गुरुवार, 4 अगस्त 2016

ssahshee seema

गर्म लू क़े थपेङे बदन में  सुई चुबो रहे है । बार बार गला ऐसा सूखता है जैसे प्यासा हो कुआँ।ऐसे ब्याकुल प्यास मैं ठण्डा पानी मिल जाए तो अम्रत के समान देव दानव मै  कलह हुआ था, उस दृश्य का यहाँ साक्षात्कार हो जाता  हैं। ग़ांव मै गला तर करने  का माध्यम सुराई या मटका ही होते  हैं। जहाँ सुयंक्त परिवार के सदस्य की सख्या 20  से 25  के करीव हो ओर छोटे बच्चे हो तो उस घऱ मैं पानी को लेकर वाद विवाद होता ही रहता हैं। दिन भर 4  से 5  वार मटका पानी से भरा जाता हो ,वहाँ पानी ठण्डा पानी कैसे हो सकता हैं। जितने सदस्य उतने हाथ बार बार खोलना बंद करना इस कारण पानी ठण्डा नहीं हो पाता हैं। एक कारण डंडी वाले लोटे से न लेकर सीधे हाथ डालकर पानी लेना  ,बच्चे तो खैर लड़कपन मे होते है समझाओ भूल जाते हैं पर बड़े ऐसी           लापरवाई करते हैं तो उनको कोन समझाए। औरते वार वार कहती पर आदत से मज़बूर जो है। इस जेठ गरमी मैं मटके के पानी से अच्छा तो हैंडपम्प का पानी जयादा ठण्डा लगता हैं। ये स्थति हर ग़ांव मे देखने को मिल जायेगी।                                                                                                                                                                                                       दोपहर के समय सब किसी न किसी कार्य में संगलन रहते हुये ,ग़ांव मैं देख सखते है। युवक से लेकर बढ़े बुज़र्ग़ तक ताश के पत्तो में जमघट में मिल जायेंगे। कही दहला पकड़ ,कही शीप ,तीन पत्ती ,ओर कही तरह के खेल खेले जाते है। जोश होश वहश,गरमा ,गरमी के साथ अन्य दर्शकों  के लिये मंनोरंजन का मुफ़्त साधन मिल जाता हैं । ताश के खेल में महिलाओं के बीच बादशाह पकड़ का खेल बहुत लोकप्रिय हे। जिसकी तरुप हो तो सामने वाला इशारों से जानने लग जाता हे कि इक्का किधर है ?अपने साथी के पास इक्का हो तो बादशाह किधर हैं ?इशारों से चाल चली जाती है ये भी कला हे,जो इस खेल को समझ जाता है वो बादशाह बन जाता हे नही तो एक्के के हाथों बादशाह पकड़ता रहता है।                                                                                         जिन महिलाओं युवतियों को ताश खेलने का सोख नहीं होता हे उनकी अलग ही महफ़िल जुड़ी मिल जायेगी। उस महफ़िल में गढ़े  मुरदे  बाते,आज़ की बाते ,उसकी बाते इसकी बाते,हर गाँव की ख़बर तार बाबू के माध्यम से पता चल जाता हे। ये कोई चिठ्ठी पत्री बाटने वाला तार बाबू नहीं जो सब तरह की ख़बर रखें उसको तार बाबू संज्ञा दी जाती है। इस महफिल की सबसे रोचक बात या क़िस्सा किसका लड़का किसकी लड़की क़ो लेकर भाग गया। ऐसी ख़बर इस माहोल की जान हैं।                                                                                                         छोटे छोटे बच्चों को माँ डरा धमकाके दोहपहर को सोने क़ो कहती हे पर ऐसी गरमी मैं जिसको नींद आती हे वो ऎसे ही सो जाते हे पर बच्चे फुदक फुदक के वाहर भाग जाते हे। माँ डाँटती रह जाती हे।                                                                                                                                                                                              इन सबसे अलग एक अनहोनी घटना घटने को आतुर थीं,जिसका कोई सपने में भी जिक्र नहीं करता हैं। नकारात्मक पहलुओं क़ो विपताओ से घिरे हुए दृश्यों क़ो जागती आँखो से सपना नहीं देखते हे। जागती आँखो से सपनों को अपने मुताबिक साँचे में डाल लेते हे  और   खोये  चित में खो जाते है। रात  को बंद आँखों से अनय सपनों में  जो दृश्य आते हे वो हमारे मुतावक नहीं ,अपना कोई नियन्त्रण नहीं होता है। आते वही  है जिसका हमने कभी न कभी किसी किसी रूप में अवलोकन किया हो ,चाये चलचित्र के माध्य्म से या किसी के दुवारा कथन कहे हुए ही सपनों के माध्य्म से रात को आते है। जानकर हम कभी नकारात्मक सपनों को जागती आँखों से नही देखना चाहते है या बंद आँखों से दर्शन हो भी जाए तो डर से शरीर में प्रतिक्रयाए शुरू हों जाती है। डर इतना भयानक होता है कि सर्दी में पसीने में लथपथ ,यहाँ तक देखा गया हे कि विस्तर गीला हो जाता है। आवाज़ लगाना चाहते हे पर आवाज निकलती नही हे,ऐसा लगता हे किसी ने दवा रखा हो। जो अपने आप क़ो सर्वशक्तिमान समझते है या दिखलाते है उन सब की दशा भी इससे बच नही पाती है। रात के सपनों पर ज़ोर नही हे ये तो आते हे और आते रहेंगे।                                                                                                                                                             दोहपर का समय सूरज की गरमी से सब बेहाल परेशान ,माथे पर पसीना ,बदन पर पसीना आना ,वार वार प्यास लगना इन सब के वावजूद सब अपने आप को किसी न किसी कार्य में व्यस्त रखें हुऐ थे। घर में शादी की तैयारी जोर शोर से चल रही है। सबसे महत्वपूर्ण काम खरीददारी और निमन्त्रण पत्र लिखना होता है। निमन्त्रण पत्र छप चुके थे .,लिस्ट बनाई जा रही है ,जिन मेहमानों की लिस्ट बन चुकी थी ,उनके नाम से निमंत्रण पत्र पूर्ण लिखे जा रहे थे और याद रहे इसलिए लिस्ट पर टिक किए जाते। इसी बीच भूल चूक मेहमानों का नाम याद आ जाता तो उसका नाम लिस्ट में अंकित कर लिया जाता। भूल से कोई मेहमान छूट जाये ,तो वो मेहमान ता उर्म भर दोष रोपण देते रहते हे 'आप ने हमको शादी में बुलाया भी नही '..और न जाने कैसे कैसे मनगनत कहानी बताते रहते हे। सबसे खाश बात अमीरी गरीबी पर आके ठहर जाती हे,,सामने वाले को यही शक रहता हे इसी कारण से नही बुलाया हैं । बात तो कोई भी हो सकती है। सब स्वतन्त्र हे अपना मन हे कुछ भी सोच सकते है। नये रिस्ते मिल जाते हे तब पुराने रिस्तो को कोन पूछंता है। नये रिस्ते चमाचम  बर्तन हे जिनको सहेज कर रखा जाता हे पुराने बर्तन पुराने रिस्ते की तरह हे जिनकी कोई कदर नही करता है। इनको कोन समझाये पुराने रिस्ते कभी नये भी तो थे। वक्त के साथ सब कुछ बदलता है।                                                                          शादी का रिस्ता बहुत ही रख रखाव का होता हे छोटी सी भूल चूक,,,,,उम्रभर कहने और सुनने को घाव दिए बात हो जाती हे जो वक्त के साथ घाव तो भर जाते हे पर निसान याद दिलाते रहते है।                                                                                                                                                                                        जिसकी शादी तय हुई थी ,उसका नाम सीमा है। छोङ पढ़ाई में बाकी हर काम में होशियार है। चंचल स्वभाव तितली की तरह सबको मोहने बाली ,,,,,डरना तो जानती ही नही क्या होता है ?हर काम को सीखने की इच्छा होसला ओर बढ़ाती। घर में राइफल को ताकना ही नही बल्कि सबकी नज़रो से चुपके चोरी चोरी मेगनीज को निकालना फिर लगाना।,..भाई जब राइफल को नली ड़ालकर साफ करते तो गोर से देखती थी,.... भाई ने जब देखा तो कहा 'सीमा चलायेगी 'ये सुना तो जैसे मन मुराद पूरी हो रही हो जो इच्छा थी एक वार घोड़ा दवा के देखू कि सुना हे झटका  लगता हैं । राइफल चलाना एक कौशल हे बिना अनुभव लिए राइफल चलाना ख़तरे से खाली नही है। राइफल को चलाने का सही तरीका कन्धे पर रख कर चलाई जाती हे ,पकङ को मजबूत बनाके रखनी होती हे। पकङ मजबूत न होगी तो खुद चोट लग जायेगी क्योकि पीछे की और धक्का देती है। सीमा राइफल चलकर गद गद हो उठी ,जब अपने मुताबिक कोई काम पूर्ण हो जाये तो खुश हो जाती।                                                                                                                                                                                                                रूपवती तो हे ,भाई की चहकती बहन है जिसका दुलार से ललिया ललिया कहकर पुकारते है। घर पर ही नही गाँव में भी निडर के चर्चे मशहूर है। पुलिस का भी डर नही हे फिर चाये किसी को पुलिस से बचना हो। किसी गलत इरादे से नही पुलिस पकङ के ले जाती  तो उस व्यक्ति को खुद को जमानत देने का मौका नही  मिल पाता  है जिसको बेवजह गेंहू के साथ घुन होंने की सजा जो मिलती है। खुद थाने में हाजिर होक जमानत की व्यवस्था जो कर लेता है।                                                                                                                                               गाँव में प्रधान चुनाव का माहोल बहुत ही रोचक होता है। इसकी तैयारी एक साल पहले से सुरू हो जाती। अपने वोटर और विपक्ष के वोटर का आंकलन किया  जाता हे। अपने पक्ष के वोट बढ़ाना और विपक्ष के वोट काटना,. ये गाँव की प्रधान राजनीति का अहम हिस्सा है जिससे ही हार जीत का फैसला होता है। बिधायक अगर गाँव का आस पास का हो तो कोई अन्य तो जीत ही नही सकता। विधायक जिसको चायेगा वही जीतेगा फिर चाये कितनी नीचता पर क्यों न आ जाये। पुलिस वालो ने अपनी हक़ीक़त दिखला ही दी कि हम विधायक के टन्टू है। गाँव वालो की रजा से भाभी प्रधान चुनाव में जो खङी थी पर विधायक नही चाहता था कि जीते इसलिय पुलिस को टन्टू बनाकर रात में अपशव्द के साथ जाने कैसे बाते कहते ताकि चुनाव में बैठ जाये। रोज रात का नियम था आखिर कब तक चुपचाप सुने। एक रात सीमा ने बेधड़क जवाव दे ही दिया ,'आखिर तुम्हारा क्या बिगड़ा हे जो ऐसे शब्द कहते हो ,तुम्हारी टन्टू जैसी हरकतो के कारण कोई मान सम्मान नही देता हे। तुमको तो गेरतली के पेदे के समान हे जो मौका देखकर उसकी तरफ़ झुक जाते  हो । थोड़ी सी तो वर्दी का सम्मान करो ,हमे कुछ कहने से कुछ नही होगा ,,,,चुनाव नही लड़ेंगे पर चोर चक्के घूम रहे उनको पकड़ो। उसके वाद पुलिस ने कुछ न कहा और घर के पीछे से चुपचाप चली गई। सीमा ने छत से शेरनी की दहाड़ से जवाव दिया। जव दहाड़ से सो टके की बात कहे तो उसका जवाव किसी के पास नही होता। प्रधान चुनाव में हार का मुख देखना पड़ा। विधायक की सह से मतदान केन्द्र की जगह बदल दी गई और धड़ाधड़ ख़ुद ही वोट डाल लिये कोन कहता?किससे कहते ?सरकार जिसकी हो पुलिस भी उसी की होती है। इस हार का कोई अर्थ ही नही था।                                                                                                                                                                                     विधायक के बाहुबली का आतंक इस कदर छाया था कि रात को बारी बारी से चौकीदारी करके गुजरती थी। राज्य चुनाव में विजयी विधायक का समर्थन नही किया था उसी का प्रतिरोध इस तरह डराकर लिया जा रहा था। सूरज छिपते ही पूरा ग़ांव अपने अपने घर में छिप जाते थे ,दूऱ दराज खेतो पर अकेले जाना मुश्किल था. आठ से दस सदस्य इक्कठे होकर तव जाते थे। मकसद था पकड़ का जिससे मोटी फिरौती की रकम बसूलना ,क्योंकि विधायक को हार का बदला जो लेना था पर इस कार्य में हार ही मिली तो ओर आक्रोश में  था। प्रधान चुनाव में अपने समर्थन को  विजयी बनाया तब शांत हुआ। चौकीदारी के कार्य में सीमा कहाँ पीछे रहती ,घर की छत पर घास फूस की झोपड़ी बना ली थी उसी में बारी बारी से मोर्चा सवालते थे। शरहद जैसा माहोल बन गया था जो रोज सुबह सुनने को मिलता था, आज रात इधर से बदमाश असला बन्दुक के साथ गुजरे उधर से गुजरे ,,,,,,,,,प्रधान जीत के साथ ये भय भी समाप्त हो गया। सतर्कता अभी भी थी ये चलता ही रहता हे ठीक वैसे ही शेर और हिरन का जंगल में डर ....                                                                                                                         प्राय देखा गया हे ,जव लड़की की शादी तय हो जाये तो अपने रूप को सजाने और सवारने में घन्टे घन्टे निकाल देती हे। वार वार आयने के सामने आकर इतराती हे , लजाती हे, शरमाती हे ,हाथों को चहरे के सामने लाकर धीरे धीरे खोलती हे मुस्कराती हे ये सब कार्य छुप छुप के होते हे मन में ये भी लगता हे कोई हमको देख न ले। चहरे पर एक दाना भी निकल जाये तो परेशान हो जाती हे कितने जतन किये जाते हे लोग को घिस कर लगती हे गोरपता को लगायेगी और न जाने कैसे कैसे सोंदर्य प्रसाधान का उपयोग करती हे। सुबह सुबह दूध का झाग लगाना फिर बेसन में चिकनाई या दही डालकर उवटन करना। वाहर धूप में निकलने से परहेज करना। वर्तन साफ करेगी तो काले वर्तन लोहे कड़ाई तवा को छोड़ देगी इससे हाथ काले हो जायेगे। पर इनको कौन समजाये ये एक भ्र्म हे ,,,,,,,,,,यहाँ तो मम्मी साफ कर लेगी पर ससुराल में ऐसा किया ,तो ग़ांव आस पड़ोस में डिडोरा पिट जायेगा और न जाने कैसी कैसी बाते उसको   सुनने को मिलेंगी ,ताने और मिलेंगे यही सिखाया हे तेरी मईया ने ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,मायके में मन के पंछी हे ,ससुराल में मन कैद पंछी हे। खाना स्वंय बनाओ सबको खिलाओ बाद में खाना पड़ता हे अगर भूल से पहले खा लिया तो हाय तोवा मच जायेगा ,जाने कितना बड़ा जुर्म हो गया। ये एक नये विवाद का रूप लेलेगा। मायके में मन पन्छी होते हे जो मन करता हे वही करते हे ,.ससुराल में बंधनों और दायत्व से कितने ही बोझ लाध दिये जाते है। ,सपने तो रात के सपनो की तरह हे जो सुबह आँख खुलते ही ओझल हो जाते हे। ससुराल के मन मुताबिक न चले  अपने मन मुताबिक़ चले तो तेज बहू का ठप्पा और कलेश को निमन्त्रण दे दिया जाता हे।                                                                                                                                                           अपनी क्षमताओ को दिखाने के लिये एक मौका तो मिलता हे ,उसका लाभ उठाकर कसौठी पर खरे उतर कर दाते तले उँगली दवाने को मजबूर कर दो और इतियास बन जाओ। अपने वर्चस्व का गुड़गान जो करता हे वो मोके से चूक जाये तो उसका हाल खाल में छुपे भेड़िया सबके सामने उजागर हो जाता हे। मौका सबको एक बार जरूर मिलता है। ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,                                                                                              खाद की  बोरी यूरिया जिक जैसी खाली बोरी को सर्फ से धोकर सिलाई को उधेड़कर एक के साथ एक जोड़कर शहर के मखमल कालीन ग़ांव में यही कालीन है । इसी कालीन के ऊपर निमन्त्रण पत्र बिखरे पड़े हे। सीमा झुककर निमन्त्रण पत्र लिख रही हे और भाभी लिस्ट से नाम बोलती ,साथ ही साथ टिक करती। आज पिछले दिनों के मुकाबले लू तेज चल रही थी। इस लू भरी दोपहरी में  अपने पसंद के मुताविक़ कुछ न कुछ व्यक्ति कर रहे हे। ताश खेलकर तो कोई चारपाई बुनकर समय काट रहा हैं । किसान कितना ही कर्ज तले दवा हो पर अपना दर्द साझा न करेगा सब किसान भाई मिलकर खुश रहने की चेष्टा करते रहेगे जैसे सब मिलकर ताश खेलना  ,शतरंज खेलना इत्यादि ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,अचानक पास से चीखने चिलाने रोने की आवाजे सुनाई देने लगी। पत्र लिखने से एकदम मोह भंग हो गया और कारण जानने की इच्छा उत्तपन्न हई ,आख़िर कौन रो रहा हे?चिल्ला रहा हे?भय से पीड़ा युक्त किस किसकी आवाज़ है ?घर से सटकर बने घर से आवाजे आ रही है। आग की लपटे  ऊँची ऊँची उठ रही है ,लू के कारण आग तेजी से फेल रही है। घर की छत बाँस बल्ली फ़ूस लकड़ी के मोटे मोटे लट्ठों  की सहायता से बनीं होने के कारण आग तेज़ी से फेल रही है। सीमा ने छत से चढ़ कर देखा ,'लपटों को देखकर कहाँ 'भाभी भाभी सामान निकल लो ,मास्टनी चाची के घर आग लग गई हे" । मास्टानी चाची और मंत्रिन चाची की बहू दोनों बच्चे आग के बीच में फस गहे है। कहते कहते नीचे उतर के आई और कमरे बरामदा से सामान निकल निकालके आंगन में ऱख दिया क्योकि सटकर घर बना है ,गहरी गहरी दरारे जो थी जिसके कारण कभी भी आग लग सकती थी लेकिन पक्का घर होने के कारण ये हादसा टल गया।                                                                  मास्टनी चाची के साथ तीन और आग में फँसे हुऐ है जो लगातार चीख रहे चिल्ला रहे है। आवाज़ सुनकर गाँव वाले घर के पास इक्कठा हों गये लेकिन दरवाजा बंद था,आग बढ़ती ही जा रही थी ,कभी भी किसी भी वक़्त कुछ भी हों सकता है। सीमा अपनी घर की छत से होकर उस घर में जाने लगीं ,नीचे छत में आग लगी हुई थीं ,धीरे धीरे क़दम बड़ा रही हे नीचे लोग होशला बड़ा रहे थे और सभलकर जाने क़ो कह रहे है। सीमा धीरे धीरे आगे बडी उस छत पर पहुँच गई जो आग की चपेट में नही थी ,नीचे सबने अपने आप को एक कोने में समेट लिया ताकि बचा जा सके। सीमा ने हिम्मत करकें ऊपर रखीं सीडी को आंगन में फासकर ऱख दी ,उसी सीढ़ी से नीचे उतरी ,महिलाये और बच्चे बुरी तरह घबराये हुए हे। पहले महिलाओ को ऊपर छत पर किया फिर एक बच्चे को एक क़ो अपनी गोदी में लेकर ऊपर आई ,आँखों के सामने आग लगी छत धड़ाम धड़ाम नीचे गिर रही है ,जिस छत से सीमा आई वो भी धड़ाम से नीचे गिरी। बचने का एक रास्ता था कमरे के अंदर खिड़की हे जिससे अहाते में ताकने और झाँकने के काम आती थी,आज वही जीवन वरदायनी बन जायेगी। गाँव वालो ने नीचे से सीढ़ी लगा दी ,एक एक कर सब उतर आये। अभी भी महिलाये बच्चे भय मुक्त नही थे। सीमा के होशले की सब तारीफ़ कर रहे है। जिससे जैसे हुआ वैसे आग बुझाने की कोशिश कर रहे पर आग बेकाबू हो चुकीं थीं। दमकल आई तव आग पर काबू हो पाया हर जगह राख  का ठेर ही ठेर था।                                                                                                           ये एक कल्पना कहानी नही हे बल्कि सत्य घटना है ,जो भी हमने दिखाने की कोशिश की हे वो सब एक साल में घटनाये घटी है।                                                                                                                     "  ग्राम बछेला जिला फ़िरोज़ाबाद राज्य उत्तर प्रदेश '                                        ये तव की बात हे जब में आठवी कक्षा मै थी। सन 1996 की घटना है। वक्त के साथ साहसी सीमा की कहानी कही खो गई है जिसने साहस का परिचय देकर जान की परवाह किये चार ज़िंदगियों को अनहोनी घटना घटने से बचाया पर आज रेगिस्तान में लुफ्त लूनी नदी के समान साहसी सीमा खो गई है। अगर ये घटना शहर या कसवा की होती तो अखवारों की शान और पुरूस्कार से सम्मान दिया जाता। अनछुये किस्सों को समाज के बीच हिस्सा बना दे तो मेरी कलम भी गौरांवित हो जायेगी। ये सीमा और कोई नही हमारी बुआजी ही है। सबसे अलग सोच के कारण परिवार की हितेशी है जितना भी कहा जाये कम है। जिस सम्मान की हकदार हे थोङा सा सम्मान मिल जाये मेरा लिखना सार्थक हो जायेगा।                                                                                                                                 आकाँक्षा जादौन                          

रविवार, 17 जुलाई 2016

वक्त की धाराओ में




वक्त की धाराओ में चलो,
चलों अपनी भी नाव चलायें!!
फल का मोह छोङ दें,
डूवेगी या पार लगेगी!!
माँझी शा हुनर लिए,
धाराओ में बढते जायें!!
मुश्किल आसान नहीं,
संकल्प से बढा साहस नहीं,
वक्त की धाराओ में चलों,
चलों अपनी भी नाव चलायें!!
गिर से निकलती धारा ,
पथ आसान नहीं हैं!
सर्घष चुनौती से भरा,
गिरती उछलती खाती गोते!
रौद्ध रूप कभी निर्मल धारा!!
अपना भी पथ ऐसा होगा,
साहस के वल पर पार होना!!
कंकरीला पथरीला पथ,
मोडो का अद्भुत सफर!!
वक्त की धाराओ में चलो,
चलो अपनी भी नाव चलायें!!
ठहरार नहीं बस चलते जाना,
विपताओ को पार कर बढते जाना!!
कितने मानव जीवो का वरदान,
तृष्णा पूरा किया अहम योगदान!!
अंत में मिली सागर से ,
किया सफर अनमोल वरदान!!
हमको अपने पथ चलना,
करना हैं समाज कल्याण!!
वक्त की धाराओ में चलो,
चलो अपनी भी नाव चलायें!

जमघट

काफिलो का जमघट,
लगता हर जगह मेला!
सेनानायक शी हिम्मत नहीं,
जनता जर्नादन का लगता खेला!!
बाँध कर रखे क्यो सपने,
हुनर के दरवाजे खोल दो!!
झुकना जिसे आ गया,
पंताका उसी ने फैराया!!
हट्टाहस करती हे जनता,
हे झुकना जिसने चाहा!!
खङा रहा अहम के वंश,
एक झोका में उखङ गया!!
निर्भीक उसकी हिम्मत,
साहस उसका परिचय!!
झुकना उसका मान सम्मान,
पिघला लोहा बनता फोलाद!!
सम्मान को करे तिरस्कार,
पराक्रम से करे परास्त!!
सोच अलग थलग जिसकी,
खुद व खुद किस्से बन जाते!!
राग की धून पर प्रेम,
स्नेह लुटाना आता है!!
हर मायूस चहरे पर,
मुस्कान लाना आता है!!
द्वेष किसी से क्या करे,
छोटा जीवन छोटी बात!!
तम से घिरा हे जीवन,
रोशनी बनना हे आता!!
काफिलो के जमघट से,
एक किरण तुम भी बनो!!
झाँको खुद के अंदर ,
अच्छा क्या हे छुपा!!
आसू न दो किसी को,
मुस्कान सबकी बनो!!
एक अध्याय ऐसा लिखो,
जिस पण नाज सब करे!!
बन जाये बंदगी सबकी,
जिंदादिल कहाणी लिखो!!
काफिलो के जमघट से,
एक किरण तुम भी बनो!!
झाँको खुद के अंदर,
अच्छा क्या हे छुपा!!

तुम चलो हम चलें...

तुम चलो हम चले,
एक नया राग बनाते चले!!
मायूस हर चहरे पर,
उम्मीद की मुस्कान लाते चले!!
दीपक से दीपक जलाते चले,
तूटे सपनो को आस बधाँते चले!!
अकेली हूँ उम्मीद के पथ पर,
सहयोग से काफिले बनाते चलें!!
तुम चलो हम चले ,
एक नया राग बनाते चले!!
लाचार वेबस ताकती आँखे,
सहारा से लङी बनाते चलें!!
मादकता जाल को त्यागे,
कर्मषठ लोह जलाते चले!!
वंजर जमीं में भी हम,
उम्मीद के फूल खिलाते चलें!!
तुम चलो हम चलो,
एक नया राग बनाते चलें!!
हर गृह में दुख अपार हैं,
हर दुख को साझा करते चलें!!
उम्मीद की प्रेणा बनकर,
गिर पर भी राह बना चलें!!
पत्थरो को भी जान देकर,
अमृत धारा निकाल चलें!!
तुम चलो हम चले,
एक नया राग बनाते चलें!!
हार उम्मीद का अंत नहीं,
अमावस्या के बाद पूर्णिमा दिखा चले!!
घनघोर निशा के बाद,
अरूणिमा बिखेर चले!!
सोंच शून्य पर? नहीं,
प्रश्नो का अम्भार बना चले!!
शिथला लङखङा रही उम्मीद,
होशलो से ऊर्जा भर चलें!!
कंकरीला पथरीला काँटो का पथ,
लक्ष्य केन्द्रित सिखा चलें!!
आखरी श्वास लहू बाकी ,
उम्मीद की आस दिखा चलें!!
गरीब की कुटिया धन से नहीं,
मन चेतना से अमीर बना चलें!!
फुटपाथ पर भविष्य मांगता भीख,
बाजूबल मेहनत का पाठ सिखा चलें!!
भूखे लाचार को रोटी दे,
कमाने के हुनर सिखा चलें!!
सुख दुख मिल कर वाँटे,
एक अलख ज्योति चला चलें!!
तुम चलों हम चलें,
एक नया राग बनातें चलें!!

गुरुवार, 30 जून 2016

यूपी का दंगल

यूपी का दंगल सजने लगा,
दाँव पेच का आकलन होने लगा!!
चौपालो में गरमागरम माहोल बना,
चमचों की जेबे गरम होने लगी!!
चार साल के दबे मुद्दे मुद्दा बना,
अब नासूर बनके पेश करने लगे!!
खा न ले गाड़ी मेरी कोई मलाई,
मलाई पर सब टूटने है लगे!!
दलित अल्पसंख्कि है पैतरा,
पैतरा का दाँव सब लगाने लगे!!
साईकल पर सवार मुलाईम अखलेश,
अपने कुरमा का वल दिखाने निकला!!
मुस्लिम के बने है ये हितेशी,
इफ्तार पार्टी आयोजन होने लगा!!
अब सोंच रहे है क्या मुफ़्त में दे,
मुफ़्त के लोभ में वोटर बिक जाते है!!
सत्ता की रोटी खूब सिक जाती हैं,
मुफ़्त का लोभ घर आ जाता हैं!!
कुरमें को जासूश पर लगा दिया,
बिक जायें वोटर वो तरकीव खोजनी हैं!!
मायावती हाथी पर सवार हो चली,
दलित का हथकड्डा लेगे निकली!!
ब्रहाम्ण ठाकुर को बनाना है विधायक,
जैसे भी हो कैसे भी हो पद मिल जायें!!
चेहरा है मायावती नईया पार हो जायें,
करोङो का खेल हे ये प्यारे,
टिकट सत्ता का रेल है प्यारे!!
डूढ डूढके पैतरे खोजे जा रहे है!!
हम में है दम वाकी पानी है कम,
मायावती का खेल दलित है वार!!
पंजा है काँग्रेस की दशा कहाँ छुपी,
गंठबंधन करते है मुँह की खाते है!!
60साल की सत्ता जनता नकार रही हैं,
ग्रहण लगा है जिनके सितारो पर,
राहुल जीत का चेहरा न बन पा रहे है!!
खेमे की नाराज़गी हार के बाद निकलती हैं,
प्रियंका को आगे लाओ चेहरा बनाओ!!
चहरे से कुछ नहीं होगा ग्रहण को हटने दों,
और क्या क्या देखना है धीरज धरों!!
मोदी जी के सैलाव में कमल खिलने निकला,
वाराणशी की बदली काया जग को दिखाया!!
राम नाम का चौला रंगने है निकला,
राम का मंदिर अहम शस्त्र जग बताया!!
कोई भी अस्त्र छुपा रह न जायें !!
दलित हो या हिन्दू पलायन मुद्दा,
साहा के नेत्रतृत्व में जीतने निकला!!
यूपी से मिला केन्द्र मे शासन,
अब यूपी में खिलाना हैं कमल!!
कोने कोने मे दमदार है सेवक,
अंदर ही मुखिया बनने की होङ मची है !!
यूपी का दंगल सजने लगा,
दाँव पेच का आकलन होने लगा!!

रविवार, 8 मई 2016


 
 
1
माँ के आचल की छाँव,
पिता का 


दुलार..,
जग से मिलाया!!
करूँ बंदना वार वार....
श्रृजन  हो पालन हार,
गुर भी मित्र भी,
ब्रह्मांड का सार!!
करूँ में वंदना वार वार....
लहू देखे सीचा माँ,
डर को जीत बनाया पिता!!
वचपन का हर पल ,
आपका था सहारा!!
अश्को की करून पुकार,
कैसी समझी हृदय पुकार!!
हर ज़िद को किया पूरा!!
करूँ वंदना वार वार.....
सच का आयना दिखाकर,
वचपन था आपसे हमारा!!
दुनिया थी पराई हमारी,
वक्त बदला रंग बदले!!
जिदंगी के ढग बदले!!
करूँ में वदना वार वार.....
आई जवानी दुनिया मे खोया,
आपकी हर बात कङवी बात!!
सपनो को अपना समझा,
आपका निरणय लगता गलत!!
आज समझा आप शुभचिन्तक,
दुनिया के रंग महा ठग!!
न होता भविष्य उज्ज्वल,
करूँ वंदना वार वार....
जब खुद माँ बाप बनते,
तब खुद समझते पीणा!!
बच्चे होते है चक्षु ,
देखते हे उनसे संसार!!
मां हे धरा ,पिता आकाश!
हमने देखा संसार!!
करूँ वंदना वार वार...

बुधवार, 13 अप्रैल 2016

भय(कविता)

किशनपुर गाँव में दो भाई रहते थें।बड़े भाई का नाम सिया और छोटे का नाम लखन था।सिया की चौखट से कोई साधु महात्मा या भिखारी निराश होकर नहीं लोटता था।भूखे व्यक्ति को भोजन और प्यासे को पानी पिलाना अपना कर्तव्य समझता था। सिया की बाँतो में शहद सी  मिठास थी,जो हर किसी को अपनी और खीच लेता था ।सिया की वाणी में पूरा गाँव मन मुग्ध था।सिया के चर्चे दूर दूर तक थे,जितना ही गाँव वालो को सिया से स्नेह था उतनी ही लखन से घृणा  थी ।
                                    लखन अपने भाई सिया के विपरीत था किसी की भी सेवा नहीं करता था।लखन के मन में लालच और छल कूट कूट कर भरा था।अपनी लालच के कारण सिया को वँटवारे में बरावर हिस्सा नहीं दिया जो भूमि दी वो अनुउपजाऊ थी।जहाँ ककड पत्थर, घास का तिनका भी नहीँ उगता था वहाँ पर सिया की मेहनत से हँसते मुस्कराते लहराते खेतो में उम्मीद की किरणे बिखरने लगी ।भूमि उपजाऊ बन गई और अनाज के ठेर देख कर ,लखन को जलन हुई।लखन उपजाऊ भूमि में सिया से कम अनाज देखा ये भी उसका मेहनत का नतीजा था।मेहनत करता नहीं था बस जलता था दूसरो को देखकर--
                                        सिया को कुशहाल देखकर,लखन को ईष्या होने लगीं।सिया से भूमि हङपने के लिए षङयन्त्र रचने लगा ।सही मौक़े की तलाश थीं।सब अपने कार्य में मगन थे ,पर लखन के मन में कुछ और ही था।जिस मौक़े की तलाश थी वो पल आ गया ।
                                         सिया को किसी कारण से शहर जाना था ,जिसकी खबर लखन को एक दिन पहले ही लग चुकी थी।लखन सिया से पहले शहर चला गया और अपने जाने की सूचना पङौसी को दी ताकि उस पर किसी का शंक न जायें।
लखन---चाचा मैं शहर जा रहा हूँ ,अगर कोई काम है तो कहो?
चाचा --ने जब बात सुनी तो दग रह गये और सोच रहे थे ,आज अचानक मेरा ख़्याल क्यो आया ?जो कभी हालचाल भी नहीं पूछता था वो आज काम की बात कर रहा हैं।चलो अच्छा है ,जब आँखे खुले तभी सवेरा।लखन अगर तू शहर जा रहा है, तो मेरे लिए आँखो वाली दवा ले आना।
लखन--ठीक है चाचा।
सिया दूसरे दिन शहर जाने के लिए गाँव से निकला तो उसे रास्ते में एक बूढ़ा व्यक्ति मिला जो ज़ोर ज़ोर से काँप रहा था।उसके वदन पर कपङे नहीं थे ,हालत गम्भीर थी।लम्बी दाढ़ी बिखरे बाल जो दीवार की टेक लगा के वैठा था, और कहार रहा था।सिया के काँनो में दर्द की आवाज़ काँनो में पढ़ी तो बढ़ते कदम रुक गया ।इधर उधर देखा तो उसे बूढ़ा व्यक्ति नज़र आ गया और उसके पास गया ।सिया ने आवाज़ दी.......चाचा ऐसे कहरा रहे क्यों हो?जिस आवाज में दर्द की आवाज़ है पर जवाव नहीं मिला ।सिया ने छूके देखा तो उसका बदन दहकते शोले के समान तप रहा था ।एक पल की देर किये अपने पास से सोल उस व्यक्ति को उड़ा दी ।बाबा आपको तो बुखार है चलो आपको हकीम के पास ले चलूँ जो कुछ ही दूरी पर है ।
उस बूढ़े व्यक्ति की धीमे स्वर से आवाज़ निकली ---वैटा बस सर्दी लग रही है जो ठीक हो जायेगी ।
सिया -----चाचा आप हमारे साथ चलो हकीम पास में ही है।दवा देगे बुखार ठीक हो जायेगा।
चाचा----नही वेटा बुढ़ापे के लक्षण है ।
सिया ---नहीं चाचा ।आपकी एक बात नहीं मानूँगा आप बस चलो ,हमारे साथ जब तक बुखार कम नहीं हो जायेगा तब तक मे भी कही नहीं जाऊँगा।
सिया चाचा को लेकर हकीम के पास गया और वही ठहर गया ।शाम भी हो चुकी थी ।
हकीम ---सिया जैसा अगर हर कोई इंसान हो जाये तो दुनिया स्वर्ग से भी सुन्दर हो जायेगी।अब तुम चिन्ता मत करो सब ठीक हो जायेगा ।तुम कही जा रहे थे ?
सिया----हाँ ।शहर जा रहा था, काम था खेती के लिए दवा बीज लेने पर रास्ते मे चाचा की हालत ठीक न लगी, तो रुक गया और आपके पास ले आया ।
हकीम ----शाम हो गई है ।तुम यही रुक जाओ कल चले जाना ।
सिया को हकीम के यहाँ पर रुकना पड़ा।
                                     लखन रास्ते में सिया का इंताजार कर रहा था कि कब साईकल सिया की नज़र आयें।ज़मीन के बीच काँटे को अपने रास्ते से हटा दूँ तो सारी ज़मीन मेरी होगी।दिन गुज़र गया शाम भी हो गई पर सिया नज़र नहीं आया और राहगीरो का आना जाना लगा रहा जो शाम के बाद आना जाना भी बंद हो गया।अब लखन को डर लगने लगा ।धीरे धीरे अंधेरी रात होने लगी।जंगल से जानवरो की आवाजे आने लगी जिससे लखन भयभीत होने लगा ।अपनी जान बचाने के लिए पेड़ पर चढ़ गया ।भय के कारण प्यास भूख चली गई थी ।अपने प्राण को बचाने का ख़्याल था कि किसी भी तरह आज की रात गुज़र जाये।मैं अपने घर पहुँच जाऊँ ।
                                              मन मे तरह तरह के ख़्याल आ रहा था ।आधी रात बीत गई,तभी उसी पेढ के नीचे बदमाश आ गयें।उनको देखा तो और काँपने लगा ।इसी डर के बजय से पसीने मे लथपथ हो गया।लखन को अपने भाई सिया की बाते याद आने लगी।सिया कहता था कि बुरे के साथ बुरा और अच्छे के साथ अच्छा होता हैं।प्रभु से बिनती करने लगा ,"प्रभु आज मुझे बचा लो,अब मैं कोई बुरा काम नहीं करूँगा।"लालच को छोङ दूँगा।लखन के पसीने की बूदे बदमाश के ऊपर गिरी-----
बदमाश---कोई है?तो दूसरे बदमाश ने पूछाँ,"क्या हुआ?
बदमाश--मेरे बाज़ू पर पानी कैसा?लगताहै कोई है यहाँ?
दूसरे मदमाश ने कहाँ,"कोई नहीं है?"इस सूनसान जंगल में कौन आयेगा।किसको अपनी मृत्यु का भय नहीं है?पक्षी होगा।
पहला बदमाश-----तुम ठीक कहते हो।
यह सब बाते लखन सुन रहा था।सूरज की किरण नज़र आई ।पक्षी आकाश में उडने लगें।सब चहचाहट कर कह रहे हो कि अपना अपना काम करो ।लखन पेङ से उतर आया और उसने भागना शुरू किया सामने सिया को देखा तो रोने लगा।
सिया----तुम इतने डरे सहमें क्यों हो?क्या हुआ?
लखन---भाई मुझे माफ़ कर दो मुझसे बहुत बङी गलती हो गई ।आज अहसास हुआ है कि मृत्यु का भय  क्या होता है?मृत्यु से ख़तरनाक  उसका भय होता है।
सिया ----लखन तुम कहना क्या चाहते हो?
लखन ने सारी घटाना बता दी।भाई मुझे माफ़ कर दो।
सिया----लखन इसमें माफ़ी कैसी प्रभु ने तुम्हे अवसर प्रदान किया है सत्य के पथ पर चलने का।उस अवसर का लाभ उठाओ जो हुआ उसको बुरा सपना समझ कर भूल जाओ और आगे बडो।
लखन ने लालच छल कपट छोङ दिया और सिया के पद चिन्हो पर चलने लगा और दोनो को सिया लखन से जानने लगें।

शनिवार, 19 मार्च 2016

गरीव है चोर नहीं

रात का समय था,घनघोर वारिस और हवा चल रही थी। उसी समय एक सरकारी कर्मचारी उधर से आ रहा था जिसके वगल में छोटा सा वेग दवा था!वह बारिश में भीगा हुआ था ,उसके ठण्ड से दाँत कटकटा रहे थे।बिजली की गडगडाहट से रास्ता नज़र नहीं आ रहा था ,वह व्यक्ति बहुत परेशान था ।मैं अपनी खिङकी से देख रहा था।
                                     
मैं बाहर गया और उस व्यक्ति को अपने घर आगमन के लिए कहाँ"लेकिन व्यक्ति ने मुझसे मना कर दिया" मैंने कहाँ साहब"आपको सर्दी लग जायेगी"जब बारिश थम जायें तब चले जाना । बहुत आग्रह करने के उपरान्त व्यक्ति अन्दर आने को राज़ी हुए। मैने उन्हे बैढाया और अपनी पत्नी प्रतिमा से कहाँ ,"साहब "आये है ।बारिश में भीग गयें है एक गर्म चाय और पोछने के लिए तौलिया लाना ।          
मैने नाम पूछाँ," मेरा नाम राम प्रसाद है।"मे बैक मे सर्विस करता हूँ।मेरी गाड़ी ख़राब हो गई  थी इसलिए आफिस में छोड़ आया हूँ।मैं बस पकड़ के घर जा रहा था पर रास्ते में बस भी खराव हो गई।मैं बस से उतर आया सोचा कि कोई सवारी मिल जायेगी पर मुझे क्या पता था कि बारिश शुरू हो जायेगी ।(इसी बीच प्रतिमा चाय लेके आ जाती है  और कहती है कि आप लोग बातों को विराम दीजिए और चाय पीजिए ।

मैने प्रतिमा से कहाँ ,"साहव के लिए भोजन बना लेना ।".. भोजन खा कर ही जायेगें।प्रतिमा अंदर रसोई घर में चली गई।मैंने कहाँ साहव,"कपड़े बदल लो "उसी वक्त साहव ने अपना दाँया हाथ आगे बडाया कि अचानक वगल से बैग सरक गया ।उस बैग की चैन ख़राब थी बैग मे 100 ,100 की तीन कड्डी निकली ।मेरे कुछ कहने से पहले ही साहब ने कहाँ,"यह मेरी तन्खाह है। "उसके बाद मैने कुछ और उसके बारे में जानने की कोशिश नहीं की ।कुछ देर तक हम दोनों में बातचीत होती रही।मेरी पत्नी ने कहाँ,"जी सुनतें हो भोजन बन चुका है आप लोग आकर खा लो।पेट भर कर साहब को भोजन कराया और हम लोगों ने भी भोजन किया। बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही थी मेरे आग्रह पर रुकने को तैयार हुए।फ़ोन से भी सम्पर्क नहीं हो पा रहा था। अपने घर बता सकते कि हम किस स्थित में है बस एक उपाय था कि एक रात अतिथि बन कर शरण लें।वही किया।मैने साहब को एक कमरे में लिटा दिया मैं दूसरे कमरे लेटा था.मैं इधर से उधर करवट बदल रहा था लेकिन मुझे नीद नहीं आ रही थी ।प्रतिमा ने पूछाँ,"आप क्यो? इतना चिन्तित हो"।मैने कहाँ,"कल सिद्धार्थ का फ़ोन आया था ,उसने कहाँ है कि पापा मुझे ट्यूशन फीस कापी किताब के लिए पैसे चाहिए।कम से कम 25 हज़ार चाहिए ।इतने पैसे कहाँ से व्यवस्था करूँ अभी हालत तंग है हर वार घाटा पर घाटा हुए जा रहा है।कोई रास्ता नज़र नहीं आ रहा है ।तुम्हे तो पता है घर का ख़र्च बड़ी मुश्किल से चल रहा है ।कोई न कोई रास्ता तो खोज ही लेगे बच्चे का भविष्य का सवाल है ।उताव चढाव तो नदी के समान ज़िंदगी है जिसमें कभी बहुत पानी होता है तो कभी सूख जाती है ।

हम लोग रात भर बात करते रहे ।कब नीद आ गईऔर सो गये जब आखँ खुली तब तक बारिश भी थम चुकी थी।साहब भी जाग चुके थे ।मेरी पत्नी प्रतिमा चाय लेकर आई ।मेरे जगाने से पहले ही साहब जाग चुके थे और साहब अपना बैग खोल कर रुपये गिन रहे थे। मैने कुछ नहीं कहाँ उल्टे पैर मे वाहर आ गया और साहब को आवाज़ दी।साहब साहब चाय बन गई है आप चाय पी लो, साहब ने चाय पीली और कहाँ ,"अब हम अपने घर जाऊगाँ" आपका सत्कार का आभारी रहूँगा ।घर से चले गयें।
                   
रामप्रसाद सवारी की तलाश में खड़े हुए थे लेकिन कुछ वक्त वाद एक आँटो मिल गया उसमे बैठकर घर के लिए रवाना हो गयें ।रास्ते में  आँटो में एक लड़का भी बैठा । थोड़ी देर बाद रामप्रसाद का घर भी आ गया ।आँटो से उतरने से पहले अपना बैग को देखकर चिल्लाये ,राम प्रसाद ने ऊँचे स्वर में कहाँ ,"इस आँटो से कोई भी सवारी नहीं उतरेगी "।

रामप्रसाद ने ड्राइवर से कहाँ,"इस आँटो को थाने ले चलो"। जब सबने सुना तो डरे और अचम्भे से पूछाँ,"साहब आँटो थाने क्यो ले जा रहे हो"? कुछ तो बताओ आख़िर बात क्या है?

रामप्रसाद ने ऊँचे स्वर में कहाँ,"मेरे रुपये किसी ने निकाल लिए है"।

लोगो ने पूछाँ,"साहव कितने रुपये थे"?

साहब ,-पूरे तीस हज़ार ।जब मैं आँटो में बैठा था तब पूरे थे अब अचानक कहाँ गायव हो गये है ।तुममे से किसी ने मेरे रुपये पर हाथ की सफ़ाई की हैं।उसी बीच एक लङका उतरने लगा ।

रामप्रसाद- "तुम कहाँ जा रहे हो?

लडका- मुझे कालेज जाना है ।

रामप्रसाद- तुम यहाँ से कही नहीं जा सकते हो।

लोगो ने एक स्वरं में कहाँ,ये लङका यही से जा रहा है तो यही चोर है ।तलासी लो ।उस लङके के पास एक पाँलीथीन थी जब उसे टटोला तो उसमें 20 हज़ार निकले ।

लोगो ने कहाँ,"यही चोर है"।चलो इसे पुलिस के हवाले कर दो तो 10हज़ार और मिल जायेगें।

तभी रामप्रसाद ने कहाँ जब तक मुझे पूरे रुपये नहीं मिल जायेगे तब तक यहाँ से कोई नहीं जायेगा।

आँटो थाने में गया जहाँ उस लड़के को खूब मारा पीटा लेकिन उसकी पुलिस ने एक बात न मानी।

लडका-साहब जी मुझे पिता को तो फ़ोन कर लेने दो ।मैं चोर हूँ तो बाकी रक़म उनसे ले लेना।

पुलिस ने सोचा और उसके पिता को बुला लिया।

लडका- अपने पिता से गिडगिडाकर रोने लगा ,"पापा आप बताओ न में चोर नहीँ हूँ मैने किसी के रुपये नहीं चुराये है।

पिता पुलिस से कहते है,"आपको कोई ग़लतफ़हमी हो रही है मेरा वेटा ऐसा नहीं कर सकता हैं।

पुलिस-मैं कुछ नहीं कर सकता हूँ।जिसके रुपये है आप उससे कुछ कह सकते हो।

तभी बाहर से रामप्रसाद आ जाते है,-साहब आपने मुझे पहचाना ?आज रात आप हमारे यहाँ रुके थे।

रामप्रसाद ने कहाँ ,"आपने अपने वेटे को कैसी शिक्षा दी हैं।

लङके के पिता ने कहाँ ,अगर मुझे चोरी ही करनी होती तो मैं बैग से रुपये रात को ही निकाल सकता था और कुछ भी कर सकता था ।मैने ऐसा नहीं किया हम ग़रीब है लेकिन चोर नहीं।

रामप्रसाद ने कुछ सोंचा फिर कहाँ,"आप कह तो ठीक रहे है लेकिन आपके वेटे के पास रुपये आये कहाँ से ?

साहब थोड़ा समय दे दो-मैं अपने वेटे से पूछ कर बताता हूँ।

अपने वेटे से पूछता है-पापा मुझसे घर की हालत छुपी तो नहीं है ।मुझे रुपये की बहुत आवश्यकता थी तो हमने अपने दोस्त के पिता से कर्ज़ पर रुपये लिए है उन्होने मुझे चैक काटकर पैसे दिये थे ।ये है वह पर्ची ।वह पर्ची रामप्रसाद को दिखाई ।लड़के को छोड़ दो और इसके रुपये इसको वापिस कर दो ।आख़िर मेरे रुपये गये कहाँ?

लड़के ने कहाँ,"साहब जी आपके पास जो व्यक्ति वैठा था वो सीट में कुछ  कर रहा था।यह तो मुझे नहीं पता क्या कर रहा था आप तलाशी ले लो।

जब रामप्रसाद ने तलाशी ली तो गद्दी उठाई तो उसमें 30 हज़ार रूपयें थे।मुझे रुपये मिल गये है । रामप्रसाद ने हाथ जोङकर दोनो से माफ़ी मांगी ।साहब ऐसा तो हमारे साथ होता ही रहता है ।आपको मांफी माँगने की ज़रूरत नहीं है ।हम गरीव है लेकिन चोर नहीं हैं।

ग़रीब है लेकिन चोर नहीं है।ग़रीब की ईमान ही सम्मान है जब सम्मान को ठेस लगती है तो ग़रीब की आँखो से ईमान के आँसू झलक जाते है जिनकी क़ीमत कोई अमीर क्या चुकायेगा।

नेत्रों से आँसू न रुके

हे सिसकती धरती नेत्रो से आँसू न रूके,
किये वार खंजर से तो दुनिया न रूके!!
हे सिसकती धरती नेत्रो से आंसू न रूके,
हे हर तरफ़ सन्नाटा ये जुवाँ न रूके!!
फैली हुई वाँये खोजती सूरमाओ को,
कौन उम्मीद करे!!
हे हर और आम मिटने के लिए,
कोई कैसे धीर धरें!!
देखे न वेटा वाप को भतीजा चचा को!!
किस पर विश्वास करें !!
हो रही कच्ची डोर रिस्तो की,
किसकी कौन आस करें!!
हे सिसकती धरती नेत्रो से आंसू न रूके,
किये वार खंजर से तो दुनिया न रुके!!
हैं खून का प्यासा जमाना छाया मातम,
चिराग कौन दिखायें!!
दौलत के भूखे लोगो में अब कहाँ,
इंसानियत न दिखे!!
लूटी जा रही अस्मत खोफ हर ओर घना,
रक्षक कौन बनें !!
सहमे हुए लोगो को अब कौन,
धीरज कौन धरें!!
हे सिसकती धरती नेत्रो से आँसून रूके,
किए वार खंजर से तो दुनिया न रूके!!
लूटी गई पूंजी नहीं वापस मिलती 
सुध कौन हरें!!
पछताये तब होत हे क्या?
चिङियाँ खेत जो चुगें!!
हे सिसकती धरती नेत्रो से आंसू न रूके,
हे हर तरफ़ सन्नाटा ये जुवा न रूके!!