मिटती आशाओं की एक छड़ की आशा हूँ,
तम से भय मय की एक किरण की आशा हूँ।।
शून्य हीन जड़ की एक अंकुर फूटती चेतना हूँ,
निराश हो चुकी शक्ति की शक्ति वेदना हूँ।।
मैं न होकर भी हूँ हर पल छड साथ हूँ तेरे,
पग डगमग होते तेरे पल में सभालती तुझे।।
मंद में चूर पर कहाँ सुनता है मेरा तू स्वर,
हर कर्म से पहले भविष्य बतलाता हूँ तुझे।।
झूठ भ्रंम अतिक्रमण में सत्य है धुंधला,
तू बढ़ता चला गया बार बार किया आगाह।।
न मै माया ,न प्रंशस्नीय, न भ्रंम जाल हूँ,
वास्तविकता कटाक्ष धार की तलवार हूँ।।
जो सुनता मेरा स्वर करता मेरा अनुसरण,
विलासताओ में रहकर भी अहं से रहता दूर।।
अधीर में विचलित न होकर जागृति चेतना,
हार कर भी मुस्कान जीत की जागृति चेतना।।
मैं न होकर भी हूँ हर पल छड़ साथ हूँ तेरे,
पग डगमग होते तेरे पल में सभालती तुझे।।
मेरे स्वर को कितना भी किया हो निरादर,
मैं ममता तुल्य पग पग हूँ साथ मैं तेरे।।
घेरती निराशाओ में आशा का हूँ स्वर,
साहस छोड चुकी देह में साहस हूँ तेरे।।
भ्रंम जाल के होके अधीर तू बना दरवान,
गुलाम भ्रंम का मेरा स्वर तू कहाँ सुने।।
जो देता निर्देश करता जाता अनुकरण,
मैने भी बार बार किया संचेत पर तू न सुने।।
दल दल में फँसता जाता है तू पग पग,
चाहत बहुत कुछ पाने की मेरी तू न सुने।।
तेरे मस्तिष्क का बनके भ्रंम का राजा,
तुझे सत्य नैतिक से ले जाता बहुत है दूर।
उस नैतिक पग भ्रष्ठ होने से गूँजता मेरा स्वर,
उस वक्त किया जिसने मेरा अनुसरण।।
एक छड की खुशी से अन्नत का स्वागत,
भ्रंम का किया अनुकरण अन्नत श्राप।।
मैं न होकर भी हूँ हर पल साथ हूँ तेरे,
पग डगमग होते तेरेपल में सभालती तुझे।।
तम मय जीवन ग्रहण बना तब ऐसा तेरा,
निराशा में डूवा आत्मदाह का लिया प्रण।।
नैतिकता पर अंकुश एक छड़ बना कंलक,
मेरा स्वर हर कर्म के फल का दर्पण।।
जो करता मेरा अनुकरण वैभव न होकर भी,
वैभव सम्मान का युग युग बन जाता सार्थक।।
प्रेणा बन कर जग का बन जाता शुभ चिन्तक,
जीवन बरदान बन हो जाता है जीवन सार्थक।।
भ्रंम माया सपने में जिसमें जो जो जकडा़ हैं,
शांती ने पथ छोडा है अंशान्ती का पहरा है।।
माया पाकर भी क्यों माया का हुआ अधीर है,
बिलासता में बसकर क्यों बिलासता का अधीर है।।
मैं न होकर भी हर पल छड़ साथ हूँ तेरे,
पग डगमग होते तेरे पग में सभालती हूँ तुझे।।
अंशान्ती मन में भी गूंजता मेरा अब भी स्वर,
जानकर भी लोटना नहीं चाता तेरा मन क्यों।
भ्रंम ने जकडा तुझे मेरे स्वर का नहीं अनुकरण,
स्वर का अनुकरण होकर भी लोटता नहीं क्यों?
मैं न होकर भी सर पल छड़ साथ हूँ तेरे,
पग डगमग होते तेरे पग सभालती हूँ तुझे।।
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