शनिवार, 18 नवंबर 2017

होती साकार आशायें

सोशल मीडिया हृदय को गति दे,
वो जीवन दायनीय नेट संचार हे।
सूखे पढे वृक्षो पर कली खिले,
उम्मीद चमकाने का श्रोत है।।
दाम दण्ड भेद से सोशित मनु,
जन जन तक सम्पर्क सुलभ है।
बस एक सवूत ही आधार है,
विद्धुति प्रकाश विखेरता अद्भुत है।।
आम की भी आशा खाश हे,
दृश्यम से शुशोवित अभिनेता हे।
रुप ओर अदाओ का समावेश,
घर 2 बसता अभिनय का संगम है।।
चुप्पी और लाज को छोडकर ,
हृदय में गुलाटी मारती कुंज है।
छुपी प्रतिभाओ का होता आदान प्रदान है,
मिला खुला रंगमच अद्भुत खिलती कलायें है।।
सिसकती कोसती खो जाती वास्तविकता,
नेता, अभिनेता, गायक, कवि इत्यादि।
शिक्षा,सास्कृतिक,क्रयाशीलता घुमडती,
सबकी आशाओ में महकती मेघ हैं।।
प्रेम के अंकुर को फलाती राश है,
एक छोर से उसपार छोर तक जाती।
अभिवेदना विचारो का होता समागंम है,
भिन्न देश,भिन्न सास्कृतिक होता पाणिग्रहण है।।
विवेक,चेतना, रहस्यमय, जागृति होती आत्मा,
स्वंय चिन्तन मनन सोर्यमय प्रज्ज्वलित होती।
साक्ष्य प्रमाण की तय तक जाती ज्ञानेद्रियाँ,
स्वयं विकल्पों से  परेह लेती फैसला।।
हानिकारक.......
वैठे है मस्तिष्क को शून्यहीन की चाल में,
मस्तिष्क पर पंग डालू करु नियंत्रण में।।
जैसा मैं चाहूँ जी हजूरी कराऊँगा।
न दिखलाऊँगा फिर भी मन भटकाऊँगा।।
देश के देश में सपोले को जगाऊँगा, 
वैठकर मैं वंदो को वंदो से झगडाऊँगा।।
मस्तिष्क पर पंग है मेरा जिहाद रचाऊँगा,
देश को देश के वंदो  से ही लडाऊँगा।।
मस्तिष्क में पडौसी षड़यंत्र रचायें वैठा है,

व्लू व्हेल गैम के पीछे शादिश छिछोरी है।।
आत्मदाह का खोपनाक खेल विकराल हो,
मानव वम्व वनाके  स्लीपल सैल वनादे।।
देश भी अपना देशवाशी भी अपने है,
अपनो में जघन्य खेल खेलता दुशाशी हैं।।
वाल्यकाल की अवस्था पर पानसाईड दुराचारी है,
अवस्था चायें कोई भी हो विचलित की भम्रमारी है।।
विश्वामित्र की तपस्या में विध्न अतियारी था,
मानव की चेतना पर यह पहरा भटकाता है।।
रिश्तों की मर्यादाओ को छिन्न भिन्न कर जाता है,
विश्वास पर प्रश्न चिन्ह घृणाशील बना जाता है।।
विचलित क्यों होते हो?भ्रम के अधीर क्यो होते हो?
यह तो व्रह्मा ने  काया में गुण अवगुण समावेश है,
हर वस्तु में दो गुण एक में ही समावेश है।।
जिसका अनुसरण कर लोगे वही निखर जायेंगा,
ईख की परिभाषा से पारितोषित करते है।
ईख से निकले रस से वनी मिठाई का उपभोग करो,
ईख से निकले रस से वनी मधुशाला देह त्याग करो।।
सोचो सोचो......निर्णय है तुम्हारा....
हम तो एक ही वात जाने है,
शोसल मीडिया हृदय को गति दें,
वो जीवन दायनीय जीवन संचार है।।
सरल सुगम आदान प्रदान करे ,
स्वप्न से साक्षातकार करे नेट संचार है।।
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गुरुवार, 21 सितंबर 2017

एक पल ठहरी नज़र

एक पल ठहरी नज़र मुझपर मैं ढूँव गया उनकी नज़रों में,
खुद का पता भूला  ढूँडता फिरता उनका पता गलियों में.!!
मंज़िल तो खुद का भूल वैठा हूँ उनको अपनी मंज़िल बना वैठा हूँ,
वक्त की रफ्तार बड गई है या मेरे सब्र का इंतहा ले बैठा हूँ!!
खुद का पता भूला.......पता गलियों में
फिरती है झलक बस उनकी मेरी आँखो में अपना नाम भी भुला वैठा हूँ,
मिल जायें एक वार पूछूँ तो ऐसा क्या किया जादू तेरी जादू में खो वैठा हूँ!!
खुद का पता भूला .....पता गलियों में
खिलते ओठ सरमाती अदा जुल्फो की बरसती घटा यादें ही याद कियें वैठा हूँ,
उतरता नहीं उसका असर दवा उसी से लेने की दुआ किये वैठा हूँ!!
एक पल ठहरी नज़र मुझपर मैं ढूँव गया उसकी नज़रों में....
खुद का पता भूला ढूँडता फिरता उनका पता गलियों में....

बुधवार, 13 सितंबर 2017

विधा....कुण्डलिया
लिखवत मिश्रण भाष्य,नीर भयो शंरवत।
हिन्दी विदेशी घुलकर,बदलो काया कल्प!
बदलो काया कल्प प्यास में कौन सो उम्वीद।
शान से चलें चौडी छाती लघु भयो गम्भीर!!
विदेशी के लपेङे में शंरवत अंजुमन की शान।
प्यास में करें त्रृप्त शंरवत नहीं नीर की आस।।
  
आकाँक्षा जादौन

मंगलवार, 29 अगस्त 2017

'प' का देखो कारनामा

'प' का देखो कारनामा,
जब2 हद से गुजरता है,
आखों में आसू और,
हृदय पर प्रहार करता है!!
आधा प और हे घातक,
क्या 2कौतक करवाता है!!
प्यास लगें जन सबको,
जन सग्राम करवाता हैं!!
राजा रंक हे अधीर सब,
नत मस्तिक झुकवाता हैं!!
प्यास की ऐसी तृष्णा,राजा को
रंक चौखट पर झुकवाता है!!
प्यार का ढाई आक्षर क्या2,
अपनो से ही विद्रोह करवाता हैं!!
भूल के कर्मानंद होके बसीभूत,
प्यार का रोगी जन बन जाता है!!
छिङ जाते हे युद्ध महा संग्राम,
लाशो के अम्बार लगवाता है!!
कुल के कुल मिट जाते हैं सब,
प्यार की गाथाये अमर करवाता हैं!!
अब एक कढी और जुङी है,
प्याज भी संग्राम करवाता हैं!!
नेताओ का बनके मुद्दा देखो?
सत्ता चौकीदारो को गिरवाता हैं!!
मुद्दा लेके अखाङे सज जाते है,
गिराके खुद राजा बन जाता हैं!!
आधा प जख्मी शेर शा घातक,
खूखार' प 'बन तब जाता हे !!
प का देखो कारनामा,
जब2 हद से गुजरता है!!
आखो में आसू और,
हृदय पर प्रहार करता हैं!!

जिदंगी की रेल हे रिस्तो का मेल हैं

अजब ये खेल हे गजब ये खेल है!
जिदंगी की रेल हे रिस्तो का मेल हैं!!
प्रिया और लाल में कौन करीब हैं!
असमज्स्य में सबकी कैसी प्रीत है!!
जिंदगी का नया पङाव अंजान  है,
थाम के हाथ होता संगम हैं!!
छोङ के मायके की किलकारी,
जिदंगी के बुनते ताने बाने हैं!!
नई पहल को पल पल समझना ,
मन को एक डोर से जोङना है!!
प्रिया की कोई अनछुई बात भी,
जख्म की बजह बन जाती है!!
धीरे धीरे ये तकरार जाने कब,
खुसियो की चाबी बन जाती हैं!!
आगन में आती हे जब खुशी,
मात्रतृत्व का तब सुख देती है!!
वेटे की अठखेली में हम तब,
परम सुख में डूब जाते हैं!!
लाल की हर आकाक्षो में हम,
नत मस्तिक होकर जीते जाते है!!
बचपन में कोई भी बात हमको,
जख्म नहीं सुख की अनुभूती करती है!!
लाख शिकायते आती हे तब,
मेरे लाल को यूही करते बदनाम है!!
पत्ती की अन्जानी बलाओ से बात,
हृदय पर जख्म करती जाती है!!
घर से बाहर जाते हे काम काज ,
डर लग जाता हे अंजानी अनीती से है!!
प्रिया और लाल की आँख मिचौली में,
लाल जीतता हे तो जिया खुश होता हैं!!
समय का चक्र बढता जाता है,
प्रिया का रस गुण बन जाता है!!
लाल बाते छुपाना सीख गया ,
झूठ बोलके बहलाना आता हैं!!
माँ फिक्र करती दिन रात है,
लाल को माँ की स्नेह की नहीं चिंता है!!
प्रिया को अब मेरे झीक पर भी,
डाँक्टर के पास ले जाते है!!
हो अगर कोई पीङा अब तो,
रात जाग कर मेरे साथ काटते है!!
जो चोट देती हे मुझको वो काम,
अब नहीं करते करना चाहते है!!
मेरे कहने से पहले ही सब अब,
इशारो में ही समझते जाते है!!
लाल हो रहा दूर मेरे खेल में,
ममता में कोई नहीं कमी है!!
दुनिया के रंग में रच गया लाल,
आई बहु तो और भी रंग बदला है!!
माना पत्नी संगिनी तुम्हारी है,
कर्तव्य हे सुख दुख को साँझा करना है!!
जितना हे फर्ज लाल का निभाता हैं,
बनता बुढापे की ज्योति लाल है!!
निकळता कोई जालिम लाल है,
तो बीतता बुढाप बृद्धा आश्रम है!!
पर प्रिया बुढापे में हम सफर है,
हम हृदय हे काया रूप प्रिया हैं!!
ज्योति बनाया हे लाल को हमने,
कब छोड दे साथ हमारा है!!
ममता फिर ही निस्वार्थ माँगती,
लाल की सलामत की दुआ हैं!!
प्रिया से बढा न कोई हे हमराज है,
बुढापा देता हे सबसे एसहास है!!
अजब ये खेल हे गजब ये खेल है!
जिदगीं की रेल हे रिस्तो का मेल है!!

बुधवार, 16 अगस्त 2017

कहने को आजाद हूँ,

कहने को आजाद हूँ,
मगर आजाद हूँ कहाँ?
नापने को आकाश हैं,
मगर जमीं का मोहताज हूँ!!
ये कैसा पक्षपात हैं?
आरक्षण की भेट चङता,
सामान्य युगुल समाज है!!
कहने को आजाद हूँ,
मगर आरक्षण विष हैं!!
आज भी हम पर,
कोई करता राज है?
घूस का महाजाल हैं,
हर तमगा बेहाल हैं!!
कहने को आजाद हूँ,
मगर घूस महाजाल है!!
धर्म की औट कर,
दंगा फसाद हैं करते?
सत्ता की रंगरलियाँ ,
जनता पर प्रतिघात करते!!
कहने को आजाद हूँ,
मगर धर्म ही कहर हैं!!
अपृश्यता का बोलवाला,
गरीब का भी कोण भाया?
बाहुवली करते हे राज,
कानून का करते परित्याग!!
कहने को आजाद हूँ,
मगर वाहुवली का राज हैं!!
आंतक का नया हे रूप,
नक्सल आतकवादी कहर हैं?
कब जन बने शमशान ,
हर पल डर का साया है!!
कहने को आजाद हूँ,
मगर दशसत का गुलाम हूँ!!
नारी की दैयनीय दशा ,
हर वर्ग पर प्रहार है?
दहेज भूड हत्या करते पाप,
अश्मत पर होते प्रहार है!!
कहने को आजाद हूँ,
मगर नारी उपभोग है”!!
गरीब की आवाज लुप्त,
अमीन की आवाज झनकार?
पैसे का रूतवा हे आज,
कानून को करे विमुख!!
कहने को आजाद हूँ,
मगर अमीरो का राज हैं!!
अन्न राज हे किसान,
कर्ज बना जी जंजाल हैं?
आत्मदाह करते हैं किसान,
भूमि अधिग्रहण की फास!!
कहने को आजाद हूँ,
मगर किसान बेहाल है!!
कहने को आजाद हूँ,
मगर आजाद हूँ कहाँ?
नापने को आकाश हे ,
मगर जमीं का मोहताज हूँ!!
(आकाँक्षा जादौंन)

मंगलवार, 1 अगस्त 2017

गाँव की छवि

पौ फटते ही पंछीसुर में राग सुनाते है,
खेत खलियानो से खुशबू मंद2 आती है!!
बीगी 2 खुसबू की दस्तक मन को हरसाते है!!
गाँव की छबी मनोरम मन को मोहते है!!
हर घर आगन में तुलसी का पौधा औषधि की याद दिलाती है!!
पंचायत का लगता जमघट भेदभाव भूलजाते है!!
संस्कृति की कल्पनाओ का साक्षातकार रूब रूह देखते है!
धोती कुर्ता सिर पर पंगढी और पाव में जूता देखते है!!
सिर पर पल्लू साडीं में लजाती बलायें लाजबंती देखते है!!
मिट्टी में धमाचौकडी करते बच्चे खूब हरसाते है!!
पेङो से लहराती हवा और कोपले पीयु2  धून सुनाते है!!
कड कड से आती हे सुंगन्ध छाप हृदय में बस जाति है!!
दूध दही छाँच की सरिता घर आगन बहती जाति है!!
आ जाये कोई शहरी बाबु तो दामाद शी खातिर पाते है!!
मातम हो या खुशिया भाईचारा हर बिधि को मिल वाँटते है!!
सध्या बाती की आवाज भी मिठास रस घोलती है!!
खुले आकाश में सोना तारों से बतलाना चाँद को देखते है!!
दादी नानी से किस्से कहाणी सबको खूब भाते है!!
गाँव के बिना भारत की किलकारी अधूरी है!!
खेत खलियान के बिना जीवन का आधार अधूरा है!!
किसान तेरे बिना हर प्राणी ही अधूरा है!!
तुझे करू बंदना बार बार तुझ बिन सब हे सूना सूना,,,,,,!!
(आकाँक्षा जादौन)www.samajakanksha.com

रविवार, 14 मई 2017

माँ को प्रणाम

इक दिन क्या सौ दिन भी कम पढ़ते हैं,
माँ के अभिनंदन में जितना कहो कम है!!
सागर सा आचल हैं आसमाँ सा प्यार,
स्वर्ग सा एहसास हैं सुखमय सा संसार!!
इक दिन क्या सौ दिन भी कम पढ़ते हैं,
माँ के अभिनंदन में जितना कहो कम हैं!!
रक्त से बना हूँ दुग्ध से सीचा है मुझको,
गीले में सोकर रूखे में सुलाया है मुझको!
मल मूत्र को धोया सीने से लिपटाया मुझको!!
अश्क की वेदना करूण  पुकार माँ ने समझा मुझको,
दर्द से कहरा रही माँ चोट लगी है मुझको!
इक दिन क्या सौ दिन भी कम पढ़ते हैं,
माँ के अभिनंदन में जितना कहो कम है!!
निकले कभी हाट पर तपी खुद आँचल की छाँव मुझको!
हट कर मे किये ख़र्च खुद ली न हो बरसो से परिधान!!
पेट काटकर अपना भाग भी अर्पित मुझको!!
मैं आगे आगे माँ पीछे पीछे कैसे कैसे मैने भगाया!
खाने की रुचिकर कब कब रसोई में बदलाया!!
मैं माँ के लिए प्यारी प्यारा दुलारा और कोई न भाया!!
मनमोहिनी बातों में माँ को कैसे करता सम्मोहित !!
अपनी तिजोरी के सिक्के मेरे लिए बन गये मोती!!
नादानियाँ मेरी माँ को देती कैसी मुस्कराटे!!
रात को जागजाग कर मेरे साथ अनौखी करे तपस्यायें!!
नीद से जो होती आँखे बंद चाय झट से माँ बनाती!
जो भी पाया माँ का आसीस बन कर ऐसा छाया!!
मैं क्या दे पाऊँगी उम्र कम माँ का प्यार बहुत गहराया! 
इक दिन क्या सौ दिन भी कम पढ़तें हैं!
माँ के अभिनंदन में जितना कहो कम हैं!!
ईश्वर का रूप माँ तुझमें समाया हैं,
मेरी हर नादानियाँ को माफ़ कराया हैं!

रविवार, 16 अप्रैल 2017

वजूद

मेरे   वजूद पर अंकुश ,    
लगाने का सुनाते है फरमान!!
सांस लेने पर प्रतिबंध जैसे,
संसार पर हम है भार!!
न लव्ज न सोंच न स्वप्न,
विन आत्मा है पाषाण!!
लेखक की आत्मा पर प्रहार,
खुद के होने पर लगता ?
कागज़ बिन कलम अंधूरे,
जैसे सागर बिन नीर!!
अरदास विन रघुराज,
जैसे नैना विन सपना!!
लेखक विन इतियास,
शब्द ने दिया है प्रमाण!!
कौन थे रघुराज राम ,
रामायण है साक्ष्य प्रमाण!!
न होते जो तुलसीदास ,
घर घर कैसे होता संत्कार!!
वजूद को विराम देने से पहले,
खुदके अभिनय का करो दर्शन!!
और माँगे तुमसे तुम्हारा वजूद,
तव कैसा लगता है प्रतिघात!!
लेखक बनाना उसका है हक,
उसके हक़ पर किया कैसा वार!!
लेखक के नैनो की धार में छुपी,
राम के संकल्प पर प्रतिघात!!
जिसपर बरसाये अपना अमृत,
उसपर होता है लेखक का हक!!
न कभी खुदसे लिखने का हुनर ,
राम ने दिया है हमको यही दान!!
उसकी नज़र है तव ही मेरी कदर,
इस कदर  को वेकदर का नहीं हक!!
ज़िंदगी जीने का सलीका दिया,
अपने रहम से हमको अपना लिया!
किसी के वजूद को वदलने से पहले,
एक वार खुद के दर्शन कर लेना!!
जो हिदायत हमको दी है ऐसी,
ऐसी हिदायत देने वालो की नहीं कमीं!!
जव तक चायेगे राम तक चलेगी कलम,
लब्ज भी उसके सोंच भी उनकीं,
हमतो एक मात्र जरिया है !!
चायेगे राम तब तक चलेगी कलम!!!

शनिवार, 15 अप्रैल 2017

ked kr lo

ठहर जायें नज़र ये इल्म जानती हो..
हो जायें काफिर ये कशिश जानती हों..
तेरे दरिमियान आँके सुध भूल बैठा हूँ,
ठहरी नज़र है जग भूल वैठा हूँ!!
पहले विंदाश अलबत्ता परिदां था,
तेरी मुडेंर का रहनुमा परिदां हूँ!!
तेरी एक झलक का अक्स ढूँडता हूँ,
वार वार बस तुझमें ही तुझको ढूँडता हूँ!!
ज़िंदगी क्या है?आज सवव जानता हूँ,
तुझ विन अंधूरी किताव हिस्सा मानता हूँ!
तू हुई मेरी मंजिल....मैं तेरा राही.....
तुझसे ज़िंदा हूँ ......मैं तेरा राही...
तलब किया इजहार किया सौ वार कहाँ,
तेरी खामोशी वार वार हाँ की तरफ़ जायें!
लव्ज को इजहार करने का फरमान दो,
मैं व्याकुल हूँ सुनने  का रसपान दों!!
मुस्कराके चली जाना दूर से पलट जाना,
तिरछी नजरों से बिन कहें हाल बयाँ करना!
खामोशियो में तेरा आशिकाना पंसद हैं,
शकून  मिल जायें बस लव्जो हाल बयाँ कर दो!
इस पंरिदो को अपने पिजडे में ग़ुलाम कर लो,
उमर भर तेरी छाँव का रहनुमा पंरिदा रहूँ!!
बस और क्या?
इस हस्ती को अपनी हस्ती में शामिल कर लो!!
बस और क्या?
इस हस्ती को अपनी हस्ती में शामिल कर लो!!
तू ही मेरी मंजिल....मैं तेरा राही...
तुझसे ही ज़िंदा हूँ...मे तेरा राही...

रविवार, 13 नवंबर 2016

राजनीति जाल

कीर्तिभान  जिन्दावाद ... कीर्तिभान  जिन्दावाद की आवाज़  वातावरण में गूँज रही थीं ..... फूलों के हार कागज़ से बने फूलों के हार से गर्दन झुकी जा रही थीं पर फूलों की माला एक के बाद एक गले में  पड़ती जा रही थीं। पटाखो की लड़ी पर लड़ी चलाई जा रही थीं। मिठाई से एक दूसरे के मुँह मीठा किया जा रहा था। दूसरी वार प्रधान पद की वहुविजयी की ख़ुशी जो थीं। जनता जनार्दन ने बहुमत के साथ विजयी जो बनाया था.दूसरी वार जीतना पांच साल के कामकाज का प्रतिफ़ल होता है। यह सावित करता हे कि  जनता की कसौटी पर  खरा उतरकर  दूसरी वार जीतकर कीर्तिभान ने विपक्ष को जता दिया कि जनता ने कियो  चुना है ?जनता के लिए और परिवार के लिए हर्ष और उल्लास का पर्व था। घर पर अभिनन्दन के लिए राह निहारी जा रही थीं। वोट की गिनती के वाद वाहर का नजारा था, विजयी घोष के रथ रूपी जनता के साथ ट्रेक्टर में सवार हो कर घर की तरफ़  काफला   चल पड़ा। कीर्तिभान के भाई ने  वैगनार गाड़ी में चलने क़ो कहा,"कि विजयी की रात हे ट्रेक्टर में बैठकर जाना ठीक नही हे ",विपक्ष पर हार का सदमा है कोइ अप्रिय घटना क़ो  निमन्त्रण न दे दे। इतना समझाने के वावजूद भी कीर्तिभान न माने और कहाँ ,'ये मेरी जीत अकेली नही हे ग्रामवासी की जीत है, हम ग्रामवासी के साथ जायेगे और  काफले के साथ चल पडे।
                        रात अपने आँचल में सितारे के जगमगाते  फूलों  की छाव सबके ऊपर बरसा रही थीं ,किसी से कोई वैरभाव नही सबपर घटता हुआ कृष्ण पक्ष का  चाँद शीतलता दे रहा था। ऊवड़ खावड़ जगह जगह गड्ढे रेगरेग कर चलता ट्रेक्टर ट्राली में बैठे ग्रामवासी  की कसरत खूब हो रही थीं ,गड्डा आता तो 6 इच जितना ऊपर उठ जाते फिर धड़ाम से नीचे आ जाते ,ट्रेक्टर में बैठकर सफ़र का रोमांच अद्भुत है ,हिलोरे खाती नाव में बैठे ऐसा एहसास  ट्रॉली में अनुभव होता है जो कभी नाव में बैठे ही न हो उनके लिये होले होले धीरे धीरे झूले में झूलने का एहसास का  अनुभव किया जा सकता है। चालक ने स्थाई रास्ता न जाकर दूसरा  कच्चे रास्ते से ले जाने लगा,शंका की दृष्ठी से सबने एक साथ एक स्वर में प्रश्न करने लगें ?काये इधर से ले जा रहे हो ?चालक ने उत्तर दिया ,"तुम सब तो पीके मस्त मल्हार गान लगें हो ,काऊ बात की चिता है ?हमसे बड़े भइया ने दूसरे रास्ते से आने की कही है,बात कह ही रहे थे कि सामने से बेगनार आती देखी जो पहले निकल गई थीं रास्ते पर कोई घात तो न लगाये हे ?जो शंका थी अनयास नही थीं।बड़े भईया ने धीरे स्वर में  कहा ,"कीर्तिभान अब तुम हमारे साथ चलोगे. स्तम्भ पूरी गेंग और हसला के साथ घात लगाये बैठा है ,ये रास्ता ख़तरे से भरा हे ,तुम सब इस रास्ते से चलो हम भी साथ चलते हे ,,जो मल्हार गायें जा रहे थें, सब चुप हों गये ,जैसे साप क़ो देखकर चुप्पी साध लेते हे। धीरे धीरे ट्रेक्टर अपनी मन्जिल पर पहुँच ही गया। स्वागत से जायदा स्तम्भ की हार के चर्चे कहाँ ?किस किस के साथ घात लगाये था। घर वालों ने ज़ोर दार स्वागत किया ,आख़िर दूसरी वार बहुत अंतराल से विजयी का तिलक जो हुआ था,,,... पूरी रात बातो में काना फूसी में हार की मज़ाक नाटकीय अभिनय प्रस्तुती में ही बीत गई।

                 सुबह होते ही पूरे ग़ांव में घूम घूम कर जुलूस निकालने की तैयारी ज़ोर सोर से होने लगीं। बड़े बुजर्ग ने रात  अनहोनी घटना से बचके निकल आने के कारण जुलूस न निकालने की सलाह दी ,,,पर नये ख़ून की पीढ़ी नये उवाल कहा मानने क़ो तैयार थे ,ढोल नगाड़े पटाख़े  डीजे साउंड सब सजा लिया था ,,,,इस वार जुलूस शानदार होगा ,पिछली जीत के मुकाबले इस वार भारी बहुमत से विजयी हुये है। बढ़े बुजर्ग की सला मसुवरा को बन्दिश समझते हे ,दुनियां क़ो समझने का तजुर्वा और नई सोंच मिलती हे तब नवप्रकाशित उज्ज्वल भविष्य निर्माण होता है ,बिना एक को साथ लिये अधूरी शिक्षा के समान हे। यहाँ पर भी बड़े बुजर्ग की बात क़ो नज़र अंदाज किये विजयी घोष का उत्थान दिखाने पूरे ग़ाव में चल पड़े,....कीर्तिभान जिन्दावाद,,,,,,जव तक सूर्य चाँद रहे तब तक  कीर्तिभान का नाम रहेगा,,,,,,,जोरसोर से डीजे के साउंड पर  नाचते गुलार उड़ाते जा रहे ,महिलाये  पुरूष फूलों की मालाओं से अभिनन्दन कर रही  हे। चारों तरफ़ विजय घोष के नारों से गुजयवान वातावरण था ,जव पास में स्तम्भ का घर आया तो नये यवुकों ने चिढ़ाने के उद्देश्य से ज़ोर ज़ोर से गले की जितनी क्षमता थीं उस क्षमता से नारे लगाने लगें अब तो नारे के वोल भी बदल गये थे ,,,,,कीर्तिभान की कीर्ति फैल रही ,,,,स्तम्भ चला शून्य की और,,,,, ख़ुले शब्दों के प्रहार से हार के आक्रोश को ये शव्द भड़की आग में घी का काम करने लगें जिससे आग और भड़क गई,,,,,स्तम्भ घर में ही था ख़ुशी के माहौल में अचानक मातम छा गया,,,स्तम्भ आँखों में हार का प्रतिशोध  लिये सब्जी काटने वाला चाकू लिये चहरे को गमछे से ढक लिया भीड़ क़ो चीरते हुये ,,,चाकू को कीर्तिभान के पेट में भोंक दिया ,,और वार कर पाता इससे पहले आस पास समर्थन के लोगों ने स्तम्भ को दबोचा पर बचके भाग गया पर जाते जाते गमछा खुल गया और पूरे  काफले में सोर हो गया ,,,,,,,,,,स्तम्भ ने कीर्तिभान को चाकू भोंक  दिया।                  
                   पेट में चाकू गड़ा हुआ देखकर जानकारों ने किसी क़ो भी छूने से रोका और निकालने से भी ,,,,ताकि डॉक्टर ऑपरेशन से निकाल सकें .असहनीय दर्द की पीड़ा और रक्त रिसरिस कर निकल रहा था खून से लथपथ था ,अगर चाकू निकल लेते तो रक्त क़ो रोकना असम्भव और बचाने के सारे उपाय निष्फल हों जाते ..तत्काल एक पल को गवाये हॉस्पीटल ले गये , परिवार के सदस्य औऱ हितेशी  शोकाकुल में डूव गये,,,,कीर्तिभान की भागिनी ह्र्दयथा  और माँ अचेत अवस्था में पहुँच गई... जब ये खबर सुनी।हास्पीटल में डाँक्टर ऑप्रेशन थ्रेटर में सर्जरी के दुवारा चाक़ू निकालने की   कोशिश कर रहे है .वाहर परिवार के सदस्य और हास्पीटल के वाहर जनता का मेला जुड़ा,सुभ चिंतक ठीक होने की कामना कर रहे तो कोई मुस्कान का मखोटा पहने जलन की पीड़ा क़ो शांत होने का  मौका मिला उसका पूरा फ़ायदा उठा रहे थे ,इस कामना से कि अब तो मौत की खबर ही मिले। स्तम्भ बिल्कुल सही किया है जायदा ही घमंड आ गया था ,प्रधान क्या बन गया अपने आप क़ो राजा समझने लगा है , सीघ्र से सीघ्र मौत की खबर सुनने क़ो मिले तो हमें सकून मिले,जो बेरी थे अच्छे बनने का ढोंग करते थे वो सव यही दुआ मांग रहे थे। स्तम्भ फ़रार हों गया जिसको पुलिस हर उस जगह तलाश कर रही जहाँ होने की उम्मीद हो सकती थीं।
                            ह्र्दयथा  को जब होश आया तो हास्पीटल को जाने लगी जव अचेत हुई तो घर पर रोक रखा था ,व्याकुल थीं और सहमी दूसरी तरफ़ ख़ुद क़ो होशला भी दे रही थीं अगर में हिम्मत खोने लगीं तो सवको कौन सवालेगा ?भानजी हमेशा मेरे हौशले और हिम्मत की सहारना करते थे पूरे परिवार क़ो  एक सूत्र में पियोंके रखा हे कितनी ही मुश्किल कियो न आ जाये अपनी हिम्मत न खोना क्योकिं एक बात हमेशा कहते थे जिसने मुश्किलों के समय मस्तिष्क क़ो शून्य किया तो जीत की उम्बीद दिखने से पहले ही हार हों जायेगी ,मस्तिष्क क़ो क्रियाशील बनाके रखा तो कोई ना कोई उपाय जरूर निकलेगा ,,,,,,,ऐसी सारी बातें मस्तिष्क में फिल्म की तरह चलने लगीं।
                        पाँच साल पहले की यादों में चली गई ,जव बिना प्रधान पद के रहते ग्रामवासियो की सेवा करते रहते। रात क़ो गाँव में कोई भी बीमार हो जाता या किसी भी तरह की परेशानी हों तो बिना कुछ लिये मदद करते जैसे कि ट्रेक्टर की मदद से हास्पीटल पहुँचा देते ,पैसे न होते तो पैसे की मदद कर देते ,वेटियों की शादी  में सिलाई मशीन उपहार के रूप में देते ,बहुत जायदा गरीव हे तो दावत का खर्च भी उठाते ,गांव की जनता इन्ही अच्छाई के कारण चहेते बन गये थे। भविष्य रूप में स्तम्भ प्रधान था उसके अनैतिक व्यवहार के कारण जनता नकार रही थीं। राशन आता तो उसकी काला बाजारी कर देता एक चौथाई लोगों क़ो ही मिल पाता ,घास लेट और चीनी के दर्शन तो तीज़ त्यौहार पर ही हों पाते .गांव विकाश के लिये जो जो पैसा आता वो पैसा अपने महल बनाता ,कामकाज एक चौथाई ही करता सरकारी कर्मचारी क़ो घूस देकर सब मामला शान्त कर देता ,एक साल से कोई काम नही किया आने वाले चुनाव के लिये पैसा जमा करके रखा। ग्रामवासी इस प्रधान से तंग आ चुकी थीं क्योकि ग्रामवासी की जगह को अपने कव्जे में लेके अपना दबदवा कायम रखता था जो भी आवाज़ उठाता उसकी  सरकार दुवारा सेवाओ को बन्द कर देता। कीर्तिभान का  परिवार खटकता था रसूकदार नोकरशाही थे बिना प्रधान के पद पर रहते हुये जिला कार्यालय में पहचान थीं ,स्तम्भ के ख़िलाफ़ कोई शिकायत करता तो सेवाओ पर प्रतिबंद लगा देता तो कोई डर के कारण कीर्तिभान से शिकायत नही करता ,ग्रामवासी ने पहले भी ग्रामप्रधान के चुनाव के लिए साफ़ मना कर देता ,कहता हम ,'ग्रामवासी की बिना पद के ही सेवा करते रहेंगे ,इस वार के प्रधान चुनाव के लिए ग्रामवासी ने बहुत कहा पर मना कर दिया। कीर्तिभान ने अपनी आँखों से ऐसा देखा जिससे फैसला बदलना पड़ा ,स्तम्भ क़ो भला समझता था उसका पर्दा उतर गया .जव खेत में काम करने वाला मजदूर अचेत हो गया ,डॉक्टर ने बताया भूखे पेट रहने के कारण अचेत बताया ,कीर्तिभान ने घर जाकर देखा तो वहा की हालत देखकर आंसू बह निकले ,बच्चे भूख से व्याकुल थे कामकाज के पैसे नही मिले थे. मुफ्त राशन मिलना बन्द था और कोई साधन नही था। हमारे गाँव में आज ये दिन भी देखना पड़ेगा .. ,ग्रामवासी ने इस हालत का जिम्मेदार स्तम्भ क़ो बताया .विस्तार से क्या क्या  यातनाये दी   हर दर्द को बताया। स्तम्भ ग्रामवासियो के हक़ क़ो अपना हक़ समझ खा रहा था ,सबकी बाते सुनकर फैसला किया इस वार प्रधान का चुनाव लड़ेगे ,इस वार  महिला सीट थीं तो ह्रदयथा क़ो प्रत्यासी बनाके चुनाव मैं उतार दिया ,
             
                                             ग्रामप्रधान के चुनाव में वोटरों क़ो खरीदा जाता है। विपक्ष के हितेशी ग्राम के सदस्य नोकरी शहर में करते हे उनके वोट को काटके अपने वोट बढ़ाये जाते हे चाये उनके पक्ष के शहर में ही क्यों नही रहते हों। नावालिक के भी वोट बनवा दिये जाते हे .वोट बढ़ाना और काटना हार जीत का अहम हिस्सा होता है। देशी शराब के ठेके घर ही खोल दिये जाते हे पिवक्कडो की सुबह शाम लाइन लग जाती .एक वोट की क़ीमत शराब से खरीद लेते .कही कही  पिवक्कड़  दोनों जगह ही अपनी पौ बारह करते .इस चुनाव में एक बड़े गाँव में खर्चा करोड़ के ऊपर पहुचँ जाता है। मतदान पड़ने की एक रात पहले नोट देकर वोट ख़रीदे जाते है ,हलवाई ऐसे लगाये जाते जैसे घर में शादी हों.रणनीति की तह फर्जी वोट का भी प्रबन्ध किया जाता है जो मतदाता शहर रहते उनके वोट डाले जाते जैसे लड़कियों क़ो अपने रिस्तेदारों दुवारा लम्बी लाज का घूघट डाल के किसी की बहू किसी क़ो बताके  डाले जाते ,विपक्ष भी तीसरी आँख के तोर पर अपनी  सेना खड़ी कर देते ताकि कोई फर्जी वोट न पड़ जाये जव पहचान लिये जाये तो मुहजवानी लड़ाई शुरू हो जाती ये लड़ाई विस्तार रूप भी धारण कर लेती जो हाथापाई डण्डे तलवार घरेलू बम्ब के रूप में देखने क़ो मिल जाती।पेप्सी कोक की काँच की बोतल में पेट्रोल भरके मुँह क़ो कपड़े की परत दर परत गट्टर बनाके शीशी बन्द कर देते उस कपड़े में आग लगाके भीड़ के बीच ज़ोरदार धमाका का रूप लेके अफरा तफ़री सा माहौल बना देते। पता चल जाये कि कि मतदान पेटी में दूसरे प्रत्यासी के वोट बहुत पड़े हों तो उस बॉक्स में स्याही डाल देते या बॉक्स क़ो लेकर भाग जाते .स्तम्भ ने भी यही काम किया पर निसफल रहा और पकड़ा गया .जनता के चहेते कीर्तिभान की ह्रदया को विजयी बना दिया।


                                      पति की सफ़लता के पीछे फूल में छुपे खुसबू की भूमिका निभाती है जो पतिनी की सोच समझ क़ो मूल्य समझे अपनी बात कहने का मौका दे. ये न समझे तुम्हारा काम चौखट के अंदर तक की सोच है ग्रहस्थी की रसोई में क्या खत्म हो गया हे ?किस कार्य के लिये पैसे चाहिए बच्चों की देखवाल बस इतना ही कार्य है वाहर क्या करता हूँ  इससे कोई मतलव नही हे ?ऐसी सोच वाले बहुत मिल जायेगे पतिनी क़ो कुछ भी नही बताते हे  ये ग़लत हे। दोनों को ही घर के वारे में और वाहर के कार्यो के वारे में जानकारी होनी चाहिए ये बात अलग हे कि रुचि न ले.,जब पति पत्नी अपने अपने काम के वारे में बताते रहे तो बुद्धि का विकाश ही होता हे और सीखना चलता रहता है .सोच एक सी भली दो की जायदा कार्यगाह होती जो हल ख़ुद न कर सके क्या पता दूसरे की सोच हल ख़ोज दे। कीर्तिभान और ह्रदयथा  एक दूसरे को बहुत अच्छे तरह समझते थे .दोनों के बीच क़भी भी  ग़ुस्सा लड़ाई मन मुटाव नही हुआ .सब लोग उनके समझदारी अच्छे पति पतिनी होने का उदाहरण देते थे।

                                  प्रधान पद के साथ ज़िम्मेदारी और बढ़ गई उद्देश्य एक था ग्रामवासी के समस्याओं क़ो दूर करना जितना सरल सोच रखा था, उतना ही कठिन था .यहाँ प्रधान के ईमानदारी होने से सिर्फ ग्रामवासी की सेवा तो की जाती हे पर बिना धन के कैसे ?गाँव के विकास के लिये जो पैसा आता उस पर कितनो की नज़र गड़ी रहती जैसे इन घूस खोरों ने अपनी सरकारी नोकरी का अधिकार बना रखा हो। सेकेट्ररी, चपरासी ,कर्मचारी ,ऑफीसर सब एक ही थाली के चट्टे बट्टे है । पहले तो दोनों घूस देने के लिए राजी नही थे पर जब विचार निर्माणधीस हों उत्थान के लिये अग्रसर हों तो धर्म को धर्म विजयी बनाने के लिये महाभारत का चिंतन करना और गीता पाठ स्मरण करना चाहिये .दोनों  ने ये भी  ठान रखा था घूस लेने वालों का पर्दा पास करना हे। गॉव क़ो सम्रद्ध उत्थान प्रग्रतिशील की प्रेणा और गाँव के लिये बन गई। कोई भूखा नही सोता कोई वेरोजगार नही हर बच्चा स्कूल जाता जो जो योजनाये सरकार ने बनाई उन सबका लाभ ग्रामवासी तक पहुँचाया .जो कर्मचारी घूस ख़ोरी थे उन सबकी वीडियो बनाके नोकरी से ही बर्खास्त करवा दिया। अच्छे काम के लिये जहाँ जयकारा भी लगता हे वही ईर्ष्या के कारण दुश्मन भी बन गये ,जो मौके की फ़िराक में रहते थे कब मौका मिले और कीर्तिभान क़ो अपने रास्ते से हटा दूँ ,वो मौका दूसरी वार हार  के वाद मिला।

                            राजनीति जाल हे नेता मकड़ी चाये छोटी इकाई ग्राम प्रधान राज्य के मुखमंत्री या प्रधानमंत्री सब मकड़ी इसमें आने के वाद कोई वाहर निकल नही सकता ,अपने दुश्मन क़ो जाल में फ़साके मृत्यु के आग़ोश में सुलादेते है पर ख़ुद भी उस जाल से बच नही पाते। आज़ कीर्तिभान भी उसी राजनीति का शिकार हों गया ,हास्पीटल के ऑपरेशन थ्रेटर में ज़िन्दगी और मौत के बीच झूल रहा है।राजनीति भी जाल के समान इर्द गिर्द घूमती रहती है ,नेता अपनी तागत से अपने बनाये जाल में फ़साके तागत का वर्चस्व दिखाता पर ख़ुद भी बच नही पाता है।

                              

शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2016

दिवाली मेरे घर का पता दें दो

बता दो बता दो ख़ुशी को पता दे दो,
इस दिवाली मेरे घर का पता दें दो।।
हर कारीगर की नज़र डूडँती हैं,
आशा अभिलाषा से पूछती है ।।
दमक की ज्योति मुस्कान की झङी देदो,
बता दो बता दो खुसी को पता दें दो।।
एक प्रश्न हम सबसे पूछते है ?
व्यापारी नौकरशाही वोनस की आस करें,
दिवाली पर हर घर अरमान हैं सजतें।।
भारी छूट का पासा फैकें हैं व्यापारी ,
लक्ष्मी जी सब आगमन हैं करते।।
नौकरशाही को मिला वोनस तो,
लक्ष्मी जी की अनुभूती सब है करते।।
फिर हम क्यों? कारीगार ख़ुशी से दूर....
बता दो बता दो ख़ुशी को पता दें दो,
इस दिवाली मेरे घर का पता दें दो।।
फ़ुटपाथ चौराहा पर लगाई है फैरी,
आशा की नज़र हर राहगीर को देखती।।
कुम्हार के दीपको को दें दो बसेरा,
धुनकर की रूही को दें दो उजाला ।।
तेल के कीप को बुलालो घर आगन,
मिट्टी की प्रतिमाओ से चौकी सजालों।।
लताओ वेलो लङियो से दरवाज़ा सजालों,
रंगो से बनाके रंगोली अलख को जगालों।।
बता बता ख़ुशी को पता दें दो................
इस दिवाली मेरे घर का पता दं दो.........।।
ऊँची दुकानो के मेहमान जरा,
फ़ुटपाथ पर दर्शन तो दें दो।।
चीनी लडझडियो से भी आगें,
मेरे दीपको को भी घर का पता दें दो।।
फ़ुटपाथ पर सजें सामानो को साहिब,
अपने घर की मेम शोभा बढ़ा लो ।।
परम्पराओ में हमारी भी अरज कर लों,
फ़ुटपाथ से सब दिवाली की आस कर लो।।
बता दो बता दो ख़ुशी को पता दें दो,
इस दिवाली मेरे घर का पता दें दो..........।।
हर कारीगर की नज़र डूडती हैं,
आशा अभिलाषा से पूछँती है।।
दमक की ज्योति मुस्कान की झङी दें दो,
बता दो बता दो ख़ुशी को पता दें दो।।  

शनिवार, 24 सितंबर 2016

शर्तो पर जीना


शर्तो पर जीना छोङ दो

सह सकते है अनगिनत जख्म,  
तो शर्तो में जीना छोड़ दो!
पी सकते है अश्को का सैवाल,
तो शर्तो में जीना छोङ दो!
सरकार को कायर की संज्ञा देते,
शहीद के शहादत का हिसाब लेते!
कूटनीति राजनीति बेजोड जबङा,
पाक को चारो खोने चित है करना!!
युद्ध हर समस्या का समाधान नही,
घर घर से शहीदो की उठेकी अर्थी,
कितनो की उजङेगी माँग का सिन्दूर, कितनो की गोद होगी यूही सूनी!
सम्पति का कितना होगा विलाप,
पश्चमी से 20पीछे है आज हम,
और 20साल हो जायेगे ऐसे पीछे,
सोचो क्या मिलेगा होकर हमको!
परिमाणु बम्ब हुआ जो विध्वन्स,
देखना है इसका जो प्रतिफल,
जापान में जाकर कर लो साक्षात्कार!
रूस का प्रकोप आज भी झेलती पीणी!!
युद्ध पहला नहीं आखरी है विक्लप,
पाक के कमज़ोर नज्ब ली पकङ,
पाक के अंदर गृहकलह कराना ,
खण्ड खण्ड करके जख्म है देना!
बोखलाहट है पिछडने की उसकी,
देश बन रहे है मित्र हमारे सब,
विकाश के पथ पर कार्यशील ,
बोखलाहट निकलती ओछी हरकत कर!
गेहूँ में कंकड चुन चुन निकाल रहे ,
करता है घुसपैठ मार मार गिरा रहे, 
सीजफाईर का बराबर देते है जवाव,
पाक की हर प्रहार का करते प्रतिकार!
युद्ध चाहते है सब जनआधार तो,
मैसेज से खून उवाल लाते हो,
सिर पर बाँधकर निकलो तिरंगा,
सीमाओ पर दिखला दो उवाल!
हर वार सैनिक ही क्यों है शहीद,
तुम भी दिखला दो जौहर का उवाल,
मैसेज पर करते बेधङक प्रतिकार,
आज मांगता है देश तुमसे हिसाव!
सब देखने सहने को हो तैयार,
तो युद्ध हो जाने दो आर या पार,
नौ जवान सजालो देश करे पुकार,
छेङा है युद्ध का ऐसा अलाप!
शहीद का हिसाव हम सब उधार,
दिलेर शहीदो के परिवार को सलाम,
चाहत है यहीं पाक को दिखादे औकात,
 अपने देश के घर घर आँसू पी सकते है,
तो शर्तो पर जीना छोङ दो!
शस्कतीकरण हो रहा देश का ऐसा,
मित्रो का मिल रहा है समर्थन अपार,
पाक का नापाक पर्दा दिया उतार,
 आंतकवादी देश घोषित करने पर विचार!
 सह सकते है अनगिनत ज़ख़्म ,
तो शर्तो पर जीना छोङ दो,
पी सकते है अश्को का सैलाव,
तो शर्तो पर जीना छोङ दो!

मंगलवार, 20 सितंबर 2016

तपस्या का फल

 हल्के आसमानी रंग का घेर वाला सूट चूड़ीदार पजामी ,सूट के रंग में गहरे सिलेटी रंग की बाजू और घेर पर लगी किनारी रंग को निखार रही  है ,गले की डोरी में बधे घुघरु की आवाज छन छन मैं उसकी तरफ़ देखने को ललचा ही गया .हवा में लहराता दुप्पट्टा बिखरे बालों की घटाओ  में, मै सुध बुध खो गया .अपने हाथों से कही दुप्पट्टा सभालती तो कही घुमड़ घुमड़ आती जुल्फे चहरे पर उसको सभालती ,नटखट सा खेल खेल रही थीं मैंने ऐसे पहले कभी किसी को नही देखा क्यों मेरे मन में उसके रूप को देखने की तीव्र लालसा जाग रही थीं ?,क्यों इस प्रेम रूपी सरिता में बहने क़ो लालायत था ?दूर से उसकी मोहित कर देने वाली क्रियाये  देख पा रहा था .बच्चों क़ो क्या निर्देशन दे रही थी या कुछ कह रही थी मुझे कुछ याद नही बस उसको देखे ही जा रहा था.. प्रेम सरिता में बहे ही जा रहा था.मैं  खिड़की वाली शीट पर वेठा टकटकी लगाये उसको देख रहा था,चालक वार वार हार्न दुवारा  चलने का संकेत दिये जा रहा था  ,मै लालायत हो रहा था उसके रूप क़ो देखने के लिये पर चालक महोदय धीरे धीरे बस क़ो आगे बड़ा रहे थे ,मुझसे वो दूर हो रही थीं मै बेचैन हों रहा था, आज से पहले मेरे साथ कभी ऐसा नही हुआ. मन ने किया उतरके उसका दीदार कर लू पर न जाने क्यों नही उठा और वो बस के चलने के साथ ओझल हो गई। मै  बहुत दुःखी था अव कव दीदार होंगे या यही आख़री दीदार था  पर अचानक मेरी शीट पर कोई बैठा मै तो वाहर ही उसे खोज रहा चालक ने जोर से ब्रेक दवाये, अपने आपको सभालने के चक्कर में मेरा हाथ उसके हाथ से टकराया जो मैं  वाहर ही उसको खोज रहा मोह भंग हुआ उसकी तरफ नजर घुमाई तो हैरान था जिसको वाहर ख़ोज रहा था वो मेरे पास ही बैठी थी. उसको मैने आसमानी सूट से पहचाना ,मै बहुत खुश हुआ ,चाह तो रहा था कि उसको देखता रहूँ पर कही वो मुझको ग़लत न समझ बैठे कि उसको घूर रहा हूँ,उससे नज़र बचाके उसके रूप की सरिता में बह गया......... कानों में लीड लगाके गाने सुनने लगा। ...                                                 पास बैठी हे मेरे  मैं कितना खुश नसीव हूँ
 थम जाये वक़्त यही तो खुश नसीव हूँ..
.
  प्रीत क्या होतीं है आज मैने जाना है ..

  बैठी हो  तो नज़र तुमसे  चुराता हूँ ....
.                                                        
  वैसे एक पल नज़र हटाता ही नही हूँ

  भुला बैठा हूँ खुदको तुझमें भुलाके,,,

 थम जाये वक़्त यही तो खुश नसीव हूँ......

     आसमानी रंग का सूट चूड़ीदार पजामी,,,
                                                                                                       
 बलखाती जुल्फे लहराता दुप्पट्टा,,,,,,,,

                                                                                                            
 छनछन करते घुघरू खनखन करती चूड़ी
                                                                                                       
 प्रेम सरिता में बह चला खुशनशीब हूँ ,,,,
,                                                                                                       
 जादू भरी आँखों में काजल इतराता ,,,,,
                                                                                                         
 गुलाब सी  झलकती गालो से  लाली ,,,,
,                                                                                                          
मोती झरते मुस्कान जो उसकी भोली ,,, 
                                                                                                        
 कानों की वाली दमके गिरती हे विजली ,,,,,,
                                                                                                     
थम जाये वक़्त यही तो खुशनसीव हूँ .....
                                                                                                           
कहना हे बहुत कुछ नज़र चुराता हूँ ,,,,,
                                                                                                         
 ख़ुद से रहा दूर फिर क्यों ख़ुद से मिलता हूँ 
                                                                                                     
दुनियां क्या देखूं सब तुझमे नज़र आता हूँ 
                                                                                                       
जादू किया तूने तुझमे खोना चाहता हूँ ,,,,,, 
                                                                                                    
 थम जाये वक़्त यही तो खुश नसीव हूँ ,,,,,,,
                                                                                                      
पास बैठी हे मेरे मैं कितना खुश नसीव हूँ ,,,,, 
                                                                         

 अचानक चालक ने ब्रेक लगाये ,मैंने सभाला कही गिर न पढू  कही वो कुछ और न समझ बैठे मैं  जान बूझ कर गिरा हूँ ......पर मेरी नज़र उसकी नज़र से टकराई वो भी टकटकी लगाये मुझको देख रही थीं .आँखों आँखों में बाते हों रही थीं शायद जो अगन मेरे ह्रदय में उठी थीं वो अगन उधर भी थीं . सब कुछ बुलाके एक दूसरे क़ो निहारे जा रहे थे,अचानक  चालक ने उतरने का संकेत रूपी हॉर्न बजाया हमने अपने आप को सभाला उसने भी सभाला और कालेज की और जाने लगीं.. मैं  भी ठहर  कर देखता रहा और खुश हुआ कि दोनों की मंजिल एक ही थीं। कुछ दूर जाके वो रूकी पता नही क्यों?उसने पलट के देखा और मुस्कराके चली गई। मै बहुत खुश हुआ जैसे उसनें भी संकेत दिया हो और आगे बढ़ने का ,मैं उत्सुक था उसके बारे में कोन सी क्लास में पड़ती हे? कहाँ  रहती हैं ? क्या नाम है ?  मै उसको देखें ही जा रहा था कि दोस्त ने मेरे मन की बात पड़ ली। ये तो आठवाँ अजूबा हो गया जो कभी लड़की क़ो नज़र उठाके नही देखता था वो लड़की को देखें ही जा रहा हैं ,अरे यार इतना मत देख नज़र लग जायेगी ,   तू मुझसे उसके वारे में पूछे,'मै ही बता देता हूँ . इसका नाम स्पर्श हे ये हमारी ही क्लास में है,पर तुझको कितावो से फुरसत मिले तव तो प्रकृति के सौन्दर्य को देखे  .अपने आस पास कितने तरह तरह के फूल हे पर तू तो आई ए एस तपस्या का विश्र्वामित्र जिसकी तपस्या स्पर्श ने भंग कर दी। विसवा मन में सोच रहा था मेरी ही क्लास में,मैं अनभिज्ञ  था। यार क्या सोचने लगा?तू ख़ुशनसीब हे जो मुड़कर देखा किसी को भाव नही देतीं है .सब कव से उसकी एक मुस्कान के लिये तरस रहे हे.ये ख़ामोश सुध बुध सी रहती हे पता नही क्यों ?                                                                                                                        विसवा  अब हम स्पर्श के चहरे पर मुस्कान लाके ही रहेगे पर कैसे ?                                                                   शुचित ने विसवा की तरफ़ चुटकी लेते कहाँ ,"जा रहने दे पहले कितावो से तो निकलो जो खुद ही  मुस्कराता न हो वो मुस्कान क्या ख़ाक लायेगा।                                                                                                            विसवा :-यार तो सही कह  रहा हे पर उसके स्पर्श ने क्या जादू किया हे ?   एक पल के लिये भी ओझल नही हो रही है।                                                                                                                                                 शुचित :-ठीक हे मै कुछ करता हूँ।                                                                                                                  शुचित ने स्पर्श क़ो मैडम बुला रही हैं इस  बहाने से पुस्कालय में बुलाया .....उसके मन में कही सवाल थे, मैडम ने  क्यों बुलाया ?शायद नोट्स के वारे में बताना हों ?यही सोंचती जा रही थीं कि अचानक नज़र विसवा पर गई वैसे ही पीछे क़दम लिये और चलने लगीं।                                                                                                                      विसवा ने पुकारा :-रुक जाओ स्पर्श,मै कुछ कहना चाहता हूँ ,                                                                       स्पर्श ने बीच में  रोकते हुये कहाँ ,'कुछ मत कहो ,हर बात कहके नही की जाती ,कुछ हाल हालत भाव को देखकर बात समझ लेनी चाहिये ,जो लड़का पढ़ाई के सिवा कुछ और नही सोचता अपनी क्लास के क्लासफैलो के वारे में नही पता है. वो आज हमारा  इतज़ार कर रहा क्यों ?तुम शब्द कहोगे तव ही जान पायेगे ,नही...  प्रेम  हे ही ऐसा जिसे शब्द की नही एहसास की आवश्यकता होती हे। . हम अपने विसवा की तपस्या भंग नही करना चाहते हे। मुझसे पहले माता पिता का सपना पहले हैं । आधार भी उन्ही का है पहले उनका सम्मान  सपना बाद में कुछ और  ..    तुम यही सोच रहे हो? मैं  सब कुछ कैसे जानती  हूँ ? तो तुमने तो आज़ जाना हे मै तो क्लास की पहली साल से ही प्रेम  करती हूँ। हाँ मै खामोश क्यों रहती हूँ मुस्कराती क्यों नही   ... जब तुम अपनी तपस्या में  इतने लीन तलीन रहते हो तो फ़िर किसके लिये मुस्कराये?                                                                                                विसवा ; मेरे लिये मैने आज जाना और तुम बरसो से पर क्यों? मुझमें ऐसा क्या देखा ?                                      
 स्पर्श ; तुम्हारी सादगी अपने काम में लगन यही भा गई कब ?कैसे? कहाँ ?सिर्फ़ तुम में ही खो गई.  मैं बहुत खुश हुई थीं जव आपके पास मुझे बैठने का मौका मिला. चाहती हूँ कि आपकी अर्द्धागिनी बन हर सुख दुःख की भागीदार बनूँ  .  मैं और मेरा प्रेम इतना निवर्ल नही है जो माँ बाप के सपनो के बीच आ जाये। मुझको घर के वारे मैं आपके बारे मैं सब पता है। मेरा तो हक़  बाद में हैं पहले उनका हक़ पहले हैं। अधूरे सपने हैं आई ए एस  के रूप मैं वेटे को देखे। इस समाज ने असफलताओ के कारण माथे पर बट्टा लगा दिया है कि जो ढीगें हाँकने बाला क़भी कुछ नही कर सकता हैं। हमारी नज़र में आदर्श हैं जिन्होंने कभी भी बखान नही किया जो अधूरा रह गया हे आपको पूरा करना हैं। जिस तरह ज़मीन जायदाद कर्ज लेना या देना सब बच्चों को मिलता हैं वैसे ही  उनका सपना जो पूरा न हो पाया ,आपको करना हैं। मै अपने विसवा की तपस्या भंग नही कर सकती हूँ।               विसवा :-आपके कारण मेरी तपस्या कैसे भंग हों सकती हे ?अगर न मिली तो सब कुछ बिख़र जायेगा.जव से देखा तब से  एक पल भी और कही  मन नही लगा पाया हूँ. पढ़ाई में स्थिर न रह सका हर जगह तुम ही तुम नज़र आ रही थीं. अव कैसे हो पायेगा तुम्हारे बिना? तुमसे ही हर सपना हे और तुम ही हर सपने को पूरा करोगी। सच मेरा मन कही नही लगेगा .बस तुम मेरी हो जाओ मैं मम्मी पापा से बात करूँगा वो कभी मना नही करेंगे।            विसवा :-पता हे नही मना करेंगे पर मैं उनका सपना नही तोड़ना चाहती हूँ। प्रेम निर्वल बनाता हे कैसे सोंच लिया,राधे श्याम का  प्रेम  मिसाल है फिर हम आपसे दूर कहा हे आपके पास हे बस सच्चा एहसास होना चाहिए ,मुझको शक्ति बनाओ मैं आपके साथ हूँ हर पल पल.. मिलना लिखा हे तो हम जरूर मिलेंगे नही तो प्रेम बनके मेरे रोम रोम में बसे हो जिसको कोई आपसे दूर नही सकता हे। आप मम्मी पापा का सपना पूरा करो इसी बीच मैं आपका इतज़ार करूगी।  मैं  भी अपने माँ बाप के आँखो में भी आँसू नही देख सकती हूँ, उनका मेरे लिये सर्वमान्य  हैं  .इस शरीर पर कोई अधिकार जता सकता पर मेरे ह्रदय पर आपका ही प्रेम हे और जन्मान्तर रहेगा। मुझको कभी बेवफा मत समझना ,संसार के प्रिति दायत्व हे उनका भी निर्वाह करना हे। श्याम को राधे ने संसार के दायत्व  में प्रेम को बन्धन नही बनाया बल्कि शक्ति बनाया हे   .                                                                    स्पर्श :-तुम इतनी प्यारी प्यारी बाते करती हो मुझको मोह लिया हे, मै वचन देता हूँ, अपने प्रेम को शक्ति बनाऊँगा ,सबका सपना पूरा करूँगा तब अपने प्रेम क़ो  लेने आऊँगा।                                                                                                  दोनों ही अपने अपने रास्ते चले गये वक़्त क्या दिखायेगा ये तो वक़्त ही बतायेगा। विसवा  ने प्रेम क़ो शक्ति बना कर सबका एक सपना पूरा करने में लग गया। कव दिन महीने में और महीने साल में गुजरे दिन रात एक कर आखिर कार पाँच साल के बाद सपना सच हुआ। सब बहुत खुश थे विसवा ने अपने ह्रदय की बात मम्मी पापा को बता दी। मम्मी तो बहू के आगमन की तैयारी करने लगीं और मम्मी पापा के साथ   स्पर्श को बहू बनाने स्पर्श के घर को निकले। स्पर्श के घर की सजावट गाने बजाने शादी जैसा माहोल देखकर सबकी समझ से परेह था। सब सोच रहे थे आख़िर  किसकी शादी है जाने कैसे कैसे बाते मन में आ रही थीं। घर से दूर  ये दृश्य नज़र आ रहा था. विसवा अरमानों क़ो सजोये स्पर्श के लिये  पुष्प गुच्छ लिया जिसकी बातों ने प्रेम की शक्ति का अवलोकन कराया था। जव तक सपना पूरा न हों जाये तव तक न मिलना हे, न सम्पर्क रखना है ,इन पांच  वर्षो में एक पल भी स्पर्श को भूला नही था ब्लकि जब समस्या का समाधान न मिलता तो उसका निदान करती थीं। आत्मा का आत्मा से मिलन पहली मुलाक़ात में हों गया था आज तो औपचारिक रूप से प्रेम को सांसारिक नाम देना था. जव  मिलने का सोचा तव से स्पर्श दूर हों गई जो हर वक़्त साथ नज़र आती थी, आज क्यों नही ?विसवा समझ नही पा रहा था.जो देखा उसको  देखकर चौक...  गया पैरो तले ज़मीन ख़िसक गई जव स्पर्श क़ो फूलों से सजीं कार मै लाल जोड़े में दुल्हन बनीं जाते देखा तो मानो सबकुछ खो गया। यादों क़ो हक़ीक़त बनाके पांच  साल बिता दिये और आज किसी की दुल्हन बन चुकी  है  .....
                                                                                         
 आज़ फिर दिल रोया हे जिसको पल पल देख जिया खिलजाता था ...
                                                              
 आज़ हुई दूर दिल रोया हे दुल्हन बनी किसी की जिया दुखता है ......
                                                             
 आज़ फ़िर दिल रोया हे ..........................................................                                                                 कसूर तुम्हारा नही कसूर मेरा भी नही किस्मत का खेला है ,,,,,
                                                                      
 वफा मैने निभाया वेवफ़ा तू भी तो नही किस्मत का खेला है ,,,,
                                                                      
 जहाँ तेरा भी जहाँ मेरा भी मिलन नही किस्मत का खेला है ,,,,
                                                                        
 सपना तेरा भी सपना मेरा भी सच न हुआ किस्मत का खेला है ,,,,                                                                      आज़ फिर दिल रोया हे ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
                                                                     
 जन्म जन्म का नाता हे मिलना हे हमको किस्मत क़ो  हराना है ,,,
                                                                   
 टूटा न अब तक टूटने न दूँगा हौसला बदकिस्मत को झुकना है ,,
                                                                   
 इतज़ार कर रहा था इतज़ार करूँगा किस्मत  क़ो पलटना हे ,,,,,
                                                                 
 आना हे तुझको मिलना हे हमको किस्मत क़ो बदलना है ,,,,,,,,
,                                                                      
अब दिल को न रुलाना हे तेरे साथ  जीना हे ,,,,,,,,,,,,,,
                                            स्पर्श ने भी विसवा को देख लिया पर किससे कहे एक एक पल राह देखते देखते काटी थीं। ,उदाश चहरे क़ो माँ बाप बखूबी पड़ लेते हे जो नज़र में होते हुए कही और खोये रहते हे.स्पर्श की हालत जीता जागता पुतला थीं उसके मन की विग्न क़ो देखकर माँ ने कह दिया।,"वेटी तेरी ये दशा हम सबको कचोड़ती हे मेरे सपने तेरे लिए सर्वोपय  मेरे ह्रदय क़ो दुखाये बिना कोई कार्य नही करेंगी। चाये तू प्रीत की ज्वाला में झुलसती रहे... मै कितना भी पूछू पर तू कुछ नही बतायेगी, मुझसे तेरी ऐसी हालत देखी नही जा रही, मैने ख़ुद पता लगाया ,कि तेरी हालत क्यों  हुई हे ?,तुम यही सोंचती थीं हमको पता चलेगा तो ठेस लगेंगी मन दुःखी होगा।  वेटी मेरा सपना तो पूरा कर दिया .प्रोफेसर  बन अपने पैरो पर खड़ी हे भविष्य कैसा भी  तू मजवूत रहेंगी .आगे की जिंदगी तुम्हें किसके साथ बितानी हे  ये तुम्हारा फैसला होना चाहिये .बस मुझे तो लड़के के वारे में  जानकारी होनी चाहिए  कैसा हैं ? क्या करता है ?मैंने सब पता कर लिया है। वो भी तुम्हारी तरह अपने माँ बाप का सपना सच करने मैं लगा है। हम इतंजार कर सकते हैं ,स्पर्श को माँ की स्वीकृति मिल गई तो शादी के सपने बुनने लगीं जो हर लड़की बुनती है , पर किस्मत क़ो कुछ और ही मंजूर था..  सडक़ दुर्घटना में माँ बाप दोनों ही चल बसे .जाते जाते अपनी अकेली वेटी क़ो इस संसार में  कैसे छोड़ जाये,? इस संसार में अकेली लड़की खुली तिज़ोरी के सिवा कुछ और नही समझते है।  वेटी का हाथ अपनी सहेली के वेटे के हाथ में सोप गई जो विसवा का दोस्त शुचित के साथ शादी  हो गई।
                                                                                                                                                            
 आते आते बहुत देर कर दी  आज फिर दिल रोया हे .......
                                                                              
 पल पल गुजरा इतजार में पर किस्मत ने हराया हे .......

,                                                                                  
वेवफा न समझना दिल में तुमको ही बसाया हे ........

                                                                                   
 जन्म जन्म का बन्धन मैने तुमसे ही बाधा हे
,                                                                                    
 आज फ़िर दिल रोया हे तेरा जिया मैने दुखाया हे........

                                                                                   
हों सके तो माफ़ करना महको किस्मत ने

 हराया हे                                      
 यहाँ से फिर एक वार दूर हो गये क्या कभी क़िस्मत बदलेंगी या बस क़िस्मत के हाथों की कठपुतली बन वार वार  दूर होते रहेगे ?माँ बाप का आसीस था जो विफ़ल कैसे हो सकता था? कभी ठेस नही पहुँचाई थीं ,अपने बच्चों की आँखों में अधूरे सपने को साकार करना था, बस प्रभू से बन्दना करते थे. ये प्रभू मेरे बच्चे क़ो उसकी ख़ुशी दे दो।  विसवा अन्दर से टूट चुका था पर क़भी भी सामने नही आने देता था। ,धीरे धीरे बरस बीतने लगें आठ बरस बीत गये। संसार कभी थमता हे ये तो चलता जाता हे और चलता ही रहता हे .रोज की तरह विसवा योग में लीन था। माँ रसोई घर में चाय बना रही थीं कि टेलीफ़ोन की घन्टी बजी जनता अपनी समस्या के वारे में बताती थीं, विसवा सबकी समस्या विचारधीन होकर सुनता था और समाधान भी करता था .जनता के ह्रदयों पर राज करता था और जनता खुश होकर अधूरी इच्छा पूरी होने का आसीस देते थे। माँ बाप ने कभी शादी के लिये नही कहा जानते थे अगर कहेगे तो कर लगा पर जो अंदर ही अंदर रोता हे उसको और पीड़ा नही देना चाहते थे ,विसवा ने निःस्वार्थ जीवन देश के प्रति समर्पित कर दिया। घन्टी बजी जा रही थीं .......माँ ने रसोई से आवाज़ लगाई .....विसवा  फ़ोन उठा ले ...       विसवा ने फ़ोन उठाया और सुनकर हाथ से फ़ोन छूट गया .....स्पीकर की     इधर उधर टकराने की आवाज़ से   माँ रसोईघर से पूछा ..  विसवा क्या हुआ ?      कोई उत्तर न दिया  हास्पीटल में जाने को कहाँ ,            माँ के मन में कही प्रश्न थे? विसवा के माथे पर पसीना ऐसी गाड़ी में भी आ रहा था .बात तो गम्भीर थीं पर इसका उत्तर तो हास्पीटल में ही जाके  मिल सकता था .

                                                                                                         कमरे का दरवाजा खोला सामने तो शुचित बिस्तर पर लेटा सिरहाने स्पर्श बैठी सिर पर हाथ फेर रही थीं और  आँखों   से आँसू  झलक  रहे थे .जव विसवा को शुचित ने देखा तो हाथ के हिसारे से  अपने पास बुलाया ,स्पर्श ने विसवा को देखा तो दोनों एक दुसरे को  देखते रहे.....शुचित ने देखकर कहाँ ,"तुम दोनों को कौन अलग कर सकता हे जव बने ही एक दूसरे के लिये ,'                                   
विसवा -कुछ मत कहो शुचित तबियत और खराब हो जायेगी ,                                                                          शुचित -मुझे कहने दो.....सबकी दुआए यही चाहती हे ,हमारे पास कम समय हे कव कौन सी सास आख़री हों .मेरे सामने तुम दोनों  प्रेम के बंधन में बध जाओ....यही मेरी इच्छा हे।  विसवा कुछ कहना चाहता था पर मना कर दिया ,स्पर्श का हाथ विसवा के हाथ में सोप दिया ,प्रभू ने इसी कार्य के लिये सास बचाके रखी थी और कहते कहते सास थम गई। सबने आवाज़ दी शायद इसी पल के लिए डेगू प्रकोप से जूझ रहा था .सबकी आँखों से आसू बह रहे थे पर अधूरे प्रेम को मिलाने के लिए सबका आसीस   जो था।  माँ ने स्पर्श को गले से लगा लिया।