाता हे और चलता ही रहता हे .रोज की तरह विसवा योग में लीन था। माँ रसोई घर में चाय बना रही थीं कि टेलीफ़ोन की घन्टी बजी जनता अपनी समस्या के वारे में बताती थीं, विसवा सबकी समस्या विचारधीन होकर सुनता था और समाधान भी करता था .जनता के ह्रदयों पर राज करता था और जनता खुश होकर अधूरी इच्छा पूरी होने का आसीस देते थे। माँ बाप ने कभी शादी के लिये नही कहा जानते थे अगर कहेगे तो कर लगा पर जो अंदर ही अंदर रोता हे उसको और पीड़ा नही देना चाहते थे ,विसवा ने निःस्वार्थ जीवन देश के प्रति समर्पित कर दिया। घन्टी बजी जा रही थीं .......माँ ने रसोई से आवाज़ लगाई .....विसवा  फ़ोन उठा ले ...       विसवा ने फ़ोन उठाया और सुनकर हाथ से फ़ोन छूट गया .....स्पीकर की     इधर उधर टकराने की आवाज़ से   माँ रसोईघर से पूछा ..  विसवा क्या हुआ ?      कोई उत्तर न दिया  हास्पीटल में जाने को कहाँ ,            माँ के मन में कही प्रश्न थे? विसवा के माथे पर पसीना ऐसी गाड़ी में भी आ रहा था .बात तो गम्भीर थीं पर इसका उत्तर तो हास्पीटल में ही जाके  मिल सकता था .

                                                                                                         कमरे का दरवाजा खोला सामने तो शुचित बिस्तर पर लेटा सिरहाने स्पर्श बैठी सिर पर हाथ फेर रही थीं और  आँखों   से आँसू  झलक  रहे थे .जव विसवा को शुचित ने देखा तो हाथ के हिसारे से  अपने पास बुलाया ,स्पर्श ने विसवा को देखा तो दोनों एक दुसरे को  देखते रहे.....शुचित ने देखकर कहाँ ,"तुम दोनों को कौन अलग कर सकता हे जव बने ही एक दूसरे के लिये ,'                                   
विसवा -कुछ मत कहो शुचित तबियत और खराब हो जायेगी ,                                                                          शुचित -मुझे कहने दो.....सबकी दुआए यही चाहती हे ,हमारे पास कम समय हे कव कौन सी सास आख़री हों .मेरे सामने तुम दोनों  प्रेम के बंधन में बध जाओ....यही मेरी इच्छा हे।  विसवा कुछ कहना चाहता था पर मना कर दिया ,स्पर्श का हाथ विसवा के हाथ में सोप दिया ,प्रभू ने इसी कार्य के लिये सास बचाके रखी थी और कहते कहते सास थम गई। सबने आवाज़ दी शायद इसी पल के लिए डेगू प्रकोप से जूझ रहा था .सबकी आँखों से आसू बह रहे थे पर अधूरे प्रेम को मिलाने के लिए सबका आसीस   जो था।  माँ ने स्पर्श को गले से लगा लिया।   

गुरुवार, 4 अगस्त 2016

ssahshee seema

गर्म लू क़े थपेङे बदन में  सुई चुबो रहे है । बार बार गला ऐसा सूखता है जैसे प्यासा हो कुआँ।ऐसे ब्याकुल प्यास मैं ठण्डा पानी मिल जाए तो अम्रत के समान देव दानव मै  कलह हुआ था, उस दृश्य का यहाँ साक्षात्कार हो जाता  हैं। ग़ांव मै गला तर करने  का माध्यम सुराई या मटका ही होते  हैं। जहाँ सुयंक्त परिवार के सदस्य की सख्या 20  से 25  के करीव हो ओर छोटे बच्चे हो तो उस घऱ मैं पानी को लेकर वाद विवाद होता ही रहता हैं। दिन भर 4  से 5  वार मटका पानी से भरा जाता हो ,वहाँ पानी ठण्डा पानी कैसे हो सकता हैं। जितने सदस्य उतने हाथ बार बार खोलना बंद करना इस कारण पानी ठण्डा नहीं हो पाता हैं। एक कारण डंडी वाले लोटे से न लेकर सीधे हाथ डालकर पानी लेना  ,बच्चे तो खैर लड़कपन मे होते है समझाओ भूल जाते हैं पर बड़े ऐसी           लापरवाई करते हैं तो उनको कोन समझाए। औरते वार वार कहती पर आदत से मज़बूर जो है। इस जेठ गरमी मैं मटके के पानी से अच्छा तो हैंडपम्प का पानी जयादा ठण्डा लगता हैं। ये स्थति हर ग़ांव मे देखने को मिल जायेगी।                                                                                                                                                                                                       दोपहर के समय सब किसी न किसी कार्य में संगलन रहते हुये ,ग़ांव मैं देख सखते है। युवक से लेकर बढ़े बुज़र्ग़ तक ताश के पत्तो में जमघट में मिल जायेंगे। कही दहला पकड़ ,कही शीप ,तीन पत्ती ,ओर कही तरह के खेल खेले जाते है। जोश होश वहश,गरमा ,गरमी के साथ अन्य दर्शकों  के लिये मंनोरंजन का मुफ़्त साधन मिल जाता हैं । ताश के खेल में महिलाओं के बीच बादशाह पकड़ का खेल बहुत लोकप्रिय हे। जिसकी तरुप हो तो सामने वाला इशारों से जानने लग जाता हे कि इक्का किधर है ?अपने साथी के पास इक्का हो तो बादशाह किधर हैं ?इशारों से चाल चली जाती है ये भी कला हे,जो इस खेल को समझ जाता है वो बादशाह बन जाता हे नही तो एक्के के हाथों बादशाह पकड़ता रहता है।                                                                                         जिन महिलाओं युवतियों को ताश खेलने का सोख नहीं होता हे उनकी अलग ही महफ़िल जुड़ी मिल जायेगी। उस महफ़िल में गढ़े  मुरदे  बाते,आज़ की बाते ,उसकी बाते इसकी बाते,हर गाँव की ख़बर तार बाबू के माध्यम से पता चल जाता हे। ये कोई चिठ्ठी पत्री बाटने वाला तार बाबू नहीं जो सब तरह की ख़बर रखें उसको तार बाबू संज्ञा दी जाती है। इस महफिल की सबसे रोचक बात या क़िस्सा किसका लड़का किसकी लड़की क़ो लेकर भाग गया। ऐसी ख़बर इस माहोल की जान हैं।                                                                                                         छोटे छोटे बच्चों को माँ डरा धमकाके दोहपहर को सोने क़ो कहती हे पर ऐसी गरमी मैं जिसको नींद आती हे वो ऎसे ही सो जाते हे पर बच्चे फुदक फुदक के वाहर भाग जाते हे। माँ डाँटती रह जाती हे।                                                                                                                                                                                              इन सबसे अलग एक अनहोनी घटना घटने को आतुर थीं,जिसका कोई सपने में भी जिक्र नहीं करता हैं। नकारात्मक पहलुओं क़ो विपताओ से घिरे हुए दृश्यों क़ो जागती आँखो से सपना नहीं देखते हे। जागती आँखो से सपनों को अपने मुताबिक साँचे में डाल लेते हे  और   खोये  चित में खो जाते है। रात  को बंद आँखों से अनय सपनों में  जो दृश्य आते हे वो हमारे मुतावक नहीं ,अपना कोई नियन्त्रण नहीं होता है। आते वही  है जिसका हमने कभी न कभी किसी किसी रूप में अवलोकन किया हो ,चाये चलचित्र के माध्य्म से या किसी के दुवारा कथन कहे हुए ही सपनों के माध्य्म से रात को आते है। जानकर हम कभी नकारात्मक सपनों को जागती आँखों से नही देखना चाहते है या बंद आँखों से दर्शन हो भी जाए तो डर से शरीर में प्रतिक्रयाए शुरू हों जाती है। डर इतना भयानक होता है कि सर्दी में पसीने में लथपथ ,यहाँ तक देखा गया हे कि विस्तर गीला हो जाता है। आवाज़ लगाना चाहते हे पर आवाज निकलती नही हे,ऐसा लगता हे किसी ने दवा रखा हो। जो अपने आप क़ो सर्वशक्तिमान समझते है या दिखलाते है उन सब की दशा भी इससे बच नही पाती है। रात के सपनों पर ज़ोर नही हे ये तो आते हे और आते रहेंगे।                                                                                                                                                             दोहपर का समय सूरज की गरमी से सब बेहाल परेशान ,माथे पर पसीना ,बदन पर पसीना आना ,वार वार प्यास लगना इन सब के वावजूद सब अपने आप को किसी न किसी कार्य में व्यस्त रखें हुऐ थे। घर में शादी की तैयारी जोर शोर से चल रही है। सबसे महत्वपूर्ण काम खरीददारी और निमन्त्रण पत्र लिखना होता है। निमन्त्रण पत्र छप चुके थे .,लिस्ट बनाई जा रही है ,जिन मेहमानों की लिस्ट बन चुकी थी ,उनके नाम से निमंत्रण पत्र पूर्ण लिखे जा रहे थे और याद रहे इसलिए लिस्ट पर टिक किए जाते। इसी बीच भूल चूक मेहमानों का नाम याद आ जाता तो उसका नाम लिस्ट में अंकित कर लिया जाता। भूल से कोई मेहमान छूट जाये ,तो वो मेहमान ता उर्म भर दोष रोपण देते रहते हे 'आप ने हमको शादी में बुलाया भी नही '..और न जाने कैसे कैसे मनगनत कहानी बताते रहते हे। सबसे खाश बात अमीरी गरीबी पर आके ठहर जाती हे,,सामने वाले को यही शक रहता हे इसी कारण से नही बुलाया हैं । बात तो कोई भी हो सकती है। सब स्वतन्त्र हे अपना मन हे कुछ भी सोच सकते है। नये रिस्ते मिल जाते हे तब पुराने रिस्तो को कोन पूछंता है। नये रिस्ते चमाचम  बर्तन हे जिनको सहेज कर रखा जाता हे पुराने बर्तन पुराने रिस्ते की तरह हे जिनकी कोई कदर नही करता है। इनको कोन समझाये पुराने रिस्ते कभी नये भी तो थे। वक्त के साथ सब कुछ बदलता है।                                                                          शादी का रिस्ता बहुत ही रख रखाव का होता हे छोटी सी भूल चूक,,,,,उम्रभर कहने और सुनने को घाव दिए बात हो जाती हे जो वक्त के साथ घाव तो भर जाते हे पर निसान याद दिलाते रहते है।                                                                                                                                                                                        जिसकी शादी तय हुई थी ,उसका नाम सीमा है। छोङ पढ़ाई में बाकी हर काम में होशियार है। चंचल स्वभाव तितली की तरह सबको मोहने बाली ,,,,,डरना तो जानती ही नही क्या होता है ?हर काम को सीखने की इच्छा होसला ओर बढ़ाती। घर में राइफल को ताकना ही नही बल्कि सबकी नज़रो से चुपके चोरी चोरी मेगनीज को निकालना फिर लगाना।,..भाई जब राइफल को नली ड़ालकर साफ करते तो गोर से देखती थी,.... भाई ने जब देखा तो कहा 'सीमा चलायेगी 'ये सुना तो जैसे मन मुराद पूरी हो रही हो जो इच्छा थी एक वार घोड़ा दवा के देखू कि सुना हे झटका  लगता हैं । राइफल चलाना एक कौशल हे बिना अनुभव लिए राइफल चलाना ख़तरे से खाली नही है। राइफल को चलाने का सही तरीका कन्धे पर रख कर चलाई जाती हे ,पकङ को मजबूत बनाके रखनी होती हे। पकङ मजबूत न होगी तो खुद चोट लग जायेगी क्योकि पीछे की और धक्का देती है। सीमा राइफल चलकर गद गद हो उठी ,जब अपने मुताबिक कोई काम पूर्ण हो जाये तो खुश हो जाती।                                                                                                                                                                                                                रूपवती तो हे ,भाई की चहकती बहन है जिसका दुलार से ललिया ललिया कहकर पुकारते है। घर पर ही नही गाँव में भी निडर के चर्चे मशहूर है। पुलिस का भी डर नही हे फिर चाये किसी को पुलिस से बचना हो। किसी गलत इरादे से नही पुलिस पकङ के ले जाती  तो उस व्यक्ति को खुद को जमानत देने का मौका नही  मिल पाता  है जिसको बेवजह गेंहू के साथ घुन होंने की सजा जो मिलती है। खुद थाने में हाजिर होक जमानत की व्यवस्था जो कर लेता है।                                                                                                                                               गाँव में प्रधान चुनाव का माहोल बहुत ही रोचक होता है। इसकी तैयारी एक साल पहले से सुरू हो जाती। अपने वोटर और विपक्ष के वोटर का आंकलन किया  जाता हे। अपने पक्ष के वोट बढ़ाना और विपक्ष के वोट काटना,. ये गाँव की प्रधान राजनीति का अहम हिस्सा है जिससे ही हार जीत का फैसला होता है। बिधायक अगर गाँव का आस पास का हो तो कोई अन्य तो जीत ही नही सकता। विधायक जिसको चायेगा वही जीतेगा फिर चाये कितनी नीचता पर क्यों न आ जाये। पुलिस वालो ने अपनी हक़ीक़त दिखला ही दी कि हम विधायक के टन्टू है। गाँव वालो की रजा से भाभी प्रधान चुनाव में जो खङी थी पर विधायक नही चाहता था कि जीते इसलिय पुलिस को टन्टू बनाकर रात में अपशव्द के साथ जाने कैसे बाते कहते ताकि चुनाव में बैठ जाये। रोज रात का नियम था आखिर कब तक चुपचाप सुने। एक रात सीमा ने बेधड़क जवाव दे ही दिया ,'आखिर तुम्हारा क्या बिगड़ा हे जो ऐसे शब्द कहते हो ,तुम्हारी टन्टू जैसी हरकतो के कारण कोई मान सम्मान नही देता हे। तुमको तो गेरतली के पेदे के समान हे जो मौका देखकर उसकी तरफ़ झुक जाते  हो । थोड़ी सी तो वर्दी का सम्मान करो ,हमे कुछ कहने से कुछ नही होगा ,,,,चुनाव नही लड़ेंगे पर चोर चक्के घूम रहे उनको पकड़ो। उसके वाद पुलिस ने कुछ न कहा और घर के पीछे से चुपचाप चली गई। सीमा ने छत से शेरनी की दहाड़ से जवाव दिया। जव दहाड़ से सो टके की बात कहे तो उसका जवाव किसी के पास नही होता। प्रधान चुनाव में हार का मुख देखना पड़ा। विधायक की सह से मतदान केन्द्र की जगह बदल दी गई और धड़ाधड़ ख़ुद ही वोट डाल लिये कोन कहता?किससे कहते ?सरकार जिसकी हो पुलिस भी उसी की होती है। इस हार का कोई अर्थ ही नही था।                                                                                                                                                                                     विधायक के बाहुबली का आतंक इस कदर छाया था कि रात को बारी बारी से चौकीदारी करके गुजरती थी। राज्य चुनाव में विजयी विधायक का समर्थन नही किया था उसी का प्रतिरोध इस तरह डराकर लिया जा रहा था। सूरज छिपते ही पूरा ग़ांव अपने अपने घर में छिप जाते थे ,दूऱ दराज खेतो पर अकेले जाना मुश्किल था. आठ से दस सदस्य इक्कठे होकर तव जाते थे। मकसद था पकड़ का जिससे मोटी फिरौती की रकम बसूलना ,क्योंकि विधायक को हार का बदला जो लेना था पर इस कार्य में हार ही मिली तो ओर आक्रोश में  था। प्रधान चुनाव में अपने समर्थन को  विजयी बनाया तब शांत हुआ। चौकीदारी के कार्य में सीमा कहाँ पीछे रहती ,घर की छत पर घास फूस की झोपड़ी बना ली थी उसी में बारी बारी से मोर्चा सवालते थे। शरहद जैसा माहोल बन गया था जो रोज सुबह सुनने को मिलता था, आज रात इधर से बदमाश असला बन्दुक के साथ गुजरे उधर से गुजरे ,,,,,,,,,प्रधान जीत के साथ ये भय भी समाप्त हो गया। सतर्कता अभी भी थी ये चलता ही रहता हे ठीक वैसे ही शेर और हिरन का जंगल में डर ....                                                                                                                         प्राय देखा गया हे ,जव लड़की की शादी तय हो जाये तो अपने रूप को सजाने और सवारने में घन्टे घन्टे निकाल देती हे। वार वार आयने के सामने आकर इतराती हे , लजाती हे, शरमाती हे ,हाथों को चहरे के सामने लाकर धीरे धीरे खोलती हे मुस्कराती हे ये सब कार्य छुप छुप के होते हे मन में ये भी लगता हे कोई हमको देख न ले। चहरे पर एक दाना भी निकल जाये तो परेशान हो जाती हे कितने जतन किये जाते हे लोग को घिस कर लगती हे गोरपता को लगायेगी और न जाने कैसे कैसे सोंदर्य प्रसाधान का उपयोग करती हे। सुबह सुबह दूध का झाग लगाना फिर बेसन में चिकनाई या दही डालकर उवटन करना। वाहर धूप में निकलने से परहेज करना। वर्तन साफ करेगी तो काले वर्तन लोहे कड़ाई तवा को छोड़ देगी इससे हाथ काले हो जायेगे। पर इनको कौन समजाये ये एक भ्र्म हे ,,,,,,,,,,यहाँ तो मम्मी साफ कर लेगी पर ससुराल में ऐसा किया ,तो ग़ांव आस पड़ोस में डिडोरा पिट जायेगा और न जाने कैसी कैसी बाते उसको   सुनने को मिलेंगी ,ताने और मिलेंगे यही सिखाया हे तेरी मईया ने ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,मायके में मन के पंछी हे ,ससुराल में मन कैद पंछी हे। खाना स्वंय बनाओ सबको खिलाओ बाद में खाना पड़ता हे अगर भूल से पहले खा लिया तो हाय तोवा मच जायेगा ,जाने कितना बड़ा जुर्म हो गया। ये एक नये विवाद का रूप लेलेगा। मायके में मन पन्छी होते हे जो मन करता हे वही करते हे ,.ससुराल में बंधनों और दायत्व से कितने ही बोझ लाध दिये जाते है। ,सपने तो रात के सपनो की तरह हे जो सुबह आँख खुलते ही ओझल हो जाते हे। ससुराल के मन मुताबिक न चले  अपने मन मुताबिक़ चले तो तेज बहू का ठप्पा और कलेश को निमन्त्रण दे दिया जाता हे।                                                                                                                                                           अपनी क्षमताओ को दिखाने के लिये एक मौका तो मिलता हे ,उसका लाभ उठाकर कसौठी पर खरे उतर कर दाते तले उँगली दवाने को मजबूर कर दो और इतियास बन जाओ। अपने वर्चस्व का गुड़गान जो करता हे वो मोके से चूक जाये तो उसका हाल खाल में छुपे भेड़िया सबके सामने उजागर हो जाता हे। मौका सबको एक बार जरूर मिलता है। ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,                                                                                              खाद की  बोरी यूरिया जिक जैसी खाली बोरी को सर्फ से धोकर सिलाई को उधेड़कर एक के साथ एक जोड़कर शहर के मखमल कालीन ग़ांव में यही कालीन है । इसी कालीन के ऊपर निमन्त्रण पत्र बिखरे पड़े हे। सीमा झुककर निमन्त्रण पत्र लिख रही हे और भाभी लिस्ट से नाम बोलती ,साथ ही साथ टिक करती। आज पिछले दिनों के मुकाबले लू तेज चल रही थी। इस लू भरी दोपहरी में  अपने पसंद के मुताविक़ कुछ न कुछ व्यक्ति कर रहे हे। ताश खेलकर तो कोई चारपाई बुनकर समय काट रहा हैं । किसान कितना ही कर्ज तले दवा हो पर अपना दर्द साझा न करेगा सब किसान भाई मिलकर खुश रहने की चेष्टा करते रहेगे जैसे सब मिलकर ताश खेलना  ,शतरंज खेलना इत्यादि ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,अचानक पास से चीखने चिलाने रोने की आवाजे सुनाई देने लगी। पत्र लिखने से एकदम मोह भंग हो गया और कारण जानने की इच्छा उत्तपन्न हई ,आख़िर कौन रो रहा हे?चिल्ला रहा हे?भय से पीड़ा युक्त किस किसकी आवाज़ है ?घर से सटकर बने घर से आवाजे आ रही है। आग की लपटे  ऊँची ऊँची उठ रही है ,लू के कारण आग तेजी से फेल रही है। घर की छत बाँस बल्ली फ़ूस लकड़ी के मोटे मोटे लट्ठों  की सहायता से बनीं होने के कारण आग तेज़ी से फेल रही है। सीमा ने छत से चढ़ कर देखा ,'लपटों को देखकर कहाँ 'भाभी भाभी सामान निकल लो ,मास्टनी चाची के घर आग लग गई हे" । मास्टानी चाची और मंत्रिन चाची की बहू दोनों बच्चे आग के बीच में फस गहे है। कहते कहते नीचे उतर के आई और कमरे बरामदा से सामान निकल निकालके आंगन में ऱख दिया क्योकि सटकर घर बना है ,गहरी गहरी दरारे जो थी जिसके कारण कभी भी आग लग सकती थी लेकिन पक्का घर होने के कारण ये हादसा टल गया।                                                                  मास्टनी चाची के साथ तीन और आग में फँसे हुऐ है जो लगातार चीख रहे चिल्ला रहे है। आवाज़ सुनकर गाँव वाले घर के पास इक्कठा हों गये लेकिन दरवाजा बंद था,आग बढ़ती ही जा रही थी ,कभी भी किसी भी वक़्त कुछ भी हों सकता है। सीमा अपनी घर की छत से होकर उस घर में जाने लगीं ,नीचे छत में आग लगी हुई थीं ,धीरे धीरे क़दम बड़ा रही हे नीचे लोग होशला बड़ा रहे थे और सभलकर जाने क़ो कह रहे है। सीमा धीरे धीरे आगे बडी उस छत पर पहुँच गई जो आग की चपेट में नही थी ,नीचे सबने अपने आप को एक कोने में समेट लिया ताकि बचा जा सके। सीमा ने हिम्मत करकें ऊपर रखीं सीडी को आंगन में फासकर ऱख दी ,उसी सीढ़ी से नीचे उतरी ,महिलाये और बच्चे बुरी तरह घबराये हुए हे। पहले महिलाओ को ऊपर छत पर किया फिर एक बच्चे को एक क़ो अपनी गोदी में लेकर ऊपर आई ,आँखों के सामने आग लगी छत धड़ाम धड़ाम नीचे गिर रही है ,जिस छत से सीमा आई वो भी धड़ाम से नीचे गिरी। बचने का एक रास्ता था कमरे के अंदर खिड़की हे जिससे अहाते में ताकने और झाँकने के काम आती थी,आज वही जीवन वरदायनी बन जायेगी। गाँव वालो ने नीचे से सीढ़ी लगा दी ,एक एक कर सब उतर आये। अभी भी महिलाये बच्चे भय मुक्त नही थे। सीमा के होशले की सब तारीफ़ कर रहे है। जिससे जैसे हुआ वैसे आग बुझाने की कोशिश कर रहे पर आग बेकाबू हो चुकीं थीं। दमकल आई तव आग पर काबू हो पाया हर जगह राख  का ठेर ही ठेर था।                                                                                                           ये एक कल्पना कहानी नही हे बल्कि सत्य घटना है ,जो भी हमने दिखाने की कोशिश की हे वो सब एक साल में घटनाये घटी है।                                                                                                                     "  ग्राम बछेला जिला फ़िरोज़ाबाद राज्य उत्तर प्रदेश '                                        ये तव की बात हे जब में आठवी कक्षा मै थी। सन 1996 की घटना है। वक्त के साथ साहसी सीमा की कहानी कही खो गई है जिसने साहस का परिचय देकर जान की परवाह किये चार ज़िंदगियों को अनहोनी घटना घटने से बचाया पर आज रेगिस्तान में लुफ्त लूनी नदी के समान साहसी सीमा खो गई है। अगर ये घटना शहर या कसवा की होती तो अखवारों की शान और पुरूस्कार से सम्मान दिया जाता। अनछुये किस्सों को समाज के बीच हिस्सा बना दे तो मेरी कलम भी गौरांवित हो जायेगी। ये सीमा और कोई नही हमारी बुआजी ही है। सबसे अलग सोच के कारण परिवार की हितेशी है जितना भी कहा जाये कम है। जिस सम्मान की हकदार हे थोङा सा सम्मान मिल जाये मेरा लिखना सार्थक हो जायेगा।                                                                                                                                 आकाँक्षा जादौन                          

रविवार, 17 जुलाई 2016

वक्त की धाराओ में




वक्त की धाराओ में चलो,
चलों अपनी भी नाव चलायें!!
फल का मोह छोङ दें,
डूवेगी या पार लगेगी!!
माँझी शा हुनर लिए,
धाराओ में बढते जायें!!
मुश्किल आसान नहीं,
संकल्प से बढा साहस नहीं,
वक्त की धाराओ में चलों,
चलों अपनी भी नाव चलायें!!
गिर से निकलती धारा ,
पथ आसान नहीं हैं!
सर्घष चुनौती से भरा,
गिरती उछलती खाती गोते!
रौद्ध रूप कभी निर्मल धारा!!
अपना भी पथ ऐसा होगा,
साहस के वल पर पार होना!!
कंकरीला पथरीला पथ,
मोडो का अद्भुत सफर!!
वक्त की धाराओ में चलो,
चलो अपनी भी नाव चलायें!!
ठहरार नहीं बस चलते जाना,
विपताओ को पार कर बढते जाना!!
कितने मानव जीवो का वरदान,
तृष्णा पूरा किया अहम योगदान!!
अंत में मिली सागर से ,
किया सफर अनमोल वरदान!!
हमको अपने पथ चलना,
करना हैं समाज कल्याण!!
वक्त की धाराओ में चलो,
चलो अपनी भी नाव चलायें!

जमघट

काफिलो का जमघट,
लगता हर जगह मेला!
सेनानायक शी हिम्मत नहीं,
जनता जर्नादन का लगता खेला!!
बाँध कर रखे क्यो सपने,
हुनर के दरवाजे खोल दो!!
झुकना जिसे आ गया,
पंताका उसी ने फैराया!!
हट्टाहस करती हे जनता,
हे झुकना जिसने चाहा!!
खङा रहा अहम के वंश,
एक झोका में उखङ गया!!
निर्भीक उसकी हिम्मत,
साहस उसका परिचय!!
झुकना उसका मान सम्मान,
पिघला लोहा बनता फोलाद!!
सम्मान को करे तिरस्कार,
पराक्रम से करे परास्त!!
सोच अलग थलग जिसकी,
खुद व खुद किस्से बन जाते!!
राग की धून पर प्रेम,
स्नेह लुटाना आता है!!
हर मायूस चहरे पर,
मुस्कान लाना आता है!!
द्वेष किसी से क्या करे,
छोटा जीवन छोटी बात!!
तम से घिरा हे जीवन,
रोशनी बनना हे आता!!
काफिलो के जमघट से,
एक किरण तुम भी बनो!!
झाँको खुद के अंदर ,
अच्छा क्या हे छुपा!!
आसू न दो किसी को,
मुस्कान सबकी बनो!!
एक अध्याय ऐसा लिखो,
जिस पण नाज सब करे!!
बन जाये बंदगी सबकी,
जिंदादिल कहाणी लिखो!!
काफिलो के जमघट से,
एक किरण तुम भी बनो!!
झाँको खुद के अंदर,
अच्छा क्या हे छुपा!!