वक्त की नील को वरवाद न कर .....यह देखने में कि रंग की धार कैसी है? कुछ फलसा लिख ऐसा कि मुक्कमल जहाँ तेरा तलवदार हो जायें...वाह। की दाद में तेरे भी नजरदार हो जायें....गुजर गया वक्त रंग की धार देखने में...तेरा जीवन भी बिना किस्सा के न पढ सकें वो लिखावट रह जायें....
शनिवार, 31 मार्च 2018
लहरो को क्या ताँकना
कंगार पर खङे होकर लहरो को क्या ताँकना,होशलो की उङान को सपनो से क्या बाँधना,माझी सा हुनर हे तो मुकाम तो दो, पंखो को खोलकर उङान तो दो.....,एक नया इतियास को ......अपने नाम का मुकाम तो दो.....।
गुरुवार, 22 मार्च 2018
खून न पिघले वो पानी हैं
नरसंघार देखकर भारतियों का,
खून न पिघले वो पानी हैं।
हम तो सुरक्षित आवाद हैं,
जिनकी उजडी बस्ती हैं।
उनसें क्या लेना देना मेरा,
आने वाली खतरे की घंटी है।
आज उनके बुझे चिरांग,
कल क्या पता हमारी वारी हों।
नरसंघार सुनकर बहरे हुए,
इतियास दुहरा रहा पदचाप है।
जव जव ठण्डा हुआ खून,
तव तव विदेशी सिंगजा जकडा हैं।
आई सी आई ने भाप लिया हैं,
नरसंघार पर करते राजनीति हैं।
आम जनता भी सोई हुई हैं,
हम है सुरक्षित औरो से क्या नाता।
यही खामोशी ही है,
वढे शंकट की आहट हैं।
जाग जाओ सोने वाले ,
फिर रोओगे पछतावोगे।
इस वार आया गजनी,
अस्तत्व ही मिट जायेंगा।
एक छत्र होगा राज,
एक ही धर्म सबका होगा पतन।
समूह में होगा नरसंघार,
नारियों का होगा जौहर।
आत्मा होगी तार तार,
ऐसा दृश्य दुहरायेगा।
आरक्षण की ललक पाने को,
कोहराम खूव मचाते हों।
घाटी में काले झण्डे फहराते हों,
देश द्रोह नारे खूब लगाते हों।
कभी भारतिय होने पर भी,
इस नरसंघार पर उवाल लाओ।
चका जाम,काला शोक ,
शेरो सी दहाड दिखलाओ।
बतलादो विदेशी, नेताओ को,
जो खोये है हमने हमारा ही कतरा।
विगुल फूक दो देशद्रोह के खिलाफ,
जो ऐसी राजनीति करेगा,
वो सत्ता का अधिकार नहीं।
जो देशद्रोह के नारे लगायेगा,
उसका पण्डुचेरी में हो कालापानी,
ऐसा कठोर निर्णय हो पालन।
तव होगा भारत स्वाभिमान,
विषैले सर्प का कुचलो फन।
अव शांती नहीं उवाल लाना हैं,
देश की माँग ही नही अपनी आन है,
शोर्य दिखाने का आया मौका।
खून ठण्डा नहीं उवाल दिखाना है,
गीदड नहीं शेर की दहाड दिखाना हैं।
खून न पिघले वो पानी हैं।
हम तो सुरक्षित आवाद हैं,
जिनकी उजडी बस्ती हैं।
उनसें क्या लेना देना मेरा,
आने वाली खतरे की घंटी है।
आज उनके बुझे चिरांग,
कल क्या पता हमारी वारी हों।
नरसंघार सुनकर बहरे हुए,
इतियास दुहरा रहा पदचाप है।
जव जव ठण्डा हुआ खून,
तव तव विदेशी सिंगजा जकडा हैं।
आई सी आई ने भाप लिया हैं,
नरसंघार पर करते राजनीति हैं।
आम जनता भी सोई हुई हैं,
हम है सुरक्षित औरो से क्या नाता।
यही खामोशी ही है,
वढे शंकट की आहट हैं।
जाग जाओ सोने वाले ,
फिर रोओगे पछतावोगे।
इस वार आया गजनी,
अस्तत्व ही मिट जायेंगा।
एक छत्र होगा राज,
एक ही धर्म सबका होगा पतन।
समूह में होगा नरसंघार,
नारियों का होगा जौहर।
आत्मा होगी तार तार,
ऐसा दृश्य दुहरायेगा।
आरक्षण की ललक पाने को,
कोहराम खूव मचाते हों।
घाटी में काले झण्डे फहराते हों,
देश द्रोह नारे खूब लगाते हों।
कभी भारतिय होने पर भी,
इस नरसंघार पर उवाल लाओ।
चका जाम,काला शोक ,
शेरो सी दहाड दिखलाओ।
बतलादो विदेशी, नेताओ को,
जो खोये है हमने हमारा ही कतरा।
विगुल फूक दो देशद्रोह के खिलाफ,
जो ऐसी राजनीति करेगा,
वो सत्ता का अधिकार नहीं।
जो देशद्रोह के नारे लगायेगा,
उसका पण्डुचेरी में हो कालापानी,
ऐसा कठोर निर्णय हो पालन।
तव होगा भारत स्वाभिमान,
विषैले सर्प का कुचलो फन।
अव शांती नहीं उवाल लाना हैं,
देश की माँग ही नही अपनी आन है,
शोर्य दिखाने का आया मौका।
खून ठण्डा नहीं उवाल दिखाना है,
गीदड नहीं शेर की दहाड दिखाना हैं।
गुरुवार, 8 मार्च 2018
समाज दर्पण: पोषित अध्याय हूँ।
समाज दर्पण: पोषित अध्याय हूँ।: मैं बंधनो से श्रृजित, पोषित अध्याय हूँ। स्वयं में स्तम्भ, स्तम्भो का आधार हूँ। युग युग से सरोकार, मुखारित करती गाथा हूँ। मैं ना...
पोषित अध्याय हूँ।
मैं बंधनो से श्रृजित,
पोषित अध्याय हूँ।
स्वयं में स्तम्भ,
स्तम्भो का आधार हूँ।
युग युग से सरोकार,
मुखारित करती गाथा हूँ।
मैं नारी के ह्दय में ,
बसती प्रेम की परिभाषा हूँ।
विरल से विकराल,
शून्य से अन्नत हूँ।
शब्दो से परेह,
पूर्ण ममत्व हूँ।
स्वार्थ से निस्वार्थ,
ममता का सागर हूँ।
अपूर्ण से पूर्ण ,
श्रृष्ठी का संचालक हूँ।
मैं नारी के ह्रदय में,
बसती प्रेम की परिभाषा हूँ।
अधिकारो सें वंचित,
स्वयं अधिकारो से श्रृजित हूँ।
अवला से दोषपूर्ण,
सक्षम का प्रतिविम्व हूँ।
नारीत्व अवला पर प्रश्न,
आज उत्तरो की श्रृंखला हूँ।
आगम निगम को स्थापति,
सोर्य की विजय गाथा हूँ।
मात्रृत्व बन कल को उदय,
नारीत्व बन स्वयं को बिखराती हूँ।
मैं नारी के ह्रदय में ,
बसती प्रेम की परिभाषा हूँ।
शीतल अग्नि का समावेश,
नेत्रों से उजागर होती हूँ।
प्रेम से प्रफुल्लित ,
प्रेम ही बरसाती हूँ।
दोष, निःदृष्ठी उपहास,
वंश का विध्वन्स कराती हूँ।
नारीत्व के वल का वल,
नवीन संकल्पना का आगाज हूँ।
दुःचारी से दोषित धरा,
पुःउत्थान का स्थापना हूँ।
शून्य और अन्नत का विम्व,
मैं नारी में बसता प्रेम हूँ।
मैं नारी के ह्रदय में,
बसती प्रेम की परिभाषा हूँ।
आँखो में सम्मान तो हो
चंद शब्दो से सम्मान नहीं,
आँखो में सम्मान तो हो!!
रूढवादी सोंच का बंधन नहीं,
सोच से सोच का समागम हो!!
किताब के दायरे में नहीं,
खुद एक किताब बनने तो दो!!
ख्आब देखने दो तोडो मत,
होशला पस्त नहीं ऊर्जा भरने दो!!
कोई भी डगर मुश्किल नहीं,
हर पथ पर कीर्त बनने तो दो!!
कमज़ोरी का आंकलन नहीं ,
वीरागंनाओ का संचार भर दो!!
पक्षपात नहीं भेदभाव से उच्च,
संकल्पनाओ का विस्तार करने दो!!
आज़ादी के पंखो में बेड़ियाँ नहीं,
होशलो की उड़ान तो भरने दों!!
हर दिशाओ की सैर पर अंकुश नहीं,
दिशाओ को इतिहास बनने तो दों!!
आज के दिन सिर्फ़ सम्मान नहीं,
हर दिन सम्मान को बनने तो दो!!
दिन रात में विचरण निडर करें,
ऐसी स्वाभिमान का अधिकार हो!!
चंद शब्दो से सम्मान नहीं,
आँखो में सम्मान तो हो!!
आँखो में सम्मान तो हो!!
रूढवादी सोंच का बंधन नहीं,
सोच से सोच का समागम हो!!
किताब के दायरे में नहीं,
खुद एक किताब बनने तो दो!!
ख्आब देखने दो तोडो मत,
होशला पस्त नहीं ऊर्जा भरने दो!!
कोई भी डगर मुश्किल नहीं,
हर पथ पर कीर्त बनने तो दो!!
कमज़ोरी का आंकलन नहीं ,
वीरागंनाओ का संचार भर दो!!
पक्षपात नहीं भेदभाव से उच्च,
संकल्पनाओ का विस्तार करने दो!!
आज़ादी के पंखो में बेड़ियाँ नहीं,
होशलो की उड़ान तो भरने दों!!
हर दिशाओ की सैर पर अंकुश नहीं,
दिशाओ को इतिहास बनने तो दों!!
आज के दिन सिर्फ़ सम्मान नहीं,
हर दिन सम्मान को बनने तो दो!!
दिन रात में विचरण निडर करें,
ऐसी स्वाभिमान का अधिकार हो!!
चंद शब्दो से सम्मान नहीं,
आँखो में सम्मान तो हो!!