बुधवार, 13 अप्रैल 2016

भय(कविता)

किशनपुर गाँव में दो भाई रहते थें।बड़े भाई का नाम सिया और छोटे का नाम लखन था।सिया की चौखट से कोई साधु महात्मा या भिखारी निराश होकर नहीं लोटता था।भूखे व्यक्ति को भोजन और प्यासे को पानी पिलाना अपना कर्तव्य समझता था। सिया की बाँतो में शहद सी  मिठास थी,जो हर किसी को अपनी और खीच लेता था ।सिया की वाणी में पूरा गाँव मन मुग्ध था।सिया के चर्चे दूर दूर तक थे,जितना ही गाँव वालो को सिया से स्नेह था उतनी ही लखन से घृणा  थी ।
                                    लखन अपने भाई सिया के विपरीत था किसी की भी सेवा नहीं करता था।लखन के मन में लालच और छल कूट कूट कर भरा था।अपनी लालच के कारण सिया को वँटवारे में बरावर हिस्सा नहीं दिया जो भूमि दी वो अनुउपजाऊ थी।जहाँ ककड पत्थर, घास का तिनका भी नहीँ उगता था वहाँ पर सिया की मेहनत से हँसते मुस्कराते लहराते खेतो में उम्मीद की किरणे बिखरने लगी ।भूमि उपजाऊ बन गई और अनाज के ठेर देख कर ,लखन को जलन हुई।लखन उपजाऊ भूमि में सिया से कम अनाज देखा ये भी उसका मेहनत का नतीजा था।मेहनत करता नहीं था बस जलता था दूसरो को देखकर--
                                        सिया को कुशहाल देखकर,लखन को ईष्या होने लगीं।सिया से भूमि हङपने के लिए षङयन्त्र रचने लगा ।सही मौक़े की तलाश थीं।सब अपने कार्य में मगन थे ,पर लखन के मन में कुछ और ही था।जिस मौक़े की तलाश थी वो पल आ गया ।
                                         सिया को किसी कारण से शहर जाना था ,जिसकी खबर लखन को एक दिन पहले ही लग चुकी थी।लखन सिया से पहले शहर चला गया और अपने जाने की सूचना पङौसी को दी ताकि उस पर किसी का शंक न जायें।
लखन---चाचा मैं शहर जा रहा हूँ ,अगर कोई काम है तो कहो?
चाचा --ने जब बात सुनी तो दग रह गये और सोच रहे थे ,आज अचानक मेरा ख़्याल क्यो आया ?जो कभी हालचाल भी नहीं पूछता था वो आज काम की बात कर रहा हैं।चलो अच्छा है ,जब आँखे खुले तभी सवेरा।लखन अगर तू शहर जा रहा है, तो मेरे लिए आँखो वाली दवा ले आना।
लखन--ठीक है चाचा।
सिया दूसरे दिन शहर जाने के लिए गाँव से निकला तो उसे रास्ते में एक बूढ़ा व्यक्ति मिला जो ज़ोर ज़ोर से काँप रहा था।उसके वदन पर कपङे नहीं थे ,हालत गम्भीर थी।लम्बी दाढ़ी बिखरे बाल जो दीवार की टेक लगा के वैठा था, और कहार रहा था।सिया के काँनो में दर्द की आवाज़ काँनो में पढ़ी तो बढ़ते कदम रुक गया ।इधर उधर देखा तो उसे बूढ़ा व्यक्ति नज़र आ गया और उसके पास गया ।सिया ने आवाज़ दी.......चाचा ऐसे कहरा रहे क्यों हो?जिस आवाज में दर्द की आवाज़ है पर जवाव नहीं मिला ।सिया ने छूके देखा तो उसका बदन दहकते शोले के समान तप रहा था ।एक पल की देर किये अपने पास से सोल उस व्यक्ति को उड़ा दी ।बाबा आपको तो बुखार है चलो आपको हकीम के पास ले चलूँ जो कुछ ही दूरी पर है ।
उस बूढ़े व्यक्ति की धीमे स्वर से आवाज़ निकली ---वैटा बस सर्दी लग रही है जो ठीक हो जायेगी ।
सिया -----चाचा आप हमारे साथ चलो हकीम पास में ही है।दवा देगे बुखार ठीक हो जायेगा।
चाचा----नही वेटा बुढ़ापे के लक्षण है ।
सिया ---नहीं चाचा ।आपकी एक बात नहीं मानूँगा आप बस चलो ,हमारे साथ जब तक बुखार कम नहीं हो जायेगा तब तक मे भी कही नहीं जाऊँगा।
सिया चाचा को लेकर हकीम के पास गया और वही ठहर गया ।शाम भी हो चुकी थी ।
हकीम ---सिया जैसा अगर हर कोई इंसान हो जाये तो दुनिया स्वर्ग से भी सुन्दर हो जायेगी।अब तुम चिन्ता मत करो सब ठीक हो जायेगा ।तुम कही जा रहे थे ?
सिया----हाँ ।शहर जा रहा था, काम था खेती के लिए दवा बीज लेने पर रास्ते मे चाचा की हालत ठीक न लगी, तो रुक गया और आपके पास ले आया ।
हकीम ----शाम हो गई है ।तुम यही रुक जाओ कल चले जाना ।
सिया को हकीम के यहाँ पर रुकना पड़ा।
                                     लखन रास्ते में सिया का इंताजार कर रहा था कि कब साईकल सिया की नज़र आयें।ज़मीन के बीच काँटे को अपने रास्ते से हटा दूँ तो सारी ज़मीन मेरी होगी।दिन गुज़र गया शाम भी हो गई पर सिया नज़र नहीं आया और राहगीरो का आना जाना लगा रहा जो शाम के बाद आना जाना भी बंद हो गया।अब लखन को डर लगने लगा ।धीरे धीरे अंधेरी रात होने लगी।जंगल से जानवरो की आवाजे आने लगी जिससे लखन भयभीत होने लगा ।अपनी जान बचाने के लिए पेड़ पर चढ़ गया ।भय के कारण प्यास भूख चली गई थी ।अपने प्राण को बचाने का ख़्याल था कि किसी भी तरह आज की रात गुज़र जाये।मैं अपने घर पहुँच जाऊँ ।
                                              मन मे तरह तरह के ख़्याल आ रहा था ।आधी रात बीत गई,तभी उसी पेढ के नीचे बदमाश आ गयें।उनको देखा तो और काँपने लगा ।इसी डर के बजय से पसीने मे लथपथ हो गया।लखन को अपने भाई सिया की बाते याद आने लगी।सिया कहता था कि बुरे के साथ बुरा और अच्छे के साथ अच्छा होता हैं।प्रभु से बिनती करने लगा ,"प्रभु आज मुझे बचा लो,अब मैं कोई बुरा काम नहीं करूँगा।"लालच को छोङ दूँगा।लखन के पसीने की बूदे बदमाश के ऊपर गिरी-----
बदमाश---कोई है?तो दूसरे बदमाश ने पूछाँ,"क्या हुआ?
बदमाश--मेरे बाज़ू पर पानी कैसा?लगताहै कोई है यहाँ?
दूसरे मदमाश ने कहाँ,"कोई नहीं है?"इस सूनसान जंगल में कौन आयेगा।किसको अपनी मृत्यु का भय नहीं है?पक्षी होगा।
पहला बदमाश-----तुम ठीक कहते हो।
यह सब बाते लखन सुन रहा था।सूरज की किरण नज़र आई ।पक्षी आकाश में उडने लगें।सब चहचाहट कर कह रहे हो कि अपना अपना काम करो ।लखन पेङ से उतर आया और उसने भागना शुरू किया सामने सिया को देखा तो रोने लगा।
सिया----तुम इतने डरे सहमें क्यों हो?क्या हुआ?
लखन---भाई मुझे माफ़ कर दो मुझसे बहुत बङी गलती हो गई ।आज अहसास हुआ है कि मृत्यु का भय  क्या होता है?मृत्यु से ख़तरनाक  उसका भय होता है।
सिया ----लखन तुम कहना क्या चाहते हो?
लखन ने सारी घटाना बता दी।भाई मुझे माफ़ कर दो।
सिया----लखन इसमें माफ़ी कैसी प्रभु ने तुम्हे अवसर प्रदान किया है सत्य के पथ पर चलने का।उस अवसर का लाभ उठाओ जो हुआ उसको बुरा सपना समझ कर भूल जाओ और आगे बडो।
लखन ने लालच छल कपट छोङ दिया और सिया के पद चिन्हो पर चलने लगा और दोनो को सिया लखन से जानने लगें।

शनिवार, 19 मार्च 2016

गरीव है चोर नहीं

रात का समय था,घनघोर वारिस और हवा चल रही थी। उसी समय एक सरकारी कर्मचारी उधर से आ रहा था जिसके वगल में छोटा सा वेग दवा था!वह बारिश में भीगा हुआ था ,उसके ठण्ड से दाँत कटकटा रहे थे।बिजली की गडगडाहट से रास्ता नज़र नहीं आ रहा था ,वह व्यक्ति बहुत परेशान था ।मैं अपनी खिङकी से देख रहा था।
                                     
मैं बाहर गया और उस व्यक्ति को अपने घर आगमन के लिए कहाँ"लेकिन व्यक्ति ने मुझसे मना कर दिया" मैंने कहाँ साहब"आपको सर्दी लग जायेगी"जब बारिश थम जायें तब चले जाना । बहुत आग्रह करने के उपरान्त व्यक्ति अन्दर आने को राज़ी हुए। मैने उन्हे बैढाया और अपनी पत्नी प्रतिमा से कहाँ ,"साहब "आये है ।बारिश में भीग गयें है एक गर्म चाय और पोछने के लिए तौलिया लाना ।          
मैने नाम पूछाँ," मेरा नाम राम प्रसाद है।"मे बैक मे सर्विस करता हूँ।मेरी गाड़ी ख़राब हो गई  थी इसलिए आफिस में छोड़ आया हूँ।मैं बस पकड़ के घर जा रहा था पर रास्ते में बस भी खराव हो गई।मैं बस से उतर आया सोचा कि कोई सवारी मिल जायेगी पर मुझे क्या पता था कि बारिश शुरू हो जायेगी ।(इसी बीच प्रतिमा चाय लेके आ जाती है  और कहती है कि आप लोग बातों को विराम दीजिए और चाय पीजिए ।

मैने प्रतिमा से कहाँ ,"साहव के लिए भोजन बना लेना ।".. भोजन खा कर ही जायेगें।प्रतिमा अंदर रसोई घर में चली गई।मैंने कहाँ साहव,"कपड़े बदल लो "उसी वक्त साहव ने अपना दाँया हाथ आगे बडाया कि अचानक वगल से बैग सरक गया ।उस बैग की चैन ख़राब थी बैग मे 100 ,100 की तीन कड्डी निकली ।मेरे कुछ कहने से पहले ही साहब ने कहाँ,"यह मेरी तन्खाह है। "उसके बाद मैने कुछ और उसके बारे में जानने की कोशिश नहीं की ।कुछ देर तक हम दोनों में बातचीत होती रही।मेरी पत्नी ने कहाँ,"जी सुनतें हो भोजन बन चुका है आप लोग आकर खा लो।पेट भर कर साहब को भोजन कराया और हम लोगों ने भी भोजन किया। बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही थी मेरे आग्रह पर रुकने को तैयार हुए।फ़ोन से भी सम्पर्क नहीं हो पा रहा था। अपने घर बता सकते कि हम किस स्थित में है बस एक उपाय था कि एक रात अतिथि बन कर शरण लें।वही किया।मैने साहब को एक कमरे में लिटा दिया मैं दूसरे कमरे लेटा था.मैं इधर से उधर करवट बदल रहा था लेकिन मुझे नीद नहीं आ रही थी ।प्रतिमा ने पूछाँ,"आप क्यो? इतना चिन्तित हो"।मैने कहाँ,"कल सिद्धार्थ का फ़ोन आया था ,उसने कहाँ है कि पापा मुझे ट्यूशन फीस कापी किताब के लिए पैसे चाहिए।कम से कम 25 हज़ार चाहिए ।इतने पैसे कहाँ से व्यवस्था करूँ अभी हालत तंग है हर वार घाटा पर घाटा हुए जा रहा है।कोई रास्ता नज़र नहीं आ रहा है ।तुम्हे तो पता है घर का ख़र्च बड़ी मुश्किल से चल रहा है ।कोई न कोई रास्ता तो खोज ही लेगे बच्चे का भविष्य का सवाल है ।उताव चढाव तो नदी के समान ज़िंदगी है जिसमें कभी बहुत पानी होता है तो कभी सूख जाती है ।

हम लोग रात भर बात करते रहे ।कब नीद आ गईऔर सो गये जब आखँ खुली तब तक बारिश भी थम चुकी थी।साहब भी जाग चुके थे ।मेरी पत्नी प्रतिमा चाय लेकर आई ।मेरे जगाने से पहले ही साहब जाग चुके थे और साहब अपना बैग खोल कर रुपये गिन रहे थे। मैने कुछ नहीं कहाँ उल्टे पैर मे वाहर आ गया और साहब को आवाज़ दी।साहब साहब चाय बन गई है आप चाय पी लो, साहब ने चाय पीली और कहाँ ,"अब हम अपने घर जाऊगाँ" आपका सत्कार का आभारी रहूँगा ।घर से चले गयें।
                   
रामप्रसाद सवारी की तलाश में खड़े हुए थे लेकिन कुछ वक्त वाद एक आँटो मिल गया उसमे बैठकर घर के लिए रवाना हो गयें ।रास्ते में  आँटो में एक लड़का भी बैठा । थोड़ी देर बाद रामप्रसाद का घर भी आ गया ।आँटो से उतरने से पहले अपना बैग को देखकर चिल्लाये ,राम प्रसाद ने ऊँचे स्वर में कहाँ ,"इस आँटो से कोई भी सवारी नहीं उतरेगी "।

रामप्रसाद ने ड्राइवर से कहाँ,"इस आँटो को थाने ले चलो"। जब सबने सुना तो डरे और अचम्भे से पूछाँ,"साहब आँटो थाने क्यो ले जा रहे हो"? कुछ तो बताओ आख़िर बात क्या है?

रामप्रसाद ने ऊँचे स्वर में कहाँ,"मेरे रुपये किसी ने निकाल लिए है"।

लोगो ने पूछाँ,"साहव कितने रुपये थे"?

साहब ,-पूरे तीस हज़ार ।जब मैं आँटो में बैठा था तब पूरे थे अब अचानक कहाँ गायव हो गये है ।तुममे से किसी ने मेरे रुपये पर हाथ की सफ़ाई की हैं।उसी बीच एक लङका उतरने लगा ।

रामप्रसाद- "तुम कहाँ जा रहे हो?

लडका- मुझे कालेज जाना है ।

रामप्रसाद- तुम यहाँ से कही नहीं जा सकते हो।

लोगो ने एक स्वरं में कहाँ,ये लङका यही से जा रहा है तो यही चोर है ।तलासी लो ।उस लङके के पास एक पाँलीथीन थी जब उसे टटोला तो उसमें 20 हज़ार निकले ।

लोगो ने कहाँ,"यही चोर है"।चलो इसे पुलिस के हवाले कर दो तो 10हज़ार और मिल जायेगें।

तभी रामप्रसाद ने कहाँ जब तक मुझे पूरे रुपये नहीं मिल जायेगे तब तक यहाँ से कोई नहीं जायेगा।

आँटो थाने में गया जहाँ उस लड़के को खूब मारा पीटा लेकिन उसकी पुलिस ने एक बात न मानी।

लडका-साहब जी मुझे पिता को तो फ़ोन कर लेने दो ।मैं चोर हूँ तो बाकी रक़म उनसे ले लेना।

पुलिस ने सोचा और उसके पिता को बुला लिया।

लडका- अपने पिता से गिडगिडाकर रोने लगा ,"पापा आप बताओ न में चोर नहीँ हूँ मैने किसी के रुपये नहीं चुराये है।

पिता पुलिस से कहते है,"आपको कोई ग़लतफ़हमी हो रही है मेरा वेटा ऐसा नहीं कर सकता हैं।

पुलिस-मैं कुछ नहीं कर सकता हूँ।जिसके रुपये है आप उससे कुछ कह सकते हो।

तभी बाहर से रामप्रसाद आ जाते है,-साहब आपने मुझे पहचाना ?आज रात आप हमारे यहाँ रुके थे।

रामप्रसाद ने कहाँ ,"आपने अपने वेटे को कैसी शिक्षा दी हैं।

लङके के पिता ने कहाँ ,अगर मुझे चोरी ही करनी होती तो मैं बैग से रुपये रात को ही निकाल सकता था और कुछ भी कर सकता था ।मैने ऐसा नहीं किया हम ग़रीब है लेकिन चोर नहीं।

रामप्रसाद ने कुछ सोंचा फिर कहाँ,"आप कह तो ठीक रहे है लेकिन आपके वेटे के पास रुपये आये कहाँ से ?

साहब थोड़ा समय दे दो-मैं अपने वेटे से पूछ कर बताता हूँ।

अपने वेटे से पूछता है-पापा मुझसे घर की हालत छुपी तो नहीं है ।मुझे रुपये की बहुत आवश्यकता थी तो हमने अपने दोस्त के पिता से कर्ज़ पर रुपये लिए है उन्होने मुझे चैक काटकर पैसे दिये थे ।ये है वह पर्ची ।वह पर्ची रामप्रसाद को दिखाई ।लड़के को छोड़ दो और इसके रुपये इसको वापिस कर दो ।आख़िर मेरे रुपये गये कहाँ?

लड़के ने कहाँ,"साहब जी आपके पास जो व्यक्ति वैठा था वो सीट में कुछ  कर रहा था।यह तो मुझे नहीं पता क्या कर रहा था आप तलाशी ले लो।

जब रामप्रसाद ने तलाशी ली तो गद्दी उठाई तो उसमें 30 हज़ार रूपयें थे।मुझे रुपये मिल गये है । रामप्रसाद ने हाथ जोङकर दोनो से माफ़ी मांगी ।साहब ऐसा तो हमारे साथ होता ही रहता है ।आपको मांफी माँगने की ज़रूरत नहीं है ।हम गरीव है लेकिन चोर नहीं हैं।

ग़रीब है लेकिन चोर नहीं है।ग़रीब की ईमान ही सम्मान है जब सम्मान को ठेस लगती है तो ग़रीब की आँखो से ईमान के आँसू झलक जाते है जिनकी क़ीमत कोई अमीर क्या चुकायेगा।

नेत्रों से आँसू न रुके

हे सिसकती धरती नेत्रो से आँसू न रूके,
किये वार खंजर से तो दुनिया न रूके!!
हे सिसकती धरती नेत्रो से आंसू न रूके,
हे हर तरफ़ सन्नाटा ये जुवाँ न रूके!!
फैली हुई वाँये खोजती सूरमाओ को,
कौन उम्मीद करे!!
हे हर और आम मिटने के लिए,
कोई कैसे धीर धरें!!
देखे न वेटा वाप को भतीजा चचा को!!
किस पर विश्वास करें !!
हो रही कच्ची डोर रिस्तो की,
किसकी कौन आस करें!!
हे सिसकती धरती नेत्रो से आंसू न रूके,
किये वार खंजर से तो दुनिया न रुके!!
हैं खून का प्यासा जमाना छाया मातम,
चिराग कौन दिखायें!!
दौलत के भूखे लोगो में अब कहाँ,
इंसानियत न दिखे!!
लूटी जा रही अस्मत खोफ हर ओर घना,
रक्षक कौन बनें !!
सहमे हुए लोगो को अब कौन,
धीरज कौन धरें!!
हे सिसकती धरती नेत्रो से आँसून रूके,
किए वार खंजर से तो दुनिया न रूके!!
लूटी गई पूंजी नहीं वापस मिलती 
सुध कौन हरें!!
पछताये तब होत हे क्या?
चिङियाँ खेत जो चुगें!!
हे सिसकती धरती नेत्रो से आंसू न रूके,
हे हर तरफ़ सन्नाटा ये जुवा न रूके!!