शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2020
निराकरण(वेब सीरीज द्वतीय अंक)"क्रू महाराज"
(द्वतीय अंक"निराकरण"क्रू महाराज)
रात्रि का तीसरा पहर था,गहरी निद्रा अवस्था में अवनीश था।स्वप्न का आरम्भ हुआ और अवनीश गहरी निद्रा में खोता ही जा रहा था,दो सौ वर्ष पहले की अवस्था में स्वप्न के माध्यम स्वरूप पहुँच गया। अंग्रेजो का शासन था लेकिन भीलगढ़ में रजत प्रताप महाराजा का शासन था। राजा दुष्ट दुर्राचारी था।अपने शासन को बनायें रखने के लिए अंग्रेजों के साथ संन्धि कर ली ।अंग्रेजो के काल में निम्न वर्गो की आर्थिक स्थति बहुत ही खराब थी।राज्य का राजा ही क्रू हो तो प्रजा कुशहाल कैसे हो सकती हैं।व्यापारी,किसान पसीने से सींचकर वास्तविक स्वरूप प्रदान करते जैसे किसान का अनाज, लेकिन उसका सही दाम ही नहीं मिलता था।पेट की आँतो को देखा जा सकता है,हड्डियों का ढाँचा जिसमें एक-एक हड्डी को गिन सकते हैं।राज्य की कुशहाली नहीं राजा की कुशहाली,प्रजा की मेहनत से अंग्रेजो के खजाने में बढ़ोतरी करने से होती थी।प्रजा की किस्मत में दुख,भूख से मुरझायें चहरे ही थें।बुनकर सुन्दर-सुन्दर वस्त्र बनाते लेकिन शरीर पर फटे पुराने ही बस्त्र थें।सुन्दर आभूषण बनाते लेकिन महिलाओ के काँन के छिद्र ही दिखाई देते थें।सब अपने काम को पूर्ण निष्ठा से निभाते लेकिन उसका मूल्य नहीं मिलता था।कही तरह के कर के कारण स्थति बिगड़ चुकी थी।
भीलगढ़ राज्य की प्रजा दुखी थी।उस राज्य में एक गाँव था,वो कुशहाल था।भरपेट भोजन था,पहनने को वस्त्र थे और सौन्दर्य निखार के लिए आभूषण थें।गाँवबासी कुशहाल थें।ऐसा नहीं था राजा के कर में कोई कटौती की थी,बल्कि कर से अधिक ही राजकोष में जमा होता था।गाँव कुशहाल था ,इसका कारण एक रहस्य था।इस कारण का कभी भेद न खुलता अगर राजा विहार भ्रमण के लिए उधर से न गुजरता।
राजा रजत प्रताप अपनी प्रियं पत्नी चिदम्बरा के साथ विहार भ्रंमण पर निकलें। सुरक्षा के लिए अंगरक्षक साथ में थें।राजा घोडे़ पर सबार होकर निकला,पत्नी डोली में थी,साथ में सेबिकायें भी चल रही थी।शाम का पहर था ,रात्रि का आगाज हो चुका था।आगे की यात्रा करना ठीक नहीं था।उसी गाँव में अपनी छाँवनी लगा ली।अंगरक्षको ने गाँव में ढोल़ बजाकर सूचना दी कि राजाजी विहार भ्रंमण के लिए निकले है, आज की रात्रि विश्राम के लिए इस गाँव में पढ़ाव डाला हैं।यथा सम्भव नहीं राजा रानी की सेवा में कुछ-कुछ उपहार प्रस्तुति करें।,प्रजा का कर्तव्य बनता हैं कि अपने राजा-रानी की सेवा करें,यह अवश्य भाग्य से प्राप्त होता हैं।रात्रि के रंगायन कार्यक्रम के उपरान्त राजा-रानी को उपहार भेट करें।
गाँव के प्रबंधक सेवक के ऊपर रंगायन कार्यक्रम को सुखद बनाने के लिए दायत्व सोफा़।गाँव के प्रबंधक सेवक ने भव्य आयोजन का प्रबंध किया।रंगायन कार्यक्रम के लिए नृत्यं संगीत का आयोजन किया।भव्य स्वागत था,राजा भी आश्चर्य चकित था,प्रजा ने शानदार आयोजन कैसे किया।रंगायन कार्यक्रम समाप्त के बाद प्रजा ने उपहार स्वरूप सुन्दर-सुन्दर आभूषण राजा रानी को भेट स्वरूप दिए।सोने-चाँदी,रत्न से शुशोभित आभूषण,मुद्रा स्वरूप सोने की गिन्नी।प्रजा के ठाट-बाट से लगता ही नहीं था कि यह प्रजा हैं।प्रजा सम्मपन्न और कुशहाल क्यों हैं।क्या कारण है कर देने के बाद भी सम्मपन्न हैं।राजा चिन्तित था,अनेक प्रश्न थे जो राजा को भयभीत कर रहे थे कि कही मेरा शासन समाप्त न हो जायें।कोई अन्य राजा न बन जायें और प्रजा पर शासन करने लगें।अपने भ्रंम के उत्तर के लिए ,राजा ने प्रबंधक को बुलाया।
प्रबधंक अपने साथ बहुत से आभूषण और मुद्रायें लाया था...जी महाराज को प्रणाम ,शीष झुकाकर नमन किया।
राजा ने थालियों में उपहार देख कर पूँछा,"हमारे राज्य में सब सुख सम्मपन्न है,यह देखकर अच्छा लगा।अन्य गाँव के प्रबंधक आकर गरीब,आर्थिक स्थति का बिलाप क्यों करते हैं?ऐसा क्या है जिसके कारण यहाँ सुख सम्मपन्न है? अन्य ग्रामीण बिलाप करते हैं?
प्रबंधक:-महाराज जी...अन्य गाँव की इस गाँव से तुलना नहीं कर सकते हैं।इस गाँव पर भगवान शिवजी की कृपा है जिसके कारण यहाँ सुख समृद्धता हैं।
राजा रजत प्रताप:-ऐसे कैसे?
प्रबंधक:-यहाँ अनादकाल से शिवालय है,मान्यया ऐसी है यहाँ स्वयं माता गौरी के साथ शिवजी स्वयं विराजमान हुए हैं।यहाँ के पूर्वजो ने तन,मन,से अराधना की शिवजी को यहाँ पर स्थापना करने के लिए।शिवजी के यहाँ स्थापना करने से पूर्व ग्रामीण बासी बहुत ही गरीब दुखी थें।इस दुख को सदा के लिए दूर कर दिया।दृढ़ सकंल्प ग्रामीण बासियों का अटूट था,मेघ मूसला धार में बरसे,तूफा़न आया,लेकिन अपने ध्यान से भंग न हुए।तब स्वंय शिवजी माता गौरी के साथ प्रकट हुए और वरदान माँगने को कहाँ,"ग्रामीण बासियों ने एक स्वर में यही विराजमान होने के लिए आग्रह किया जिससे यहाँ सुख समृद्धा बनी रहें।प्रभू शिवजी यहाँ स्थापति हो गयें।चमत्कार रुप में यहाँ एक खनिज सम्पदा प्रकट हुई। रत्न सोना,रजत रुप में मिट्टी से सूरज की प्रथम किरण के साथ ही अवतरित होते हैं।मंदिर के समीप ही यह स्थल हैं।
राजा रजत प्रताप:-चौक कर कहाँ,ऐसा क्या?हमारे राज्य में रत्न,सोना ,रजत मिट्टी से अवतरत होते है तो इनपर एक छत्र राज सिर्फ राजा का होता हैं।यहाँ की प्रजा इस राज को छुपाने की और सम्पदा को हड़पने की दोषी है।
प्रबंधक भयभीत होने लगा:-यह क्या राज खोल दिया।अब क्या होगा?महाराज जी यहाँ की सम्पदा सिर्फ ग्रामीण बासियों की है।
रजत प्रताप ने इतने शब्द ही सुने और म्यान में से तलवार निकाली और प्रबंधक का शीष धड़ से अलग कर दिया।स्वयं देखना चाहता था कि प्रबधंक की बात में कहाँ तक सत्यता हैं।बास्तव में मिट्टी से रत्न,स्वर्ण,रजत सम्पदा निकलते हैं या भ्रामक कहानी हैं।भेष धारण करकें ग्रामीण बासियों के साथ प्रथम बेला में शिवालय में पहुँच गयें।
शिवालय प्रथम बेला में सूरज की प्रथम किरण पढ़ने के साथ चमकने लगा,किस कारण से दृव्य प्रकाश उत्पन्न होता है।यह रहस्य ही था।ग्रामीण बासियो से मिलकर गौरी शिव की पूजा अर्चना की।प्रभू शिवजी,माता गौरी,पुत्र कार्तिक और गणेश के साथ ,वाहन नंदी सबारी के साथ विराजमान हैं।दिव्य आलोखिक प्रकाश मंत्र मुग्ध कर देता हैं।पूजा अर्चना सम्पन्न हुई ,तद पश्चात मिट्टी से रत्न,स्वर्ण और रजत उपरी सतह पर प्रकट होने लगें।राजा की आँखे चकाचौध हो गई,जिससे पहले प्रजा उस सम्पदा को ले पाती।राजा के सैनिक मिट्टी के आसपास घेरा लगाकर कहने लगे,"आगे बढ़ने का प्रयास मत करना."महाराज ने अपना भेष छोडकर बास्तविक स्वरूप में प्रकट हो गयें।
राजा रजत प्रताप:-तुम सबने राज्य और राजा के साथ छ़ल किया है।इस सम्पदा पर सिर्फ राजा का ही अधिकार हैं।तुम सब दोषी हो,इसकी सजा तो अवश्य मिलेगी।"सैनिको सबको पकड़ लो बेड़ियाँ डा़ल दो।"
एक बुर्जग:-राजा जी आप यह अच्छा नहीं कर रहे हैं।इस सम्पदा पर सिर्फ ग्रामीण बासियों का अधिकार हैं।इस अधिकार को वल पूर्वक अधिकार पाने की कोशिश भी की तो ईश्वर का वरदान ही अभिश्राप बन जायेगा।
राजा रजत प्रताप:-हम राजा है ।हमारे राज्य की प्रत्येक बस्तु पर सिर्फ हमारा ही अधिकार हैं।सैनिको सबके हाथ में बेडिया डाल दों।मिट्टी से उत्पन्न हुई सम्पदा को संरक्षण में ले लों।
महाराज का आदेश पाकर,सैनिक सम्पदा को लेने मिट्टी में हाथ डा़ला कि अचानक सम्पदा सर्प के स्वरूप में परिवर्तन हो गयें। उस सैनिक को डस लिया जिसने सम्पदा को छुआ था।
वुर्जग:-यह देखकर हँसा...हा हा हा....महाराज जी कहाँ था।इस सम्पदा पर सिर्फ यहाँ के ग्रामीण बासियों का अधिकार है किसी का नहीं।हमारे पूर्वजो ने कठिन तप करके दुख के निराकरण हेतु ईश्वर को यही स्थापति होने का वरदान माँगा था।
उस बुर्जग ने इतना ही कहाँ था कि उस बुर्जग का शीष धड़ से अलग कर दिया।अपने क्रोध और अपमान के आवेग में सैनिको को मंदिर विध्वस का आदेश दे दिया।यहाँ अब रक्त की नदियाँ बहेगी।जो मेरा नहीं वो किसी का नहीं।सबके प्राण हर लो।मुक्ती दे दो,इस मंदिर को ध्वस्त कर दों।ईश्वर मुझे नहीं दे सकता उसपर किसी का अधिकार नहीं।सैनिक मंदिर को ध्वस्त करने के लिए नहीं जा रहे थें।
सैनिक:-महाराज यह घोर अर्नथ हमसे नहीं होगा,आप चायें तो हमारे शीष धड़ से अलग कर दों।
ग्रामीण बासी एक स्वर में राजा से कह रहे थें।महाराज जी आप ऐसा महापाप न करें,आप चाये तो हम सब अपनी सम्पदा आपको पहुँचा दिया करेगें।हमको वरदान रूप में प्राप्त हुई है।मंदिर को ध्वस्त न करें।
राजा मंद में चूर था,जो मेरा नहीं वो किसी का नहीं होगा।ग्रामीण बासी बेड़ियों में कैद थे,अपराध करने के लिए रोक रहे थे लेकिन राजा न माना।सीढ़ियाँ चड़ता जा रहा था,पहले घंटे को उखाड़ कर फैक दिया।अचानक भूमि में कम्पन्न होने लगा।सब कुछ हिलने लगा लेकिन राजा ने एक बात न मानी,भूकम्प तीव्र था,सर्पो की सेना एकत्रित हो गई,मंदिर की सुरक्षा के लिए।लेकिन राजा नर संघार बन चुका था।सर्पो को तलबार से मारने का प्रयास कर रहा था।इधर भूकम्प से सब कुछ हिलने लगा।सर्प के रक्त से मंदिर दूर्षित हो चुका था,शिवजी का क्रोध कहे या कुछ और भूकम्प के कारण मंदिर प्रतिष्ठित प्रितमायें और शिवलिग़ स्वयं ही उखड़ कर मिट्टी में लुप्त हो गई।मंदिर रुप में सिर्फ निर्जीव ढाँचा ही शेष था।भूकम्प शान्त हुआ ।जब ग्रामीण बासियों ने अपने अराध्य को मंदिर में न देखा तो सबने एक स्वर में श्राप दिया।माता-पिता के बिना बच्चा अनाथ हो जाता है।हम सब भी आज अनाथ हो गयें है,हमारा श्राप है तुम कभी संतान सुख प्राप्त न कर पाओगें।संतान खोने का दुख क्या होता है।बार-बार जन्म लेना होगा और निसंतान का दुख भोगना होगा। संतान का सुख कभी प्राप्त नहीं होगा।संतान के दुख से हमेशा दुखी रहोगें।
राजा रजत प्रताप:-हँसा हा हा हा...,सैनिको को आदेश दिया सबके प्राण हर लों।आज से हमारे राज्य में सिर्फ मेरी ही पूजा होगी।हम ही है सबके ईश्वर,मेरी ही प्रतिमा मंदिर में प्रतिष्ठित होगी।हम ही है सबके ईश्वर,भगवान ।मेरे सिबा अन्य की पूजा अर्चना करता कोई भी पाया गया उसका तत्काल धड़ से शीष अलग कर दिया जायें।इस घटना के बाद और खूँखार दानव राजा बन चुका था।प्रजा त्राहि -त्राहि कर रही थी लेकिन ईश्वर अदृश्य हो चुके थें।शिवजी के सेबक का रक्त देखकर क्रोधित हो चुके थें। भंयानक स्वप्न के साथ अवनीश का स्वप्न भी टूट गया।
(सामान्य राजा से खूँखार राजा कैसे बन गया।इसका क्या रहस्य हैं।)अवनीश ने स्वप्न में गाँव का दृश्य देखा था मस्तिष्क में छप चुका था।अपने अपराधो को सुधार करने का एक अवशर मिला था।कैसे प्रतिमाओं को खोजेगा,कौन कौन से अवरोध मार्ग में आयेगें।यह सब जानने के लिए देखते है अगले अंक में।)
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