गुरुवार, 21 सितंबर 2017

एक पल ठहरी नज़र

एक पल ठहरी नज़र मुझपर मैं ढूँव गया उनकी नज़रों में,
खुद का पता भूला  ढूँडता फिरता उनका पता गलियों में.!!
मंज़िल तो खुद का भूल वैठा हूँ उनको अपनी मंज़िल बना वैठा हूँ,
वक्त की रफ्तार बड गई है या मेरे सब्र का इंतहा ले बैठा हूँ!!
खुद का पता भूला.......पता गलियों में
फिरती है झलक बस उनकी मेरी आँखो में अपना नाम भी भुला वैठा हूँ,
मिल जायें एक वार पूछूँ तो ऐसा क्या किया जादू तेरी जादू में खो वैठा हूँ!!
खुद का पता भूला .....पता गलियों में
खिलते ओठ सरमाती अदा जुल्फो की बरसती घटा यादें ही याद कियें वैठा हूँ,
उतरता नहीं उसका असर दवा उसी से लेने की दुआ किये वैठा हूँ!!
एक पल ठहरी नज़र मुझपर मैं ढूँव गया उसकी नज़रों में....
खुद का पता भूला ढूँडता फिरता उनका पता गलियों में....

बुधवार, 13 सितंबर 2017

विधा....कुण्डलिया
लिखवत मिश्रण भाष्य,नीर भयो शंरवत।
हिन्दी विदेशी घुलकर,बदलो काया कल्प!
बदलो काया कल्प प्यास में कौन सो उम्वीद।
शान से चलें चौडी छाती लघु भयो गम्भीर!!
विदेशी के लपेङे में शंरवत अंजुमन की शान।
प्यास में करें त्रृप्त शंरवत नहीं नीर की आस।।
  
आकाँक्षा जादौन