ख्आईशो के दीवार पर ,
चलो एक ईट और लगाते हैं।
सफर के कारवाँ पर,
चलो एक हस्ती और सजाते हैं।।
खामोश हुई आरजू पर,
चलो मसाल की लौ जलाते हैं।
धूमल हो चुकी हस्ती,
चलो खुद के अक्स से मिलाते हैं।।
जिंदा है अब भी कहानी बंदे,
खुद के अलफाजो से मिलाते हैं।
हार की चौखटो के उसपर,
चलो जीत की प्रेणा जगाते हैं।।
शून्य हीन चेतना से त्रस्त,
चलो उमंग के बीज रोपते हैं।
थक चुके वैवसी लाचारों से,
चलो गीता की ऊर्जा विखेरते हैं।।
विचलित मन की साखाओं को,
चलो वृक्ष से मिलाते है।।
विखरे जमींर के तिनको को,
चलो घरोदा फिर से बनातें है।।
पिघल चुके मोम की बूंदो से,
चलो फिर से मोम बनाते हैं।।
लडखडाते कदमों की जड को,
चलो निडर जड़ पदचाप बनाते हैं।।
व्योम की सीमायें निश्चित मानते,
चलों अन्नत अलौखिक दिखलाते हैं।।
दृढ़ सकल्प से कोई साहस नहीं,
चलों खुद दृढ़ से अवगत कराते हैं।।
परास्त हो चुकी आत्म शक्ति को,
चलो आत्म शक्ति से मिलाते हैं।।
ख्आईशो के दीवार पर,
चलो एक ईट और लगातें हैं।।
सफर के कारवाँ पर,
चलों एक हस्ती और सजातें हैं।।
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