पेडॊ की साखाऒ पर पछियो की चह चहचाहट
वातावरण को गुंजयवान बना रही है ।ऐसा प्रतीत हो रहा है कि निराश हो चुकी जिदगी की
दहलीज पर आखरी उम्मीद की चर्चा कर रहे है । अनसुने पदचाप पर अपने अपने मत व्यक्त
कर रहे है।कितनी दीवाली आई और चली गई पर कभी रॊशनी का एक दिया जलाने कोई नहीं आया
। जब किसी युवक के मुख से अपनी करूणा ममता रूपी माँ का नाम सुना तो प्रर्थना कर
रहे कि इस उम्मीद को निराधार मत बनाना । फूल कलियाँ भी यही उम्मीद की आस कर रही
है।उपवन का कण कण अपनी माँ के लिए उम्मीद की नजर
से देख रहा है।ऐसा क्या था ? पदचाप के साथ तारणी माँ के लिए उम्मीद की आस उपवन
का कण कण कर रहा है।प्रत्येक दिन तारणी अपने भोजन में से आधा भाग पछियों को अर्पित
कर देती । कभी कभी भोजन में देरी हो जाती तो पंछी ची ची कर शोर करने लगते ,माँ की
साङी चोंच में दबाकर बच्चों जैसा हठ करते।ऎसा दृश्य माँ होने की अनुभूति का एहसास
जगाती है। तारणी भी बच्चो आओ आओ..... कह कर पुकारती थी।पेङ पोधो का रख रखाव,कलियाँ
फूलो से अनोखा स्नेह था, किसी को भी तोङने की सक्त चेतावनी थी। सौन्दर्य सरावोर हर
किसी को अपनी तरफ आकृषित कर ही लेते है.इसी बीच फूल को तोङ लिया तो अच्छा पाठ सिखा
दिया जाता। ऎसी ही घटना ने बाद बिवाद का अर्थ समझा दिया ,सबको सोचने को मजवूर कर
दिया। एक वार संरक्षण कर्ता की महोदया गणतंत्र पर्व पर अतिथी रूप में आगमन
हुआ।कार्यक्रम आगाज होने से पहले उपवन की शोभा देखनी चाही।उपवन की सौन्दर्यता को
देखकर मन मुंग्ध हो गई कि कलियाँ पत्तियों को तोड कर गुच्छ बनाया ओर समारोह की तरफ
जाने लगी जब तारिणी ने देखा तो भूल गई कौन हूँ मै! और
कौन है महोदया!जिस हाथ में गुच्छ को पकङे थी उस हाथ से
गुच्छ छीन लेती है और रोने लगती है। महोदया को बहुत क्रोध आया और अपनी बेवाक शक्ति
का उंलघन कर तारिणी पर बरसे लगी ओर मुहँ से अंहकार के शब्द,उच्च आसन का कोतूहल बन
बरसने लगी पर ये अंहकार पत्ति के उच्च आसन का दुःउपयोग उठाया जा रहा था।तारणी लहू
लुहान हो गई थप्पङो की ओर शब्दों की गूज से सब उपवन में एकत्रित हो गये।आखिर
तुझमें होशला कहाँ से आया? मेरे हाथो से गुच्छ छीन लिया.अपराधियो को समय समय पर खुराक मिलती ही
रहनी चाहिए नहीं तो ओरो को सह मिलेगी, सबके सब वागी हो जायेगे।थप्पङो ओर घूसो से
वार कर भङास निकालने मेँ जुटी थी. कर्मचारियों ने आके तारणी को अलग किया जो भङास
निकाल रही थी।
संचालन कर्ता अधिकारी ने गर्जन के साथ कहाँ,चुप हो जाओ......वास्तविकता
जाननी चाही क्योकिं सब इक्कठे हो चुके थे, अतिथी,
कर्मचारी, कोई गलत फैसला खुद पर हावी हो न जायें। सांन्तवना का मरहम लगाते हुऐ
पूछाँ,”तारणी तुम बताओ ।“ बीच में पत्नी
वोलने लगी.....
अधिकारी....जिससे पूछाँ जाये वही जवाव
देगा।
तारणी....ङरते घबराते ...अंतरमऩ में बार
बार अचेतऩ को चेतऩ होऩे का स्वप्ऩ या भ्रम वास्तविक से साक्षात्कार होने का प्रश्ऩ
उठ रहा था। सागर में हर वक्त पवने चलती है,क्या वो कभी शान्त रहती है।ये छलावा
है...तारणी भी समझ न सकी और स्नेह में ङूबती गई....कथा वाचक की तरह कहती गई......श्रोता
भक्त बन सुनते गए.....,स्वयं तर्क वितर्क कर समाधाऩ देती गई........महोदय आपने
मुझे अपऩा पक्ष रखने की अऩुमती दी इसके लिए आपका बहुत बहुत आभार.....प्रकृति अऩमोल
धरोवर है जिसका हम मूल्य चुका नहीं सकते है,ये है तो जीवन है ..हम जीवन की कल्पना
भी नही कर सकते है.पौधो पर खिले फूल उदास चहरे पर मुस्कान ला देते है.वादियो में धीरे
धीरे झूलते पेडों की शाखओं पर पत्तियों की सरसराहट,बसंत ऋतु में नई कोपले नई
उंमग,बरसात में टपकती बूंदे,रेशो से गिरती पत्त्तों पर सजती, धरा पर बिछती हिम की
चादरे,सब सौन्दरर्य मय होता है कि प्रकृति के आगोश में खो जाऊँ......जितना भी कहाँ
है ये तो ओस की मात्र बूंद है।आन्नद मय होना है तो प्रकृति से साक्षात्कार होंना
पडेगा। अब आप सबके मन में प्रश्न उठ रहा होगा?फूल,
फल,औषधियों के रुप में पेडो से छाल,पत्तियाँ,इत्यादि तोडेगे नहीं तो प्राप्त कैसे
करेगे। प्रकृति की तुलना पंच तत्व से बने शरीर से कर नही सकते पर आधार तो बन ही
सकते है।हम अपनी इन्द्रईयो दुवारा समाज के भागीदार बनते है लेकिन जीवन जीते हुऐ
रक्त दान कर सकते है और मृत्यु के बाद अपना शरीर।हम जीवन जीते हुऐ और मृत्यु के
बाद क्या दान करते है?दान करना या न करना व्यक्तगति निर्णय होता
है। प्रकृति का अपना कोई व्यक्तगति निर्णय नही होता है। क्या उनमें जान नही
है।क्या उन्हे दर्द नही होता है। हम अपने निज स्वार्थ के संसाधनो का अतिक्रमण करते
जा रहे है जिसका परिणाम किसी से छुपा हैं? वंजर भूमि का
विस्तार नदियों का सिकडुना,हिम श्रृंखलाओं का मैदानी विस्तार होना,अनायस बीमारियों
का उदगम,दिन प्रतिदिन विस्तार होता जा रहा है।कारण एक ही है प्रकृति का
हिरास।हमकों चाहिए बहुत कुछ पर करते कुछ नहीं है।पेड पोधे सबको लगाने चाहिए किसी
एक का काम नही हैं।मैडम जी को मंन मुग्ध फूलो ने मोह लिया.फूल है ही जादूगर सबको
मोह लेते है।प्रेम का प्रतीक,स्त्री श्रृंगार,वलिदानियो के नमन में सम्मपर्ति,नाम एक
काम अनेक।मैडम जी ने कलियों और पत्त्तियो
को तोडा.कलियो को फूल बनना था.फूल तो अपनी तरफ आकृषित करते ही है तो क्या तोडा ही
जायें.।कलियो के साथ कोई दुर्व्यवहार करे जैसे तोडना मसलना कुचलना तव मुझे नारी का
चित्र नजर आता है कोई उसके साथ वर्वरता कर रहा है। दोनों ही कोमल होते है,दोनो ही
स्नेह चाहते है .बस यही कारण था।उपवन के कण कण में मेरा ही जीवन बसता है। मैडम जी
से हाथ जोडकर बार बार क्षमा मागती हूँ। तालियों
की ग़डगडाहट से तारणी की जय जयकार होने लगी...
जो दिख रहा था वो वास्तव में धुंध थी हकीकत
कुछ और ही थी। समारोह सम्मपन्न होने के बाद कहर बनके तारणी पर बरसने लगा। विजली के
झटके दिए जिसके कारण सुध वुध खो वैठी और
अंधेरे कमरे में फैक दिया। यह पहली वार
नहीं जब जब आवाज उठाई तब तब उसके साथ असाय पीडा का परिचय दिया।धुंध छँटती है तव नई
किरण की सौगात भी नजर आने लगती है।एक वार
पुन: नये संरक्षण महोदय ने उपवन की साज सज्जा रख रखाव का दायत्व तारणी को सोंप
दिया। अपने मुताविक काम मिल गया उसी में अपना समय बिताने लगी।उपवन तारणी से तारणी
उपवन से अनोखा रिश्ता जुड गया।
अनजानी पदचाप सुनी तो सबकी की नजर टकटकी लगायें
देखती रही.....किशोर अवस्था का यवुक,मुखारविन्दु की आभा तारणी के मुख से मेल खाती,
व्यक्तगति की पहचान आँखो से पङी जा सकती है.आँखे सम्वेदनाओ,प्रेम ,भ्रमित,षङयन्त्र
को पढ़ने वाला यंत्र है.जो अपने खेल के माहिर खिलाङी बन चुके होते है उनके लिए आँखो
से मानवता के साथ खेल खेलना बन जाता है।किसी के हाथो की कटपुतली नही बल्कि ह्रदय
की भावनाओ को आँखो से संचार व्यक्त करते है।यवुक की आँखो से तारणी के प्रति स्नेह
सम्वेंदनाओ की आभा झलक रही थी।उपवन वासियों के लिए हर्ष की लहर दौङ गई।यह यवुक
पहले भी कही वार आ चुका था।यवुक की नजर.... उपवन के बीच वृद्ध की दहलीज पर खङी महिला पर पङी।
सिर के वाल सफेद पङ चुके।शान्ती का प्रतीक वदन पर सफेद साङी चहरे पर वृद्ध
रूपी झुरियाँ,कमर झुकी,डण्डे के सहारे खङी होकर,फूलो को पानी देती.पानी देने के
वाद फूलो को छूके देख रही,ऐसा लग रहा है कि माँ अपने बच्चो को दुलार कर रही है।उपहार
यह सब देख रहा है।आगे जाकर तारणी के पैर छूये।
उपहार.....दादी माँ आर्शीरवाद दो कि
अंधूरी कहानी को पूरा कर सकू.अर्द्धसत्य को सत्य के दर्शन करा सकूँ।
तारणी ने चश्मे को सभाल के देखा...उपहार
आया है देखकर बहुत खुश हुई।अपने जन्मोत्सब के दिन दो वर्ष से आ रहा था।उपहार भी
देख कर अनदेखा कर देता तो शायद जो तारणी के मुखार पर खुशी दिख रही है वो कभी नही
दिखती।बार बार एक ही प्रश्न क्यों पूछता है?अतीत के जख्मो को
अतीत में ही रहने दों। एक तू ही तो है जो मेरे पास आता है।
उपहार......दादी माँ .अतीत का सत्य जानना
है.आखिर किस कारण से आप यहाँ है?क्यो मै आपके पास छुपते छुपाता आता हूँ ?क्यो आपका सत्य छुपाया जाता है?हमकों आपके बारे
में कभी पता ही नहीं चलता, काँलेज में मानसिकता से ग्रसित कुछ अराजकता के तत्व
चुनाव में मुझे परास्त की चाह में किसी भी सीमा को लांघ सकते थे।कालेज चुनाव में
परिवार के अतीत का चिट्ठा सबके सामने खोल के रखना।अतीत से मेरे चरित्र का आंकलन
करना.ओछी राजनीति है।घर पर सबसे पूछाँ...तो सबका एक ही स्वर....मेरा भी मन आपके
प्रति द्वेष का भाव था..मन में नफरत के अंकुर लेके आया था, आपके कारण मेरी जिदगी
पर प्रश्न चिन्ह क्यों लग रहा है?जव देखा तो देखता रह गया.... आपको घायल पंछी के लिए व्याकुल देखा,उपचार के लिए भागकर जाना रास्ते में
दो वार गिरना,खुद चोट खाना पर पंछी को हाथ से न गिरने देना.वृद्ध अवस्था में अपनी
चिन्ता न करना। इस पङाव में शरीर भी साथ छोङने लगता है,आपके होशले ने अंतर मन में
कही प्रश्नो का सैलाव आ गया बार बार प्रश्न करता जो मैं देख रहा हूँ वो दोखा है या
सब कह रहे है वो दोखा है।दादी माँ दो साल से अपने जन्म दिन पर पूछँता हूँ पर आप
कुछ नही बताती है.आज मैं यहाँ से नहीं जाऊगाँ। दादाजी भी कहते थे लेकिन नाम नहीं बताते थें।मैने हठ पूर्वक
कहाँ , तो न जाने
एक आस की उम्मीद से मेरी तरफ देखा। जैसे कुछ अंधूरा है उसको पूर्ण करना हैं। कह रहें थे तुम
से ही मेरी आस है तुम कर सकते हों। दादाजी ने बहुत कुछ बताया लेकिन पूर्ण सत्य क्या
है? मन के चित्रों में प्रश्न चिन्ह हैं। मैंने भी प्रण
कर ही लिया है .पूर्ण सत्य जानना ही हैं और जानकर ही
रहूँगा।
तारणी ..... जो हुआ सो हुआ।कब बुलावा आ
जायें,प्रभु घर जाने का।अतीत को अतीत ही रहने दो.जानकर हाशिल क्या होगा?अतीत को बदला नही जा सकता है।जख्म भर चुके है निशान ताउम्र रहेगे।जिस तरह
जिंदगी के पन्नो पर लिखावट को मिटाकर नया श्रृजन नहीं कर सकते है वैसे ही जख्म के
निसान को नहीं मिटा सकते।
उपहार.....दादी माँ अतीत अगर पेंन्सिल से
लिखा हो, प्रश्न पूर्ण हो, उत्तर गलत हो,उसको सही किया जा सकता है।हमको पूर्ण विश्वास है आपका अतीत भी पेंन्सिल से
ही लिखा गया है।हमको जानना है...दादी माँ आज मैं खाली हाथ यहाँ से नहीं जाऊगाँ।अब
तक मैंने कुछ नहीं मागाँ।दादी माँ जन्मदिन का उपहार चाहिए।
तारणी...हाँ...मैं तेरा जन्मदिन कैसे भूल
सकती हूँ।मैने तेरे लिए खीर बनाई है।
उपहार...दादी माँ आपको पता है।
तारणी...मुझको सबके वारे में पता है किसको
क्या पंसद है।
उपहार...दादी माँ आपको सबके वारे में पता
हैं लेकिन आप की किसी को चिन्ता नहीं है।आप किस हाल में कहाँ हैं?किसी को फर्क नहीं पङता।सब अपने में मस्त है। मुझे खीर नही चाहिए।अतीत को
आज वर्तमान समझ कर सब कह दो। दादी का हाथ लेकर अपने सिर पर रख दिया...आपको आज
बताना ही पङेगा।
उपहार जिद न कर।
दादी आज मेरा जन्मदिन है,उपहार तो देना ही
होंगा।
तारणी अपने पोते की बात न टाल सकी।अक्सर
देखा गया हे,वृद्धावस्था में अपनी सारी खुशी वेटे वेटी की अपेक्षा पोता पोती में
झलकने लगती है।बच्चो के साथ खेलना,हँसना,अजीब अजीब बाते सुनना,बच्चा बन जाना.बचपन
की हिठलोरी किलकारी ह्दय प्रफुल्लित से भर जाता हैं।पोता पोती के मोह जाल में फँस
जाता है।बच्चे भी अपना वचपन दादा दादी,नाना नानी के आँचल में समेट देते है।बच्चे
भी खुश वही रहते है जहाँ उनकी बाते सुने, खेले,वो सब दादा दादी ही करते है।बच्चो
को दादा दादी से अच्छा खिलोना भला कौन मिल सकता है।
आज तारणी भी पोते की मोह जाल में फँस
गई। आखिर कार पोते की जिद के सामने झुक ही गई।एक बुरा ख्आव जानकर जिस अतीत को भूल
चुकी थी आज फिर वही ख्आव को हकीकत में लाने लगी...
उपहार मेरा दुर्भाग्य असुभ की काली
छाया उसी दिन से छा गई जिस दिन मेरा जन्म हुआ।मेरा अशुभ नाम वचपन से ही पङ
गया।जन्म से ही दुर्भाग्य का खेल सुरू हो गया।
मेरे पिता तुम्हारे पर दादा रघुवीर सिहं
हास्पीटल के गली के चक्कर इधर से उधर,उधर से इधर काटते हुऐ,मन में अजीब अजीब तरह
के ख्याल आ रहे थे।शादी के आठ साल बाद कही गोद भरी है। मुरादे माँगी,मन्नत रखी,वृत
पूजा पाठ,सब यात्रायें की तब कही गोद भरी है।रघुवीर सिहं ने सारा दामोदार भगवान के
ऊपर छोङा....भगवान सब कुछ ठीक ही करना।बस एक वेटा देदो इन आँखो को थोङा सकून
देदो।कब से आस लगाये खङा हूँ।सुन्दरी आप्रेशन थ्रेटर में जिदंगी मौत के कश्मकश में
जूज रही है।अपने पत्ति रघुवीर को निराश नहीं करना चाहती थी क्योकि आँखो में बच्चे
के लिए तङफ देखी थी।आस पङोस के बच्चे घर आ जाते तो लाड, प्यार, दुलार सर आँखो में
बिठा लेते।डाँ साहव ने तो पहले ही बता दिया था कि बच्चे के समय परेशानी हो सकती
है। सुन्दरी को तो सिर्फ रघुवीर की आँखो में खुशी देखनी थी। डाँ साहव के सामने
अजीव केश सामने आया जो पहली बार कोई स्त्री अपनी जिदंगी से जायदा अपने बच्चे को
बचाना चाहती है,बार बार डाँ साहव से आग्रह कर रही थी.दर्द की पीङा में खुद जूझ रही है पर अपने पत्ति को खुशी देना चाहती है।
डाँ साहब....एक वार फिर सोंच लो।
सुन्दरी....डाँ साहव सोचना कैसा। मैंने
उनकी आँखो में देखा है सपना उम्मीद की तडफ,कान व्याकुल है किलकारी सुनने को,बचपन
को एकवार फिर से जीने की चाह, कितनी आसायें है आँखो में,मै कैसे धुधला कर दूँ।मैं
अपने बच्चे के रूप में मैं ही तो हूँ..उसकी आँखो से मैं देखूँगी....मै न रहकर भी
मैं हूँ, बस रिश्ता बदल जायेगा.पर मैं हूँ।मेरी चिन्ता न करो बस बच्चे को बचा
लो,मैं आपकी शुक्रगुजार रहूँगी।
डाँ साहव...जैसी तुम्हारी मर्जी....मैं तो
यही कोशिश करूँगी कि माँ और बच्चे की जान बच जायें।
सुन्दरी पीडा से व्याकुत थी...ग़ृह
नक्षत्र की विकराल स्थति,ये कैसा सहयोग था शनि अमावस्या,शनि के जन्म के समय जो
नक्षत्र की स्थति वही आज समय बना है।विधाता ही जान सकते थे भविष्य के गर्व में
क्या छुपा है।मानव की चेतना में नवीन अंकुरित स्वप्न पलते रहते हे क्या सब पौधे से
विशालकाय वृक्ष,वृक्ष से महत्वकाक्षाँयें क्या पूर्ण हो जाती है?बहुत
से स्वप्न बीज से अंकुरित होने में ही दम तोङ देते है।क्रमवद प्रत्यनशील को ही
महत्वकाक्षाँओ का ही फल प्राप्त होता है ।मानव की चेतना में नित्य अंकुरित पनपते
रहते हे..वृक्ष कौन बनेगा ये तो विधाता ही जान सकता है।रघुवीर सिंह भी चेतना में
स्वप्न पालने लगा पर नियति का खेल तो विधाता ही जाने।जव काँनो में खवर पङी कि
सुन्दरी दुनियाँ में नहीं रही।पैर लडखडा गयें माला के मोती टूट के विखर गयें जो
सुन्दरी ने शादी की पहली सालगिराह पर देकर कहाँ,"मेरी
सासो की साज से बनी हे जब तक मैं हूँ तब तक यह है,मेरे होने का वजूद है.मेरी सासे
थम जायें उस दिन यह भी विखर
जायेगी।सुन्दरी की सासो के साथ ही मोती भी विखर गये,मोती के साथ ही परिवार भी विखर
गया। रघुवीर सिहं सुन्दरी को बहुत चाहता था।चाहत की पराकाष्ठा ऐसी थी दो दिन मायके
चली जाती तो जिदंगी अंधूरी सी लगती .मै अंधूरा हूँ सुन्दरी के बिना। हर जगह साथ
साथ ही जाते.वलाये लेकर आशीष देते नजर न लगे किसी की पर आज नजर लग चुकी थी।इसका
असर था जो कुछ पल पहले वच्चे के लिए खुश था और दूसरे पल ही तूफान ने सब कुछ विखेर
दिया।
नर्स बच्ची को गोद में लेके आई ..आपके
यहाँ वेटी ने जन्म लिया है।
रघुवीर सिंह.....मेरी नजरो से दूर ले
जाओ।जो जन्म लेते ही अपनी माँ को खा गई वो
शुभ नहीं हो सकती है अशुभ है अशुभ....
रघुवीर सिंह सुन्दरी के शोक में डूव
गया।सुन्दरी के बिना जिन्दगी खत्म हो गई। आस पडौस वाले घुस पुस बाते करने लगे.लङकी
का जन्म गण्डमूल मघा नक्षत्र में हुआ है माँ को तो कष्ट देना ही था।पिता से
विक्षोभ होना ही था अगर अभी भी इसका
समाधान नहीं किया तो किस किस की जिंदगी में भूचाल लायेगी।ये तो वक्त ही
बतायेगा।राशि और नक्षत्र के एक ही स्थान पर उदय और मिलन के आधार पर गण्डमूल
नक्षत्रों का निर्माण होता है। समय रहते इसकी पूजा अर्चना की जायें तो दोष दूर
किया जा सकता है...नक्षत्र का मन्त्र जाप,27 कुओं का जल,27 तीर्थ स्थलों के
कंकण,समुद्र का फेन,27छिद्र का घङा,27 पेङ के पत्ते,7 निर्धारित अनाज,7खेङो की
मृतिका आदि दिव्य जङी बूटी औषधियों के द्वारा शान्ति प्रकिया सम्मन कराना चाहिए।यह
क्रिया 27 दिन तक जबतक वह नक्षत्र हो 27 माला का जप,तर्पण मार्जन कर 27 लोगो को
भोजन कराना चाहिए।दक्षिणा देकर आयना
द्वारा बच्चे का चेहरा देखना चाहिए।एक साल तक ननिहाल के वस्त्र धारण कराने
चाहिए।मामा द्वारा लाये गये वस्त्र इत्यादि पूजा विधि पूर्ण की जाती है।गण्डमूल
ननिहाल के लिए भी कष्टकारक होता है।माँ की गोद भी न मिल सकी न पिता के सिर का
हाथ।मिली तो सिर्फ अशुभ नाम की पहचान और नानी की गोदी।
नानी को उसमें अपनी वेटी सुन्दरी की छवि दिखाई
देती थी।नानी का विश्वास था जिस ने सुन्दरी की कोख से जन्म लिया है, आम नहीं हो
सकती है वो तो सबके दुख तरने वाली होगी। आस पङौस मोहल्ले की औरतो ने केतकी को सलाह
दी जैसै भी बन सके गण्डमूल का निवारण कर लेना चाहिए।तुम्हारे सिवा कौन है।माँ का
साया तो छिन चुका है पिता ने मुँह फेर लिया है,भगवान न चाये कोई और अनहोनी न हो
जायें..अनाथ .अनाथ कहते ही रोक लिया ....ऐसा नहीं होगा....दुख को तारने
केतकी सुन्दरी की भाँति तारणी का लालन पालन करने लगीं।रघुवीर सिहं को कौन
सभाले।शराव को हमसफर बनाया।अक्सर देखा गया है आदमी पर विपदा आई खुद से टूट जायें
या दुख भुलाना हो तो मयखाने की तरफ ही क्यो कदम चल पङते है?विपदा
तो अमावस्या की छाया है जो धीरे धीरे कट जायेंगी और पूर्णिमा के चाँद की तरह
खुसियाँ बरसने लगेगी।अमावस्या की रात को ओर नारकीय बनाने के लिए तम को दूर करने
वाले दीपक को बुझा देना उचित है क्या?शराव किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकती है वल्कि
कायर,हारे हुऐ खिलाङी की चेतना को शून्य की और ले जाती है।रघुवीर सिहं भी उसी राह
पर चल पङा।जायदाद की कोई कमी नहीं,दूसरी शादी भी जल्दी हो गई।वक्त हर जख्म को भर
देता है।धीरे धीरे रघुवीर सिंह सुन्दरी को भूलने लगा और दूसरी पत्नी राघनी के साथ
जिदगीं जीने लगा।समय चक्र भी धीरे धीरे बढने लगा। रघुवीर सिहं के यहाँ दूसरी पत्नी
से लङकी ने जन्म लिया । उसका नाम सलौनी रखा। सलौनी को सर आँखो पर विठा कर रखता।
सलौनी की किस्मत इस तरह चमकी कि उसका भाई कौशल ने धरती पर पहला कदम रखा। रघुवीर
सिहं को अपना परिवार पूरा लगने लगा। सलौनी और कौशल को माँ वाप का स्नेह मिलने लगा
। बदकिस्मत तारणी की थी जिसको पिता का साया भी नसीव न था। केतकी नानी माँ ने ममता
दुलार दिया कि पिता का एहसास तक न होने दिया। समय चक्र आगे बढने लगा।दुनियाँ
तकनीकी क्षेत्र में नये आयाम जोडते गये। बच्चे युवावस्था में कदम रख रहे थे।
आज सुबह कुछ खाश थी, पछियों की चहचहाट के
बीच मंद मंद खुशबू हवा के साथ बह रही थी जैसे सब मिलके तारणी को 18वाँ जन्म दिन की
शुभकामनायें दे रहे हो। अरुणमा शीशे से तारणी के मुख पर पङी तो तारणी ने निद्रा
में खलल जानकर करवट लेली पर तभी अर्लाम बजने लगा। धुन के शब्द सुनकर एक पल की देर
किये खङी हो गई। हैपा बर्थडे टू यू..........बहुत खुश थी कही दिनो से कही प्रश्न
घूम रहे थे उन सबका जबाव जो मिलने वाला था। इससे पहले नानी माँ ने सक्त हिदायत दी
और कहाँ वालिग होने से पहले किसी का उत्तर नही दूँगी। नानी माँ पाककक्ष में तारणी
के लिए खीर बना रही थी।पीछे से जाकर नानी माँ को पकङ लिया..नानी माँ आज तो मेरा
जन्मदिन है आज तो उपहार मेरी मर्जी का मिलेगा।
नानी माँ...हर जन्मदिन पर उपहार तेरी ही
मर्जी का मिला है आज खाश कैसे?ठीक है बताओ क्या चाहिए?
तारणी....नानी माँ माँ के बारे में सब कुछ
बताया लेकिन आपने मेरे पिता के बारे में कभी
कुछ नहीं बताया।जब जबमैंने पूछाँ तब तब आपने टाला है।कौन है।कहाँ रहते
है।क्या नाम है।अन्तर मन में प्रशनो ने तूफान मचा रखा है।काँलेज में सब मजाक बनाते
है।आखिर मेरी पहचान क्या है?आपको आज बताना ही
होगा।
केतकी की आँखो से आँसू झरने लगें.......अब
तक तो टाला पर अब मुश्किल है.तारणी को सबकुछ जानने का हक है।मन में ही सोंच रही
थी।अतीत तारिणी का दुखमय है कैसे कहूँ...कैसे सैमना करेगी? एक न एक दिन समक्ष आना ही हैतो आज ही सही।
तारणी....नानी माँ आपकी आँखो में
आँसू।आपकी आँखो में आँसू नही देख सकती हूँ।अव कभी भी आपसे नहीं पूँछूगी।स्नेह के
हाथो से नानी माँ के आँसू पोछने लगी...केतकी ने स्नेह के हाथो से दुलार किया....तारणी
तू मेरे आँसू से भाभुक क्यों हो जाती है।अगर मैं आँसू की व्याख्या करने लगी तो
पूरा ग्रंथ लिख जायेगा।पहले से ही महान कवि जयशंकर प्रसाद ने आँसू के ऊपर काव्य
लिख ङाला है।दुनियाँ के छल से कैसे समझ पाओगी। आँसू जाल भी है...नीर भी...प्रीत
भी......शस्त्र भी.....ठग भी....मेरी एक ही सीख है जहाँ तुम आँसू को देखकर कमजोर
पङी सामने वाला विजयी हो जायेगा इसलिए तुम कभी भी आँसू के माया जाल में नहीं फँसना
है।18वाँ जन्मदिन है मत का अधिकार सरकार ने दे दिया है तो फिर मैं कैसे तुम्हारे
अधिकार से वंचित कर सकती हूँ।मैं सबकुछ बताऊँगी।पिता का नाम रघुवीर सिंह है।
तारणी ने अचम्भे से पूँछा....सच में पिता
का नाम रघुवीर सिंह है।
केतकी....आश्चर्य से क्यों पूछाँ?
तारणी....बस ऐसे ही।
नानीमाँ...तेरा नाम रघुवीर सिंह से जुङा
है पर तेरी सूरत देखना पंसद नहीं करता है।
तारणी....नानी माँ...क्यों?मैंने ऐसा क्या कर दिया?
केतकी ने तारणी को विस्तार से घटना चक्र
सुनाया।तारणी ने जब सुना दुर्भाग्य का वट्टा जन्म से लगा है तो पैरो के नीचे की
जमींन सरक गई।खुद को ऐसा महसूस कर रही है जैसे डोर से कटी पतंग डाल से टूटा पत्ता
सारे सपने एक पल में विखर गये। वादल तो छाये बिन बरसे चले जायें,फूल बिन खिले
मुरझा गये. वही हालत तारणी का था।अपनी दुर्भाग्य को धिक्कार रही थी... ये ईश्वर
मेरे साथ आपने ऐसा क्यो किया?वेटी को माँ से
जुदा किया,माँ की गोदी वो सारी खुशी मुझसे छीन ली।पिता के होते हुऐ भी पिता की
नजरों से दूर ।पिता का नाम मिलना था उस जगह नाम दिया अशुभ..दुर्भाग्य .....काँनो
में गूंज रहा है। नानी माँ ने आलगिंन लगा लिया। मेरी सुन्दरी की काया हो ...सब गुण
झलकते है ।
तारणी....नानी माँ नानी माँ....
नानी माँ....क्या हुआ?
तारणी.....नानी माँ ..मुझे छोङ कर कही मत
जाना।मैं अकेली हो जाऊँगी।पापा का दिया नाम अशुभ मेरा पीछा नहीं छोङेगा ,डर लगने
लगा है कही आपको खो न दूँ। मेरा नाम शायद ठीक ही रखा हैं,मैं किसी को खुशी नहीं दे
सकती हूँ।जो भी मेरे साथ या करीब रहता है,मेरे कारण ही उसके जीवन में विप्पत्ति
आती है। मैं ही उसके दुख का कारण बनती हूँ।नानी माँ मुझे ईश्वर ने जन्म कियों दिया?
नानी माँ....वेटी ऐसा मत कहो। भगवान की
कोई भी वस्तु वेबुनियाद वेमतलव नहीं होती ।भगवान ने इस संसार में जो भी बनाया उसका
कुछ न कुछ उद्देश्य अवश्य होता है। नीम का पेङ कितना कङवा होता है लेकिन उसके
कितने लाभ है। कङवा होके भी अपनी मिठास सी जगह बना लेता है। शहद कितना मीठा होता
है लेकिन मानव की वीमारी का कारण भी बन जाता है। मधुमेह से मानव की मृत्यु हो जाती
है। नीम कङवा होके मधुमेह को ठीक कर देता है।वेटी भगवान की वस्तु का पता नहीं है
,कब अच्छे गुण अवगुण बन जायें।कब अवगुण गुणवान बन जायें।कुछ पता नही है सबका अपना
अपना महत्व है।
तारणी...नानी माँ आप मुझे बताओ।कैसे अशुभ
को शुभ बनाऊँ।दुर्भाग्य को भाग्य बनाऊँ?
नानी माँ....वेटी तुझे अशुभ को अपने जीवन से मिटाकर
शुभ बनाना है। भगवान के आशीष की
देन है,कभी किसी का अहित नहीं कर सकती।सबके दुख हरने वाली है,जग तारणी है,जग के
दुख हरने वाली है।तू तारिणी तू तारिणीहैं।
तारणी..नानी माँ सच में जग तारणी हूँ।
नानीमाँ....हाँ तुझे जग तारणी बनना
है।मुझसे एक वादा करना होगा।
तारणी....नानी माँ क्या?
केतकी....इस दुनियाँ को दिखाना होगा।अशुभ
नहीं शुभ है।
तारणी...नानी माँ मैं आपसे वादा करती
हूँ।मै अशुभ नाम मिटा दूँगी।
नानीमाँ....बाते
बहुत हो गई..आज कालेज नहीं जाना?
तारणी....नानी माँ...हाँ जाना है।आज तो
क्लास में इम्पोडेट लेक्चर है।आज अगर मिस हो जायेगा तो फिर समझ में नहीं आयेगा।
शेष है.......
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