शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2020

निराकरण (वेब सीरीज)प्रथम अंक"ईश्वर का परिचय"

(प्रथम अंक" निराकरण" ईश्वर का परिचय) गर्जना के साथ बरसात हो रही है,बिजली की गड़गडाहट ह्रदय में डर भर देती है कि अभी हमारे ऊपर ही गिर पड़े।मध्यान का समय है ;लेकिन साँझ का पहर लग रहा है।आंसमा में बदली गर्जना के साथ बरसात, जिसके कारण समय का पता ही नहीं लगता।सड़क पर गाड़ियों की लम्बी- लम्बी कतारे लग जाती हैं।सड़क का रूप परिवर्तन हो जाता है,सड़क नदी का स्वरुप और गाड़िया तैरती नाव सी प्रतीत होती हैं।गाड़ियों की हैटलाईट जलती,जैसे दुर्घटना का सूचना तंत्र हो,जिस प्रकार सागर में तैरती नावो पर जलती हैं।बरसात के कारण जीवन थम सा जाता हैं।सबको अपने दिन चर्या कामकाज पर जाने की जल्दी होती हैं।वक्त के साथ धीरे-धीरे बरसात थमती है और जाम भी हटता है; लेकिन गाड़ियों के हार्न ऐसे बजते है जैसे सब बहरे हो चुके हैं।हार्न का अभी कोई कार्य नहीं है जैसे ही आगे का रास्ता साफ़ नज़र आयेगा ,अपनी सूझ-बूझ का सहारा लेकर ,नियमों का पालन कर गाड़ी निकाल लागे लेकिन धैर्य नहीं है और हार्न सुर पकड़ लेते हैं।इन होर्न की आवाजें बेसुरीली होती है,मधुर मिठास की जगह सिर मैं दर्द,चिड़चिडा़पन को बढ़ाती ही हैं।धीरे-धीरे सब जाने लगें।रास्ता खुल चुका था ;लेकिन एक गाड़ी आगे बढ़ने की बजाय वही जाम हो गई।ट्रेफिग हवलदार पास आकर उस गाड़ी को जाने के लिए कहाँ लेकिन उसने सुना नही।तब हवलदार ने डण्डे से शीशे पर प्रहार किया।शीशे पर डण्डें के प्रहार से खिड़की के शीशे को नीचे किया। हवलदार कहता है...तुमको घर नहीं जाना हैं।कब का ट्रेफिक खुल चुका है।बीच में गाडी खड़ा करके अवरोध न उत्तपन्न करों।भाई निकल नहीं तो जबरन कार्यवाही करनी पढ़ेगी। सुनकर गाड़ी आगे चली गई।गाड़ी को ले जाकर पैदल यात्रियों के लिए बनी फुटपाथ पर जाकर खड़ा कर दिया।खिड़की खोलकर एक नवयवुक बाहर निकला।कोट पेन्ट पहने था ,आँख पर पतले लेंश का चश्मा था।चश्मा उतार कर कंधो से अपनी आँखे पोछी।दूसरे हाथ से टाई को ढी़ला किया .अचानक उस व्यक्ति ने दहाड़ना आरम्भ कर दिया और चीख-चीख कर रोने लगा।मोबाईल की घंटी बजी...कार्लर ट्यून थी। उस व्यक्ति ने फोन उठाया:-हैलो! अजनवी महिला:-साहब साहब।घबराई हुई तीव्र ध्वनि की गति से चलती सांसो को सुना जा सकता था। व्यक्ति का नाम अवनीश हैं, जैसे किसी अनहोनी की घटना का पहले से पता हो, लम्बी सांस लेकर कहाँ...हाँ! महिला :-साहब साहब ,मालकिन का चौथा शिशु भी जन्म लेते ही मृत्युं के काल .....कहते कहते रूक गई। अवनीश:-ऐसे असंतोष समाचार सुनने की आदत पढ़ चुकी हैं। कहकर फोन काट देता हैं। (हल्की हल्की बरसात शुरू हो चुकी थी.अपने मुख को आसमान की तरफ़ देखकर ,अपने दोनों हाथों की मुट्ठी बनाकर ,सीना तानकर ,घुटनो के वल जम़ीन पर बैठकर .....चीखता चिल्लाता हैं।आखिर क्यों आखिर क्यों?मेरे साथ ही क्यों होता हैं।सब कुछ ठीक होने के बावजूद आखरी छड़ में बच्चें की रोने की आवाजें काँन में पढ़नी चाहिए थी लेकिन काल की आवाजें क्यों सुनाई देती हैं?भंयकर आवाजें जैसे स्यार रो रहे ह़ो,कुत्ते रो रहे हो,अजीब-अजीब सी आवाजे सुनाई देती हैं।आखिर क्यों क्यों क्यों? हाँ हूँ नास्तिक,हाँ हूँ नास्तिक।श्रृष्टी में कोई शक्ति है जो संचालन करती है तो होने का प्रमाण दों,मुझ जैसे नास्तिक को आस्तिक बना दें।ऐसा कभी नहीं होगा,मुझे नास्तिक से आस्तिक बना दें, ऐसा छड़ कभी नहीं आयेगा। बरसात के संगीतमय सुर के बीच,शंख बंदना,घंटा बंदना,मजीरे बंदना,मृदगं बदना के साथ भजन मंण्डली उधर से गुजर रही थी।रामरस ,कृष्णरस में भक्त आन्नदित थें।नृत्यगान ,भजन रस में हरे रामा!हरे कृष्णा!कृष्णा कृष्णा!राधे श्याम!राधे राधे!सीता रामा!सीता राम!भक्त रस के साथ उधर से जा रहे थें। अवनीश के काँनो में जब भजन और संगीत के सुर पहुँचे तो पहले तो अपने काँन बंद करके सुनना नहीं चाहता था,लेकिन अचानक उसके कद़म स्वयं ही थिरकने लगें,कैसी अद्भुत आकृषक शक्ति थी जो अवनीश को नृत्य के रस से वंचित न कर पाई।कुछ पल उस भावरस में उतर कर भी गोते खाकर एक अशब्दमय सी अनुभूति हो रही थी,जिसको परिभाषित नहीं कर सकता था।भजन मण्डली आगे बढ़ती जा रही थी।एक साधु ने चरणामृत दिया श्रृद्धा के साथ ग्रहण कर लिया।पहले कभी प्रसाद न लेता था ,कोई बाँटता उसको भी अच्छा खासा पाठ पढ़ा देता था।क्या यह प्रसाद है।सब ढो़ग है,ढ़ोगी है।कमाई का साधन हैं।कौन खाने आता है ,बस नाम पर पर्ची कटाते रहो और मूर्ख जनता को भ्रंमित करके आडम्बर फैलाते रहों।मंदिर,मंस्जिद ,चर्च,गुरूद्वारा के नाम पर जम़ीन को हड्डपते रहों।कहते भी है तुम सबका भगवान,ईश्वर हर जगह है ,अगर हर जगह है तो जम़ीन की क्या आवश्यकता हैं।सबके सब बहुत बड़े ठ़ग हैं।मूर्ख जनता है ईश्वर का नाम लेकर डर,प्रकोप दिखाके डराते धमकाते रहो और लूटते रहों।पति जितना अधिक नास्तिक था पत्नी उतनी ही अधिक आस्तिक थी।पूजा-पाठ,कर्म काण्ड़ करने ही नहीं देता था ,घर में एक भी देवी देवता की न प्रतिमा थी न चित्र था।पत्नी का नाम सम्भावना था।कहती थी कर्म काण्ड तो भावनायें है,ईश्वर को पाना तो एक मात्र उपाय तो प्रभू का नाम स्मरण,निरन्तर जपना हैं।ईश्वर के नाम लेने से कोई रोक नहीं सकता हैं।बस भावनाओं को प्रकट करने के लिए अंकुश लगा सकते हो लेकिन स्मरण करने पर अंकुश कभी नहीं लगा सकते हैं। अविनाश ने कभी प्रसाद ग्रहण नहीं किया वो चरणामृत ग्रहण करके ऐसा महसूस कर रहा था,जैसे किसी काराबास से मुक्त हुआ हों।स्वयं पर विश्वास नहीं कर पा रहा था।यह कैसे सम्भव है?मैं नास्तिक हूँ ,आज कैसे प्रसाद ग्रहण कर सकता हूँ।कुछ समझ नहीं पा रहा था।एक महापुरुष,संत पास में आयें।लम्बी-लम्बी जटायें दाड़ी मूंछे थी,हाथ में कम्डल,ललाट पर चंदन का तीन उगलियों का टीका था,जैसे शिवजी के लगा होता हैं।पैर में खडाऊँ ,भगवा रंग में रंगी पोषाक थी।अविनाश के पास आकर शीष पर हाथ रखा,अविशान भी मंत्र मुग्ध था कुछ न कह सका और मन की भावनाओ से नत मस्तिष्क होकर प्रणाम किया। महात्मा:-वत्स।स्वयं को नास्तिक समझते थे आज क्या हुआ? अविनाश:-स्वयं आश्चर्य चकित हूँ।ऐसे कैसे हो सकता हो।जो दिखाई नहीं देता है तो कैसे मान लूँ।आज मैं स्वयं को इस परिवर्तन से रोक न सका ।ऐसे- कैसे हो सकता हैं। महात्मा:-ईश्वर के होने का क्या प्रमाण चाहिए? अविनाश:-अगर है तो दिखाई क्यों नहीं देते।ईश्वर अगर कण-कण में फिर मंदिर, मस्जिद,गरुद्वारा,चर्च क्यों? जब दिखाई ही नहीं देते तो प्रसाद ,आडम्बर क्यों?दीपक जलाना,धूप जलाना,माला पहनाना,पुष्प अर्पण करना क्यों? महात्मा:-अब तुम मेरे प्रश्न का उत्तर दों?हवा का स्वरुप क्या हैं?रोशनी का रंग क्या है?शरीर से क्या निकल जाने से मृत्युं हो जाती है?सूर्य रूकता क्यों नहीं है,पृथ्वी थमती क्यों नहीं है? अविनाश:-हवा को महसूस किया जाता है।प्रकाश को भी महसूस किया जाता हैं।गुरुत्वाकर्षण के कारण पृथ्वी घूमती है,नत्रक्ष मण्ड़ल इसी के कारण परिक्रमण करते हैं।कहते सब है आत्मा निकल जाने से मृत्युं होती हैं।देखी किसी ने नहीं हैं। महात्मा:-और क्या साक्षात प्रमाण दूँ।ईश्वर एक छड़ के लिए स्थिर कर दें तो सब कुछ संतुलन बिगड़ जायेगें।हर जगह त्राहि- त्राहि मंच जायेगी।ईश्वर का स्वरुप हर कण -कण में विद्यमान में।ईश्वर की शक्ति को स्वयं मानव भी अनुभूति कर सकता हैं।प्राणाय,एकाग्रता साधना करके,अपने अंदर की कुण्डलियों को जागृति कर सकता हैं।ईश्वर हर जगह है लेकिन ईश्वर हर जगह उस ईश्वर को महसूस नहीं कर सकता हैं।मंदिर को देखकर स्वयं शीष झुक जाता है।यही आस्था है।आस्था का स्वरूप ही प्रतिमा है,यही प्रतिमा समाज को जोड़ने का कार्य करती हैं।प्रसाद भावनाएं है हम प्रकृति से अनगिनत बस्तुएँ ग्रहण करते और आस्था स्वरूप पहला निवाला फल,मिष्ठान आस्था स्वरुप ईश्वर क़ अर्पण करते हैं।हमारा अस्तत्व कुछ नहीं हैं।ईश्वर की ही हम सब संतान है।आस्था पर प्रहार करना सबसे बड़ा अपराध हैं।जब हम आस्था पर प्रहार करते है,तो ह्रदय से श्राप निकलता हैं।जब हम किसी का मझांक बनाते है अपशब्द कहते है तो उसके ह्रदय पर प्रहार करते है तो वो व्यक्ति मुख से जो शब्द निकालता है वो शब्द भविष्य में या आने बाले जन्म में अपना स्वरूप अवश्य दिखाता हैं।"मैंने भी तुम्हारा भविष्य पढ़ लिया हैं।तुम्हारी चार संतान हुई लेकिन जन्म लेने के उपरान्त काल का ग्रास बन चुकी हैं।"यह सब तुम्हारे कर्मो का ही फल है इसके कारण तुम अपनी संतान की किलकारी भी नहीं सुन पाते हों। अवनीश:-हाँ....क्या कारण है? महात्मा:-तुम्हारे पिछले जन्म के कर्मो के कारण समाज का श्राप रूप में मिला है जिसके कारण तुम कभी बच्चे की किलकारी सुन नहीं पाओगें।यह पिछले जन्म से नहीं कही जन्मों से तुम निःसन्तान होकर ही काल का ग्रास बनते रहे हो और आने बाले कही जन्मों में श्राप के परिणाम को भुगतना ही पढ़ेगा। यह सुनकर अविनाश हाथ जोड़कर महात्मा के चरणो में गिर पढ़ा...:-कोई तो मार्ग होगा।यह दुख बहुत कष्टदायक हैं।कोई तो निराकरण होगा। महात्मा:-हाँ है,उस निराकरण के लिए ही तो तेरे पास आया हूँ।निराकरण के लिए तुम्हें अपनी भागिनी के साथ मिलकर कार्य करना होगा। अविनाश:-कैसा कार्य? महात्मा दो जन्म पूर्व तुमने मद में चूर स्वयं को ईश्वर घोषित किया था।समाज की भावनाओं का स्वरूप मंदिरो को तोड़कर अपनी प्रतिमायें प्रतिष्ठित की थी।उन प्रतिमाओ को तुमने स्वयं मिट्टी में दबा दी थी।उन प्रतिमाओं को निकाल कर मंदिर में पुनः स्थापति करवानी होगी,तब ही तुम इस श्राप से दोष मुक्त होगें।भावना स्वरूप समाज का श्राप है वो ही इससे मुक्ती दिलायेगें।यह कार्य इतना सरल नहीं हैं। अविनाश:-ऐसा क्यों? महात्मा:-जहाँ प्रकाश है वहाँ अंधकार है,जहाँ आशा है वहाँ निराशा है,जहाँ नास्तिक है वहाँ आस्तिक हैं।जहाँ अच्छाई है वहाँ बुराई है।तुमको अच्छे कार्य को करने के लिए बुरी शक्तियाँ बाँधा उत्तपन्न करगी।इन बाँधाओ को पार करके ही प्रतिमाओं को खोजकर मंदिर में स्थापति करना हैं।मंदिर शिवजी का है,शिवजी का ही परिवार है। अविनाश:-कहाँ पर,कहाँ जाना होगा? महात्मा:-तुम्हें स्वप्न में जाने का रास्ता अवगत होगा। यह रुद्धाक्ष माला है, इसको कंठ से कभी दूर न करना ।अपनी भार्या के साथ भवात्मक कार्य में सफलता प्राप्त करना। कहकर महात्मा ने रुद्धाक्ष की माला को अविनाश के कंठ में धारण करा दी।अविनाश ने नेत्र बंद करके शीष झुकाके बंदना कर रहा था,ऊ नमः शिवाय का मंत्र जप रहा था।नेत्र खोले तो महात्मा नहीं थें। अविनाश के मुख पर आशा ज्योति प्रज्जलित हो चुकी थी,उस ज्योति को जलाकर घर आ गया। (प्रथम अंक समाप्त)

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