गुरुवार, 25 जनवरी 2018

आवाहन

जिंदा की ललकार वल कहाँ?
मृत्यु का आवाहन करते हों?
आत्ममंथन कर स्वयं विचार करो?
नारी सम्मान में कितने शीष कटते है?
इतियास पन्नो पर अहाकार करते हो?
मन चंचल क्या क्या उमडता है,
पर कितना पटल पर उतरता है।।
व्यक्ति के प्रति क्या विचार रखते है,
मन की डोर स्वयं के हाथो में रखते है।।
क्यों वनाता भंसाली मसाला ,
यह उस सोच पर तमाचा है?
एक प्रश्न मेरा योद्धाओं से है,
इतियास के आवाहन पर उठी तलवारे?
जिंदा की ललकार का वल वनो।।
यह शोर्य जव पालोगे दिखलाओगे,
तव ही योद्धाओ कहलाओगे।।
 सिर्फ राजनीति करने का खेला है,
तो समझो तुम्हारा अतन नही पतन होगा।।
हर नारी है पद्मावती नही लक्ष्मीवाई का,
आवाहन वीरागना देखना चाहते है।।
जौहर नहीं अवला नहीं मर्दाना का,
चौला चण्डी का आवाहन चाहते है।।
भेडियों के झुण्ड में शेरनी की दहाड,
तलवार की ललकार वल का प्रहार चाहते है।।
जौहर आत्मदाह नहीं भेडियो की मृत्यु,
रक्त से धरा को वतलाना चाहते है।।
दुर्गा लक्ष्मी सरस्वती से निकलके, 
काली चण्डी आक्रोश जगाना चाहते है।।
याद करो द्रोपती को सभा में हुई लाजवत,
आत्मदाह नहीं महाभारत विध्वंस कराया था।।
सीता जी पर दृष्ठी पढी रावण की,
रावण की लंका दहन वध करवाया था।।
याद करो और वीरागंनाओ को वीरा,
रोम रोम में लक्ष्मीवाई सा शोर्य भरना है।।
कलयुग के वार का वार आत्मदाह नही करना हैं,
जीके भेडियों का प्रतिहार करना है।।
रोम रोम में पद्मावती नही लक्ष्मीवाई सा,
जौहर नहीं वीरागंनाओ को भरना है।।
www.samajakanksha.com

सोमवार, 18 दिसंबर 2017

याद बहुत आते है वीते पल





जव से एन एन एस( राष्ट्रीय सेवा योजना) का टूरकैम्प’ की भनक काँन में पढी तव से सव लङकियों में फुसफुसाहट शुरू हो गई। वार्षिक टूर पर नहीं गये तो अंक नहीं मिलेगे। इसका महत्व आने वाले समय में पता चलता है।किसी प्रशासनिक नौकरी के लिए पहले कदम में इसका महत्व दिखता हैं। अंक रूप में विद्धार्थी के लिए जल रूपी संरक्षण हैं। अंक के रूप में नौकरी में तय मानक रूपी में यह अनुदान का काम करता हैं। स्नातक के प्रथम वर्ष में प्रवेश के लिए फार्म भरा जाता है, जिसमें कुछ नियम होते है अगर आपने श्रम के रूप में प्रत्येक रविवार को आठ घंटे के रूप में कार्य किया तो विद्धार्थी को  3 से 5 अंक और दो वर्ष में 10  दिन का टूर किया तो 8 से 10 अंक का प्रमाणित रुप में अंक पत्र दिया जायेगा। आठ घंटे के रूप में प्रत्येक रविवार को भाग लेकर श्रम तो कर ही रहे थे, जिसमें पोलियो दवा पिलाना कालेज की साफ सफाई, शिक्षा का महत्व बताना, नशा से हानियों के प्रति जागरूक कराना। इस प्रकार के कार्यक्रम से विद्धार्थी में श्रंम के प्रति चेतना जागती है और भेदभाव का खण्डन होता हैं। सदभावना,सदविचार का उदय होता है। शर्म और अपने विचारो को विना झिझक के  व्याख्या रूप में प्रस्तुति करना ,जिसके लिए सांस्कृति रूप का मंचन किया जाता है। प्रत्येक रविवार को लतीफे, कविता पाठ, कोई नाटक रूप में अपने विचार प्रस्तुति करना ,गीत गजल से अपने सुरो को पहचानना, अपने विचारो को खुले रूप में समाज के सामने प्रस्तुति करना जैसे, निवन्ध, कला के रूप में अपने अंदर के विचारो को रंगो के माध्यम से पटल पर विखेर देना जैसे कार्यक्रम होते थे। इतने सारे विकल्प थे जिससे अपने आप को पहचानना अपने अंदर छुपी प्रतिभा से साक्षात्कार कर सकते थे। पर यह दौर आत्म मंथन का नहीं होता है शर्म और लाज के घूघट में लजाते वाल वालाये है। यह दोर खुद से द्व्द आकृषित मनोदशा में विचलित करने वाले रहस्य से भरा होता हैं।विपरीत की तरफ झुकाव प्रेम में प्रफुल्लित धारावाहिक देखना, फिल्म के गीत गुनगुनाना, फिल्म देखना, अपने सपनो मॆं खोये रहना होता है। कोई लक्ष्य निर्धारित नही होता है क्या करना हैं.कभी यह करना है तो कभी वो करना है। जो दृढं संकल्प से लक्ष्य निर्धारित कर लेते है उनके लिए सुनहरा भविष्य वाँये फैलाके स्वागत करता है। जो भटका होता है उसके लिए भविष्य में कदम कदम पर मुश्किलो का सामना करना पढता हैं।
   इसवार 10 दिन का टूर कैम्प का आयोजंन वृंदावन में होना था जिसमें पाँच कालेज के विद्धार्थी भाग लेना था। उस पाँच में नारायण महाविद्धाल का नाम भी अंकित हुआ। सर ने जव से बताया कि कैम्प में जाना आवश्यक है अगर नहीं गये तो अंक के अनुदान में कटौती की जायेगीं।जितनी सफलता मिलनी चाहिए अपने श्रमदान से वो नहीं मिल पायेगी। छोटे से कसवे में जहाँ अकेले आगरा तक जाने की अनुमति नहीं थी, न स्वयं जा सकते थे वहाँ 10 दिन के कैम्प के लिए कैसे अनुमति मिले? लङको के लिए कोई समस्या नहीं है पर लडकियों के लिए आने वाले भविष्य निर्माण में योगदान देने के लिए पहली सीढी है। अपने परिवार से दूर अकेले अपने मित्रो के साथ 10 दिन के कैम्प में अपने आप को भाग ही नही वल्कि अपने आप को प्रस्तुति भी करना था। हजारो विद्धार्थियो के वीच में अपनी प्रतिभा का अनुसरण भी करना था। सर ने जव कहाँ तव से एक ही वात चल रही थी कि परिवार वाले जाने की अनुसति देगे, या वस लङकी होने का समझोता करना पढेगा।हम सव जो सोंच रहे थे वैसा कोई भी अडचन नहीं हुई वल्कि सहज ही माता पिता से जाने की अनुमति मिल गई। शायद माता पिता जानते थे अंक का अनुदान भविष्य में क्या महत्व रखता है। जहाँ सामान्य वर्ग में कठिनाई से नौकरी मिल पाती है वहाँ यह अंक का अनुदान भविष्य का स्तम्भ है। जिसकी जव आवश्यकता हो तव सिर्फ एक कारण के कारण उम्रभर पछतावा न रह जायें। शायद माता पिता जानते थे, हम सवको जाने की अनुमति मिल गई थी। हम सव सहेलियों में उत्साह भी था और एक अनकहाँ डर भी था जितने विश्वास से माता पिता ने जाने की अनुमति दी है उस विश्वास को वनायें रखना है। जहाँ छोटी छोटी वातो का वतगड वनाके समाज में प्रसाद वितरण कर दिया जाता है वहाँ पर अपने अपने अनुसार मीठे में मसाले मिलाकर चटकारे लेकर वाते कही और सुनी जाती हैं। आज के दौर के सी सी टी कैमरे के रूप में जगह जगह व्यक्ति खुद मिल जायेगे। जिनका यही काम है लडके लडकियो की गतविधियो पर नजर रखना। लोगो का क्या है वस माता पिता पर अपने बच्चो पर विश्वास रखना चाहिए। वही विश्वास को लेकर हम सव वस में वैढकर वृंदावन के रोमाचिंत वृतांत्त पर निकल गये। सहेलियों के साथ पहला और शायद आखरी 10 दिन का जीने और दुनियाँ को अपने अनुसार समझने का मौका था। खुलकर विचारो पर अवव्यक्ति प्रकिया देना, वहस करना तो शामिल ही नहीं था, वस अपने सहेलियों के वीच वाते करना किसी की टाँग खिचाई करना कभी कभी किसी को लेकर परिहास करना तक ही सीमित था। दुनियाँ में क्या हो रहा है क्या सही है क्या गलत है इससे कोई लेना देना नहीं था। शर्म लज्जा तो इस दौर के घूधट है जिससे कभी निकले ही नही कभी निकलने की कौशिश भी करते पर वदनाम के डर के कारण खुद की सुंन्दरता को निखारा ही नही। खुले वाल आँखो में काजल मंद मंद मुस्कान को कभी सामने लाये ही नहीं। हम सव सहेलियाँ एक से एक महान थी अपनी सौंन्दर्य को निखारने की वजाय दवाके छुपाके रखते थे ...अगर सुंदर दिखाई दिये तो कालेज जाना मुश्किल हो जायेगा। मनचले लडके कैसे शव्दो को कह कह के आना जाना दुर्भर कर देगें। अगर किसी तरह की दुराचार की खवर घर पर पढी तो कालेज ही वंद हो जायेगा। हम सव ऐसी भेष भूषा वनाते थे कोई देखे भी नहीं...वालो में तेल डालकर गुथी चौटी ,दुप्पटे को लहजे में सभालके पिनअप करके डालना। सूट सलवार मे कोई विषेश तरह की डिजाईन नहीं वस साधा सूट,वालो को विषेश तरह से कभी सभारा नहीं न कटे न छल्ले निकालना, न हाथो में कंगन वस एक घङी सोभा देती थी। इस तरह का सभारा और इसी रुप में पूरी पढाई कर दी। एक वात जानते थे सजने सभरने के लिए पूरी उम्र पढी है। अव सवकी शादी के वाद व्यक्तत्व में वदलाव है। देखने वाले यही कहते है सव वदल गये है। पोषाक ,अपने सौन्दर्य को कैसे निखारा जाता है, कोई इनसे सीखे। जव जो समय की माँग तव वो करना हमेशा फायदा ही होता हैं।
    हम सव और भी सहपाठी के साथ 10 दिन के कैम्प पर निकल पढे। आर्ट वर्ग और साईस वर्ग के विद्धार्थियो का सम्मिलित कैम्प था। सवके अपने अपने मन में विचारो का आना जाना तो क्रियाशीलता है। वस अपने सफर पर थे हम सव उसके हमसफर लङके लडकियो का संयुक्त रूप से कैम्प था दोनो ही वैठे अपने ही धुन में आंन्नद के साथ सफर पर वढ रहे थे। सिरसागंज से वृंदावन की दूरी 160 किलोमीटर है,आगरा 80 किलोमीटर पढता हैं। आगरा के वाद मथुरा उसके वाद वृंदावन। हम सवकी मंजिल भी वृंदावन में जाके रूक गई।
          वृंदावन के फोगला आश्रम में सवके ठहरने के लिए जगह सुनचित की गई। फोगला आश्रम में जितने भी कमरे थे, सव कमरें राष्ट्रीय सेवा योजना के माध्यम से श्रंमदान विद्धार्थियो के लिए और उनके साथ आये प्रोफेसर के लिए सुनचित की गई थी। एक कमरे में पाँच विद्धार्थी ठहर सकते थे। हमारा कमरा क्रम एक सौ ग्याहर था । यादें जो जुडी थी इसलिए भूलना और भुलाना मुश्किल हैं। लङकियों के लिए अलग और लङको के लिए अलग व्यवस्था थी। एक तरफ लङकियों के लिए क्रम अनुसार आश्रम के दूसरे हिस्से में लङको के लिए। अगर कहाँ जायें कार्य के उपरान्त कोई भी लङका या लङकी एक तरफ से दूसरी तरफ आ जा नहीं सकता था। अनुशासन का पहला पाठ यही था। जितना सरल हम समझ रहे थे उससे कठिन अनुशासन होने वाला था।
      सव महाविद्धालय के विद्धार्थियों को प्रागण में वुलाया गया। 10 दिन की कार्य तालिका और अनुशासन के प्रति नियम वताना था, उन सव नियम का अनुशरण करना था।अनुशासन का पालन नहीं किया तो सजा तो कुछ नहीं थी पर फिर भी भुगतान करना पढता था। अनुशासन और नियम इस प्रकार थे....सुवह की चाय विस्तर पर नहीं मिलेगी इसी प्रागङ में प्रार्थना के उपरान्त चाय नाश्ता मिलेगा। 8 वजे तक सवको उस प्रांगङ में उपस्थित होना था। 9 वजे जो कार्य दिया जायेगा उसका अनुशरण करना था। 2 वजे द्रोपहर का भोजन ....4 वजे कार्य प्रणाली ...6 वजे शाम की चाय, 8 वजे शाम का भोजन,9वजे सांस्कृतिक कार्यक्रम में प्रत्येक महाविद्धालय के विद्धार्थी को भाग लेना था। कैसे कौन कव लेगा इसके लिए एक दिन एक विद्धालय के विद्धार्थी प्रदर्शन करेगे। अपने अपने विद्धालय की तरफ से एक लङकी और एक लङका को संचालन कर्ता की तौर पर नियुक्त किया गया। हमारे विद्धालय की तरफ से माधवी को संडालन कर्ता वनाया गया। जिसका दायत्व था कि समय से प्रागड में उपस्थित रहने के लिए सवको कहना। कहाँ जाये तो अर्लाम का काम करना था। कोई वात अपने विद्धालय के प्रोफेसर से कह सके ...उस संचालन कर्ता से वाकी लोग अपनी वात को रख रखे और उस  समस्या का समाधान किया जा सकें। प्रागंङ में समय का पालन नहीं किया तो सजा के तोर पर चाय के उपरान्त चाय नहीं मिलेगी, भोजन के उपरान्त भोजन नही मिलेगा। समय का विषेश ध्यान रखना था। यह अनुशासन जीवन में हर चींज का महत्व दर्शाने ने लिए व्याप्त थे।
      पहला दिन तो एसे ही वीत कहाँ, दूसरे दिन का आगाज हुआ। सुवह 8वजे प्रागङ में समय से पहुँना था। सव जोश के साथ उठे अपने दैनिक कार्य से पूर्ण होके सवसे पहले पहुँच गयें। सवसे पहले मै उठ गई क्योकि मुझको स्नान करना होता था...वरसो से एक नियम था विना स्नान किए अन्न न ग्रहण करती थी। अव कोई नियम वना लिया है तो उसका पालन करना स्वयं पर होता है। अपने सुविधा के लिए वना लिया अपनी सुविधा अनुसार तोङ लिया। जीवन में कोई संकल्प न करो अगर करो तो उस संकल्प को पूर्ण करना उतना कठिन है जिस प्रकार हिमालय पर चढना। मेरा कोई संकल्प नहीं था वस इतना था स्नान तो रोजाना करना है तो स्नान करके के उपरान्त ही भोजन किया जायें। वस उसका की पालन कर रही थी। आस्था का दीपक कही प्रज्जलित किया जा सकता हैं। वस आस्था होनी चाहिए..यह हमारी आस्था थी कि नवम्वर के महीने में ठण्ङे पानी से सुवह सुवह स्नान करना। जोश के साथ सव प्रागङ में एकत्रित हो गये। प्रार्थना हुई सवको टीम रूपी एक एक दिन प्रार्थना करनी थी। प्रार्थना के उपरान्त चाय नाश्ता किया। 9वजे पंक्तिवंद हाथो मे झाङू लिए, गली गली सङक सङक निकल पढे. यह नजारा देखने वाले की कमी नहीं थी।2002 में अगर मोदी जी प्रधान मंत्री होते तो हम सवका नाम भी स्वच्छता मिशन में अंकित हो जाता। स्वच्छता जैसा कार्य भी किया था। गंधगी से लिप्त गोविद कुंङ को कहाँ जाये तो जीण उद्धार करने का दायत्व हम सवके ऊपर ही था। जिस कुंङ में मिट्टी और कचङे से पटा पढा था उसमें पानी संरक्षण के उद्देश्य से कार्य किया जा रहा था। सव टीम वनाके कार्य कर रहे थे। चैन वनाके तशले में मिट्टी और कचङा वाहर निकाला जाता था। फवङा कुदाल से खुदाई की जाती थी। आश्रम से तो स्वेटर पहनके आते थे और यहाँ मेहनत रुपी पसीने से पहने हुए कपङे भीग जाते थे। पहली वार मजदूर का एहसास हुआ वह कितनी मेहनत करते है और यहाँ थोङी सी मेहनत में माथा पकङ के वैठ गयें। कुंङ का तो पहला ही दिन था तव यह हाल हो गई थी। द्रोपहर के भोजन के समय अनुसार आश्रम में पहुँच गयें। जिसको स्नान करना था जो भी करना था करे। पर आराम का कोई समय नहीं मिलना था। 4 वजे कोई न कोई अतिथि का आगमन होता था, अपने विचारो से चेतना जगाना चाहते थे पर यहाँ सवको उनके गलत समय पर भाषण झुलझुलाहट ही लाते थे।
        भोजन का प्रवंध तो अच्छा था। हर दिन नया नाश्ता,द्रोपहर के भोजन में और शाम के भोजन में अलग अलग सूची अनुसार वनाने का आदेश था। थकान और भूख से व्याकुल भोजन देखकर  पहले पाने की चाह में अनुशासन भूल जाते थे। यह दृश्य शादी समारोह से कम नहीं लगता था। मेहनत करने के वाद का भोजन का स्वाद क्या होता है ,इससे सव भली भाति परिचित हुए थे।
रात्रि को सांस्कृति समारोह में अपने विद्धालय को उच्च दिखाने की प्रतियोगता जन्म ले चुकी थी। हमारे विद्धालय की प्रतिदिव्द्धी आगरा विद्धालय के सेनजोंश से था। हमारे पास कोई अभिनय प्रस्तुति करने के लिए साज सामान नहीं था। उनके पास उस अभिनय को प्रस्तुति करने के लिए साज सामान था। शायद उन्होने पहले से ही रूपरेखा तय करके ही आये थे या साज सामान मंगाया था। अपने विद्धालय को उच्च विजय वनाने के लिए सोये हुए अभिनय जागने लगे, चुप्पी तोङके वोलने लगें। इस तरह के अभिनय निकलने लगे थे जिसको देखकर पहली वार देखने वाले दाँतो तले उँगली दवा लें। अभिनय प्रस्तुति के वाद खुद पर यकीन करना मुश्किल होता था। सरस्वती वंदना, कविता पाठ, गीत ,नाटक प्रस्तुति ,पागल का अभिनय,शरावी का अभिनय। उस वक्त तक मेरी कोई चेतना जागृति ही नही हुई थी अगर हुई होती तो स्वयं रचित कविता पाठ या नाटक की रूप रेखा से परिचय कराते। तव मेरे मन में एक अनयास, डर, शर्म, झिझक ने अपना कव्जा कर रखा था और आज कोई डर नहीं है मेरे यह करने से परिहास का पात्र वनूँगी, या शावाशी का वस अपने अंदर वसते शैलाव, करूणा, मात्रत्व, दोष को शव्दो मे पियोके प्रस्तुति कर देते हैं। जैसे जिसने सांस्कृति के रूप मॆं परिचय दिया आज भी सवके ह्रदय में न मिटने वाली छवि वनके वस गई है।
     अनुशासन ने सवको लाचार वना दिया था। वेचेनी चिङचिङापन सिरदर्द क्रोध ने अपना वसेरा वनाना सुरू कर दिया। गोविंन्द कुंड की सफाई के दोरोन पसीना के दुवारा पानी वाहर निकल जाता है ,ऊपर से गर्मी मेहनत करने के वाद थकान ,न आराम के लिए समय मिलना वस समय प्रणाली के दुवारा कोई न कोई कार्य होता रहता था।जिसके कारण अचेत होते विद्धार्थी की हालत खराव हो रही थी। 2 वजे वाद  थक के चूर हो जाते थे कि आराम मिल जाये थोङा सो लिया जायें पर  कहाँ आराम था। किसी न किसी अतिथि का आगमन होता था, मस्तिष्क को पकाने वाले कोई न अमल करने वाले भाषण से रूवरूह होना पढता था। न भूलने वाली घटना ने अपनी दोस्त से झगङा करक लिया। एक तो सिर में दर्द हो रहा था मेरी वार्तालाप में हिन्दी के समावेश के साथ ग्राम की भाषा का मिलना एक कारण है। मेरी सहेली शुभचिन्तक हमें सुधारने के लिए कहती भी है पर वह समय न सोंचने का न सुधरने का होता है । जव क्रोध पर अंकुश न हो तो सही कथन भी गलत ही लगता है। यह भी तो गलत है हमको कैसी भाषा मे वार्तालाप करनी है. क्षेत्रीय भाषा हमारे शरीर पर रंग रूप के समान है खुद को सुंदर दिखाने के लिए चहरे को सौन्दर्य प्रसाधन दुवारा छुपा लेने से क्या सत्य को छुपाया जा सकता हैं। नही भोजपुरी हरियाणवी जैसी मिठास नही इसलिए व्यक्तत्व निखरने की वजय उस ग्रामीण रुपी भाषा के कारण दव जाता हैं। वह दौर था ही किसी की न सुनना जो हम है वैसे ही खुश है। आज भी जव हम वादविवाद के लय में आते है तव ग्रामीण भाषा का ही प्रयोग करते है। हमको वातों की चाशनी में हिन्दी और अग्रेजी के शव्दो का मिश्रण करके परोशना नहीं आता हैं। इसलिए पहली वार मुझसे मेरी वातो से प्रभावित न होनो स्वाभाभिक है। दिन प्रतिदिन सम्पर्क में रहने से शायद मेरी वातो के साथ जीने की मजवूरी होती है या मेरी आदत से समझोता कर लेते है। मै भी मानती हूँ अपने व्यक्तत्व को निखारना है तो शव्दो की चाशनी में मिश्रण करना ही पढेगा। हमारी वातो में चाशनी न होने के कारण नमकीन मठरी सवको खानी पढती है कोई मीठी खाना चाये उसके लिए मीठी नही है। खा इसलिए कभी नमक का स्वाद वनके रह गई ।  सव शुभचिन्तक होने के वावजूद अकेला महसूस होता हैं। अव यह सव सोंचना छोङ दिया हैं। हमें कोई स्वीकार करे तो ग्रामीण रूप  के साथ न कि रूप पर पर लेप लगाके। हमारी वार्तालाप का क्या स्थर है उसी स्थर के साथ। हमें आज भी पढे लिखे उच्च दिखाने के लिए  हिन्दी कम अग्रेजी का अधिक प्रयोग करते है,या दिखावा करते है कि हम आज के वातावरण के साथ मेल जोल करते है। हिन्दी में वोलना लिखना नीचता दिखना जैसा समझते हैं। अगर ग्रामीण भाषा में वोलने लगे तो उसको जाहिल गवार की उपाधी से सम्मान करते है। यह हमारे देश की सवसे वङी समस्या है इसी के कारण प्रतिभाये पहचान के वावजूद खो जाती हैं। हम भी झूठे दिखावा के वीच में अपने आपको को जकङा सा महसूस करते है। सवके पास सामने को पढने की दृष्ठी है यह तो आप खुद जान सकते है कि सामने वाला कितनी आपको इज्जत दे रहा हैं या अपको नीचता दिखाने की कोशिश कर रहा हैं। हमें अपनी भाषा के कारण अपनी सहेली से झगङा भी करना पढा। वात इसके उपरान्त कुछ और भी थी .. अपनी दोस्त से ही अपेक्षा करते है कि वह समझे, घर पर वंदिश हो,न समझने वाला हो  दोस्त से ही उम्मीद रखते है। जव वह भी परिवार की तरह करने लगे तो क्रोध आ ही जाता है। उसी क्रोध की अग्नि में  अश्को के सैलाव उमङ पढा था । हम दोनो को और सहेली मना रही थी, पर इतना जरूर था किसी ने किसी की गलती नही वताई न किसी का पक्ष लिया। वैसे हम में कभी भी झगडा नहीं होता है। यह भी एक यादगार पल है। मुझे कोद्ध बहुत जल्दी आ जाता है जिससे रिश्ते विगङ जाते है पर दूसरी तरफ धैर्य, शाहस,अपनत्व की कला में पारगंत रूची है सवको मोहने वाली हैं। उसकी वातो से ही लोग प्रभावित हो जाते हैं। मैने कभी उसके चेहरे पर क्रोध की रेखाऐ नही देखी हैं। जहाँ भी जायें सवको मन मुग्ध करने वाली अनौखी छवि है।रश्मी के पास वातो का पिटारा है पर उन वातों में भी एक कला है सवको अपनी तरफ आकृषित करने की। उस दौर में सुनना नई चीजो को जानने की जिज्ञाशा रहती है। सवको उन वातो में वाँध कर रखना। यह एक कला है जो आज कही खो गई है। माधवी वस हाँ में हाँ मिलाने वाली है किसी के प्रति न वढा चिढाकर वयान करना न भडकाना एक दूसरो की गलती नहीं निकालती वल्कि पर्दा डालकर आगे वडती है। सवको  प्रेम से वाँध कर रखना,अलग ही निराला ढग हैं। सीमा अपने नाम के प्रति ही ही कभी सीमा का उंलघन नहीं किया,अपने ऊपर विश्वास का स्थर वरकरार रखा है,चाये वो दोस्ती के प्रति या घर परिवार के प्रति आदार की भावना रही है। अंजुल ने अपने पढाई के क्षेत्र में हर साल उच्च अंक  के कारण प्रतीक रूप में चाँदी के सिक्का के रूप मे सजोके रखे है। हम सव में कभी भी प्रतियोगता किसी भी कार्य के लिए नहीं रही । पढाई के लिए साज सामान में एक दूसरे की मदत के लिए विना कहे खडे रहते थे। पीठ पीछे चुगली करना उसके मुँह पर उसकी तारीफ और उसके मुहँ पर उसकी तारीफ किसी और की चुगली करना, कभी जाना ही नहीं। किसी अन्य को हमारे मध्य हस्तक्षेप करने पर उसको मुहँ की खानी पडती थी । हम सव एक दूसरे की तागत थे। कोई भी एक दिन न कोई आये तो कालेज में मन नहीं लगता था। इन्ही पलो के कारण वीते पल वहुत याद आते हैं। सवको एक दूसरे को सभालने के लिए हम मिलके खङे रहते थे। इसी के कारण कोई सैध न लगा सका, तो आज कैसे अकेले रह सकते थे। हमको और रूची को मनाया गया दोस्ती में जायदा देर तक नाराजगी ठीक नहीं हैं।
        अनुशासन ने जीना दुर्वर कर दिया था पर हमको सीखना जरूरी था कि मजदूर दो वक्त की रोटी के लिए कितनी मेहनत करते है। मेहनत के वाद भोजन का स्वाद वङ जाता हैं।सैनिक अनुशासन का पालन गम्भीरता से करते है उनके सामने तो यह कुछ भी नहीं हैं।
कही कही प्रेम के अंकुर भी फूट रहे थे, पर यह उम्र ही ऐसी है। सवकी अपनी अपनी सोंच है उसको नजर अंदाज करके आगे वढते है या प्रेम के कल्पनाओ में गोते खाते है। घर से अलग रहने की पहली विदाई का एहसास था। कहता कोई नहीं था पर रात को छुप छुपके नीर रिसते जरूर थे। आज के जमाने के फोन की आजादी तो  नहीं थी, टेलीफोन से ही भवनाओ का आदान प्रदान होता था। पर यह सुविधा भी हर घर में सुलभ नहीं थी। आस पङोस या टेलीफोन वूथ का प्रयोग करके ही की जाती थी। जिसके घर पर टेलीपोन था ,उन सवने टेलीफोन वूथ पर जाकर वात की। वात करते करते भावनाओ के नीर रिस कर टप टप गिरने लगें। सबने एक दूसरे को सभाला फिर हँसी के गप्पे वातचीत, टाँग खिचाई मंजाक करने लगें। दिन भर की थकान तो होती थी पर देर रात जागते रहते थे, यह पल जी लेना चाहते थे, कल फिर या दुवारा साथ साथ गुजारने का मौका मिले न मिलें। एक एक कर के दिन गुजरने लगें। आखरी के दो दिन  शेष थे।
         सुवह से शाम तक अनुशासन और समय के अनुकूल सारणी का अनुसरण किया। प्रोफेसर सर ने कहाँ किसी को रंगोली वनानी आती है। हम रंगोली वनाने का प्रयोजन समझ न पायें. सवने मना कर दिया इससे पहले झाडू हाथ में लेकर नारे लगाके गली गली गुजरते थे। नारे लिखने के लिए कहाँ गया था. सिलोगन क्या वला होती है इससे अनभिग्र थे। आज दीवाली पर रंगोली सवसे अलग और सुंदर दिखने के लिए तरह तरह की डिजाईन वनाते है। सिलोगन  वच्चो के कार्यकिय्रा में यह सव सामिल हो चुका है अव कुछ भी नयापन नहीं है। वस हमारे जमाने में नया था। दो लाईन के नारे भी न दे पायें वस हँसना और टाँगखिचाई अपने दिवा स्वप्नो में ही खोये रहते थे। अच्छी तरह सांस्कृतिक कार्यक्रम में भाग लेने के वावजूद दूसरा स्थान प्राप्त कर सकें। आने वाले अतिथि के स्वागत में हमने रंगोली नहीं वनाई वल्कि आगरा विद्धालय से जोन्स के विद्धार्थी ने रंगोली भी वनाई और सिलोगन भी नारे भी लिखे। इसी वजय से उनका प्रथम स्थान आया। कौन अतिथि आने वाला है इन सवसे हम अनभिग्र थें। हम एक दूसरी जगह जाने का आदेश मिला, जहाँ सामने सुंदर सा पार्क था ...पर हमको इधर उधर भटकने की आजादी नहीं थी। एक कक्ष में जाकर वैठ गयें। रोज की तरह अनचाये भाषण सुरू हो गये। इतना कहाँ गया आने वाली अतिथि मान्य उमा भारती है , किसी को भी फोटो खीचने की सक्त मना थी। हम भी कैमरा ले गये थे पर सव फोटो नि किय्र हो गये। तव रील लगाई जाती थी फोटो खीचते समय कैमरा जमीन पर गिर गया और रील वाहर के वातावरण के सम्पर्क में आ कर खराव हो गई। कैम्प की गतिविधी के लिए फोटोग्रापर और रिकोडिग भी होती थी । सव विद्धालय के विद्धार्थी को ग्रुप फोटो खीची गई थी।
      देर तक इंतजार करने के वाद मान्य उमा भारती आई..आते ही अभिन्नदन में सव खङे हो गये फिर अपनी अपनी जगह पर वैठ गये। शांत होने का आदेश और अनुशासन में रहना था। उमा भारती ने सव में से किसी एक को खङे होने का आदेश दिया. यह देखकर हम सव भी नजर चुराने लगे कि हमको खङा न कर दें। कुछ सवाल पूँछे शायद कुछ कार्य चल रहा था उसकी जानकारी के लिए खङा किया था कि कैसा काम चल रहा है। यह सव जाने के वाद पता चला, किसलिए खङा किया था। अव सवको प्रमाण पत्र देने थे.. सवसे अच्छा काम करने के लिए वही प्रमाण पत्र दिया गया। एक उस लङकी को जो काम के दोरान अचेत हो गई थी । दूसरा गुंजन को जव हमने सुना तो दंग रह गये सवके मन में प्रश्न था ऐसा क्या अच्छा कार्य किया जिसके कारण प्रमाण पत्र मिला है। तव मेरी सहेली ने वताया इसके पापा देतागिरी में रहते है। हम जव आश्रम में थे , तव साँझ को इसके पापा यहाँ के संचालन से मिलने आये थे। उस वक्त पहली वार राजनीति का दाँव समझमें आया। अच्छा कार्य नही वाहूवली रूपी नेता की चाकरी से वहुत कुछ वदला जाता है। उसी वदलाव का प्रमाण मेरे नजरो के सामने है नेता आये अपना परिचय दिया और वाह वाह लूटी सर्वोच्च का प्रमाण पत्र  दिलवा दिया।  कभी तो वच्चो को खुद कुछ कमाने दिया करो ...क्या हर जगह राजनीति ठीक नहीं है। हमारे घर से या किसी और के घर से तो कोई आया नहीं था फिर यह क्यो आयें? मौका को भुनाने तो नेता ही जानते है। इतना वढा कार्यक्रम अधिकारी की देखरेख में किया जाता है ऐसे आयोजन सरकार ही कराती है जहाँ कुछ सीखने को मिले सदभावना जागृति हो एक अच्छे इंसान वन सकें। पर हर जगह नेतागिरी बहुत से सवाल छोङ जाती हैं। जो हुआ सो हुआ पर हम सवको इन प्रमाण पत्र से मतलव नही था। वस पल दो पल मायूसी फिर से मुस्कान,इसी के साथ कार्यक्रम की भी समाप्ति हो गई। इतने दिन अनुशासन के दायरे में रहकर सीखा ही था ,वक्त की कदर सिखाती है कल पर नही टालना जो करना है आज ही करो,कल पर टाल दिया तो मुट्ठी से रेत फिसल जाने जैसा अनुभव होता हैं।
             वृंदावन में आये है और मंदिरो के दर्शन न करे तो ऐसे कैसे हो सकता है। वृजवासी होने का आज खुद सजोने का मौका था। थकान और अनुशासन की वेङियो से आज पंछी आजाद हो गया था। कही भी किसी को जाने की अनुमति नहीं थी। संचालन कार्य प्रणाली पर हम सवकी जिम्मेदारी थी। यह दौर ही था मन मर्जियो से जीने का उचित अनुचित में फर्क नहीं कर पाते है वस सव इसमें फँस जाते है एक वार करना तो चाहिए फिर चायें उसका परिणाम उचित हो या अनुचित। इसी को ध्यान में रखकर वृंदावन में घूमने यहाँ वहाँ जाने के अनुमति नहीं था। आज अनुशासन से आजाद है निकल पढे वृंदावन राधा कृष्ण के पावन कण कण से धुन गूजने जैसा महसूस होता है। अव प्रश्न होगा हम तो कही वार गये है हमको तो ऐसा सुनाई नहीं दिया। जव मन में भक्ती की चरम सीमा का आलंघन हो, जग में व्याप्त हर जीव में कृष्ण राधे की अनुभूति होती है तो फिर वस काँनो में एक नाम ही गूंजता है श्री राधे राधे ...... वृंदावन के वासी राधे राधे कह कर ही आभार,सम्वोधन प्रकट करते थे। हाय हैलो नमस्कार, हाथ मिलाना जैसा प्रकट नहीं करते थे। राधे राधे कहने में वृजवासी होने का अपना ही आन्नद है ऐसा लगता है  बहुत कुछ वदल रहे है पर सुंगध तो वही है जिसको कैसे वदला जा सकता है। गुलाव को किसी में सम्मलित करो पर खुशवू को वदला खुद से छलावा करना जैसा है। हम सवके सामने अपने वास्तविक को छुपाके आज के परिवेश में जीने की कोशिश करते ,पर हिन्दुस्तानी ही रहेगे जिसकी पहचान कण कण में ईश्वर वसते है। वृजवासी है तो राधे राधे, रघुवासी है जय श्री राम....राम राम की ध्वनि रोम रोम में वसती ही है। ढोलक मजीरे के संग राधे राधे के कीर्तन गान तो गली गली की सोभा हैं। अग्रेजो ने निर्माण कराया मंदिर प्रसिद्ध है अग्रेज भी वहुत थे जो हमारी संस्कृति में खोते देखे राधे राधे के गान में खुद को सम्मोहित करते देखा। लम्वा टीका केसरिया धोती कुर्ता रंग गोरे से पहचान होती थी कि यह अग्रेज है ....मन में एक अटूट विश्वास की चेतना जाग रही थी ...मुरली वाले की छलिया आकृषित आभा में एक वार कोई आयें तो अपने छलिया में अपना ही वना लेते है इसका प्रमाण हम मंदिर में देख रहे थे। वैसे तो गली गली में मंदिर है ..पर जो हमें विशेष अपनी गाथा कहते थे वहाँ वहाँ गयें। गोविंद कुंड से कही कुंड थे उनमें जल था। हर मंदिर में एक वात थी मंदिर के पट समय समय पर खुलते थे। रास लीला की पोषाको से एक घर शोभामान हो रहा था वहाँ पर हर सामान रखा हुआ था। कठपुतली का सामान वढा सा नगाडा, रंगमच का वङा सा मंच। सवको अपनी और आकृषित करता था। दुकानो पर वाल गोपाल के पोषाको से सजी थी दुकाने, प्रसाद और पूजा सामग्री से गली गली सुंगधित हो रही थी। वृंदावन प्राणी को भक्तिमय के अथार्य सागर में लेती चली जाती है....उस भक्ती को कुछ शव्दो में कहना वेईमाने होगी।

         अव घर लोटने का समय आ गया था, पर जाने क्यों ऐसा लग रहा था जैसे कुछ छूट रहा हैं। ऐसे पल अव कभी नहीं लोट के आयेगे। यह पल जीवन के सवसे खूवसूरत यादे होती है...न कमाने की,न कल के लिए वचत की वस खुद के सपनो में जिये रहते है। घर से जायदा स्कूल कालेज में अच्छा लगता हैं। खुद के अंदर झाँकने का मोका मिलता है, खुद से मिलते हैं। नये परिवेश में जीने का पहला पढाव यही है। अच्छे साथी मिले तो जीवन सार्थक होता हैं। यही संगत गलत हो तो जीवन नासूर वन जाता हैं।बहुत कुछ सीखते है पर यही पल याद आते है। दायत्व के माया जाल मे इस कदर जकड जाते कभी फुरसत के पल भी जी सकें। कभी विछङे मित्र से सामना हो जायें तो वस देखकर यही लगता है काश कोई छडी होती घुमाकर वीते पल मे चले जाते। इस माया चक्र के दायत्व में ऐसे फँसे है कि सुगम सरल नेट के दुवारा भी वातचीत नही हो पाती हैं। बहुत कुछ वदल गया है,सोंच विचार. परिवार माहोल.....इसी वीच में जी भर के हँसना ,टाँग खिचाई,मजाक एक दायरा वन गया है...उस दायरे से निकल कर परिहास किया तो कही रिश्तो में दूरी न आ जायें। इतने सालों मे बहुत कुछ वदल गया है। जो पहले चुप चुप रहती थी वो वोलना सीख गई,सवाल जवाव करना,तर्क वितर्क, सही गलत कहना सीख गई। सवका व्यक्तगति पहले से वदल गया है। भाग दोड की जिंदगी में दोस्तो को याद करने का समय भी नहीं हैं। पर आज खुलके विचारो को कह सकते है पर फिर भी सीख देना दूरी को वढाती हैं। किसी को अपनी वात को थोपना नहीं चाहिए वस आज की यही चाह है। सवको अपने अनुसार जीने का हक है अपने अनुसार वोलने का हक हैं। जो जैसे परिवेश में रहता है उसे वैसे ही आदत हो जाती है। जो तुम अपना समझ के कह रहे हो उसको वही वात गलत लगें। यहाँ शुभचिन्तक का दृष्ठी कोण इतना है जैसे भी हो जहाँ है वहाँ खुश रहो..कोई भी वला न आयें।  साथ में हँसना जीना वो जाने कहाँ गये पल........



शनिवार, 18 नवंबर 2017

होती साकार आशायें

सोशल मीडिया हृदय को गति दे,
वो जीवन दायनीय नेट संचार हे।
सूखे पढे वृक्षो पर कली खिले,
उम्मीद चमकाने का श्रोत है।।
दाम दण्ड भेद से सोशित मनु,
जन जन तक सम्पर्क सुलभ है।
बस एक सवूत ही आधार है,
विद्धुति प्रकाश विखेरता अद्भुत है।।
आम की भी आशा खाश हे,
दृश्यम से शुशोवित अभिनेता हे।
रुप ओर अदाओ का समावेश,
घर 2 बसता अभिनय का संगम है।।
चुप्पी और लाज को छोडकर ,
हृदय में गुलाटी मारती कुंज है।
छुपी प्रतिभाओ का होता आदान प्रदान है,
मिला खुला रंगमच अद्भुत खिलती कलायें है।।
सिसकती कोसती खो जाती वास्तविकता,
नेता, अभिनेता, गायक, कवि इत्यादि।
शिक्षा,सास्कृतिक,क्रयाशीलता घुमडती,
सबकी आशाओ में महकती मेघ हैं।।
प्रेम के अंकुर को फलाती राश है,
एक छोर से उसपार छोर तक जाती।
अभिवेदना विचारो का होता समागंम है,
भिन्न देश,भिन्न सास्कृतिक होता पाणिग्रहण है।।
विवेक,चेतना, रहस्यमय, जागृति होती आत्मा,
स्वंय चिन्तन मनन सोर्यमय प्रज्ज्वलित होती।
साक्ष्य प्रमाण की तय तक जाती ज्ञानेद्रियाँ,
स्वयं विकल्पों से  परेह लेती फैसला।।
हानिकारक.......
वैठे है मस्तिष्क को शून्यहीन की चाल में,
मस्तिष्क पर पंग डालू करु नियंत्रण में।।
जैसा मैं चाहूँ जी हजूरी कराऊँगा।
न दिखलाऊँगा फिर भी मन भटकाऊँगा।।
देश के देश में सपोले को जगाऊँगा, 
वैठकर मैं वंदो को वंदो से झगडाऊँगा।।
मस्तिष्क पर पंग है मेरा जिहाद रचाऊँगा,
देश को देश के वंदो  से ही लडाऊँगा।।
मस्तिष्क में पडौसी षड़यंत्र रचायें वैठा है,

व्लू व्हेल गैम के पीछे शादिश छिछोरी है।।
आत्मदाह का खोपनाक खेल विकराल हो,
मानव वम्व वनाके  स्लीपल सैल वनादे।।
देश भी अपना देशवाशी भी अपने है,
अपनो में जघन्य खेल खेलता दुशाशी हैं।।
वाल्यकाल की अवस्था पर पानसाईड दुराचारी है,
अवस्था चायें कोई भी हो विचलित की भम्रमारी है।।
विश्वामित्र की तपस्या में विध्न अतियारी था,
मानव की चेतना पर यह पहरा भटकाता है।।
रिश्तों की मर्यादाओ को छिन्न भिन्न कर जाता है,
विश्वास पर प्रश्न चिन्ह घृणाशील बना जाता है।।
विचलित क्यों होते हो?भ्रम के अधीर क्यो होते हो?
यह तो व्रह्मा ने  काया में गुण अवगुण समावेश है,
हर वस्तु में दो गुण एक में ही समावेश है।।
जिसका अनुसरण कर लोगे वही निखर जायेंगा,
ईख की परिभाषा से पारितोषित करते है।
ईख से निकले रस से वनी मिठाई का उपभोग करो,
ईख से निकले रस से वनी मधुशाला देह त्याग करो।।
सोचो सोचो......निर्णय है तुम्हारा....
हम तो एक ही वात जाने है,
शोसल मीडिया हृदय को गति दें,
वो जीवन दायनीय जीवन संचार है।।
सरल सुगम आदान प्रदान करे ,
स्वप्न से साक्षातकार करे नेट संचार है।।
script async src="//pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js"></script>
<script>
     (adsbygoogle = window.adsbygoogle || []).push({
          google_ad_client: "ca-pub-7707985376803549",
          enable_page_level_ads: true
     });
</script>

गुरुवार, 21 सितंबर 2017

एक पल ठहरी नज़र

एक पल ठहरी नज़र मुझपर मैं ढूँव गया उनकी नज़रों में,
खुद का पता भूला  ढूँडता फिरता उनका पता गलियों में.!!
मंज़िल तो खुद का भूल वैठा हूँ उनको अपनी मंज़िल बना वैठा हूँ,
वक्त की रफ्तार बड गई है या मेरे सब्र का इंतहा ले बैठा हूँ!!
खुद का पता भूला.......पता गलियों में
फिरती है झलक बस उनकी मेरी आँखो में अपना नाम भी भुला वैठा हूँ,
मिल जायें एक वार पूछूँ तो ऐसा क्या किया जादू तेरी जादू में खो वैठा हूँ!!
खुद का पता भूला .....पता गलियों में
खिलते ओठ सरमाती अदा जुल्फो की बरसती घटा यादें ही याद कियें वैठा हूँ,
उतरता नहीं उसका असर दवा उसी से लेने की दुआ किये वैठा हूँ!!
एक पल ठहरी नज़र मुझपर मैं ढूँव गया उसकी नज़रों में....
खुद का पता भूला ढूँडता फिरता उनका पता गलियों में....

बुधवार, 13 सितंबर 2017

विधा....कुण्डलिया
लिखवत मिश्रण भाष्य,नीर भयो शंरवत।
हिन्दी विदेशी घुलकर,बदलो काया कल्प!
बदलो काया कल्प प्यास में कौन सो उम्वीद।
शान से चलें चौडी छाती लघु भयो गम्भीर!!
विदेशी के लपेङे में शंरवत अंजुमन की शान।
प्यास में करें त्रृप्त शंरवत नहीं नीर की आस।।
  
आकाँक्षा जादौन

मंगलवार, 29 अगस्त 2017

'प' का देखो कारनामा

'प' का देखो कारनामा,
जब2 हद से गुजरता है,
आखों में आसू और,
हृदय पर प्रहार करता है!!
आधा प और हे घातक,
क्या 2कौतक करवाता है!!
प्यास लगें जन सबको,
जन सग्राम करवाता हैं!!
राजा रंक हे अधीर सब,
नत मस्तिक झुकवाता हैं!!
प्यास की ऐसी तृष्णा,राजा को
रंक चौखट पर झुकवाता है!!
प्यार का ढाई आक्षर क्या2,
अपनो से ही विद्रोह करवाता हैं!!
भूल के कर्मानंद होके बसीभूत,
प्यार का रोगी जन बन जाता है!!
छिङ जाते हे युद्ध महा संग्राम,
लाशो के अम्बार लगवाता है!!
कुल के कुल मिट जाते हैं सब,
प्यार की गाथाये अमर करवाता हैं!!
अब एक कढी और जुङी है,
प्याज भी संग्राम करवाता हैं!!
नेताओ का बनके मुद्दा देखो?
सत्ता चौकीदारो को गिरवाता हैं!!
मुद्दा लेके अखाङे सज जाते है,
गिराके खुद राजा बन जाता हैं!!
आधा प जख्मी शेर शा घातक,
खूखार' प 'बन तब जाता हे !!
प का देखो कारनामा,
जब2 हद से गुजरता है!!
आखो में आसू और,
हृदय पर प्रहार करता हैं!!

जिदंगी की रेल हे रिस्तो का मेल हैं

अजब ये खेल हे गजब ये खेल है!
जिदंगी की रेल हे रिस्तो का मेल हैं!!
प्रिया और लाल में कौन करीब हैं!
असमज्स्य में सबकी कैसी प्रीत है!!
जिंदगी का नया पङाव अंजान  है,
थाम के हाथ होता संगम हैं!!
छोङ के मायके की किलकारी,
जिदंगी के बुनते ताने बाने हैं!!
नई पहल को पल पल समझना ,
मन को एक डोर से जोङना है!!
प्रिया की कोई अनछुई बात भी,
जख्म की बजह बन जाती है!!
धीरे धीरे ये तकरार जाने कब,
खुसियो की चाबी बन जाती हैं!!
आगन में आती हे जब खुशी,
मात्रतृत्व का तब सुख देती है!!
वेटे की अठखेली में हम तब,
परम सुख में डूब जाते हैं!!
लाल की हर आकाक्षो में हम,
नत मस्तिक होकर जीते जाते है!!
बचपन में कोई भी बात हमको,
जख्म नहीं सुख की अनुभूती करती है!!
लाख शिकायते आती हे तब,
मेरे लाल को यूही करते बदनाम है!!
पत्ती की अन्जानी बलाओ से बात,
हृदय पर जख्म करती जाती है!!
घर से बाहर जाते हे काम काज ,
डर लग जाता हे अंजानी अनीती से है!!
प्रिया और लाल की आँख मिचौली में,
लाल जीतता हे तो जिया खुश होता हैं!!
समय का चक्र बढता जाता है,
प्रिया का रस गुण बन जाता है!!
लाल बाते छुपाना सीख गया ,
झूठ बोलके बहलाना आता हैं!!
माँ फिक्र करती दिन रात है,
लाल को माँ की स्नेह की नहीं चिंता है!!
प्रिया को अब मेरे झीक पर भी,
डाँक्टर के पास ले जाते है!!
हो अगर कोई पीङा अब तो,
रात जाग कर मेरे साथ काटते है!!
जो चोट देती हे मुझको वो काम,
अब नहीं करते करना चाहते है!!
मेरे कहने से पहले ही सब अब,
इशारो में ही समझते जाते है!!
लाल हो रहा दूर मेरे खेल में,
ममता में कोई नहीं कमी है!!
दुनिया के रंग में रच गया लाल,
आई बहु तो और भी रंग बदला है!!
माना पत्नी संगिनी तुम्हारी है,
कर्तव्य हे सुख दुख को साँझा करना है!!
जितना हे फर्ज लाल का निभाता हैं,
बनता बुढापे की ज्योति लाल है!!
निकळता कोई जालिम लाल है,
तो बीतता बुढाप बृद्धा आश्रम है!!
पर प्रिया बुढापे में हम सफर है,
हम हृदय हे काया रूप प्रिया हैं!!
ज्योति बनाया हे लाल को हमने,
कब छोड दे साथ हमारा है!!
ममता फिर ही निस्वार्थ माँगती,
लाल की सलामत की दुआ हैं!!
प्रिया से बढा न कोई हे हमराज है,
बुढापा देता हे सबसे एसहास है!!
अजब ये खेल हे गजब ये खेल है!
जिदगीं की रेल हे रिस्तो का मेल है!!

बुधवार, 16 अगस्त 2017

कहने को आजाद हूँ,

कहने को आजाद हूँ,
मगर आजाद हूँ कहाँ?
नापने को आकाश हैं,
मगर जमीं का मोहताज हूँ!!
ये कैसा पक्षपात हैं?
आरक्षण की भेट चङता,
सामान्य युगुल समाज है!!
कहने को आजाद हूँ,
मगर आरक्षण विष हैं!!
आज भी हम पर,
कोई करता राज है?
घूस का महाजाल हैं,
हर तमगा बेहाल हैं!!
कहने को आजाद हूँ,
मगर घूस महाजाल है!!
धर्म की औट कर,
दंगा फसाद हैं करते?
सत्ता की रंगरलियाँ ,
जनता पर प्रतिघात करते!!
कहने को आजाद हूँ,
मगर धर्म ही कहर हैं!!
अपृश्यता का बोलवाला,
गरीब का भी कोण भाया?
बाहुवली करते हे राज,
कानून का करते परित्याग!!
कहने को आजाद हूँ,
मगर वाहुवली का राज हैं!!
आंतक का नया हे रूप,
नक्सल आतकवादी कहर हैं?
कब जन बने शमशान ,
हर पल डर का साया है!!
कहने को आजाद हूँ,
मगर दशसत का गुलाम हूँ!!
नारी की दैयनीय दशा ,
हर वर्ग पर प्रहार है?
दहेज भूड हत्या करते पाप,
अश्मत पर होते प्रहार है!!
कहने को आजाद हूँ,
मगर नारी उपभोग है”!!
गरीब की आवाज लुप्त,
अमीन की आवाज झनकार?
पैसे का रूतवा हे आज,
कानून को करे विमुख!!
कहने को आजाद हूँ,
मगर अमीरो का राज हैं!!
अन्न राज हे किसान,
कर्ज बना जी जंजाल हैं?
आत्मदाह करते हैं किसान,
भूमि अधिग्रहण की फास!!
कहने को आजाद हूँ,
मगर किसान बेहाल है!!
कहने को आजाद हूँ,
मगर आजाद हूँ कहाँ?
नापने को आकाश हे ,
मगर जमीं का मोहताज हूँ!!
(आकाँक्षा जादौंन)

मंगलवार, 1 अगस्त 2017

गाँव की छवि

पौ फटते ही पंछीसुर में राग सुनाते है,
खेत खलियानो से खुशबू मंद2 आती है!!
बीगी 2 खुसबू की दस्तक मन को हरसाते है!!
गाँव की छबी मनोरम मन को मोहते है!!
हर घर आगन में तुलसी का पौधा औषधि की याद दिलाती है!!
पंचायत का लगता जमघट भेदभाव भूलजाते है!!
संस्कृति की कल्पनाओ का साक्षातकार रूब रूह देखते है!
धोती कुर्ता सिर पर पंगढी और पाव में जूता देखते है!!
सिर पर पल्लू साडीं में लजाती बलायें लाजबंती देखते है!!
मिट्टी में धमाचौकडी करते बच्चे खूब हरसाते है!!
पेङो से लहराती हवा और कोपले पीयु2  धून सुनाते है!!
कड कड से आती हे सुंगन्ध छाप हृदय में बस जाति है!!
दूध दही छाँच की सरिता घर आगन बहती जाति है!!
आ जाये कोई शहरी बाबु तो दामाद शी खातिर पाते है!!
मातम हो या खुशिया भाईचारा हर बिधि को मिल वाँटते है!!
सध्या बाती की आवाज भी मिठास रस घोलती है!!
खुले आकाश में सोना तारों से बतलाना चाँद को देखते है!!
दादी नानी से किस्से कहाणी सबको खूब भाते है!!
गाँव के बिना भारत की किलकारी अधूरी है!!
खेत खलियान के बिना जीवन का आधार अधूरा है!!
किसान तेरे बिना हर प्राणी ही अधूरा है!!
तुझे करू बंदना बार बार तुझ बिन सब हे सूना सूना,,,,,,!!
(आकाँक्षा जादौन)www.samajakanksha.com

रविवार, 14 मई 2017

माँ को प्रणाम

इक दिन क्या सौ दिन भी कम पढ़ते हैं,
माँ के अभिनंदन में जितना कहो कम है!!
सागर सा आचल हैं आसमाँ सा प्यार,
स्वर्ग सा एहसास हैं सुखमय सा संसार!!
इक दिन क्या सौ दिन भी कम पढ़ते हैं,
माँ के अभिनंदन में जितना कहो कम हैं!!
रक्त से बना हूँ दुग्ध से सीचा है मुझको,
गीले में सोकर रूखे में सुलाया है मुझको!
मल मूत्र को धोया सीने से लिपटाया मुझको!!
अश्क की वेदना करूण  पुकार माँ ने समझा मुझको,
दर्द से कहरा रही माँ चोट लगी है मुझको!
इक दिन क्या सौ दिन भी कम पढ़ते हैं,
माँ के अभिनंदन में जितना कहो कम है!!
निकले कभी हाट पर तपी खुद आँचल की छाँव मुझको!
हट कर मे किये ख़र्च खुद ली न हो बरसो से परिधान!!
पेट काटकर अपना भाग भी अर्पित मुझको!!
मैं आगे आगे माँ पीछे पीछे कैसे कैसे मैने भगाया!
खाने की रुचिकर कब कब रसोई में बदलाया!!
मैं माँ के लिए प्यारी प्यारा दुलारा और कोई न भाया!!
मनमोहिनी बातों में माँ को कैसे करता सम्मोहित !!
अपनी तिजोरी के सिक्के मेरे लिए बन गये मोती!!
नादानियाँ मेरी माँ को देती कैसी मुस्कराटे!!
रात को जागजाग कर मेरे साथ अनौखी करे तपस्यायें!!
नीद से जो होती आँखे बंद चाय झट से माँ बनाती!
जो भी पाया माँ का आसीस बन कर ऐसा छाया!!
मैं क्या दे पाऊँगी उम्र कम माँ का प्यार बहुत गहराया! 
इक दिन क्या सौ दिन भी कम पढ़तें हैं!
माँ के अभिनंदन में जितना कहो कम हैं!!
ईश्वर का रूप माँ तुझमें समाया हैं,
मेरी हर नादानियाँ को माफ़ कराया हैं!

रविवार, 16 अप्रैल 2017

वजूद

मेरे   वजूद पर अंकुश ,    
लगाने का सुनाते है फरमान!!
सांस लेने पर प्रतिबंध जैसे,
संसार पर हम है भार!!
न लव्ज न सोंच न स्वप्न,
विन आत्मा है पाषाण!!
लेखक की आत्मा पर प्रहार,
खुद के होने पर लगता ?
कागज़ बिन कलम अंधूरे,
जैसे सागर बिन नीर!!
अरदास विन रघुराज,
जैसे नैना विन सपना!!
लेखक विन इतियास,
शब्द ने दिया है प्रमाण!!
कौन थे रघुराज राम ,
रामायण है साक्ष्य प्रमाण!!
न होते जो तुलसीदास ,
घर घर कैसे होता संत्कार!!
वजूद को विराम देने से पहले,
खुदके अभिनय का करो दर्शन!!
और माँगे तुमसे तुम्हारा वजूद,
तव कैसा लगता है प्रतिघात!!
लेखक बनाना उसका है हक,
उसके हक़ पर किया कैसा वार!!
लेखक के नैनो की धार में छुपी,
राम के संकल्प पर प्रतिघात!!
जिसपर बरसाये अपना अमृत,
उसपर होता है लेखक का हक!!
न कभी खुदसे लिखने का हुनर ,
राम ने दिया है हमको यही दान!!
उसकी नज़र है तव ही मेरी कदर,
इस कदर  को वेकदर का नहीं हक!!
ज़िंदगी जीने का सलीका दिया,
अपने रहम से हमको अपना लिया!
किसी के वजूद को वदलने से पहले,
एक वार खुद के दर्शन कर लेना!!
जो हिदायत हमको दी है ऐसी,
ऐसी हिदायत देने वालो की नहीं कमीं!!
जव तक चायेगे राम तक चलेगी कलम,
लब्ज भी उसके सोंच भी उनकीं,
हमतो एक मात्र जरिया है !!
चायेगे राम तब तक चलेगी कलम!!!

शनिवार, 15 अप्रैल 2017

ked kr lo

ठहर जायें नज़र ये इल्म जानती हो..
हो जायें काफिर ये कशिश जानती हों..
तेरे दरिमियान आँके सुध भूल बैठा हूँ,
ठहरी नज़र है जग भूल वैठा हूँ!!
पहले विंदाश अलबत्ता परिदां था,
तेरी मुडेंर का रहनुमा परिदां हूँ!!
तेरी एक झलक का अक्स ढूँडता हूँ,
वार वार बस तुझमें ही तुझको ढूँडता हूँ!!
ज़िंदगी क्या है?आज सवव जानता हूँ,
तुझ विन अंधूरी किताव हिस्सा मानता हूँ!
तू हुई मेरी मंजिल....मैं तेरा राही.....
तुझसे ज़िंदा हूँ ......मैं तेरा राही...
तलब किया इजहार किया सौ वार कहाँ,
तेरी खामोशी वार वार हाँ की तरफ़ जायें!
लव्ज को इजहार करने का फरमान दो,
मैं व्याकुल हूँ सुनने  का रसपान दों!!
मुस्कराके चली जाना दूर से पलट जाना,
तिरछी नजरों से बिन कहें हाल बयाँ करना!
खामोशियो में तेरा आशिकाना पंसद हैं,
शकून  मिल जायें बस लव्जो हाल बयाँ कर दो!
इस पंरिदो को अपने पिजडे में ग़ुलाम कर लो,
उमर भर तेरी छाँव का रहनुमा पंरिदा रहूँ!!
बस और क्या?
इस हस्ती को अपनी हस्ती में शामिल कर लो!!
बस और क्या?
इस हस्ती को अपनी हस्ती में शामिल कर लो!!
तू ही मेरी मंजिल....मैं तेरा राही...
तुझसे ही ज़िंदा हूँ...मे तेरा राही...

रविवार, 13 नवंबर 2016

राजनीति जाल

कीर्तिभान  जिन्दावाद ... कीर्तिभान  जिन्दावाद की आवाज़  वातावरण में गूँज रही थीं ..... फूलों के हार कागज़ से बने फूलों के हार से गर्दन झुकी जा रही थीं पर फूलों की माला एक के बाद एक गले में  पड़ती जा रही थीं। पटाखो की लड़ी पर लड़ी चलाई जा रही थीं। मिठाई से एक दूसरे के मुँह मीठा किया जा रहा था। दूसरी वार प्रधान पद की वहुविजयी की ख़ुशी जो थीं। जनता जनार्दन ने बहुमत के साथ विजयी जो बनाया था.दूसरी वार जीतना पांच साल के कामकाज का प्रतिफ़ल होता है। यह सावित करता हे कि  जनता की कसौटी पर  खरा उतरकर  दूसरी वार जीतकर कीर्तिभान ने विपक्ष को जता दिया कि जनता ने कियो  चुना है ?जनता के लिए और परिवार के लिए हर्ष और उल्लास का पर्व था। घर पर अभिनन्दन के लिए राह निहारी जा रही थीं। वोट की गिनती के वाद वाहर का नजारा था, विजयी घोष के रथ रूपी जनता के साथ ट्रेक्टर में सवार हो कर घर की तरफ़  काफला   चल पड़ा। कीर्तिभान के भाई ने  वैगनार गाड़ी में चलने क़ो कहा,"कि विजयी की रात हे ट्रेक्टर में बैठकर जाना ठीक नही हे ",विपक्ष पर हार का सदमा है कोइ अप्रिय घटना क़ो  निमन्त्रण न दे दे। इतना समझाने के वावजूद भी कीर्तिभान न माने और कहाँ ,'ये मेरी जीत अकेली नही हे ग्रामवासी की जीत है, हम ग्रामवासी के साथ जायेगे और  काफले के साथ चल पडे।
                        रात अपने आँचल में सितारे के जगमगाते  फूलों  की छाव सबके ऊपर बरसा रही थीं ,किसी से कोई वैरभाव नही सबपर घटता हुआ कृष्ण पक्ष का  चाँद शीतलता दे रहा था। ऊवड़ खावड़ जगह जगह गड्ढे रेगरेग कर चलता ट्रेक्टर ट्राली में बैठे ग्रामवासी  की कसरत खूब हो रही थीं ,गड्डा आता तो 6 इच जितना ऊपर उठ जाते फिर धड़ाम से नीचे आ जाते ,ट्रेक्टर में बैठकर सफ़र का रोमांच अद्भुत है ,हिलोरे खाती नाव में बैठे ऐसा एहसास  ट्रॉली में अनुभव होता है जो कभी नाव में बैठे ही न हो उनके लिये होले होले धीरे धीरे झूले में झूलने का एहसास का  अनुभव किया जा सकता है। चालक ने स्थाई रास्ता न जाकर दूसरा  कच्चे रास्ते से ले जाने लगा,शंका की दृष्ठी से सबने एक साथ एक स्वर में प्रश्न करने लगें ?काये इधर से ले जा रहे हो ?चालक ने उत्तर दिया ,"तुम सब तो पीके मस्त मल्हार गान लगें हो ,काऊ बात की चिता है ?हमसे बड़े भइया ने दूसरे रास्ते से आने की कही है,बात कह ही रहे थे कि सामने से बेगनार आती देखी जो पहले निकल गई थीं रास्ते पर कोई घात तो न लगाये हे ?जो शंका थी अनयास नही थीं।बड़े भईया ने धीरे स्वर में  कहा ,"कीर्तिभान अब तुम हमारे साथ चलोगे. स्तम्भ पूरी गेंग और हसला के साथ घात लगाये बैठा है ,ये रास्ता ख़तरे से भरा हे ,तुम सब इस रास्ते से चलो हम भी साथ चलते हे ,,जो मल्हार गायें जा रहे थें, सब चुप हों गये ,जैसे साप क़ो देखकर चुप्पी साध लेते हे। धीरे धीरे ट्रेक्टर अपनी मन्जिल पर पहुँच ही गया। स्वागत से जायदा स्तम्भ की हार के चर्चे कहाँ ?किस किस के साथ घात लगाये था। घर वालों ने ज़ोर दार स्वागत किया ,आख़िर दूसरी वार बहुत अंतराल से विजयी का तिलक जो हुआ था,,,... पूरी रात बातो में काना फूसी में हार की मज़ाक नाटकीय अभिनय प्रस्तुती में ही बीत गई।

                 सुबह होते ही पूरे ग़ांव में घूम घूम कर जुलूस निकालने की तैयारी ज़ोर सोर से होने लगीं। बड़े बुजर्ग ने रात  अनहोनी घटना से बचके निकल आने के कारण जुलूस न निकालने की सलाह दी ,,,पर नये ख़ून की पीढ़ी नये उवाल कहा मानने क़ो तैयार थे ,ढोल नगाड़े पटाख़े  डीजे साउंड सब सजा लिया था ,,,,इस वार जुलूस शानदार होगा ,पिछली जीत के मुकाबले इस वार भारी बहुमत से विजयी हुये है। बढ़े बुजर्ग की सला मसुवरा को बन्दिश समझते हे ,दुनियां क़ो समझने का तजुर्वा और नई सोंच मिलती हे तब नवप्रकाशित उज्ज्वल भविष्य निर्माण होता है ,बिना एक को साथ लिये अधूरी शिक्षा के समान हे। यहाँ पर भी बड़े बुजर्ग की बात क़ो नज़र अंदाज किये विजयी घोष का उत्थान दिखाने पूरे ग़ाव में चल पड़े,....कीर्तिभान जिन्दावाद,,,,,,जव तक सूर्य चाँद रहे तब तक  कीर्तिभान का नाम रहेगा,,,,,,,जोरसोर से डीजे के साउंड पर  नाचते गुलार उड़ाते जा रहे ,महिलाये  पुरूष फूलों की मालाओं से अभिनन्दन कर रही  हे। चारों तरफ़ विजय घोष के नारों से गुजयवान वातावरण था ,जव पास में स्तम्भ का घर आया तो नये यवुकों ने चिढ़ाने के उद्देश्य से ज़ोर ज़ोर से गले की जितनी क्षमता थीं उस क्षमता से नारे लगाने लगें अब तो नारे के वोल भी बदल गये थे ,,,,,कीर्तिभान की कीर्ति फैल रही ,,,,स्तम्भ चला शून्य की और,,,,, ख़ुले शब्दों के प्रहार से हार के आक्रोश को ये शव्द भड़की आग में घी का काम करने लगें जिससे आग और भड़क गई,,,,,स्तम्भ घर में ही था ख़ुशी के माहौल में अचानक मातम छा गया,,,स्तम्भ आँखों में हार का प्रतिशोध  लिये सब्जी काटने वाला चाकू लिये चहरे को गमछे से ढक लिया भीड़ क़ो चीरते हुये ,,,चाकू को कीर्तिभान के पेट में भोंक दिया ,,और वार कर पाता इससे पहले आस पास समर्थन के लोगों ने स्तम्भ को दबोचा पर बचके भाग गया पर जाते जाते गमछा खुल गया और पूरे  काफले में सोर हो गया ,,,,,,,,,,स्तम्भ ने कीर्तिभान को चाकू भोंक  दिया।                  
                   पेट में चाकू गड़ा हुआ देखकर जानकारों ने किसी क़ो भी छूने से रोका और निकालने से भी ,,,,ताकि डॉक्टर ऑपरेशन से निकाल सकें .असहनीय दर्द की पीड़ा और रक्त रिसरिस कर निकल रहा था खून से लथपथ था ,अगर चाकू निकल लेते तो रक्त क़ो रोकना असम्भव और बचाने के सारे उपाय निष्फल हों जाते ..तत्काल एक पल को गवाये हॉस्पीटल ले गये , परिवार के सदस्य औऱ हितेशी  शोकाकुल में डूव गये,,,,कीर्तिभान की भागिनी ह्र्दयथा  और माँ अचेत अवस्था में पहुँच गई... जब ये खबर सुनी।हास्पीटल में डाँक्टर ऑप्रेशन थ्रेटर में सर्जरी के दुवारा चाक़ू निकालने की   कोशिश कर रहे है .वाहर परिवार के सदस्य और हास्पीटल के वाहर जनता का मेला जुड़ा,सुभ चिंतक ठीक होने की कामना कर रहे तो कोई मुस्कान का मखोटा पहने जलन की पीड़ा क़ो शांत होने का  मौका मिला उसका पूरा फ़ायदा उठा रहे थे ,इस कामना से कि अब तो मौत की खबर ही मिले। स्तम्भ बिल्कुल सही किया है जायदा ही घमंड आ गया था ,प्रधान क्या बन गया अपने आप क़ो राजा समझने लगा है , सीघ्र से सीघ्र मौत की खबर सुनने क़ो मिले तो हमें सकून मिले,जो बेरी थे अच्छे बनने का ढोंग करते थे वो सव यही दुआ मांग रहे थे। स्तम्भ फ़रार हों गया जिसको पुलिस हर उस जगह तलाश कर रही जहाँ होने की उम्मीद हो सकती थीं।
                            ह्र्दयथा  को जब होश आया तो हास्पीटल को जाने लगी जव अचेत हुई तो घर पर रोक रखा था ,व्याकुल थीं और सहमी दूसरी तरफ़ ख़ुद क़ो होशला भी दे रही थीं अगर में हिम्मत खोने लगीं तो सवको कौन सवालेगा ?भानजी हमेशा मेरे हौशले और हिम्मत की सहारना करते थे पूरे परिवार क़ो  एक सूत्र में पियोंके रखा हे कितनी ही मुश्किल कियो न आ जाये अपनी हिम्मत न खोना क्योकिं एक बात हमेशा कहते थे जिसने मुश्किलों के समय मस्तिष्क क़ो शून्य किया तो जीत की उम्बीद दिखने से पहले ही हार हों जायेगी ,मस्तिष्क क़ो क्रियाशील बनाके रखा तो कोई ना कोई उपाय जरूर निकलेगा ,,,,,,,ऐसी सारी बातें मस्तिष्क में फिल्म की तरह चलने लगीं।
                        पाँच साल पहले की यादों में चली गई ,जव बिना प्रधान पद के रहते ग्रामवासियो की सेवा करते रहते। रात क़ो गाँव में कोई भी बीमार हो जाता या किसी भी तरह की परेशानी हों तो बिना कुछ लिये मदद करते जैसे कि ट्रेक्टर की मदद से हास्पीटल पहुँचा देते ,पैसे न होते तो पैसे की मदद कर देते ,वेटियों की शादी  में सिलाई मशीन उपहार के रूप में देते ,बहुत जायदा गरीव हे तो दावत का खर्च भी उठाते ,गांव की जनता इन्ही अच्छाई के कारण चहेते बन गये थे। भविष्य रूप में स्तम्भ प्रधान था उसके अनैतिक व्यवहार के कारण जनता नकार रही थीं। राशन आता तो उसकी काला बाजारी कर देता एक चौथाई लोगों क़ो ही मिल पाता ,घास लेट और चीनी के दर्शन तो तीज़ त्यौहार पर ही हों पाते .गांव विकाश के लिये जो जो पैसा आता वो पैसा अपने महल बनाता ,कामकाज एक चौथाई ही करता सरकारी कर्मचारी क़ो घूस देकर सब मामला शान्त कर देता ,एक साल से कोई काम नही किया आने वाले चुनाव के लिये पैसा जमा करके रखा। ग्रामवासी इस प्रधान से तंग आ चुकी थीं क्योकि ग्रामवासी की जगह को अपने कव्जे में लेके अपना दबदवा कायम रखता था जो भी आवाज़ उठाता उसकी  सरकार दुवारा सेवाओ को बन्द कर देता। कीर्तिभान का  परिवार खटकता था रसूकदार नोकरशाही थे बिना प्रधान के पद पर रहते हुये जिला कार्यालय में पहचान थीं ,स्तम्भ के ख़िलाफ़ कोई शिकायत करता तो सेवाओ पर प्रतिबंद लगा देता तो कोई डर के कारण कीर्तिभान से शिकायत नही करता ,ग्रामवासी ने पहले भी ग्रामप्रधान के चुनाव के लिए साफ़ मना कर देता ,कहता हम ,'ग्रामवासी की बिना पद के ही सेवा करते रहेंगे ,इस वार के प्रधान चुनाव के लिए ग्रामवासी ने बहुत कहा पर मना कर दिया। कीर्तिभान ने अपनी आँखों से ऐसा देखा जिससे फैसला बदलना पड़ा ,स्तम्भ क़ो भला समझता था उसका पर्दा उतर गया .जव खेत में काम करने वाला मजदूर अचेत हो गया ,डॉक्टर ने बताया भूखे पेट रहने के कारण अचेत बताया ,कीर्तिभान ने घर जाकर देखा तो वहा की हालत देखकर आंसू बह निकले ,बच्चे भूख से व्याकुल थे कामकाज के पैसे नही मिले थे. मुफ्त राशन मिलना बन्द था और कोई साधन नही था। हमारे गाँव में आज ये दिन भी देखना पड़ेगा .. ,ग्रामवासी ने इस हालत का जिम्मेदार स्तम्भ क़ो बताया .विस्तार से क्या क्या  यातनाये दी   हर दर्द को बताया। स्तम्भ ग्रामवासियो के हक़ क़ो अपना हक़ समझ खा रहा था ,सबकी बाते सुनकर फैसला किया इस वार प्रधान का चुनाव लड़ेगे ,इस वार  महिला सीट थीं तो ह्रदयथा क़ो प्रत्यासी बनाके चुनाव मैं उतार दिया ,
             
                                             ग्रामप्रधान के चुनाव में वोटरों क़ो खरीदा जाता है। विपक्ष के हितेशी ग्राम के सदस्य नोकरी शहर में करते हे उनके वोट को काटके अपने वोट बढ़ाये जाते हे चाये उनके पक्ष के शहर में ही क्यों नही रहते हों। नावालिक के भी वोट बनवा दिये जाते हे .वोट बढ़ाना और काटना हार जीत का अहम हिस्सा होता है। देशी शराब के ठेके घर ही खोल दिये जाते हे पिवक्कडो की सुबह शाम लाइन लग जाती .एक वोट की क़ीमत शराब से खरीद लेते .कही कही  पिवक्कड़  दोनों जगह ही अपनी पौ बारह करते .इस चुनाव में एक बड़े गाँव में खर्चा करोड़ के ऊपर पहुचँ जाता है। मतदान पड़ने की एक रात पहले नोट देकर वोट ख़रीदे जाते है ,हलवाई ऐसे लगाये जाते जैसे घर में शादी हों.रणनीति की तह फर्जी वोट का भी प्रबन्ध किया जाता है जो मतदाता शहर रहते उनके वोट डाले जाते जैसे लड़कियों क़ो अपने रिस्तेदारों दुवारा लम्बी लाज का घूघट डाल के किसी की बहू किसी क़ो बताके  डाले जाते ,विपक्ष भी तीसरी आँख के तोर पर अपनी  सेना खड़ी कर देते ताकि कोई फर्जी वोट न पड़ जाये जव पहचान लिये जाये तो मुहजवानी लड़ाई शुरू हो जाती ये लड़ाई विस्तार रूप भी धारण कर लेती जो हाथापाई डण्डे तलवार घरेलू बम्ब के रूप में देखने क़ो मिल जाती।पेप्सी कोक की काँच की बोतल में पेट्रोल भरके मुँह क़ो कपड़े की परत दर परत गट्टर बनाके शीशी बन्द कर देते उस कपड़े में आग लगाके भीड़ के बीच ज़ोरदार धमाका का रूप लेके अफरा तफ़री सा माहौल बना देते। पता चल जाये कि कि मतदान पेटी में दूसरे प्रत्यासी के वोट बहुत पड़े हों तो उस बॉक्स में स्याही डाल देते या बॉक्स क़ो लेकर भाग जाते .स्तम्भ ने भी यही काम किया पर निसफल रहा और पकड़ा गया .जनता के चहेते कीर्तिभान की ह्रदया को विजयी बना दिया।


                                      पति की सफ़लता के पीछे फूल में छुपे खुसबू की भूमिका निभाती है जो पतिनी की सोच समझ क़ो मूल्य समझे अपनी बात कहने का मौका दे. ये न समझे तुम्हारा काम चौखट के अंदर तक की सोच है ग्रहस्थी की रसोई में क्या खत्म हो गया हे ?किस कार्य के लिये पैसे चाहिए बच्चों की देखवाल बस इतना ही कार्य है वाहर क्या करता हूँ  इससे कोई मतलव नही हे ?ऐसी सोच वाले बहुत मिल जायेगे पतिनी क़ो कुछ भी नही बताते हे  ये ग़लत हे। दोनों को ही घर के वारे में और वाहर के कार्यो के वारे में जानकारी होनी चाहिए ये बात अलग हे कि रुचि न ले.,जब पति पत्नी अपने अपने काम के वारे में बताते रहे तो बुद्धि का विकाश ही होता हे और सीखना चलता रहता है .सोच एक सी भली दो की जायदा कार्यगाह होती जो हल ख़ुद न कर सके क्या पता दूसरे की सोच हल ख़ोज दे। कीर्तिभान और ह्रदयथा  एक दूसरे को बहुत अच्छे तरह समझते थे .दोनों के बीच क़भी भी  ग़ुस्सा लड़ाई मन मुटाव नही हुआ .सब लोग उनके समझदारी अच्छे पति पतिनी होने का उदाहरण देते थे।

                                  प्रधान पद के साथ ज़िम्मेदारी और बढ़ गई उद्देश्य एक था ग्रामवासी के समस्याओं क़ो दूर करना जितना सरल सोच रखा था, उतना ही कठिन था .यहाँ प्रधान के ईमानदारी होने से सिर्फ ग्रामवासी की सेवा तो की जाती हे पर बिना धन के कैसे ?गाँव के विकास के लिये जो पैसा आता उस पर कितनो की नज़र गड़ी रहती जैसे इन घूस खोरों ने अपनी सरकारी नोकरी का अधिकार बना रखा हो। सेकेट्ररी, चपरासी ,कर्मचारी ,ऑफीसर सब एक ही थाली के चट्टे बट्टे है । पहले तो दोनों घूस देने के लिए राजी नही थे पर जब विचार निर्माणधीस हों उत्थान के लिये अग्रसर हों तो धर्म को धर्म विजयी बनाने के लिये महाभारत का चिंतन करना और गीता पाठ स्मरण करना चाहिये .दोनों  ने ये भी  ठान रखा था घूस लेने वालों का पर्दा पास करना हे। गॉव क़ो सम्रद्ध उत्थान प्रग्रतिशील की प्रेणा और गाँव के लिये बन गई। कोई भूखा नही सोता कोई वेरोजगार नही हर बच्चा स्कूल जाता जो जो योजनाये सरकार ने बनाई उन सबका लाभ ग्रामवासी तक पहुँचाया .जो कर्मचारी घूस ख़ोरी थे उन सबकी वीडियो बनाके नोकरी से ही बर्खास्त करवा दिया। अच्छे काम के लिये जहाँ जयकारा भी लगता हे वही ईर्ष्या के कारण दुश्मन भी बन गये ,जो मौके की फ़िराक में रहते थे कब मौका मिले और कीर्तिभान क़ो अपने रास्ते से हटा दूँ ,वो मौका दूसरी वार हार  के वाद मिला।

                            राजनीति जाल हे नेता मकड़ी चाये छोटी इकाई ग्राम प्रधान राज्य के मुखमंत्री या प्रधानमंत्री सब मकड़ी इसमें आने के वाद कोई वाहर निकल नही सकता ,अपने दुश्मन क़ो जाल में फ़साके मृत्यु के आग़ोश में सुलादेते है पर ख़ुद भी उस जाल से बच नही पाते। आज़ कीर्तिभान भी उसी राजनीति का शिकार हों गया ,हास्पीटल के ऑपरेशन थ्रेटर में ज़िन्दगी और मौत के बीच झूल रहा है।राजनीति भी जाल के समान इर्द गिर्द घूमती रहती है ,नेता अपनी तागत से अपने बनाये जाल में फ़साके तागत का वर्चस्व दिखाता पर ख़ुद भी बच नही पाता है।

                              

शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2016

दिवाली मेरे घर का पता दें दो

बता दो बता दो ख़ुशी को पता दे दो,
इस दिवाली मेरे घर का पता दें दो।।
हर कारीगर की नज़र डूडँती हैं,
आशा अभिलाषा से पूछती है ।।
दमक की ज्योति मुस्कान की झङी देदो,
बता दो बता दो खुसी को पता दें दो।।
एक प्रश्न हम सबसे पूछते है ?
व्यापारी नौकरशाही वोनस की आस करें,
दिवाली पर हर घर अरमान हैं सजतें।।
भारी छूट का पासा फैकें हैं व्यापारी ,
लक्ष्मी जी सब आगमन हैं करते।।
नौकरशाही को मिला वोनस तो,
लक्ष्मी जी की अनुभूती सब है करते।।
फिर हम क्यों? कारीगार ख़ुशी से दूर....
बता दो बता दो ख़ुशी को पता दें दो,
इस दिवाली मेरे घर का पता दें दो।।
फ़ुटपाथ चौराहा पर लगाई है फैरी,
आशा की नज़र हर राहगीर को देखती।।
कुम्हार के दीपको को दें दो बसेरा,
धुनकर की रूही को दें दो उजाला ।।
तेल के कीप को बुलालो घर आगन,
मिट्टी की प्रतिमाओ से चौकी सजालों।।
लताओ वेलो लङियो से दरवाज़ा सजालों,
रंगो से बनाके रंगोली अलख को जगालों।।
बता बता ख़ुशी को पता दें दो................
इस दिवाली मेरे घर का पता दं दो.........।।
ऊँची दुकानो के मेहमान जरा,
फ़ुटपाथ पर दर्शन तो दें दो।।
चीनी लडझडियो से भी आगें,
मेरे दीपको को भी घर का पता दें दो।।
फ़ुटपाथ पर सजें सामानो को साहिब,
अपने घर की मेम शोभा बढ़ा लो ।।
परम्पराओ में हमारी भी अरज कर लों,
फ़ुटपाथ से सब दिवाली की आस कर लो।।
बता दो बता दो ख़ुशी को पता दें दो,
इस दिवाली मेरे घर का पता दें दो..........।।
हर कारीगर की नज़र डूडती हैं,
आशा अभिलाषा से पूछँती है।।
दमक की ज्योति मुस्कान की झङी दें दो,
बता दो बता दो ख़ुशी को पता दें दो।।  

शनिवार, 24 सितंबर 2016

शर्तो पर जीना


शर्तो पर जीना छोङ दो

सह सकते है अनगिनत जख्म,  
तो शर्तो में जीना छोड़ दो!
पी सकते है अश्को का सैवाल,
तो शर्तो में जीना छोङ दो!
सरकार को कायर की संज्ञा देते,
शहीद के शहादत का हिसाब लेते!
कूटनीति राजनीति बेजोड जबङा,
पाक को चारो खोने चित है करना!!
युद्ध हर समस्या का समाधान नही,
घर घर से शहीदो की उठेकी अर्थी,
कितनो की उजङेगी माँग का सिन्दूर, कितनो की गोद होगी यूही सूनी!
सम्पति का कितना होगा विलाप,
पश्चमी से 20पीछे है आज हम,
और 20साल हो जायेगे ऐसे पीछे,
सोचो क्या मिलेगा होकर हमको!
परिमाणु बम्ब हुआ जो विध्वन्स,
देखना है इसका जो प्रतिफल,
जापान में जाकर कर लो साक्षात्कार!
रूस का प्रकोप आज भी झेलती पीणी!!
युद्ध पहला नहीं आखरी है विक्लप,
पाक के कमज़ोर नज्ब ली पकङ,
पाक के अंदर गृहकलह कराना ,
खण्ड खण्ड करके जख्म है देना!
बोखलाहट है पिछडने की उसकी,
देश बन रहे है मित्र हमारे सब,
विकाश के पथ पर कार्यशील ,
बोखलाहट निकलती ओछी हरकत कर!
गेहूँ में कंकड चुन चुन निकाल रहे ,
करता है घुसपैठ मार मार गिरा रहे, 
सीजफाईर का बराबर देते है जवाव,
पाक की हर प्रहार का करते प्रतिकार!
युद्ध चाहते है सब जनआधार तो,
मैसेज से खून उवाल लाते हो,
सिर पर बाँधकर निकलो तिरंगा,
सीमाओ पर दिखला दो उवाल!
हर वार सैनिक ही क्यों है शहीद,
तुम भी दिखला दो जौहर का उवाल,
मैसेज पर करते बेधङक प्रतिकार,
आज मांगता है देश तुमसे हिसाव!
सब देखने सहने को हो तैयार,
तो युद्ध हो जाने दो आर या पार,
नौ जवान सजालो देश करे पुकार,
छेङा है युद्ध का ऐसा अलाप!
शहीद का हिसाव हम सब उधार,
दिलेर शहीदो के परिवार को सलाम,
चाहत है यहीं पाक को दिखादे औकात,
 अपने देश के घर घर आँसू पी सकते है,
तो शर्तो पर जीना छोङ दो!
शस्कतीकरण हो रहा देश का ऐसा,
मित्रो का मिल रहा है समर्थन अपार,
पाक का नापाक पर्दा दिया उतार,
 आंतकवादी देश घोषित करने पर विचार!
 सह सकते है अनगिनत ज़ख़्म ,
तो शर्तो पर जीना छोङ दो,
पी सकते है अश्को का सैलाव,
तो शर्तो पर जीना छोङ दो!