कीर्तिभान जिन्दावाद ... कीर्तिभान जिन्दावाद की आवाज़ वातावरण में गूँज रही थीं ..... फूलों के हार कागज़ से बने फूलों के हार से गर्दन झुकी जा रही थीं पर फूलों की माला एक के बाद एक गले में पड़ती जा रही थीं। पटाखो की लड़ी पर लड़ी चलाई जा रही थीं। मिठाई से एक दूसरे के मुँह मीठा किया जा रहा था। दूसरी वार प्रधान पद की वहुविजयी की ख़ुशी जो थीं। जनता जनार्दन ने बहुमत के साथ विजयी जो बनाया था.दूसरी वार जीतना पांच साल के कामकाज का प्रतिफ़ल होता है। यह सावित करता हे कि जनता की कसौटी पर खरा उतरकर दूसरी वार जीतकर कीर्तिभान ने विपक्ष को जता दिया कि जनता ने कियो चुना है ?जनता के लिए और परिवार के लिए हर्ष और उल्लास का पर्व था। घर पर अभिनन्दन के लिए राह निहारी जा रही थीं। वोट की गिनती के वाद वाहर का नजारा था, विजयी घोष के रथ रूपी जनता के साथ ट्रेक्टर में सवार हो कर घर की तरफ़ काफला चल पड़ा। कीर्तिभान के भाई ने वैगनार गाड़ी में चलने क़ो कहा,"कि विजयी की रात हे ट्रेक्टर में बैठकर जाना ठीक नही हे ",विपक्ष पर हार का सदमा है कोइ अप्रिय घटना क़ो निमन्त्रण न दे दे। इतना समझाने के वावजूद भी कीर्तिभान न माने और कहाँ ,'ये मेरी जीत अकेली नही हे ग्रामवासी की जीत है, हम ग्रामवासी के साथ जायेगे और काफले के साथ चल पडे।
रात अपने आँचल में सितारे के जगमगाते फूलों की छाव सबके ऊपर बरसा रही थीं ,किसी से कोई वैरभाव नही सबपर घटता हुआ कृष्ण पक्ष का चाँद शीतलता दे रहा था। ऊवड़ खावड़ जगह जगह गड्ढे रेगरेग कर चलता ट्रेक्टर ट्राली में बैठे ग्रामवासी की कसरत खूब हो रही थीं ,गड्डा आता तो 6 इच जितना ऊपर उठ जाते फिर धड़ाम से नीचे आ जाते ,ट्रेक्टर में बैठकर सफ़र का रोमांच अद्भुत है ,हिलोरे खाती नाव में बैठे ऐसा एहसास ट्रॉली में अनुभव होता है जो कभी नाव में बैठे ही न हो उनके लिये होले होले धीरे धीरे झूले में झूलने का एहसास का अनुभव किया जा सकता है। चालक ने स्थाई रास्ता न जाकर दूसरा कच्चे रास्ते से ले जाने लगा,शंका की दृष्ठी से सबने एक साथ एक स्वर में प्रश्न करने लगें ?काये इधर से ले जा रहे हो ?चालक ने उत्तर दिया ,"तुम सब तो पीके मस्त मल्हार गान लगें हो ,काऊ बात की चिता है ?हमसे बड़े भइया ने दूसरे रास्ते से आने की कही है,बात कह ही रहे थे कि सामने से बेगनार आती देखी जो पहले निकल गई थीं रास्ते पर कोई घात तो न लगाये हे ?जो शंका थी अनयास नही थीं।बड़े भईया ने धीरे स्वर में कहा ,"कीर्तिभान अब तुम हमारे साथ चलोगे. स्तम्भ पूरी गेंग और हसला के साथ घात लगाये बैठा है ,ये रास्ता ख़तरे से भरा हे ,तुम सब इस रास्ते से चलो हम भी साथ चलते हे ,,जो मल्हार गायें जा रहे थें, सब चुप हों गये ,जैसे साप क़ो देखकर चुप्पी साध लेते हे। धीरे धीरे ट्रेक्टर अपनी मन्जिल पर पहुँच ही गया। स्वागत से जायदा स्तम्भ की हार के चर्चे कहाँ ?किस किस के साथ घात लगाये था। घर वालों ने ज़ोर दार स्वागत किया ,आख़िर दूसरी वार बहुत अंतराल से विजयी का तिलक जो हुआ था,,,... पूरी रात बातो में काना फूसी में हार की मज़ाक नाटकीय अभिनय प्रस्तुती में ही बीत गई।
सुबह होते ही पूरे ग़ांव में घूम घूम कर जुलूस निकालने की तैयारी ज़ोर सोर से होने लगीं। बड़े बुजर्ग ने रात अनहोनी घटना से बचके निकल आने के कारण जुलूस न निकालने की सलाह दी ,,,पर नये ख़ून की पीढ़ी नये उवाल कहा मानने क़ो तैयार थे ,ढोल नगाड़े पटाख़े डीजे साउंड सब सजा लिया था ,,,,इस वार जुलूस शानदार होगा ,पिछली जीत के मुकाबले इस वार भारी बहुमत से विजयी हुये है। बढ़े बुजर्ग की सला मसुवरा को बन्दिश समझते हे ,दुनियां क़ो समझने का तजुर्वा और नई सोंच मिलती हे तब नवप्रकाशित उज्ज्वल भविष्य निर्माण होता है ,बिना एक को साथ लिये अधूरी शिक्षा के समान हे। यहाँ पर भी बड़े बुजर्ग की बात क़ो नज़र अंदाज किये विजयी घोष का उत्थान दिखाने पूरे ग़ाव में चल पड़े,....कीर्तिभान जिन्दावाद,,,,,,जव तक सूर्य चाँद रहे तब तक कीर्तिभान का नाम रहेगा,,,,,,,जोरसोर से डीजे के साउंड पर नाचते गुलार उड़ाते जा रहे ,महिलाये पुरूष फूलों की मालाओं से अभिनन्दन कर रही हे। चारों तरफ़ विजय घोष के नारों से गुजयवान वातावरण था ,जव पास में स्तम्भ का घर आया तो नये यवुकों ने चिढ़ाने के उद्देश्य से ज़ोर ज़ोर से गले की जितनी क्षमता थीं उस क्षमता से नारे लगाने लगें अब तो नारे के वोल भी बदल गये थे ,,,,,कीर्तिभान की कीर्ति फैल रही ,,,,स्तम्भ चला शून्य की और,,,,, ख़ुले शब्दों के प्रहार से हार के आक्रोश को ये शव्द भड़की आग में घी का काम करने लगें जिससे आग और भड़क गई,,,,,स्तम्भ घर में ही था ख़ुशी के माहौल में अचानक मातम छा गया,,,स्तम्भ आँखों में हार का प्रतिशोध लिये सब्जी काटने वाला चाकू लिये चहरे को गमछे से ढक लिया भीड़ क़ो चीरते हुये ,,,चाकू को कीर्तिभान के पेट में भोंक दिया ,,और वार कर पाता इससे पहले आस पास समर्थन के लोगों ने स्तम्भ को दबोचा पर बचके भाग गया पर जाते जाते गमछा खुल गया और पूरे काफले में सोर हो गया ,,,,,,,,,,स्तम्भ ने कीर्तिभान को चाकू भोंक दिया।
पेट में चाकू गड़ा हुआ देखकर जानकारों ने किसी क़ो भी छूने से रोका और निकालने से भी ,,,,ताकि डॉक्टर ऑपरेशन से निकाल सकें .असहनीय दर्द की पीड़ा और रक्त रिसरिस कर निकल रहा था खून से लथपथ था ,अगर चाकू निकल लेते तो रक्त क़ो रोकना असम्भव और बचाने के सारे उपाय निष्फल हों जाते ..तत्काल एक पल को गवाये हॉस्पीटल ले गये , परिवार के सदस्य औऱ हितेशी शोकाकुल में डूव गये,,,,कीर्तिभान की भागिनी ह्र्दयथा और माँ अचेत अवस्था में पहुँच गई... जब ये खबर सुनी।हास्पीटल में डाँक्टर ऑप्रेशन थ्रेटर में सर्जरी के दुवारा चाक़ू निकालने की कोशिश कर रहे है .वाहर परिवार के सदस्य और हास्पीटल के वाहर जनता का मेला जुड़ा,सुभ चिंतक ठीक होने की कामना कर रहे तो कोई मुस्कान का मखोटा पहने जलन की पीड़ा क़ो शांत होने का मौका मिला उसका पूरा फ़ायदा उठा रहे थे ,इस कामना से कि अब तो मौत की खबर ही मिले। स्तम्भ बिल्कुल सही किया है जायदा ही घमंड आ गया था ,प्रधान क्या बन गया अपने आप क़ो राजा समझने लगा है , सीघ्र से सीघ्र मौत की खबर सुनने क़ो मिले तो हमें सकून मिले,जो बेरी थे अच्छे बनने का ढोंग करते थे वो सव यही दुआ मांग रहे थे। स्तम्भ फ़रार हों गया जिसको पुलिस हर उस जगह तलाश कर रही जहाँ होने की उम्मीद हो सकती थीं।
ह्र्दयथा को जब होश आया तो हास्पीटल को जाने लगी जव अचेत हुई तो घर पर रोक रखा था ,व्याकुल थीं और सहमी दूसरी तरफ़ ख़ुद क़ो होशला भी दे रही थीं अगर में हिम्मत खोने लगीं तो सवको कौन सवालेगा ?भानजी हमेशा मेरे हौशले और हिम्मत की सहारना करते थे पूरे परिवार क़ो एक सूत्र में पियोंके रखा हे कितनी ही मुश्किल कियो न आ जाये अपनी हिम्मत न खोना क्योकिं एक बात हमेशा कहते थे जिसने मुश्किलों के समय मस्तिष्क क़ो शून्य किया तो जीत की उम्बीद दिखने से पहले ही हार हों जायेगी ,मस्तिष्क क़ो क्रियाशील बनाके रखा तो कोई ना कोई उपाय जरूर निकलेगा ,,,,,,,ऐसी सारी बातें मस्तिष्क में फिल्म की तरह चलने लगीं।
पाँच साल पहले की यादों में चली गई ,जव बिना प्रधान पद के रहते ग्रामवासियो की सेवा करते रहते। रात क़ो गाँव में कोई भी बीमार हो जाता या किसी भी तरह की परेशानी हों तो बिना कुछ लिये मदद करते जैसे कि ट्रेक्टर की मदद से हास्पीटल पहुँचा देते ,पैसे न होते तो पैसे की मदद कर देते ,वेटियों की शादी में सिलाई मशीन उपहार के रूप में देते ,बहुत जायदा गरीव हे तो दावत का खर्च भी उठाते ,गांव की जनता इन्ही अच्छाई के कारण चहेते बन गये थे। भविष्य रूप में स्तम्भ प्रधान था उसके अनैतिक व्यवहार के कारण जनता नकार रही थीं। राशन आता तो उसकी काला बाजारी कर देता एक चौथाई लोगों क़ो ही मिल पाता ,घास लेट और चीनी के दर्शन तो तीज़ त्यौहार पर ही हों पाते .गांव विकाश के लिये जो जो पैसा आता वो पैसा अपने महल बनाता ,कामकाज एक चौथाई ही करता सरकारी कर्मचारी क़ो घूस देकर सब मामला शान्त कर देता ,एक साल से कोई काम नही किया आने वाले चुनाव के लिये पैसा जमा करके रखा। ग्रामवासी इस प्रधान से तंग आ चुकी थीं क्योकि ग्रामवासी की जगह को अपने कव्जे में लेके अपना दबदवा कायम रखता था जो भी आवाज़ उठाता उसकी सरकार दुवारा सेवाओ को बन्द कर देता। कीर्तिभान का परिवार खटकता था रसूकदार नोकरशाही थे बिना प्रधान के पद पर रहते हुये जिला कार्यालय में पहचान थीं ,स्तम्भ के ख़िलाफ़ कोई शिकायत करता तो सेवाओ पर प्रतिबंद लगा देता तो कोई डर के कारण कीर्तिभान से शिकायत नही करता ,ग्रामवासी ने पहले भी ग्रामप्रधान के चुनाव के लिए साफ़ मना कर देता ,कहता हम ,'ग्रामवासी की बिना पद के ही सेवा करते रहेंगे ,इस वार के प्रधान चुनाव के लिए ग्रामवासी ने बहुत कहा पर मना कर दिया। कीर्तिभान ने अपनी आँखों से ऐसा देखा जिससे फैसला बदलना पड़ा ,स्तम्भ क़ो भला समझता था उसका पर्दा उतर गया .जव खेत में काम करने वाला मजदूर अचेत हो गया ,डॉक्टर ने बताया भूखे पेट रहने के कारण अचेत बताया ,कीर्तिभान ने घर जाकर देखा तो वहा की हालत देखकर आंसू बह निकले ,बच्चे भूख से व्याकुल थे कामकाज के पैसे नही मिले थे. मुफ्त राशन मिलना बन्द था और कोई साधन नही था। हमारे गाँव में आज ये दिन भी देखना पड़ेगा .. ,ग्रामवासी ने इस हालत का जिम्मेदार स्तम्भ क़ो बताया .विस्तार से क्या क्या यातनाये दी हर दर्द को बताया। स्तम्भ ग्रामवासियो के हक़ क़ो अपना हक़ समझ खा रहा था ,सबकी बाते सुनकर फैसला किया इस वार प्रधान का चुनाव लड़ेगे ,इस वार महिला सीट थीं तो ह्रदयथा क़ो प्रत्यासी बनाके चुनाव मैं उतार दिया ,
ग्रामप्रधान के चुनाव में वोटरों क़ो खरीदा जाता है। विपक्ष के हितेशी ग्राम के सदस्य नोकरी शहर में करते हे उनके वोट को काटके अपने वोट बढ़ाये जाते हे चाये उनके पक्ष के शहर में ही क्यों नही रहते हों। नावालिक के भी वोट बनवा दिये जाते हे .वोट बढ़ाना और काटना हार जीत का अहम हिस्सा होता है। देशी शराब के ठेके घर ही खोल दिये जाते हे पिवक्कडो की सुबह शाम लाइन लग जाती .एक वोट की क़ीमत शराब से खरीद लेते .कही कही पिवक्कड़ दोनों जगह ही अपनी पौ बारह करते .इस चुनाव में एक बड़े गाँव में खर्चा करोड़ के ऊपर पहुचँ जाता है। मतदान पड़ने की एक रात पहले नोट देकर वोट ख़रीदे जाते है ,हलवाई ऐसे लगाये जाते जैसे घर में शादी हों.रणनीति की तह फर्जी वोट का भी प्रबन्ध किया जाता है जो मतदाता शहर रहते उनके वोट डाले जाते जैसे लड़कियों क़ो अपने रिस्तेदारों दुवारा लम्बी लाज का घूघट डाल के किसी की बहू किसी क़ो बताके डाले जाते ,विपक्ष भी तीसरी आँख के तोर पर अपनी सेना खड़ी कर देते ताकि कोई फर्जी वोट न पड़ जाये जव पहचान लिये जाये तो मुहजवानी लड़ाई शुरू हो जाती ये लड़ाई विस्तार रूप भी धारण कर लेती जो हाथापाई डण्डे तलवार घरेलू बम्ब के रूप में देखने क़ो मिल जाती।पेप्सी कोक की काँच की बोतल में पेट्रोल भरके मुँह क़ो कपड़े की परत दर परत गट्टर बनाके शीशी बन्द कर देते उस कपड़े में आग लगाके भीड़ के बीच ज़ोरदार धमाका का रूप लेके अफरा तफ़री सा माहौल बना देते। पता चल जाये कि कि मतदान पेटी में दूसरे प्रत्यासी के वोट बहुत पड़े हों तो उस बॉक्स में स्याही डाल देते या बॉक्स क़ो लेकर भाग जाते .स्तम्भ ने भी यही काम किया पर निसफल रहा और पकड़ा गया .जनता के चहेते कीर्तिभान की ह्रदया को विजयी बना दिया।
पति की सफ़लता के पीछे फूल में छुपे खुसबू की भूमिका निभाती है जो पतिनी की सोच समझ क़ो मूल्य समझे अपनी बात कहने का मौका दे. ये न समझे तुम्हारा काम चौखट के अंदर तक की सोच है ग्रहस्थी की रसोई में क्या खत्म हो गया हे ?किस कार्य के लिये पैसे चाहिए बच्चों की देखवाल बस इतना ही कार्य है वाहर क्या करता हूँ इससे कोई मतलव नही हे ?ऐसी सोच वाले बहुत मिल जायेगे पतिनी क़ो कुछ भी नही बताते हे ये ग़लत हे। दोनों को ही घर के वारे में और वाहर के कार्यो के वारे में जानकारी होनी चाहिए ये बात अलग हे कि रुचि न ले.,जब पति पत्नी अपने अपने काम के वारे में बताते रहे तो बुद्धि का विकाश ही होता हे और सीखना चलता रहता है .सोच एक सी भली दो की जायदा कार्यगाह होती जो हल ख़ुद न कर सके क्या पता दूसरे की सोच हल ख़ोज दे। कीर्तिभान और ह्रदयथा एक दूसरे को बहुत अच्छे तरह समझते थे .दोनों के बीच क़भी भी ग़ुस्सा लड़ाई मन मुटाव नही हुआ .सब लोग उनके समझदारी अच्छे पति पतिनी होने का उदाहरण देते थे।
प्रधान पद के साथ ज़िम्मेदारी और बढ़ गई उद्देश्य एक था ग्रामवासी के समस्याओं क़ो दूर करना जितना सरल सोच रखा था, उतना ही कठिन था .यहाँ प्रधान के ईमानदारी होने से सिर्फ ग्रामवासी की सेवा तो की जाती हे पर बिना धन के कैसे ?गाँव के विकास के लिये जो पैसा आता उस पर कितनो की नज़र गड़ी रहती जैसे इन घूस खोरों ने अपनी सरकारी नोकरी का अधिकार बना रखा हो। सेकेट्ररी, चपरासी ,कर्मचारी ,ऑफीसर सब एक ही थाली के चट्टे बट्टे है । पहले तो दोनों घूस देने के लिए राजी नही थे पर जब विचार निर्माणधीस हों उत्थान के लिये अग्रसर हों तो धर्म को धर्म विजयी बनाने के लिये महाभारत का चिंतन करना और गीता पाठ स्मरण करना चाहिये .दोनों ने ये भी ठान रखा था घूस लेने वालों का पर्दा पास करना हे। गॉव क़ो सम्रद्ध उत्थान प्रग्रतिशील की प्रेणा और गाँव के लिये बन गई। कोई भूखा नही सोता कोई वेरोजगार नही हर बच्चा स्कूल जाता जो जो योजनाये सरकार ने बनाई उन सबका लाभ ग्रामवासी तक पहुँचाया .जो कर्मचारी घूस ख़ोरी थे उन सबकी वीडियो बनाके नोकरी से ही बर्खास्त करवा दिया। अच्छे काम के लिये जहाँ जयकारा भी लगता हे वही ईर्ष्या के कारण दुश्मन भी बन गये ,जो मौके की फ़िराक में रहते थे कब मौका मिले और कीर्तिभान क़ो अपने रास्ते से हटा दूँ ,वो मौका दूसरी वार हार के वाद मिला।
राजनीति जाल हे नेता मकड़ी चाये छोटी इकाई ग्राम प्रधान राज्य के मुखमंत्री या प्रधानमंत्री सब मकड़ी इसमें आने के वाद कोई वाहर निकल नही सकता ,अपने दुश्मन क़ो जाल में फ़साके मृत्यु के आग़ोश में सुलादेते है पर ख़ुद भी उस जाल से बच नही पाते। आज़ कीर्तिभान भी उसी राजनीति का शिकार हों गया ,हास्पीटल के ऑपरेशन थ्रेटर में ज़िन्दगी और मौत के बीच झूल रहा है।राजनीति भी जाल के समान इर्द गिर्द घूमती रहती है ,नेता अपनी तागत से अपने बनाये जाल में फ़साके तागत का वर्चस्व दिखाता पर ख़ुद भी बच नही पाता है।
रात अपने आँचल में सितारे के जगमगाते फूलों की छाव सबके ऊपर बरसा रही थीं ,किसी से कोई वैरभाव नही सबपर घटता हुआ कृष्ण पक्ष का चाँद शीतलता दे रहा था। ऊवड़ खावड़ जगह जगह गड्ढे रेगरेग कर चलता ट्रेक्टर ट्राली में बैठे ग्रामवासी की कसरत खूब हो रही थीं ,गड्डा आता तो 6 इच जितना ऊपर उठ जाते फिर धड़ाम से नीचे आ जाते ,ट्रेक्टर में बैठकर सफ़र का रोमांच अद्भुत है ,हिलोरे खाती नाव में बैठे ऐसा एहसास ट्रॉली में अनुभव होता है जो कभी नाव में बैठे ही न हो उनके लिये होले होले धीरे धीरे झूले में झूलने का एहसास का अनुभव किया जा सकता है। चालक ने स्थाई रास्ता न जाकर दूसरा कच्चे रास्ते से ले जाने लगा,शंका की दृष्ठी से सबने एक साथ एक स्वर में प्रश्न करने लगें ?काये इधर से ले जा रहे हो ?चालक ने उत्तर दिया ,"तुम सब तो पीके मस्त मल्हार गान लगें हो ,काऊ बात की चिता है ?हमसे बड़े भइया ने दूसरे रास्ते से आने की कही है,बात कह ही रहे थे कि सामने से बेगनार आती देखी जो पहले निकल गई थीं रास्ते पर कोई घात तो न लगाये हे ?जो शंका थी अनयास नही थीं।बड़े भईया ने धीरे स्वर में कहा ,"कीर्तिभान अब तुम हमारे साथ चलोगे. स्तम्भ पूरी गेंग और हसला के साथ घात लगाये बैठा है ,ये रास्ता ख़तरे से भरा हे ,तुम सब इस रास्ते से चलो हम भी साथ चलते हे ,,जो मल्हार गायें जा रहे थें, सब चुप हों गये ,जैसे साप क़ो देखकर चुप्पी साध लेते हे। धीरे धीरे ट्रेक्टर अपनी मन्जिल पर पहुँच ही गया। स्वागत से जायदा स्तम्भ की हार के चर्चे कहाँ ?किस किस के साथ घात लगाये था। घर वालों ने ज़ोर दार स्वागत किया ,आख़िर दूसरी वार बहुत अंतराल से विजयी का तिलक जो हुआ था,,,... पूरी रात बातो में काना फूसी में हार की मज़ाक नाटकीय अभिनय प्रस्तुती में ही बीत गई।
सुबह होते ही पूरे ग़ांव में घूम घूम कर जुलूस निकालने की तैयारी ज़ोर सोर से होने लगीं। बड़े बुजर्ग ने रात अनहोनी घटना से बचके निकल आने के कारण जुलूस न निकालने की सलाह दी ,,,पर नये ख़ून की पीढ़ी नये उवाल कहा मानने क़ो तैयार थे ,ढोल नगाड़े पटाख़े डीजे साउंड सब सजा लिया था ,,,,इस वार जुलूस शानदार होगा ,पिछली जीत के मुकाबले इस वार भारी बहुमत से विजयी हुये है। बढ़े बुजर्ग की सला मसुवरा को बन्दिश समझते हे ,दुनियां क़ो समझने का तजुर्वा और नई सोंच मिलती हे तब नवप्रकाशित उज्ज्वल भविष्य निर्माण होता है ,बिना एक को साथ लिये अधूरी शिक्षा के समान हे। यहाँ पर भी बड़े बुजर्ग की बात क़ो नज़र अंदाज किये विजयी घोष का उत्थान दिखाने पूरे ग़ाव में चल पड़े,....कीर्तिभान जिन्दावाद,,,,,,जव तक सूर्य चाँद रहे तब तक कीर्तिभान का नाम रहेगा,,,,,,,जोरसोर से डीजे के साउंड पर नाचते गुलार उड़ाते जा रहे ,महिलाये पुरूष फूलों की मालाओं से अभिनन्दन कर रही हे। चारों तरफ़ विजय घोष के नारों से गुजयवान वातावरण था ,जव पास में स्तम्भ का घर आया तो नये यवुकों ने चिढ़ाने के उद्देश्य से ज़ोर ज़ोर से गले की जितनी क्षमता थीं उस क्षमता से नारे लगाने लगें अब तो नारे के वोल भी बदल गये थे ,,,,,कीर्तिभान की कीर्ति फैल रही ,,,,स्तम्भ चला शून्य की और,,,,, ख़ुले शब्दों के प्रहार से हार के आक्रोश को ये शव्द भड़की आग में घी का काम करने लगें जिससे आग और भड़क गई,,,,,स्तम्भ घर में ही था ख़ुशी के माहौल में अचानक मातम छा गया,,,स्तम्भ आँखों में हार का प्रतिशोध लिये सब्जी काटने वाला चाकू लिये चहरे को गमछे से ढक लिया भीड़ क़ो चीरते हुये ,,,चाकू को कीर्तिभान के पेट में भोंक दिया ,,और वार कर पाता इससे पहले आस पास समर्थन के लोगों ने स्तम्भ को दबोचा पर बचके भाग गया पर जाते जाते गमछा खुल गया और पूरे काफले में सोर हो गया ,,,,,,,,,,स्तम्भ ने कीर्तिभान को चाकू भोंक दिया।
पेट में चाकू गड़ा हुआ देखकर जानकारों ने किसी क़ो भी छूने से रोका और निकालने से भी ,,,,ताकि डॉक्टर ऑपरेशन से निकाल सकें .असहनीय दर्द की पीड़ा और रक्त रिसरिस कर निकल रहा था खून से लथपथ था ,अगर चाकू निकल लेते तो रक्त क़ो रोकना असम्भव और बचाने के सारे उपाय निष्फल हों जाते ..तत्काल एक पल को गवाये हॉस्पीटल ले गये , परिवार के सदस्य औऱ हितेशी शोकाकुल में डूव गये,,,,कीर्तिभान की भागिनी ह्र्दयथा और माँ अचेत अवस्था में पहुँच गई... जब ये खबर सुनी।हास्पीटल में डाँक्टर ऑप्रेशन थ्रेटर में सर्जरी के दुवारा चाक़ू निकालने की कोशिश कर रहे है .वाहर परिवार के सदस्य और हास्पीटल के वाहर जनता का मेला जुड़ा,सुभ चिंतक ठीक होने की कामना कर रहे तो कोई मुस्कान का मखोटा पहने जलन की पीड़ा क़ो शांत होने का मौका मिला उसका पूरा फ़ायदा उठा रहे थे ,इस कामना से कि अब तो मौत की खबर ही मिले। स्तम्भ बिल्कुल सही किया है जायदा ही घमंड आ गया था ,प्रधान क्या बन गया अपने आप क़ो राजा समझने लगा है , सीघ्र से सीघ्र मौत की खबर सुनने क़ो मिले तो हमें सकून मिले,जो बेरी थे अच्छे बनने का ढोंग करते थे वो सव यही दुआ मांग रहे थे। स्तम्भ फ़रार हों गया जिसको पुलिस हर उस जगह तलाश कर रही जहाँ होने की उम्मीद हो सकती थीं।
ह्र्दयथा को जब होश आया तो हास्पीटल को जाने लगी जव अचेत हुई तो घर पर रोक रखा था ,व्याकुल थीं और सहमी दूसरी तरफ़ ख़ुद क़ो होशला भी दे रही थीं अगर में हिम्मत खोने लगीं तो सवको कौन सवालेगा ?भानजी हमेशा मेरे हौशले और हिम्मत की सहारना करते थे पूरे परिवार क़ो एक सूत्र में पियोंके रखा हे कितनी ही मुश्किल कियो न आ जाये अपनी हिम्मत न खोना क्योकिं एक बात हमेशा कहते थे जिसने मुश्किलों के समय मस्तिष्क क़ो शून्य किया तो जीत की उम्बीद दिखने से पहले ही हार हों जायेगी ,मस्तिष्क क़ो क्रियाशील बनाके रखा तो कोई ना कोई उपाय जरूर निकलेगा ,,,,,,,ऐसी सारी बातें मस्तिष्क में फिल्म की तरह चलने लगीं।
पाँच साल पहले की यादों में चली गई ,जव बिना प्रधान पद के रहते ग्रामवासियो की सेवा करते रहते। रात क़ो गाँव में कोई भी बीमार हो जाता या किसी भी तरह की परेशानी हों तो बिना कुछ लिये मदद करते जैसे कि ट्रेक्टर की मदद से हास्पीटल पहुँचा देते ,पैसे न होते तो पैसे की मदद कर देते ,वेटियों की शादी में सिलाई मशीन उपहार के रूप में देते ,बहुत जायदा गरीव हे तो दावत का खर्च भी उठाते ,गांव की जनता इन्ही अच्छाई के कारण चहेते बन गये थे। भविष्य रूप में स्तम्भ प्रधान था उसके अनैतिक व्यवहार के कारण जनता नकार रही थीं। राशन आता तो उसकी काला बाजारी कर देता एक चौथाई लोगों क़ो ही मिल पाता ,घास लेट और चीनी के दर्शन तो तीज़ त्यौहार पर ही हों पाते .गांव विकाश के लिये जो जो पैसा आता वो पैसा अपने महल बनाता ,कामकाज एक चौथाई ही करता सरकारी कर्मचारी क़ो घूस देकर सब मामला शान्त कर देता ,एक साल से कोई काम नही किया आने वाले चुनाव के लिये पैसा जमा करके रखा। ग्रामवासी इस प्रधान से तंग आ चुकी थीं क्योकि ग्रामवासी की जगह को अपने कव्जे में लेके अपना दबदवा कायम रखता था जो भी आवाज़ उठाता उसकी सरकार दुवारा सेवाओ को बन्द कर देता। कीर्तिभान का परिवार खटकता था रसूकदार नोकरशाही थे बिना प्रधान के पद पर रहते हुये जिला कार्यालय में पहचान थीं ,स्तम्भ के ख़िलाफ़ कोई शिकायत करता तो सेवाओ पर प्रतिबंद लगा देता तो कोई डर के कारण कीर्तिभान से शिकायत नही करता ,ग्रामवासी ने पहले भी ग्रामप्रधान के चुनाव के लिए साफ़ मना कर देता ,कहता हम ,'ग्रामवासी की बिना पद के ही सेवा करते रहेंगे ,इस वार के प्रधान चुनाव के लिए ग्रामवासी ने बहुत कहा पर मना कर दिया। कीर्तिभान ने अपनी आँखों से ऐसा देखा जिससे फैसला बदलना पड़ा ,स्तम्भ क़ो भला समझता था उसका पर्दा उतर गया .जव खेत में काम करने वाला मजदूर अचेत हो गया ,डॉक्टर ने बताया भूखे पेट रहने के कारण अचेत बताया ,कीर्तिभान ने घर जाकर देखा तो वहा की हालत देखकर आंसू बह निकले ,बच्चे भूख से व्याकुल थे कामकाज के पैसे नही मिले थे. मुफ्त राशन मिलना बन्द था और कोई साधन नही था। हमारे गाँव में आज ये दिन भी देखना पड़ेगा .. ,ग्रामवासी ने इस हालत का जिम्मेदार स्तम्भ क़ो बताया .विस्तार से क्या क्या यातनाये दी हर दर्द को बताया। स्तम्भ ग्रामवासियो के हक़ क़ो अपना हक़ समझ खा रहा था ,सबकी बाते सुनकर फैसला किया इस वार प्रधान का चुनाव लड़ेगे ,इस वार महिला सीट थीं तो ह्रदयथा क़ो प्रत्यासी बनाके चुनाव मैं उतार दिया ,
ग्रामप्रधान के चुनाव में वोटरों क़ो खरीदा जाता है। विपक्ष के हितेशी ग्राम के सदस्य नोकरी शहर में करते हे उनके वोट को काटके अपने वोट बढ़ाये जाते हे चाये उनके पक्ष के शहर में ही क्यों नही रहते हों। नावालिक के भी वोट बनवा दिये जाते हे .वोट बढ़ाना और काटना हार जीत का अहम हिस्सा होता है। देशी शराब के ठेके घर ही खोल दिये जाते हे पिवक्कडो की सुबह शाम लाइन लग जाती .एक वोट की क़ीमत शराब से खरीद लेते .कही कही पिवक्कड़ दोनों जगह ही अपनी पौ बारह करते .इस चुनाव में एक बड़े गाँव में खर्चा करोड़ के ऊपर पहुचँ जाता है। मतदान पड़ने की एक रात पहले नोट देकर वोट ख़रीदे जाते है ,हलवाई ऐसे लगाये जाते जैसे घर में शादी हों.रणनीति की तह फर्जी वोट का भी प्रबन्ध किया जाता है जो मतदाता शहर रहते उनके वोट डाले जाते जैसे लड़कियों क़ो अपने रिस्तेदारों दुवारा लम्बी लाज का घूघट डाल के किसी की बहू किसी क़ो बताके डाले जाते ,विपक्ष भी तीसरी आँख के तोर पर अपनी सेना खड़ी कर देते ताकि कोई फर्जी वोट न पड़ जाये जव पहचान लिये जाये तो मुहजवानी लड़ाई शुरू हो जाती ये लड़ाई विस्तार रूप भी धारण कर लेती जो हाथापाई डण्डे तलवार घरेलू बम्ब के रूप में देखने क़ो मिल जाती।पेप्सी कोक की काँच की बोतल में पेट्रोल भरके मुँह क़ो कपड़े की परत दर परत गट्टर बनाके शीशी बन्द कर देते उस कपड़े में आग लगाके भीड़ के बीच ज़ोरदार धमाका का रूप लेके अफरा तफ़री सा माहौल बना देते। पता चल जाये कि कि मतदान पेटी में दूसरे प्रत्यासी के वोट बहुत पड़े हों तो उस बॉक्स में स्याही डाल देते या बॉक्स क़ो लेकर भाग जाते .स्तम्भ ने भी यही काम किया पर निसफल रहा और पकड़ा गया .जनता के चहेते कीर्तिभान की ह्रदया को विजयी बना दिया।
पति की सफ़लता के पीछे फूल में छुपे खुसबू की भूमिका निभाती है जो पतिनी की सोच समझ क़ो मूल्य समझे अपनी बात कहने का मौका दे. ये न समझे तुम्हारा काम चौखट के अंदर तक की सोच है ग्रहस्थी की रसोई में क्या खत्म हो गया हे ?किस कार्य के लिये पैसे चाहिए बच्चों की देखवाल बस इतना ही कार्य है वाहर क्या करता हूँ इससे कोई मतलव नही हे ?ऐसी सोच वाले बहुत मिल जायेगे पतिनी क़ो कुछ भी नही बताते हे ये ग़लत हे। दोनों को ही घर के वारे में और वाहर के कार्यो के वारे में जानकारी होनी चाहिए ये बात अलग हे कि रुचि न ले.,जब पति पत्नी अपने अपने काम के वारे में बताते रहे तो बुद्धि का विकाश ही होता हे और सीखना चलता रहता है .सोच एक सी भली दो की जायदा कार्यगाह होती जो हल ख़ुद न कर सके क्या पता दूसरे की सोच हल ख़ोज दे। कीर्तिभान और ह्रदयथा एक दूसरे को बहुत अच्छे तरह समझते थे .दोनों के बीच क़भी भी ग़ुस्सा लड़ाई मन मुटाव नही हुआ .सब लोग उनके समझदारी अच्छे पति पतिनी होने का उदाहरण देते थे।
प्रधान पद के साथ ज़िम्मेदारी और बढ़ गई उद्देश्य एक था ग्रामवासी के समस्याओं क़ो दूर करना जितना सरल सोच रखा था, उतना ही कठिन था .यहाँ प्रधान के ईमानदारी होने से सिर्फ ग्रामवासी की सेवा तो की जाती हे पर बिना धन के कैसे ?गाँव के विकास के लिये जो पैसा आता उस पर कितनो की नज़र गड़ी रहती जैसे इन घूस खोरों ने अपनी सरकारी नोकरी का अधिकार बना रखा हो। सेकेट्ररी, चपरासी ,कर्मचारी ,ऑफीसर सब एक ही थाली के चट्टे बट्टे है । पहले तो दोनों घूस देने के लिए राजी नही थे पर जब विचार निर्माणधीस हों उत्थान के लिये अग्रसर हों तो धर्म को धर्म विजयी बनाने के लिये महाभारत का चिंतन करना और गीता पाठ स्मरण करना चाहिये .दोनों ने ये भी ठान रखा था घूस लेने वालों का पर्दा पास करना हे। गॉव क़ो सम्रद्ध उत्थान प्रग्रतिशील की प्रेणा और गाँव के लिये बन गई। कोई भूखा नही सोता कोई वेरोजगार नही हर बच्चा स्कूल जाता जो जो योजनाये सरकार ने बनाई उन सबका लाभ ग्रामवासी तक पहुँचाया .जो कर्मचारी घूस ख़ोरी थे उन सबकी वीडियो बनाके नोकरी से ही बर्खास्त करवा दिया। अच्छे काम के लिये जहाँ जयकारा भी लगता हे वही ईर्ष्या के कारण दुश्मन भी बन गये ,जो मौके की फ़िराक में रहते थे कब मौका मिले और कीर्तिभान क़ो अपने रास्ते से हटा दूँ ,वो मौका दूसरी वार हार के वाद मिला।
राजनीति जाल हे नेता मकड़ी चाये छोटी इकाई ग्राम प्रधान राज्य के मुखमंत्री या प्रधानमंत्री सब मकड़ी इसमें आने के वाद कोई वाहर निकल नही सकता ,अपने दुश्मन क़ो जाल में फ़साके मृत्यु के आग़ोश में सुलादेते है पर ख़ुद भी उस जाल से बच नही पाते। आज़ कीर्तिभान भी उसी राजनीति का शिकार हों गया ,हास्पीटल के ऑपरेशन थ्रेटर में ज़िन्दगी और मौत के बीच झूल रहा है।राजनीति भी जाल के समान इर्द गिर्द घूमती रहती है ,नेता अपनी तागत से अपने बनाये जाल में फ़साके तागत का वर्चस्व दिखाता पर ख़ुद भी बच नही पाता है।
