मैं बंधनो से श्रृजित,
पोषित अध्याय हूँ।
स्वयं में स्तम्भ,
स्तम्भो का आधार हूँ।
युग युग से सरोकार,
मुखारित करती गाथा हूँ।
मैं नारी के ह्दय में ,
बसती प्रेम की परिभाषा हूँ।
विरल से विकराल,
शून्य से अन्नत हूँ।
शब्दो से परेह,
पूर्ण ममत्व हूँ।
स्वार्थ से निस्वार्थ,
ममता का सागर हूँ।
अपूर्ण से पूर्ण ,
श्रृष्ठी का संचालक हूँ।
मैं नारी के ह्रदय में,
बसती प्रेम की परिभाषा हूँ।
अधिकारो सें वंचित,
स्वयं अधिकारो से श्रृजित हूँ।
अवला से दोषपूर्ण,
सक्षम का प्रतिविम्व हूँ।
नारीत्व अवला पर प्रश्न,
आज उत्तरो की श्रृंखला हूँ।
आगम निगम को स्थापति,
सोर्य की विजय गाथा हूँ।
मात्रृत्व बन कल को उदय,
नारीत्व बन स्वयं को बिखराती हूँ।
मैं नारी के ह्रदय में ,
बसती प्रेम की परिभाषा हूँ।
शीतल अग्नि का समावेश,
नेत्रों से उजागर होती हूँ।
प्रेम से प्रफुल्लित ,
प्रेम ही बरसाती हूँ।
दोष, निःदृष्ठी उपहास,
वंश का विध्वन्स कराती हूँ।
नारीत्व के वल का वल,
नवीन संकल्पना का आगाज हूँ।
दुःचारी से दोषित धरा,
पुःउत्थान का स्थापना हूँ।
शून्य और अन्नत का विम्व,
मैं नारी में बसता प्रेम हूँ।
मैं नारी के ह्रदय में,
बसती प्रेम की परिभाषा हूँ।
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