सोमवार, 7 मई 2018

तस्वीर बदलती है


किसी मेरे मित्र ने फैसवुक पर एक पेंटिग लाईक की. मेरे फैसवुक पर नजर आने लगीं। बहुत ही सुंन्दर एक संदेश प्रेरक तस्वीर थी। मैने तस्वीर को जूम करके देखा तो वह संदेश विछङे हुए मित्र की झलक लिए थी. जहाँ पेंटिग की अभिनेत्री ख्याति शोहरत के शिखर पर थी,जनता  एक झलक के लिए लालायित थी. पर अभिनेत्री के आँखो से अश्क झलक रहे थे। मन में मित्र की छवि जो दूर होती जा रही थी। जव मैने यह तस्वीर देखी तव मुझे अपने मित्र की याद आने लगीं। उसको भी तस्वीर बनाने का वहुत शोक था। डेस्क.खिङकी, मेज पर चौक से तस्वीर बनाती रहती थी।कभी कभी तो अध्यापक पढाते रहते वो उनकी ही तस्वीर डेस्क पर बनाती तो कभी काँपी पर पेंन से, वो कम वात करती पर जाने मन में क्या सोंचती रहती थी?अपने ही ख्यालो में खोई रहती थी। न जाने क्यों वो खामोश रहकर अपनी तस्वीरो में बहुत कुछ कह जाती थी।जैसे जैसे आगे की क्लास में पहुँचते जा रहे उसकी कलात्मक अभिव्यक्ति चित्रकार की और वढती जा रही थी। कालेज में मनमुग्ध वाटिका प्रयोगात्मक के लिए छोटा सा रूप जलाशय में उछल कूद करते मेढक, फूलो पर सजती रंग विरंगी तितलियाँ ,चढती शाखाओ पर लताये को अपनी तस्वीर में ऐसे प्रस्तुति क्या कि लगता ही नहीं था कि यह स्कूल की वाटिका का दृश्य है. लगता था कि किसी प्रसिद्ध पर्यटक का दृश्य हो। इस तस्वीर के लिए उसे कालेज में विशेष उपहार दिया गया था और सबको तस्वीर दिखाई गई थी।पर न जाने क्यों मेरी आँखो में न उतरने वाली तस्वीर बस गई थी।इस तस्वीर को देखकर अपने मित्र की बहुत याद आने लगीं। मैं उसका सहपाठी था क्योकि हम छोटे से कसवें में रहते थे वहाँ लङकी की मित्र लङकी ही होती थी ,वहाँ पर बात करने पर हगांमा हो जाता हैं। मन गङंत कहानियाँ बनाई जाती है यह सब घर पर पता चल जाये तो पढना लिखना बंद कर दिया जाता हैं। खाशकर लङकियो से तो जितनी दूरी बनाई जाये उतना ही अच्छा रहता हैं।
                   मै उसकी चित्रकारी देखकर मोहित हो गया पर कुछ न कह सका. मै नहीं चाहता था कि मेरे कारण उसका जीवन अधर में लटक जायें।पढाई छूट जायें और मैं अपने आपको कभी माफ न कर पाऊँ। देखने मैं सुंदर शांत स्वभाव गंम्भीर चितन करने वाली जिसकी झलक तस्वीर में देख चुके थे. उसकी सहेली उतनी ही वाचाल थी जहाँ पर वैठने के लिए जगह बनानी हो वहाँ कचर पचर बाते सुरू कर देती और वो उनकी वातो से परेशान होकर जगह छोङ देते,उस जगह पर अपना कव्जा पाकर वहुत खुश हो जाती थी जैसे कोई जंग जीत ली हो। मै अपनें मन की बात कभी न कह पाया और माध्यमिक के वाद रास्ते अलग अलग हो गयें। मेरा वीटेक में दाखिला हो गया और मैं अपनी पढाई करने वाहर चला गया। मित्र सहपाठी वही छूट गयें। वो सारी मीठी यादें जिदंगी के किस्से बन गयें।आज तस्वीर देखी तो वो सारे किस्से याद आने लगें। मेरा मन न माना और उस पेंटिग वाली को मित्र निवेदन भेज दिया। उधर तुंरत स्वीकार का मैसेज टाईम लाईन पर आया।
हलो.......
धन्यवाद...आपने निवेदन स्वीकार किया।
धन्यवाद तो आपका कहना चाहिए। आपने निवेदन भेजा। प्रोफाईल पिक्चर में बदले बदले नजर आ रहे हो।
क्या हम पहले से मिले है? क्या मै आपको जानता हूँ?
इतने सारे सवाल एक साथ....हाँ जानती हू। अव तुम बताओ नाम क्या है?
तुम्हारे प्रोफाईल पिक्चर पर तो पेंटिग लगीं हैं। अगर मैं सही हूँ तो तुम जागृति हों।
हाँ....और तुम्हारा नाम धैर्य है। मेरी फ्रेङ लिस्ट तो लम्वी है पर कालेज वाले कोई मित्र नहीं है। फोलोवर भी बहुत है पर कोई मित्र नहीं......कहते कहते....आँनलाईन से चली गई....
मैं सोचने लगा....बताओ...जागृति ने हमको पहचान लिया। जो शांत रहने वाली आज बोलने लगीं.....यह तो कमाल हो गया।
कहते कहते ...कालेज वाले समय में खो गया......छुप छुपके देखता था....
छुप छुपके देखे मेरी नजर....
डर लगता है खुद से मगर....
गुस्ताकी न कर वैठूँ भूल से....
तोहमत न लग जाये तुम पर भूल से...
मेरी ही खता सजा न हो नजर...
डर लगता है खुद से मगर...
तू ही मेरा सकून...तू ही मेरा रहनुमा है...
तुझसे ही जिंदा हूँ ...तू ही मेरा जीवन है...
छुपाके रखे थे कितने अरमान....
खुद ही जाने किसको क्या खवर...
उम्मीद टूट चुकी थी ऐसा हुआ असर...
तुझसे करके बात खोया खोया वेखवर...
डर लगता हैं रात का ख्आव न ओझल..
भागता है जिया सजाता अरमान...
थम जा ठहर जा ख्आव न औझल..
तू ही मेरा सकून ...तू ही मेरा रहनुमा...
तुझसे ही जिंदा हूँ...तू ही मेरा जीवन...
मैं अव इस इंतजार मैं था, कव आँनलाईन होगी? बहुत कुछ कहना था ....बहुत से सवाल थे...मै रात को उठ उठकर फैसवुक चैक करता कि आँनलाईन तो नहीं है।मै रातभर सो न सका बस कालेज दिन ऎसे लग रहे थे जैसे आज ही की बात हों। कभी मैं खुद ही मुस्करा जाता, तो कही सरमाके नजर चुराता...आँफिस में सब बार बार पूँछते क्या हुआ? मुस्करा क्यों रहे हो? मैरे पास कोई जवाव नहीं था.बस फैसवुक पर आँनलाईन होने का इंतजार था...मै किसी के प्रश्न का उत्तर भी नहीं देना चाहता था, कही मैं इधर बात करता रहा और वो आँनलाईन होके चली भी जायें।
     मै मैस में रात का भोजन कर रहा था,फैसवुक आँन था वो आँनलाईन हुई मैने खाना छोङकर कमरे मैं आ गया....आते आते ही मैने....
हैलो.....जागृति.....
कहकर हाथ धोने चला गया।
हाँ.....कल मेरा फोन डिसचार्ज हो गया था।
अच्छा..और कैसी हो?
मैने कुछ और नहीं कहाँ कि कितनी वेसवरी से इंतजार कर रहा था। बहुत सी बाते करनी थी...इतने दिनो बाद जो मिले है।
हाँ....हमको भी..
तुम्हारी शादी हो गई क्या?
क्यों?
बस ऐसे ही।
हाँ हुई भी और नहीं भी....
क्या मतलव?
चलो छोङो क्यो जख्मो को कुरेदना।
ठीक है तुम्हारी मर्जी ....नहीं बताना चाहती तो न सहीं....
बता दूँगी....एक बात तो बतोओ। तुम तो इंजीनियर हो फिर भी ...इतनी जल्दी हिन्दी में कैसे लिख लेते हो ?वो भी इतनी अच्छी।
हिन्दी अपनी पहचान है...इसको कैसे भूल सकते है। इंग्लिस आँफिस के लिए बहुत है। हम इतने आगे भी न निकल जाये कि अपनी जङो को भूल जाँऊ...हमारी सभ्यता संस्कृति की धरोवर है हम सभालेगे तव ही आने वाली पीढी को सिखा सकते हैं। चायें कोई मेरी इस सोंच को मजाक बनायें पर यह सबक है हम कहाँ से जुङे है। हमारी जङे गाँव से जुङी है यह हमको नहीं भूलना हैं। करो वह जो तुमको अच्छा लगें..दिखावे से तो खुदको दोखा देना हैं। मै गोराविंत होता हूँ अपनी मात्र भाषा में खुदको जीकर...चीन वाले सारे कामकाज तकनीकी गैरतकनीकी काम अपनी ही भाषा में करते है और हम इंग्लिस में क्यों? हम अपनी बात को अच्छे से अपनी मात्र भाषा में विना रूके  व्याख्या कर सकते है। हम इंग्लिस में ही वोलेगे और कोई वोले तो उसका मजाक बनायेगे। जहाँ जरूरत है वहाँ इंग्लिस वैसे नहीं...कुछ जायदा ही हो गया.....
नहीं आपने सच कहाँ है।आपने प्रभावित किया...खैर हमको इंग्लिस में वातचीत करनी नहीं आती है।एक आप है और एक वो..... कहती कहती रूक गई..
आप रूक क्यो गई?
बताओ ना....
हाँ वताऊँगी.....खामोश होने की...जुल्म रहने की सजा मिली है अब और नहीं...मैने फैसला किया वदल दूँगी खुदको....नजरिया को..सबसे बात करूँगी.। सब सहेली की शादी हो गई...मेरी भी....आपके ही जैसे इंजीनियर थे..........कहते कहते फिर रूक गई.....
आप कुछ कहते कहते रूक गई.....
छोङो मेरे बारे में जानने की .....आप अपने बारे में बताईयें। आपकी शादी हो गई।
नहीं अभी नहीं....माँ ढूडँ रही है...कोई मिल जायें।
आपको... कैसी पंसद हैँ?
कुछ नहीं....बस मुझे समझ सकें....मैं उसे....
अच्छा है।
पहले आप चुप चुप गुम सुम सी रहती थी।आपसे तो कभी बात भी नहीं होती थी फिर भी आप हमसे बात कर रही है.....हमको अच्छा लगा।
वक्त के साथ चलना चाहिए...नहीं तो हम पिछङ जायेगे। पर अभी भी कुछ से ही बात करती हूँ पर अपने आप को बदल दूँगी।
बदलना क्यो हैं? किसी एक के लिए अपने आप को बदलना ठीक नहीं हैं। आपकी खामोशी बहुत कुछ रंगो के माध्यम से अगुंलियो के थिरकन से..कल्पनाओ के अर्थाय सागरो से अनमोल रत्न खोज खोज कर चित्र में पियोह देती हो। अतुल्नीय अविश्वसनीय प्रतिभा भगवान किसी किसी को ही देते है। ऐसी प्रतिभा का किसी के लिए अंस्त नहीं करना चाहिए वल्कि उसको निखारना चाहिए..। इसलिए उसकी नित्य अभ्यास करना चाहिए... उसी अभ्यास का आपको फल मिला है.। मैने आपकी पेंटिग देखी है जिसमें आपको कही पुरूस्कारो से सम्मानित किया गया हैं।
आपने देख ली...
हाँ...आप तो स्कूल समय से ही चित्र बनाती थी ..कभी डेस्क पर ,कभी वेचों पर कभी खिङकी पर आज उसका ही प्रतिफल हैं। मै इतना तो कह सकता हूँ आपका यहाँ तक पहुँचना आसान नहीं रहा होगा।
हाँ... पर अब फिर बात करेगे। अभी मुझे कुछ काम हैं।…..ठीक है....
अव रोज उससे नेट पर चेट होती पर अपने बारे में कुछ नही बताती....हमको ऐसा लग रहा था जैसे कुछ तो ऐसा है जो छुपाया जा रहा है पर क्या? हर वार पूँछा,...उसने हर वार बहाना बनाके दूसरी बात छेङ देती।
मैने उसकी प्रोफाईल चैक की कि कौन कौन जागृति के मित्र है। उस फेंङ लिस्ट में जागृति की सहेली भी नजर आई, जिसका नाम करूणा था..मैने करूणा को फ्रेङ निवेदन भेज दिया। उसने मेरा निवेदन स्वीकार कर लिया। 
हैलो......करूणा....पहचाना.......।
हाँ...तुम्हारा नाम धैर्य हैं। उस वक्त कालेज में तुम्हारा इंजीनियर में सिलेक्सन हुआ था वो भी विना कोचिग के ...यह बात सर ने प्रार्थना स्थल में बताया था। वैसे भी  छँटवी कक्षा से इंटर तक सहपाठी रहे है तो कैसे नहीं पहचानेगे। फिर जहाँ से हम है वही से आप भी हो तो कैसे भूल सकते हैं?
बहुत बहुत आभार आपने इतनी सहजता से विस्त्रित पहचान दीं।
हाँ....चलो अच्छा लगा। आजकल हो कहाँ?
मै सिविल इंजीनियर हूँ...अभी दिल्ली में ही हूँ। और आप कहाँ हो?
मै भी दिल्ली में ही हूँ मेरे पत्ती देव गुङगाँव में जाँव करते हैं।
अच्छा लगा आपसे बात करके। जागृति की फ्रेड लिस्ट में से आपको खोजा हैं। जागृति तो बहुत वढी चित्रकार हो गई है। उसकी पेंटिग सेयर की जाती है गोराविंत करती है पेंटिग ..
पर क्या कहे? जो दिखती है उतनी सरल जिंदगी नहीं हैं। जागृति ने बहुत कुछ देखा हैं।
क्या? मैने काफी बार पूँछा पर कुछ नहीं बताया।
धैर्य एक बात वताओ ...तुम्हारी शादी हो गई है ।
करूणा क्यो पूँछा,?
बस ऐसे ही...
नहीं..
मैं जानना चाहता हूँ..जागृति के बारे में...
धैर्य तुम शादी करोगे जागृति से..
क्या....अचानक ऐसे कहाँ तो कुछ कह नहीं सका..
मैने सीधे सीधे शादी के लिए पूँछ लिया.....अच्छा नहीं लगा।
अचाचक कहाँ,करूणा पहले जागृति के वारे में वताओ?“
जागृति की कहानी जानकर तुम भी दूरी बना लोगे।
ऐसा क्यों कह रही हो कि मैं ऐसा करूगाँ? ठीक है तुमने सीधे सीधे शादी करने की बात कही है तो मैं भी घुमा फिराके बात नहीं करूँगा। अब तक नहीं कहाँ वो आज कह ही देता हूँ।
क्या? छुपा रखा था अव तक .....
मैं जागृति को पंसद करता था पर कभी कहाँ नहीं, मेरे एक गलत कदम के कारण भविष्य अधर में न लटक जायें। जो भी भावनायें थी अंदर ही अंदर रखी और माध्यमिक के बाद हमारी दिशाये भी बदल गई। सात साल बाद फैसवुक के माध्यम से बातचीत हो रही हैं।
कमाल का है नेट आँनलाईन.... यानिक तुम अंदर ही अंदर पंसद करते थे लेकिन बहुत देर कर दी कहने में.....पर अभी भी देर नहीं हुई है।
मै जानना चाहता हूँ....इन सात साल मैं क्या हुआ है? जागृति के जीवन में जो भी घटना घटी कह दों.....जो भी बन सकेगा मै करूँगा...आपने शादी के लिए पूँछा तो मै भी तैयार हूँ, क्या जागृति करेगी?
धैर्य कल बात करूँ.. लम्वी कहानी है...ससुराल मैं हूँ...मायका नहीं है जो मन मर्जी कर लूँ....
करूणा हँसमुख चंचल छवि की है पहले भी बात कर लेती थी तब उसे सब ऐसे घूर घूर के देखते थे जैसे क्या गुना कर दिया है हम छोटे से कसँवे के कालेज में पढते थे, जहाँ लङके और लङकियो की अलग अलग कक्षाये होती थी. कुछ विषय ऐसे होते थे जहाँ साथ साथ ही पढना होता था जैसे कला वर्ग का भूगोल और विज्रान वर्ग की कक्षाये साथ ही देनी होती थी। अभी भी कसँवा के हालात ऐसे ही है जैसे पहले थे कालेज मॆ अव भी पांवदी है पहले जैसी कि वातचीत नहीं करना..हँसहँस कर सङक पर नहीं चलना अकेले लङकियो का वाजार नहीं जाना... पर अव यह सोंच कुछ मध्यमिक परिवार में अभी भी जो चाये शहर हो या कसवाँ नहीं बदलती हैं। अगर एक नजर से देखा जाये तो गलत नहीं है कुछ पांवदी लङको लङकियो को सभ्य आचरण प्रगृतिशील के पथ पर ले जाती हैं। लङके गुट बनाके भविष्य निर्माण के समय वेतुके वातचीत करना ...लङकियो को घूरना उनका पीछा करना अभ्रद व्यवहार करना अनैतिक के पथ पर ले जाती है, जव समय हाथ से निकल जाये तव सिर्फ पछतावा के सिवा कुछ नही रहता है। जीवन निर्भाह के लिए कोई स्थिर उच्चतर रोजगार नहीं होता हैं।जव समय था तव उस मूल्य समय को वर्वाद कर दिया आवारा गर्दी में न कोई पढाई उस वक्त पुराने दिन करके रोना आता है। पांवदी होना हितकर है श्राप नहीं हाँ माना अच्छा नहीं लगता है पर इसका मूल्य समय पर पता चलता हैं। मै अभी भी पुराने दिनो की मीठी यादों मॆ चला गया, पर साथ ही साथ एक अलग ही वैचेनी थी कि
 जागृति के जीवन में ऐसा क्या घटित हुआ है जिसके कारण खुदको बदलना स्वीकार कर लिया....ऐसा क्या हुआ?कव हुआ? कैसे हुआ? बहुत से सवाल थे जिसका जवाव तो सिर्फ करूणा ही दे सकती थी। मेरा मन व्यथित था वेसवरी से इंतजार था कि कव करूणा आँनलाईन होगी मेरे सवालो के जवाव मिलेगें। मन न आँफिस में लग रहा था न किसी अन्य कार्य में बस नजर टिकी थी फैसवुक पर कव करुणा आँनलाईन हो और मेरी जिज्ञासा शान्त हो। करुणा का फैसवुक पर मैसेज आया...
हैलो धैर्य......
कैसे हो...
मेरा मन तो किसी कार्य में नहीं लग रहा था,बस फैसवुक खोलके वैढा था जैसे ही मैसेज आया ....मैं खुश हो गया और उत्तर भेज दिया....हाँ सच कहूँ तो मै ठीक नहीं हूँ.....मेरा मन व्यथित है.कव से तुम्हारा इंतजार कर रहा था कि कव आँनलाईन होगी मेरे सवाल का जवाव दोगी..
अब मै गृहणी हूँ तो बहुत से कामकाज होते है. अब फुरसत मिली है तो मैने तुमसे बात करने की सोची जो कल अंधूरी रह गई थी।
हाँ....मै जागृति के बारे में जानने के लिए उत्सुक हूँ। ऐसा क्या हुआ है ?
स्नातक के वाद ही...जागृति की शादी मैकेनिकल इंजीनियर से हो गई. ऊँचा खानदान सब कुछ अच्छा था.....खानदान परिवार कितना ही अच्छा हो, पर जव तक जिसका हाथ थामकर नये परिवार से संस्कृति से अवगत करायें वो ही वेकदर करने वाला निकले तो शादी सम्पर्ण की जगह समझोता बन जाती हैं। समझोता भी ऐसा जिसमें पत्ती के अनुसार अपना व्यक्तव्य बदलो .जैसे पंसद हो वैसे रहो....अगर किसी भी कार्य की अवहेलना की तो वार वार नीचा दिखाने का एक मोके को हाथ से न गवाना. पल पल उङारना मारना। पति की नीचता मानसकिता के चलते परिवार भी अपने रंग बदलने लगते है. वो भी पल पल अपमान करते हैं। एक लङकी अपना सबकुछ छोङकर एक अनजाने व्यक्ति का हाथ थामकर नये सफर पर निकल पढती है कि मुझको सभालने वाला मेरे साथ चल रहा है. जव वही हाथ छोङ दे तो जिंदगी उस दोहराये पर खङी कर देती है जहाँ नजर तो सवकुछ आता हैं. सब अपने ही दिखते है पर परिस्थतियाँ बदल चुकी होती है। माता पिता पर वोझ औऱ वङ जाता है और भी वच्चो की शादी में रुकावट पैदा करती है. छोङी गई स्त्री की दशा आज के दोर में वन में भटकती जानकी की तरह हैं।माता पिता के लिए परिस्थतियाँ भिन्न हो पहले जैसा दुलार न हो पर पहला घर और आखरी घर मायका ही रहता है। और वच्चो की शादी और मुहल्ले वालो के ताने मानसिकता को दिशाहीन बना देती है। छोङी गई स्त्री मायके में शरीर पर रिसता घाव है जो शरीर को पीङा तो देता है पर अलग नहीं किया जा सकता हैं। माता पिता जव तक जीवत रहते है वेटी का दर्द को तो समझते है पर कुछ कर नही सकते है...समाज से तो लङा जा सकता है पर खुद के अंशो से कैसे लङे। भाई और भाभी वार वार ताने देते है वुरा भला कहते है दुतकारते है....तव वो औरत पल पल कितनी मोते मरती होगी।  आसान है पर करना उतना ही कठिन है एक स्त्री का तलाक सुदा जीवन जीना कठिन हैं।जो भईया राखी के दिन हमेशा साथ खङ होने का दावा करता था वो ही जली कटी वाते कहता हैं। भाभी तो एक ताना मारना छोङती नहीं है.. वहुत कुछ सहा है,वहुत कुछ देखा है जागृति ने....
धैर्य....हाँ....इतना कुछ हो गया हमको कुछ भी नही पता.. आखिर जागृति के पति को किस बात का घंमङ था क्या था? ऐसा असके पास जो औरो से अलग बनायें...वहुत से डाँक्टर इंजीनियर या कोई विशेष शिक्षा प्राप्त कर अच्छी नोकरी करते है तो किस वात का घंमङ है। आखिर ऐसा क्या था जो सवसे अलग वनायें? अपनी जीविका के साधन के लिए कोई भी चुनाव करें पर उस की कदर कोई कोई ही कर पाता है उसका मूल्य कोई कोई ही जान पाता है। एक डाँक्टर तव सफल डाँक्टर है जव उसकी गरिमा को पहचान पाये सही मुल्य समझ पायें...जैसे कि तुमको यह दायत्व मिला है जव किसी वीमारी मॆ ग्रसित होते है तव परिवार वालो के लिए डाँक्टर भगवान से कम नहीं है..भगवान की उपाधी दे देते हैं। पर डाक्टर उस उपाधी को वरकरार नही रख पाते है और अंहकार के आवेश मे और पद को तिरस्कार कर देते हैं. अमीर के हितैशी बन जाते है और गैरसरकारी हास्पीटल वाले मोटी रकम छापना सुरु कर देते है. समाज सेवा नहीं एक व्यापार बन जाता हैं। गरीव को निरादर की नजर से देखते है पर अमीर को सम्मान की नजर से देखते है. इस पद की गरिमा को जिसने पहचाना जिसके लिए समाज सेवा से वढ कर कुछ नही हैं. गैरसरकारी अस्पताल में एक दो दिन मुफ्त परामर्श की सुविधा और शल्य चिकत्सा के लिए छूट एक अलग ही पहचान बनाती हैं। उसकी यश कीर्ति जन जन तक पहुँचती है।पर यह हर कोई नहीं समझ सकता हैं गरीव सिर्फ पैसो के मामले में होते पर रंक से राजा बनाके ये उस्ताद होते है।
धैर्य.. तुम्हारी सोंच तो अलग हैं...इंजीनियर कैसे अपने व्यक्तत्व को निखार सकते हैं।यह भी वतलाओ...
नहीं....बस ऐसे ही कह गया. जायदा ही कह गया...किसी भी वात को विस्तार पूर्वक कहना मेरी आदत है पर यह हर किसी को अच्छी नहीं लगती है।
सबकी अपनी अपनी राय है, कौन किस तरह सोंचता हैं।
मै भी ऐसे ही सबके सामने नहीं कहता हूँ, सामने वाले का मनोदशा को समझ कर ही विस्तार से कहता हूँ।
तुमको तो लेखक बनना चाहिए...यकीनन अच्छे से बात का स्पष्ट्रीकरण कर सकते हो, एकवार तो जरुर सोचने को मजवूर कर सकते हो। एक वार लोग बात को नहीं सुनेगे पर लिखी हुई बात को पढी तो चिन्तन करने पर विवश जरुर हो जायेगें।
करुणा लेखक तो वहुत कुछ लिखते है पर एकवार कोशिश जरुर करेगे, किसी भी वात को लेकर उठते तूफान को लिखने की कोशिश करेगे। वताओ......बातो बातो में जो सच जानना था वो तो भूल ही चुके है...आखिर जागृति पर केसे केसे प्रताणित क्या जाता था?
जव प्रताणित की सीमा पर कर ,उस मुकाम पर पहुँच चुकी थी। जव जागृति के लिए ससुराल के दरवाजे हमेशा हमेशा के लिए वंद कर देने के संकेत लिए ,मायके में अपने सामान के साथ अकेली आ पहुँची। सुध वुध खोई रिक्से से उतर कर दहलीज पर कदम रखते ही माँ से लिपट कर बहुत रोई.. रोते रोते अपनी व्यर्था सुनाने लगी पर आवाज स्पष्ठ न होने के कारण कुछ समझ नहीं आ रहा था। घुटन की सास से निकल कर वातावरण की खुली हवा में सास लेकर ....आराम से आपवीती कह सुनानी... जव जागृति मायके आई हुई थी, तव मैं भी मायके में ही थी। जव उसकी ऐसी हालत के वारे में पता चला तो उससे मिलने उसके घर जा पहुँची।.
    पहले तो मुझसे गले लग कर बहुत रोई...रोले रोले.....रोने से जी हल्का हो जायेगा...जव शांत हुई तो अपनी आप वीती सुनाई ही नहीं वल्कि गम्भीर चोटो को भी दिखाया....देखकर मै विचलित हो गई कोई कैसे इतना नीचता तक जा सकता हैं? जितना खुला भाग उसपर कोई भी चोट के निसान नहीं...अंदरूनी भाग चोट के निसान से नीली लाल पढ चुकी थी. सुलगती सिगरेट से दागने के अनगिनत निसान थे....कहाँ कहाँ नही दागा कह भी नही सकते है।पत्ती की निद्नीय को देखकर अच्छाई से लिप्त  ससुराल के मुखङे से नकाव हट गया और अपना कहर बरसाना सुरू कर दिया।
    शरूआत तव से होती है...जो फोन पर रात भर घंटो चिपका रहता था..वादे कस्मे साथ जीने मरने की बाते करता था। उसके तेवर शादी के वाद कैसे वदल गयें? जागृति के पापा ने खूव दहेज दिया था...सुरु के दिनो में तो जागृति की खूव तारीफ होती थी पर फिर अचानक वदलाव आ गया। जागृति छोटे से कसँवे में रहती है,बहुत सी चीजे है जो वोलने का ढग, वैढने का ढग,पहनने का ढग सब शहर से भिन्न होता है। हम जिस माहोल में रहते है वहाँ गाँव की भाषा भी वोली जाती है जिसका हम शहर में नही भूल पाते है । जागृति भी गाँव की भाषा वोल जाती थी. सब उसकी मजाक बनाते थे...कहते थे, लो गवार आ गई....मेर्नस नाम की चींज नहीं है...क्या ठेट दैहाती भाषा वोलती हैं...अग्रेजी के विल्कुल मैर्नस नही हैं...वोलने में हाय, हैलो. चम्मच को स्पून नहीं  कहती।...जव हम सब बात कर रहे है तो क्या तुम्हारा वोलना जरूरी है?....क्या कहती हो सोई हमारे यहाँ ऐसा कहते है. यह सोई क्या होता है?ऐसे ही उसकी वोलने पर पांवदी लगा दी जव तक वोलने का ढग नहीं सीख लेती हो तव तक वोलोगी नहीं....किसी के सौन्दर्य की तारीफ करने में हाय सैक्सी...सो वोम लग रही हो, सो हाँट ...सो चिली सो पटाखा कहना अगर मैर्नस होते है।नमस्ते की जगह गले लगना चूमना, हाथ मिलाना मैर्नस है। हिन्दी वोलना गवार अग्रेजी वोलना ऐटयूट को नापने की मापनी है।हिन्दी वोलने के वीच में अपनी स्थाई समुदाय वोलने की भाषा खङी वोली, भोजपुरी व्रजभाषा का उपयोग करना वैड मैर्नस है। शहरी करण में जवतक अग्रेजी के शव्द न वोले तव तक मैनर्स नहीं है।
जागृति हिन्दू रीतरिवाज की तरह एक ग्रहणी की तरह सौलह श्रंगार को सजाती तो उसकी हँसी उङाई जाती है. माँग में मोटी पट्टी की तरह सिंदूर,आँखो में काजल,वीच में महरूम विंदी, चोटी गुथी हुई,गहरी लिप्टिक,कलाई भरके चूढी,चटक रंग की साङी, छम छम करती पायल ऐसा रूप सजाकर शादी के दूसरे दिन ही रसोई घर में आई,यह सोचकर कि सब खुश हो जायेगे, पत्ती तो मुंग्ध हो जायेगे पर सव उसको देखकर हँसने लगें.... जागृति के पत्ती ने जव देखा ,यह क्या गवार सा रूप बना रखा है। कहते कहते ही...हाथ से माँग का सिदूर पोछ डाला ....ऐसे सोलह श्रंगार करने से कुछ नही होता है जितनी उमर है उतनी ही जियेगे। पत्ती को जो पंसद हो वही करना चाहिए आज के वाद ऐसे गवारू कपडे नहीं पहनना है। मिनी स्कर्ट,फ्राँक ,गाऊन जींस टाँप में रहना मैनर्स है। जींस टाँप को अपना लिया, सूट सलवार पर भी पांवदी थी।
हद तो तव हो गई जव साथ में एकवार पार्टी में मिनी स्कर्ट पहना कर ले गया। पहनने की आदत तो थी नही जो अपनी स्कर्ट को नीचे खीचती रही।किसी से बात करने की वजय चुप रहना ही वेहतर समझा। जहाँ का दृश्य  पति पत्नी दूसरे के साथ नृत्य कर रहे है, मर्यादा की सीमा क्या थी? नर नारी के हाथो में झलकते जाम दूसरे के वाँहो में झूलना, शहरीकरण के यह मैनर्स है। पार्टी भी किसलिए थी प्रमोशन के लिए ....जागृति एक कोने में चुप सी वैढी थी पर किसी व्यक्ति की नजर उस पर पढ गई उसने साथ में ड्रान्स करने के लिए कहाँ, नहीं....
वार वार वह व्यक्ति कहता रहा.....आखिर में उस व्यक्ति ने हाथ पकङ के खीचा, पर यह वात जागृति को अच्छी नहीं लगी, उसने चिल्लाकर कहाँ, जव एकवार वोल दिया नही करना तो जिद क्यों”?
पार्टी में एकदम सन्नाटा छा गया...जागृति के पति ने विना कुछ पूछँ...सबके सामने जागृति पर चाटा जङ दिया. तेरी हिम्मत कैसे हुई...ऊँची आवाज में वाँस से वात करने की. तू गवार है गवार ही रहेगी. मेरी ही गलती थी जो तुझको यहाँ लेके आया..तूने मेरी नोकरी पर लात मारी है मेरे वाँस पर चिल्लाकर....
तभी एक लङकी आई....ओ सिट यार...क्या गवाँरू टाईप की वीवी चूज की हैं. तुम जैसे हैडसम क्रेजी के लिए कितनी जान छिङकती हैं। कहते कहते हाथ पकङ कर ड्रासफ्लोर पर ले गई...
जाते जाते जागृति के पति ने कहाँ, मेरी लाईफ ङिस्कास्टिग कर दी है. दूर हो जाओ....अपनी सूरत भी मत दिखाना. किसी के साथ  ड्रास न करना मैर्नस नही है..एकहाथ में जाम दूसरे हाथ में अपने साथी की जगह किसी ओर का हाथ थामना मैर्नस हैं। यह रात उसके जीवन में ग्रहण बनके आई और जिंदगी को वेरंग कर दिया।
मन बहुत विचलित था कैसे उठते तूफान को शांत करें? अपनी भावनाओ को अपने अंदर उठते अनगिनत प्रश्न को अपनी कला में उतार देती थी।कोई नही  था जो उसकी पीङा समझ सकें। अपनी व्यर्था को भावनाओ को रंगो में रंग कर चित्रपटल पर उतार देती थी  उसके पती की नजर एक रात उसके चित्रकारी पर पढी, जव पार्टी में से नसे में धुत लङखङाते कदम के साथ, उसी लङकी के साथ घर मे आया जव रात अपने चर्म पर थी..पती को तो कोई फिक्र नही थी पर जागृति राह देखती थी। चित्रकारी पूरी हो चुकी थी रंग अभी सूखने वाकी थे...उसकी नजर पढी कि देखकर खुश होगे पर,पास में रखा पानी का गिलास उठाया और उस चित्रकारी पर फैक दिया. और तो कुछ आता नही है बस गाँव की लीपपोत को यहाँ पर भी वरकरार रखा हैं। तुमसे तो शादी करके मेरी लाईफ की तो वाँट लग गई है। गवाँरू न वोलने का ढग न पहनने का ढग न स्टैन्डर्स पढाई क्या की है ...हाँ...आर्टवर्ग  से पहले समाजशास्त्र से एम ए और आर्ट में यह लीपपोत..कहाँ हम और कहाँ तू कोई मेल है। मैने किया है मैकेनिकल इंजीनियर में एम टेक, सो व्यूटीफुल लेडी एम वी ए जो आज एच आर हैड है। ये सारी वाते करता रहा और जागृति कुछ न कर सकी...जाते जाते कहाँ, मेरे रूम में आने की जरूरत नहीं है, आज की रात व्यूटीफुल लेडी के साथ तुम जैसी गवाँरू की यही जगह है लावी में...
हर दिन घुट घुटके जीना पढ रहा था ...इस ग्रहण का कव अंत होगा? पूरे घर का कामकाज कराती, वात वात पर ताने सुनाती जलील करती.. तू इन डिवोस पेपर पर साईन कर और निकल जा मेरी नजर से...पर जागृति नहीं करती थी क्यों? मायके मॆ गई तो और वहिनो की शादी मॆ अङर्चन आयेगी. कैसे होगी शादी..जैसे भी हो ससुराल से निकाली गई, पती की छोडी स्त्री के लिए कही जगह नहीं है।मारपीट की सारी हद पार कर दी..आखिरकार जागृति ने भी हार मान ली और तलाक के पेपर पर हस्ताक्षर कर दिये और ससुराल से निकाल दिया।
माँ पिता को भी चिन्ता थी, अव इन लङकियो का क्या होगा कैसे होगी शादी?छोङी गई स्त्री के लिए..आगे सफर वहुत कठिन होता है।जागृति टूट चुकी होती अगर उसकी छोटी वहिन तर्क वितर्क की ईमारत न गढती... जो वकालात कर रही थी वो भी अपने हिम्मत से ...लङकियो को पढाई के लिए ऐसे घर से दूर नही भेजते थे..पर उसकी जिद थी किसी की नहीं मानी सरकार के अनुदान की सहायता से पढाई कर रही थी। घर पर जागृति के आ जाने से मातम सा छा गया था, सब ऐसी नजर से देखते थे जैसे कितना वढा जुर्म कर  दिया हो। चाची ताई और भाभी ऐसे ताने मारते...कैसी कुलछनी हुई है पूरे घर को ले ढूवी अब कौन करेगा इनकी लङकियो से शादी... भईया भी कहने से नही चुकते थे। जागृति को धीरज वधाँने वाला कोई नहीं था....अपनी जिंदगी को वोझ समझने लगी थी, इस वेरंग जिदगी को खत्म करने की सोंच लिए गाँव के पास नहर की तरफ भाग निकली...उधर से जागृति की बहिन कंगार आ रही थी...कंगार कुछ कह पाती ...पुल से चढ कर नहर में छलाग लगा दी....पीछे पीछे कंगार ने भी छलाग लगा दी...और जागृति को डूवने से वचा लिया.अकेले कंधे पर वाँजू को  सहारा देकर घर ले आई।चारपाई पर लिटा दिया...मेला देखने वालो का मजमा जुड गया।जागृति अपने दर्द का हाल करूणा से सुना देती कौन क्या कह रहा हैं।करूणा होशला देती पर आखिर कव तक अपने आप से जूजती रहती लोगो के ताने सुन सुनके रहन शक्ति क्षीण हो चुकी थी, तव फैसला किया, न रहेगा वाँस न वजेगी वासुरी....कंगार को सारी घटना करुणा ने वता दी। क्यो? किस कारण से आज जागृति को यह हाल हुआ है।
कंगार का आज इंतहान था। देखना था कितना सीखा है. अपने तर्क वितर्क से एक निर्जीव हो चुकी साखा में जीने की चेतना जगा सकती है कि नहीं...... कंगार... आप सबके ताने किसी भी जीवित व्यक्ति को निर्जीव बना सकते हैं।यह परिवार है जहाँ मुश्किलो में साथ होना चाहिए था, वहाँ अपनी अंदर दवी सुलगती चिंगारी को प्रंचंड अग्नि बनाने में आप सबको तो निर्पुणता हाशिल हैं। बहिना इनके ताने के कारण अनमोल काया को त्याग करने चली. यह सब तो यही चाहते है कि हम टूट जायें। जब एक औरत होकर दूसरी औरत का दर्द न समझे तो उन सबको समझाना वेकार है। वैसे ही पाषाण पर कहने से चित्र उत्कृष्ठ हो सकें.... यहाँ कहने से नहीं वल्कि तुमको इतना सक्षम बनना है कि खुद ही वोलती वंद हो जायें। बहिना अब तुम यहाँ एक क्षण न रूकोगी चलो मेरे साथ अब कहने सुनने का समय नहीं है कुछ करने का समय है।मम्मी पापा आप चिंता मत करना, इन लोगो का मत सोचों ये होते ही है किसी के दुख को कम नहीं करते है वल्कि और वढा देते हैं।
कंगार जागृति को अपने साथ शहर ले आई और होशला देने लगी।जो खूवी थी उसको अपनी जीने की वजय बनाने के लिए प्रोत्साहित करने लगी।पुरानी जिंदगी को वुरा ख्आव जानकर भूलने को कहती।खुश रखने के लिए बाहर घुमाने ले जाती. पेंटिग करेने का सामान लेके रख दिया और खोई हुई शक्ति को जगाकर ....सुन्न स्थति में चली गई चित्रकार को जगाया, मन के अंदर कल्पनाओ के रंग भरकर चित्रपटल पर उतारने लगी।....कंगार ने उन चित्रो को वेवसाईड पर खाता बनाके चित्रो को अपलोड कर देती. देखते देखते सहारना के साथ पेंटिग ने किस्मत ही वदल दीं। सोहरत दौलत अपना नाम एक अलग ही पहचान बन गई। जो ताने मारते थे सब देखते ही रह गयें। दौलत सब जख्म भर देती है,  उसके अतीत से जायदा आज को महत्व देती हैं। शोहरत दौलत सब बदल लेती है। जिसने कला को पहचाना नहीं अपमान किया आज कला ही उसकी पहचान हैं।अमीर लोगो के घर की सोभा वढाती हैं जिसके लिए कोई भी कीमत चुकाने के लिए सज्ज हैं।उच्च कोटि की प्रतियोगता में सम्मान का प्रतीक रूपी तमंगा मिला। यहाँ तक पहुँचने में समय और संर्घष की सीढी पार कर उसका प्रतिफल मिला हैं।
करूणा के कहे शव्द को मैने अपनी लेखनी दुवारा लिखने की कोशिश की।लिखने के लिए प्रेरित भी करुणा ने ही किया था ।पर मेरे मन में ङर था कि जागृति के साथ इतना कुछ हुआ है, कही मुझे भी उसी तराजू में न तोलने लगे। एकवार विश्वास पर चोट लगें तो दूध का जला छाँच भी फूक फूक कर पीता हैं। कैसे जागृति से कहूँ ,मन की वात क्या समझेगी...उठक पटक व्याकुलता के कारण चैन नहीं था. तभी मन में विचार आया क्यो न करुणा का सहारा लिया जाये।बहुत कुछ सहा है अकेले...हाँ तभी याद आया करुणा ने कहाँ भी था, कि तुम शादी करोगे।
        कही भी मन नही लगता थोङी सी खुशी दे दू तो अपने आपको धन्य समझूगा. डर भी था कही मना कर दिया तो क्या होगा?दूसरे पल ही अगर मना भी कर देगी तो उसका हक है।मुझे जागृति का सम्मान करना होगा। जव करुणा से अपनी मन की वात कह डाली,कि एक वार जागृति से वात करे. मै हाथ थामना चाहता हूँ एकवार और मोका देना चाहिए, अपनी जिंदगी को....हर वार डरावने सपने नहीं आते है कभी तो मीठे सपने आते है जो मुस्कान लाते हैं। करुणा भी यही चाहती थी कि जागृति को समझने वाला ही नहीं वल्कि प्रत्येक औरत का सम्मान करने वाला धर्य जैसा ही व्यक्ति मिले।
करुणा हाँ मै कोशिश ही नही वल्कि राजी भी करुँगी, जव खुशी स्वयं दस्तक दे रही है। तो उसका सम्मान करना चाहिए..निराधर नहीं करना चाहिए।
धैर्य जागृति के ख्यालो में खो गया....
 ठहर जायें नज़र ये इल्म जानती हो..
हो जायें काफिर ये कशिश जानती हों..
तेरे दरिमियान आँके सुध भूल बैठा हूँ,ठहरी नज़र है जग भूल वैठा हूँ!!
पहले विंदाश अलबत्ता परिदां था,तेरी मुडेंर का रहनुमा परिदां हूँ!!
तेरी एक झलक का अक्स ढूँडता हूँ,वार वार बस तुझमें ही तुझको ढूँडता हूँ!!
ज़िंदगी क्या है?आज सबब जानता हूँ,तुझ बिन अंधूरी किताव हिस्सा मानता हूँ!
तू हुई मेरी मंजिल....मैं तेरा राही.....
तुझसे ज़िंदा हूँ ......मैं तेरा राही...
तलब किया इजहार किया सौ वार कहाँ,तेरी खामोशी वार वार हाँ की तरफ़ जायें!
लव्ज को इजहार करने का फरमान दो,मैं व्याकुल हूँ सुनने  का रसपान दों!!
मुस्कराके चली जाना दूर से पलट जाना,तिरछी नजरों से बिन कहें हाल बयाँ करना!
खामोशियो में तेरा आशिकाना पंसद हैं,शकून  मिल जायें बस लव्जो हाल बयाँ कर दो! 
इस पंरिदो को अपने पिजडे में ग़ुलाम कर लो,उमर भर तेरी छाँव का रहनुमा पंरिदा रहूँ!!
बस और क्या? इस हस्ती को अपनी हस्ती में शामिल कर लो!!
बस और क्या?इस हस्ती को अपनी हस्ती में शामिल कर लो!!
तू ही मेरी मंजिल....मैं तेरा राही...
तुझसे ही ज़िंदा हूँ...मे तेरा राही...

करुणा ने जागृति को फोन करके सारी वात कह सुनाई...धैर्य शादी करना चाहता हैं.. सबकुछ को भूलके एक मौका और देना चाहिए।धैर्य ने खुद कहाँ है,तू ऐसे ही बिना सोचे समझे मना मत कर देना. शान्ती मे सोचके..मेरा कहाँ माने तो हाँ कर देना।
जागृति कुछ कहना चाहती थी पर करूणा ने मौका ही नही दिया ।जव करुणा ने सब बात कह ङाली तो कहती है..तू भी कुछ कह ना..एकवार फोन पर बात कर लेना।तु कुछ कहती क्यों नहीं है?
जागृति...और कुछ कहना है, कि अव मै कुछ कहूँ...
करुणा..नहीं कह ना..
जागृति..एकवार ट्रैन छूट जायें फिर रुकने का नाम नहीं लेती है..वक वक लगी रहती है कभी तो सामने वाले की सुनने लिया करो...आखिर करना क्या चाहती हैं.बस अपने ही सवाल और अपने ही जवाव... करूणा मैं भी एकवार धैर्य से मिलना चाहती हूँ..जो भी कहना है मिलके कहेगे।तारवावू खवर पहुँचा देना...फिर दोनो हँसने लगी...
जागृति की आकाँक्षा अनुसार मिलने का कार्यक्रम रखा गया..रेस्तरा में जहाँ पहले से ही धैर्य इंतजार कर रहा था ।इस दुविधा के साथ आखिर मिलके क्या वात करना चाहती है?कही लताङ तो लगाने के लिए  नही वुलाया है.अजीव अजीव नकारात्मक ही विचार आ रहे थे।करुणा के साथ जागृति पास आ कर खङी हो गई..धैर्य को आने की खवर भी नहीं हुई.....
करुणा ने बहुत आवाज लगाई...पर एक वार भी जवाव नहीं दिया..करुणा ने मेज पर रखे पानी के गिलास को उठाकर..पानी को हाथ मे लेकर छीटे चहरे पर मारे....पानी के छीटे पढते ही धैर्य हङवङा गया...यह देखकर करुणा की हँसी छूट गई..जागृति भी मंद मंद मुस्काने लगी. धैर्य भी हँसने लगा...
करुणा कहाँ खोये हुए थे...अभी से शादी के सपने तो नही देखने लगें।
धैर्य.. नहीं तुम्हारी सहेली इतनी जल्दी हाँ कहेगी क्या?
करुणा...ये तो तुमको स्वंय ही पूछँना होगा...और वाजू पकङ के पीछे से सामने खङा किया।
धैर्य टकटकी लगाके देखना चाहता था ,पर मन ने इंजाजत नही दी।पता नहीं क्या फैसला होगा?और नजर चुरा ली सामने देखने की वजाय इधर उधर देखने लगा।
जागृति  फोन में कुछ करने लगीं.एकपल के वाद कहाँ.यह एन जो ओ कौन चलता हैं?नाम है संचालन कर्ता ...धैर्य सिहं..
नाम सुनते ही धैर्य ने कहाँ.हाँ हम सब मिलके चलाते हैं। प्रताङित, असाय, समाज से भहिष्कृति जैसी महिलाओ के लिए ,सक्षम बनाने की एक पहल हैं. पर जागृति इसका क्या लेना देना?.शादी का निर्णय तुम्हारा है।
जागृति..यह भी बता दो इस एन जी वो में हर साल जागृति कलावर्ग से दान दिया जाता है। यह कहाँ से आता है?
धैर्य एक पल के लिए सुन्न रह गया. हाँ मेरे दिमांग में क्यों नही आया तुम्हारा नाम?वो तुम थी…..
जागृति...मैं तो जरिया हूँ ...मुझ जैसे हार चुकी महिलाओ के लिए एक किरण तुम्हारा एन जी ओ दिखाता है, इससे वङी वात क्या हो सकती हैं। तुम्हारे प्रस्ताव पर सोचना कैसा.जव सोंच अच्छी हो, तव ही एक नई पहल कर सकते है।मै तुम्हारी इसी पहल के कारण हाँ कहती हूँ।
जागृति के हाँ कहते ही...धैर्य की नजर जागृति को टकटकी लगाके निहारने लगीं।

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