सोमवार, 7 मई 2018

तस्वीर बदलती है


किसी मेरे मित्र ने फैसवुक पर एक पेंटिग लाईक की. मेरे फैसवुक पर नजर आने लगीं। बहुत ही सुंन्दर एक संदेश प्रेरक तस्वीर थी। मैने तस्वीर को जूम करके देखा तो वह संदेश विछङे हुए मित्र की झलक लिए थी. जहाँ पेंटिग की अभिनेत्री ख्याति शोहरत के शिखर पर थी,जनता  एक झलक के लिए लालायित थी. पर अभिनेत्री के आँखो से अश्क झलक रहे थे। मन में मित्र की छवि जो दूर होती जा रही थी। जव मैने यह तस्वीर देखी तव मुझे अपने मित्र की याद आने लगीं। उसको भी तस्वीर बनाने का वहुत शोक था। डेस्क.खिङकी, मेज पर चौक से तस्वीर बनाती रहती थी।कभी कभी तो अध्यापक पढाते रहते वो उनकी ही तस्वीर डेस्क पर बनाती तो कभी काँपी पर पेंन से, वो कम वात करती पर जाने मन में क्या सोंचती रहती थी?अपने ही ख्यालो में खोई रहती थी। न जाने क्यों वो खामोश रहकर अपनी तस्वीरो में बहुत कुछ कह जाती थी।जैसे जैसे आगे की क्लास में पहुँचते जा रहे उसकी कलात्मक अभिव्यक्ति चित्रकार की और वढती जा रही थी। कालेज में मनमुग्ध वाटिका प्रयोगात्मक के लिए छोटा सा रूप जलाशय में उछल कूद करते मेढक, फूलो पर सजती रंग विरंगी तितलियाँ ,चढती शाखाओ पर लताये को अपनी तस्वीर में ऐसे प्रस्तुति क्या कि लगता ही नहीं था कि यह स्कूल की वाटिका का दृश्य है. लगता था कि किसी प्रसिद्ध पर्यटक का दृश्य हो। इस तस्वीर के लिए उसे कालेज में विशेष उपहार दिया गया था और सबको तस्वीर दिखाई गई थी।पर न जाने क्यों मेरी आँखो में न उतरने वाली तस्वीर बस गई थी।इस तस्वीर को देखकर अपने मित्र की बहुत याद आने लगीं। मैं उसका सहपाठी था क्योकि हम छोटे से कसवें में रहते थे वहाँ लङकी की मित्र लङकी ही होती थी ,वहाँ पर बात करने पर हगांमा हो जाता हैं। मन गङंत कहानियाँ बनाई जाती है यह सब घर पर पता चल जाये तो पढना लिखना बंद कर दिया जाता हैं। खाशकर लङकियो से तो जितनी दूरी बनाई जाये उतना ही अच्छा रहता हैं।
                   मै उसकी चित्रकारी देखकर मोहित हो गया पर कुछ न कह सका. मै नहीं चाहता था कि मेरे कारण उसका जीवन अधर में लटक जायें।पढाई छूट जायें और मैं अपने आपको कभी माफ न कर पाऊँ। देखने मैं सुंदर शांत स्वभाव गंम्भीर चितन करने वाली जिसकी झलक तस्वीर में देख चुके थे. उसकी सहेली उतनी ही वाचाल थी जहाँ पर वैठने के लिए जगह बनानी हो वहाँ कचर पचर बाते सुरू कर देती और वो उनकी वातो से परेशान होकर जगह छोङ देते,उस जगह पर अपना कव्जा पाकर वहुत खुश हो जाती थी जैसे कोई जंग जीत ली हो। मै अपनें मन की बात कभी न कह पाया और माध्यमिक के वाद रास्ते अलग अलग हो गयें। मेरा वीटेक में दाखिला हो गया और मैं अपनी पढाई करने वाहर चला गया। मित्र सहपाठी वही छूट गयें। वो सारी मीठी यादें जिदंगी के किस्से बन गयें।आज तस्वीर देखी तो वो सारे किस्से याद आने लगें। मेरा मन न माना और उस पेंटिग वाली को मित्र निवेदन भेज दिया। उधर तुंरत स्वीकार का मैसेज टाईम लाईन पर आया।
हलो.......
धन्यवाद...आपने निवेदन स्वीकार किया।
धन्यवाद तो आपका कहना चाहिए। आपने निवेदन भेजा। प्रोफाईल पिक्चर में बदले बदले नजर आ रहे हो।
क्या हम पहले से मिले है? क्या मै आपको जानता हूँ?
इतने सारे सवाल एक साथ....हाँ जानती हू। अव तुम बताओ नाम क्या है?
तुम्हारे प्रोफाईल पिक्चर पर तो पेंटिग लगीं हैं। अगर मैं सही हूँ तो तुम जागृति हों।
हाँ....और तुम्हारा नाम धैर्य है। मेरी फ्रेङ लिस्ट तो लम्वी है पर कालेज वाले कोई मित्र नहीं है। फोलोवर भी बहुत है पर कोई मित्र नहीं......कहते कहते....आँनलाईन से चली गई....
मैं सोचने लगा....बताओ...जागृति ने हमको पहचान लिया। जो शांत रहने वाली आज बोलने लगीं.....यह तो कमाल हो गया।
कहते कहते ...कालेज वाले समय में खो गया......छुप छुपके देखता था....
छुप छुपके देखे मेरी नजर....
डर लगता है खुद से मगर....
गुस्ताकी न कर वैठूँ भूल से....
तोहमत न लग जाये तुम पर भूल से...
मेरी ही खता सजा न हो नजर...
डर लगता है खुद से मगर...
तू ही मेरा सकून...तू ही मेरा रहनुमा है...
तुझसे ही जिंदा हूँ ...तू ही मेरा जीवन है...
छुपाके रखे थे कितने अरमान....
खुद ही जाने किसको क्या खवर...
उम्मीद टूट चुकी थी ऐसा हुआ असर...
तुझसे करके बात खोया खोया वेखवर...
डर लगता हैं रात का ख्आव न ओझल..
भागता है जिया सजाता अरमान...
थम जा ठहर जा ख्आव न औझल..
तू ही मेरा सकून ...तू ही मेरा रहनुमा...
तुझसे ही जिंदा हूँ...तू ही मेरा जीवन...
मैं अव इस इंतजार मैं था, कव आँनलाईन होगी? बहुत कुछ कहना था ....बहुत से सवाल थे...मै रात को उठ उठकर फैसवुक चैक करता कि आँनलाईन तो नहीं है।मै रातभर सो न सका बस कालेज दिन ऎसे लग रहे थे जैसे आज ही की बात हों। कभी मैं खुद ही मुस्करा जाता, तो कही सरमाके नजर चुराता...आँफिस में सब बार बार पूँछते क्या हुआ? मुस्करा क्यों रहे हो? मैरे पास कोई जवाव नहीं था.बस फैसवुक पर आँनलाईन होने का इंतजार था...मै किसी के प्रश्न का उत्तर भी नहीं देना चाहता था, कही मैं इधर बात करता रहा और वो आँनलाईन होके चली भी जायें।
     मै मैस में रात का भोजन कर रहा था,फैसवुक आँन था वो आँनलाईन हुई मैने खाना छोङकर कमरे मैं आ गया....आते आते ही मैने....
हैलो.....जागृति.....
कहकर हाथ धोने चला गया।
हाँ.....कल मेरा फोन डिसचार्ज हो गया था।
अच्छा..और कैसी हो?
मैने कुछ और नहीं कहाँ कि कितनी वेसवरी से इंतजार कर रहा था। बहुत सी बाते करनी थी...इतने दिनो बाद जो मिले है।
हाँ....हमको भी..
तुम्हारी शादी हो गई क्या?
क्यों?
बस ऐसे ही।
हाँ हुई भी और नहीं भी....
क्या मतलव?
चलो छोङो क्यो जख्मो को कुरेदना।
ठीक है तुम्हारी मर्जी ....नहीं बताना चाहती तो न सहीं....
बता दूँगी....एक बात तो बतोओ। तुम तो इंजीनियर हो फिर भी ...इतनी जल्दी हिन्दी में कैसे लिख लेते हो ?वो भी इतनी अच्छी।
हिन्दी अपनी पहचान है...इसको कैसे भूल सकते है। इंग्लिस आँफिस के लिए बहुत है। हम इतने आगे भी न निकल जाये कि अपनी जङो को भूल जाँऊ...हमारी सभ्यता संस्कृति की धरोवर है हम सभालेगे तव ही आने वाली पीढी को सिखा सकते हैं। चायें कोई मेरी इस सोंच को मजाक बनायें पर यह सबक है हम कहाँ से जुङे है। हमारी जङे गाँव से जुङी है यह हमको नहीं भूलना हैं। करो वह जो तुमको अच्छा लगें..दिखावे से तो खुदको दोखा देना हैं। मै गोराविंत होता हूँ अपनी मात्र भाषा में खुदको जीकर...चीन वाले सारे कामकाज तकनीकी गैरतकनीकी काम अपनी ही भाषा में करते है और हम इंग्लिस में क्यों? हम अपनी बात को अच्छे से अपनी मात्र भाषा में विना रूके  व्याख्या कर सकते है। हम इंग्लिस में ही वोलेगे और कोई वोले तो उसका मजाक बनायेगे। जहाँ जरूरत है वहाँ इंग्लिस वैसे नहीं...कुछ जायदा ही हो गया.....
नहीं आपने सच कहाँ है।आपने प्रभावित किया...खैर हमको इंग्लिस में वातचीत करनी नहीं आती है।एक आप है और एक वो..... कहती कहती रूक गई..
आप रूक क्यो गई?
बताओ ना....
हाँ वताऊँगी.....खामोश होने की...जुल्म रहने की सजा मिली है अब और नहीं...मैने फैसला किया वदल दूँगी खुदको....नजरिया को..सबसे बात करूँगी.। सब सहेली की शादी हो गई...मेरी भी....आपके ही जैसे इंजीनियर थे..........कहते कहते फिर रूक गई.....
आप कुछ कहते कहते रूक गई.....
छोङो मेरे बारे में जानने की .....आप अपने बारे में बताईयें। आपकी शादी हो गई।
नहीं अभी नहीं....माँ ढूडँ रही है...कोई मिल जायें।
आपको... कैसी पंसद हैँ?
कुछ नहीं....बस मुझे समझ सकें....मैं उसे....
अच्छा है।
पहले आप चुप चुप गुम सुम सी रहती थी।आपसे तो कभी बात भी नहीं होती थी फिर भी आप हमसे बात कर रही है.....हमको अच्छा लगा।
वक्त के साथ चलना चाहिए...नहीं तो हम पिछङ जायेगे। पर अभी भी कुछ से ही बात करती हूँ पर अपने आप को बदल दूँगी।
बदलना क्यो हैं? किसी एक के लिए अपने आप को बदलना ठीक नहीं हैं। आपकी खामोशी बहुत कुछ रंगो के माध्यम से अगुंलियो के थिरकन से..कल्पनाओ के अर्थाय सागरो से अनमोल रत्न खोज खोज कर चित्र में पियोह देती हो। अतुल्नीय अविश्वसनीय प्रतिभा भगवान किसी किसी को ही देते है। ऐसी प्रतिभा का किसी के लिए अंस्त नहीं करना चाहिए वल्कि उसको निखारना चाहिए..। इसलिए उसकी नित्य अभ्यास करना चाहिए... उसी अभ्यास का आपको फल मिला है.। मैने आपकी पेंटिग देखी है जिसमें आपको कही पुरूस्कारो से सम्मानित किया गया हैं।
आपने देख ली...
हाँ...आप तो स्कूल समय से ही चित्र बनाती थी ..कभी डेस्क पर ,कभी वेचों पर कभी खिङकी पर आज उसका ही प्रतिफल हैं। मै इतना तो कह सकता हूँ आपका यहाँ तक पहुँचना आसान नहीं रहा होगा।
हाँ... पर अब फिर बात करेगे। अभी मुझे कुछ काम हैं।…..ठीक है....
अव रोज उससे नेट पर चेट होती पर अपने बारे में कुछ नही बताती....हमको ऐसा लग रहा था जैसे कुछ तो ऐसा है जो छुपाया जा रहा है पर क्या? हर वार पूँछा,...उसने हर वार बहाना बनाके दूसरी बात छेङ देती।
मैने उसकी प्रोफाईल चैक की कि कौन कौन जागृति के मित्र है। उस फेंङ लिस्ट में जागृति की सहेली भी नजर आई, जिसका नाम करूणा था..मैने करूणा को फ्रेङ निवेदन भेज दिया। उसने मेरा निवेदन स्वीकार कर लिया। 
हैलो......करूणा....पहचाना.......।
हाँ...तुम्हारा नाम धैर्य हैं। उस वक्त कालेज में तुम्हारा इंजीनियर में सिलेक्सन हुआ था वो भी विना कोचिग के ...यह बात सर ने प्रार्थना स्थल में बताया था। वैसे भी  छँटवी कक्षा से इंटर तक सहपाठी रहे है तो कैसे नहीं पहचानेगे। फिर जहाँ से हम है वही से आप भी हो तो कैसे भूल सकते हैं?
बहुत बहुत आभार आपने इतनी सहजता से विस्त्रित पहचान दीं।
हाँ....चलो अच्छा लगा। आजकल हो कहाँ?
मै सिविल इंजीनियर हूँ...अभी दिल्ली में ही हूँ। और आप कहाँ हो?
मै भी दिल्ली में ही हूँ मेरे पत्ती देव गुङगाँव में जाँव करते हैं।
अच्छा लगा आपसे बात करके। जागृति की फ्रेड लिस्ट में से आपको खोजा हैं। जागृति तो बहुत वढी चित्रकार हो गई है। उसकी पेंटिग सेयर की जाती है गोराविंत करती है पेंटिग ..
पर क्या कहे? जो दिखती है उतनी सरल जिंदगी नहीं हैं। जागृति ने बहुत कुछ देखा हैं।
क्या? मैने काफी बार पूँछा पर कुछ नहीं बताया।
धैर्य एक बात वताओ ...तुम्हारी शादी हो गई है ।
करूणा क्यो पूँछा,?
बस ऐसे ही...
नहीं..
मैं जानना चाहता हूँ..जागृति के बारे में...
धैर्य तुम शादी करोगे जागृति से..
क्या....अचानक ऐसे कहाँ तो कुछ कह नहीं सका..
मैने सीधे सीधे शादी के लिए पूँछ लिया.....अच्छा नहीं लगा।
अचाचक कहाँ,करूणा पहले जागृति के वारे में वताओ?“
जागृति की कहानी जानकर तुम भी दूरी बना लोगे।
ऐसा क्यों कह रही हो कि मैं ऐसा करूगाँ? ठीक है तुमने सीधे सीधे शादी करने की बात कही है तो मैं भी घुमा फिराके बात नहीं करूँगा। अब तक नहीं कहाँ वो आज कह ही देता हूँ।
क्या? छुपा रखा था अव तक .....
मैं जागृति को पंसद करता था पर कभी कहाँ नहीं, मेरे एक गलत कदम के कारण भविष्य अधर में न लटक जायें। जो भी भावनायें थी अंदर ही अंदर रखी और माध्यमिक के बाद हमारी दिशाये भी बदल गई। सात साल बाद फैसवुक के माध्यम से बातचीत हो रही हैं।
कमाल का है नेट आँनलाईन.... यानिक तुम अंदर ही अंदर पंसद करते थे लेकिन बहुत देर कर दी कहने में.....पर अभी भी देर नहीं हुई है।
मै जानना चाहता हूँ....इन सात साल मैं क्या हुआ है? जागृति के जीवन में जो भी घटना घटी कह दों.....जो भी बन सकेगा मै करूँगा...आपने शादी के लिए पूँछा तो मै भी तैयार हूँ, क्या जागृति करेगी?
धैर्य कल बात करूँ.. लम्वी कहानी है...ससुराल मैं हूँ...मायका नहीं है जो मन मर्जी कर लूँ....
करूणा हँसमुख चंचल छवि की है पहले भी बात कर लेती थी तब उसे सब ऐसे घूर घूर के देखते थे जैसे क्या गुना कर दिया है हम छोटे से कसँवे के कालेज में पढते थे, जहाँ लङके और लङकियो की अलग अलग कक्षाये होती थी. कुछ विषय ऐसे होते थे जहाँ साथ साथ ही पढना होता था जैसे कला वर्ग का भूगोल और विज्रान वर्ग की कक्षाये साथ ही देनी होती थी। अभी भी कसँवा के हालात ऐसे ही है जैसे पहले थे कालेज मॆ अव भी पांवदी है पहले जैसी कि वातचीत नहीं करना..हँसहँस कर सङक पर नहीं चलना अकेले लङकियो का वाजार नहीं जाना... पर अव यह सोंच कुछ मध्यमिक परिवार में अभी भी जो चाये शहर हो या कसवाँ नहीं बदलती हैं। अगर एक नजर से देखा जाये तो गलत नहीं है कुछ पांवदी लङको लङकियो को सभ्य आचरण प्रगृतिशील के पथ पर ले जाती हैं। लङके गुट बनाके भविष्य निर्माण के समय वेतुके वातचीत करना ...लङकियो को घूरना उनका पीछा करना अभ्रद व्यवहार करना अनैतिक के पथ पर ले जाती है, जव समय हाथ से निकल जाये तव सिर्फ पछतावा के सिवा कुछ नही रहता है। जीवन निर्भाह के लिए कोई स्थिर उच्चतर रोजगार नहीं होता हैं।जव समय था तव उस मूल्य समय को वर्वाद कर दिया आवारा गर्दी में न कोई पढाई उस वक्त पुराने दिन करके रोना आता है। पांवदी होना हितकर है श्राप नहीं हाँ माना अच्छा नहीं लगता है पर इसका मूल्य समय पर पता चलता हैं। मै अभी भी पुराने दिनो की मीठी यादों मॆ चला गया, पर साथ ही साथ एक अलग ही वैचेनी थी कि
 जागृति के जीवन में ऐसा क्या घटित हुआ है जिसके कारण खुदको बदलना स्वीकार कर लिया....ऐसा क्या हुआ?कव हुआ? कैसे हुआ? बहुत से सवाल थे जिसका जवाव तो सिर्फ करूणा ही दे सकती थी। मेरा मन व्यथित था वेसवरी से इंतजार था कि कव करूणा आँनलाईन होगी मेरे सवालो के जवाव मिलेगें। मन न आँफिस में लग रहा था न किसी अन्य कार्य में बस नजर टिकी थी फैसवुक पर कव करुणा आँनलाईन हो और मेरी जिज्ञासा शान्त हो। करुणा का फैसवुक पर मैसेज आया...
हैलो धैर्य......
कैसे हो...
मेरा मन तो किसी कार्य में नहीं लग रहा था,बस फैसवुक खोलके वैढा था जैसे ही मैसेज आया ....मैं खुश हो गया और उत्तर भेज दिया....हाँ सच कहूँ तो मै ठीक नहीं हूँ.....मेरा मन व्यथित है.कव से तुम्हारा इंतजार कर रहा था कि कव आँनलाईन होगी मेरे सवाल का जवाव दोगी..
अब मै गृहणी हूँ तो बहुत से कामकाज होते है. अब फुरसत मिली है तो मैने तुमसे बात करने की सोची जो कल अंधूरी रह गई थी।
हाँ....मै जागृति के बारे में जानने के लिए उत्सुक हूँ। ऐसा क्या हुआ है ?
स्नातक के वाद ही...जागृति की शादी मैकेनिकल इंजीनियर से हो गई. ऊँचा खानदान सब कुछ अच्छा था.....खानदान परिवार कितना ही अच्छा हो, पर जव तक जिसका हाथ थामकर नये परिवार से संस्कृति से अवगत करायें वो ही वेकदर करने वाला निकले तो शादी सम्पर्ण की जगह समझोता बन जाती हैं। समझोता भी ऐसा जिसमें पत्ती के अनुसार अपना व्यक्तव्य बदलो .जैसे पंसद हो वैसे रहो....अगर किसी भी कार्य की अवहेलना की तो वार वार नीचा दिखाने का एक मोके को हाथ से न गवाना. पल पल उङारना मारना। पति की नीचता मानसकिता के चलते परिवार भी अपने रंग बदलने लगते है. वो भी पल पल अपमान करते हैं। एक लङकी अपना सबकुछ छोङकर एक अनजाने व्यक्ति का हाथ थामकर नये सफर पर निकल पढती है कि मुझको सभालने वाला मेरे साथ चल रहा है. जव वही हाथ छोङ दे तो जिंदगी उस दोहराये पर खङी कर देती है जहाँ नजर तो सवकुछ आता हैं. सब अपने ही दिखते है पर परिस्थतियाँ बदल चुकी होती है। माता पिता पर वोझ औऱ वङ जाता है और भी वच्चो की शादी में रुकावट पैदा करती है. छोङी गई स्त्री की दशा आज के दोर में वन में भटकती जानकी की तरह हैं।माता पिता के लिए परिस्थतियाँ भिन्न हो पहले जैसा दुलार न हो पर पहला घर और आखरी घर मायका ही रहता है। और वच्चो की शादी और मुहल्ले वालो के ताने मानसिकता को दिशाहीन बना देती है। छोङी गई स्त्री मायके में शरीर पर रिसता घाव है जो शरीर को पीङा तो देता है पर अलग नहीं किया जा सकता हैं। माता पिता जव तक जीवत रहते है वेटी का दर्द को तो समझते है पर कुछ कर नही सकते है...समाज से तो लङा जा सकता है पर खुद के अंशो से कैसे लङे। भाई और भाभी वार वार ताने देते है वुरा भला कहते है दुतकारते है....तव वो औरत पल पल कितनी मोते मरती होगी।  आसान है पर करना उतना ही कठिन है एक स्त्री का तलाक सुदा जीवन जीना कठिन हैं।जो भईया राखी के दिन हमेशा साथ खङ होने का दावा करता था वो ही जली कटी वाते कहता हैं। भाभी तो एक ताना मारना छोङती नहीं है.. वहुत कुछ सहा है,वहुत कुछ देखा है जागृति ने....
धैर्य....हाँ....इतना कुछ हो गया हमको कुछ भी नही पता.. आखिर जागृति के पति को किस बात का घंमङ था क्या था? ऐसा असके पास जो औरो से अलग बनायें...वहुत से डाँक्टर इंजीनियर या कोई विशेष शिक्षा प्राप्त कर अच्छी नोकरी करते है तो किस वात का घंमङ है। आखिर ऐसा क्या था जो सवसे अलग वनायें? अपनी जीविका के साधन के लिए कोई भी चुनाव करें पर उस की कदर कोई कोई ही कर पाता है उसका मूल्य कोई कोई ही जान पाता है। एक डाँक्टर तव सफल डाँक्टर है जव उसकी गरिमा को पहचान पाये सही मुल्य समझ पायें...जैसे कि तुमको यह दायत्व मिला है जव किसी वीमारी मॆ ग्रसित होते है तव परिवार वालो के लिए डाँक्टर भगवान से कम नहीं है..भगवान की उपाधी दे देते हैं। पर डाक्टर उस उपाधी को वरकरार नही रख पाते है और अंहकार के आवेश मे और पद को तिरस्कार कर देते हैं. अमीर के हितैशी बन जाते है और गैरसरकारी हास्पीटल वाले मोटी रकम छापना सुरु कर देते है. समाज सेवा नहीं एक व्यापार बन जाता हैं। गरीव को निरादर की नजर से देखते है पर अमीर को सम्मान की नजर से देखते है. इस पद की गरिमा को जिसने पहचाना जिसके लिए समाज सेवा से वढ कर कुछ नही हैं. गैरसरकारी अस्पताल में एक दो दिन मुफ्त परामर्श की सुविधा और शल्य चिकत्सा के लिए छूट एक अलग ही पहचान बनाती हैं। उसकी यश कीर्ति जन जन तक पहुँचती है।पर यह हर कोई नहीं समझ सकता हैं गरीव सिर्फ पैसो के मामले में होते पर रंक से राजा बनाके ये उस्ताद होते है।
धैर्य.. तुम्हारी सोंच तो अलग हैं...इंजीनियर कैसे अपने व्यक्तत्व को निखार सकते हैं।यह भी वतलाओ...
नहीं....बस ऐसे ही कह गया. जायदा ही कह गया...किसी भी वात को विस्तार पूर्वक कहना मेरी आदत है पर यह हर किसी को अच्छी नहीं लगती है।
सबकी अपनी अपनी राय है, कौन किस तरह सोंचता हैं।
मै भी ऐसे ही सबके सामने नहीं कहता हूँ, सामने वाले का मनोदशा को समझ कर ही विस्तार से कहता हूँ।
तुमको तो लेखक बनना चाहिए...यकीनन अच्छे से बात का स्पष्ट्रीकरण कर सकते हो, एकवार तो जरुर सोचने को मजवूर कर सकते हो। एक वार लोग बात को नहीं सुनेगे पर लिखी हुई बात को पढी तो चिन्तन करने पर विवश जरुर हो जायेगें।
करुणा लेखक तो वहुत कुछ लिखते है पर एकवार कोशिश जरुर करेगे, किसी भी वात को लेकर उठते तूफान को लिखने की कोशिश करेगे। वताओ......बातो बातो में जो सच जानना था वो तो भूल ही चुके है...आखिर जागृति पर केसे केसे प्रताणित क्या जाता था?
जव प्रताणित की सीमा पर कर ,उस मुकाम पर पहुँच चुकी थी। जव जागृति के लिए ससुराल के दरवाजे हमेशा हमेशा के लिए वंद कर देने के संकेत लिए ,मायके में अपने सामान के साथ अकेली आ पहुँची। सुध वुध खोई रिक्से से उतर कर दहलीज पर कदम रखते ही माँ से लिपट कर बहुत रोई.. रोते रोते अपनी व्यर्था सुनाने लगी पर आवाज स्पष्ठ न होने के कारण कुछ समझ नहीं आ रहा था। घुटन की सास से निकल कर वातावरण की खुली हवा में सास लेकर ....आराम से आपवीती कह सुनानी... जव जागृति मायके आई हुई थी, तव मैं भी मायके में ही थी। जव उसकी ऐसी हालत के वारे में पता चला तो उससे मिलने उसके घर जा पहुँची।.
    पहले तो मुझसे गले लग कर बहुत रोई...रोले रोले.....रोने से जी हल्का हो जायेगा...जव शांत हुई तो अपनी आप वीती सुनाई ही नहीं वल्कि गम्भीर चोटो को भी दिखाया....देखकर मै विचलित हो गई कोई कैसे इतना नीचता तक जा सकता हैं? जितना खुला भाग उसपर कोई भी चोट के निसान नहीं...अंदरूनी भाग चोट के निसान से नीली लाल पढ चुकी थी. सुलगती सिगरेट से दागने के अनगिनत निसान थे....कहाँ कहाँ नही दागा कह भी नही सकते है।पत्ती की निद्नीय को देखकर अच्छाई से लिप्त  ससुराल के मुखङे से नकाव हट गया और अपना कहर बरसाना सुरू कर दिया।
    शरूआत तव से होती है...जो फोन पर रात भर घंटो चिपका रहता था..वादे कस्मे साथ जीने मरने की बाते करता था। उसके तेवर शादी के वाद कैसे वदल गयें? जागृति के पापा ने खूव दहेज दिया था...सुरु के दिनो में तो जागृति की खूव तारीफ होती थी पर फिर अचानक वदलाव आ गया। जागृति छोटे से कसँवे में रहती है,बहुत सी चीजे है जो वोलने का ढग, वैढने का ढग,पहनने का ढग सब शहर से भिन्न होता है। हम जिस माहोल में रहते है वहाँ गाँव की भाषा भी वोली जाती है जिसका हम शहर में नही भूल पाते है । जागृति भी गाँव की भाषा वोल जाती थी. सब उसकी मजाक बनाते थे...कहते थे, लो गवार आ गई....मेर्नस नाम की चींज नहीं है...क्या ठेट दैहाती भाषा वोलती हैं...अग्रेजी के विल्कुल मैर्नस नही हैं...वोलने में हाय, हैलो. चम्मच को स्पून नहीं  कहती।...जव हम सब बात कर रहे है तो क्या तुम्हारा वोलना जरूरी है?....क्या कहती हो सोई हमारे यहाँ ऐसा कहते है. यह सोई क्या होता है?ऐसे ही उसकी वोलने पर पांवदी लगा दी जव तक वोलने का ढग नहीं सीख लेती हो तव तक वोलोगी नहीं....किसी के सौन्दर्य की तारीफ करने में हाय सैक्सी...सो वोम लग रही हो, सो हाँट ...सो चिली सो पटाखा कहना अगर मैर्नस होते है।नमस्ते की जगह गले लगना चूमना, हाथ मिलाना मैर्नस है। हिन्दी वोलना गवार अग्रेजी वोलना ऐटयूट को नापने की मापनी है।हिन्दी वोलने के वीच में अपनी स्थाई समुदाय वोलने की भाषा खङी वोली, भोजपुरी व्रजभाषा का उपयोग करना वैड मैर्नस है। शहरी करण में जवतक अग्रेजी के शव्द न वोले तव तक मैनर्स नहीं है।
जागृति हिन्दू रीतरिवाज की तरह एक ग्रहणी की तरह सौलह श्रंगार को सजाती तो उसकी हँसी उङाई जाती है. माँग में मोटी पट्टी की तरह सिंदूर,आँखो में काजल,वीच में महरूम विंदी, चोटी गुथी हुई,गहरी लिप्टिक,कलाई भरके चूढी,चटक रंग की साङी, छम छम करती पायल ऐसा रूप सजाकर शादी के दूसरे दिन ही रसोई घर में आई,यह सोचकर कि सब खुश हो जायेगे, पत्ती तो मुंग्ध हो जायेगे पर सव उसको देखकर हँसने लगें.... जागृति के पत्ती ने जव देखा ,यह क्या गवार सा रूप बना रखा है। कहते कहते ही...हाथ से माँग का सिदूर पोछ डाला ....ऐसे सोलह श्रंगार करने से कुछ नही होता है जितनी उमर है उतनी ही जियेगे। पत्ती को जो पंसद हो वही करना चाहिए आज के वाद ऐसे गवारू कपडे नहीं पहनना है। मिनी स्कर्ट,फ्राँक ,गाऊन जींस टाँप में रहना मैनर्स है। जींस टाँप को अपना लिया, सूट सलवार पर भी पांवदी थी।
हद तो तव हो गई जव साथ में एकवार पार्टी में मिनी स्कर्ट पहना कर ले गया। पहनने की आदत तो थी नही जो अपनी स्कर्ट को नीचे खीचती रही।किसी से बात करने की वजय चुप रहना ही वेहतर समझा। जहाँ का दृश्य  पति पत्नी दूसरे के साथ नृत्य कर रहे है, मर्यादा की सीमा क्या थी? नर नारी के हाथो में झलकते जाम दूसरे के वाँहो में झूलना, शहरीकरण के यह मैनर्स है। पार्टी भी किसलिए थी प्रमोशन के लिए ....जागृति एक कोने में चुप सी वैढी थी पर किसी व्यक्ति की नजर उस पर पढ गई उसने साथ में ड्रान्स करने के लिए कहाँ, नहीं....
वार वार वह व्यक्ति कहता रहा.....आखिर में उस व्यक्ति ने हाथ पकङ के खीचा, पर यह वात जागृति को अच्छी नहीं लगी, उसने चिल्लाकर कहाँ, जव एकवार वोल दिया नही करना तो जिद क्यों”?
पार्टी में एकदम सन्नाटा छा गया...जागृति के पति ने विना कुछ पूछँ...सबके सामने जागृति पर चाटा जङ दिया. तेरी हिम्मत कैसे हुई...ऊँची आवाज में वाँस से वात करने की. तू गवार है गवार ही रहेगी. मेरी ही गलती थी जो तुझको यहाँ लेके आया..तूने मेरी नोकरी पर लात मारी है मेरे वाँस पर चिल्लाकर....
तभी एक लङकी आई....ओ सिट यार...क्या गवाँरू टाईप की वीवी चूज की हैं. तुम जैसे हैडसम क्रेजी के लिए कितनी जान छिङकती हैं। कहते कहते हाथ पकङ कर ड्रासफ्लोर पर ले गई...
जाते जाते जागृति के पति ने कहाँ, मेरी लाईफ ङिस्कास्टिग कर दी है. दूर हो जाओ....अपनी सूरत भी मत दिखाना. किसी के साथ  ड्रास न करना मैर्नस नही है..एकहाथ में जाम दूसरे हाथ में अपने साथी की जगह किसी ओर का हाथ थामना मैर्नस हैं। यह रात उसके जीवन में ग्रहण बनके आई और जिंदगी को वेरंग कर दिया।
मन बहुत विचलित था कैसे उठते तूफान को शांत करें? अपनी भावनाओ को अपने अंदर उठते अनगिनत प्रश्न को अपनी कला में उतार देती थी।कोई नही  था जो उसकी पीङा समझ सकें। अपनी व्यर्था को भावनाओ को रंगो में रंग कर चित्रपटल पर उतार देती थी  उसके पती की नजर एक रात उसके चित्रकारी पर पढी, जव पार्टी में से नसे में धुत लङखङाते कदम के साथ, उसी लङकी के साथ घर मे आया जव रात अपने चर्म पर थी..पती को तो कोई फिक्र नही थी पर जागृति राह देखती थी। चित्रकारी पूरी हो चुकी थी रंग अभी सूखने वाकी थे...उसकी नजर पढी कि देखकर खुश होगे पर,पास में रखा पानी का गिलास उठाया और उस चित्रकारी पर फैक दिया. और तो कुछ आता नही है बस गाँव की लीपपोत को यहाँ पर भी वरकरार रखा हैं। तुमसे तो शादी करके मेरी लाईफ की तो वाँट लग गई है। गवाँरू न वोलने का ढग न पहनने का ढग न स्टैन्डर्स पढाई क्या की है ...हाँ...आर्टवर्ग  से पहले समाजशास्त्र से एम ए और आर्ट में यह लीपपोत..कहाँ हम और कहाँ तू कोई मेल है। मैने किया है मैकेनिकल इंजीनियर में एम टेक, सो व्यूटीफुल लेडी एम वी ए जो आज एच आर हैड है। ये सारी वाते करता रहा और जागृति कुछ न कर सकी...जाते जाते कहाँ, मेरे रूम में आने की जरूरत नहीं है, आज की रात व्यूटीफुल लेडी के साथ तुम जैसी गवाँरू की यही जगह है लावी में...
हर दिन घुट घुटके जीना पढ रहा था ...इस ग्रहण का कव अंत होगा? पूरे घर का कामकाज कराती, वात वात पर ताने सुनाती जलील करती.. तू इन डिवोस पेपर पर साईन कर और निकल जा मेरी नजर से...पर जागृति नहीं करती थी क्यों? मायके मॆ गई तो और वहिनो की शादी मॆ अङर्चन आयेगी. कैसे होगी शादी..जैसे भी हो ससुराल से निकाली गई, पती की छोडी स्त्री के लिए कही जगह नहीं है।मारपीट की सारी हद पार कर दी..आखिरकार जागृति ने भी हार मान ली और तलाक के पेपर पर हस्ताक्षर कर दिये और ससुराल से निकाल दिया।
माँ पिता को भी चिन्ता थी, अव इन लङकियो का क्या होगा कैसे होगी शादी?छोङी गई स्त्री के लिए..आगे सफर वहुत कठिन होता है।जागृति टूट चुकी होती अगर उसकी छोटी वहिन तर्क वितर्क की ईमारत न गढती... जो वकालात कर रही थी वो भी अपने हिम्मत से ...लङकियो को पढाई के लिए ऐसे घर से दूर नही भेजते थे..पर उसकी जिद थी किसी की नहीं मानी सरकार के अनुदान की सहायता से पढाई कर रही थी। घर पर जागृति के आ जाने से मातम सा छा गया था, सब ऐसी नजर से देखते थे जैसे कितना वढा जुर्म कर  दिया हो। चाची ताई और भाभी ऐसे ताने मारते...कैसी कुलछनी हुई है पूरे घर को ले ढूवी अब कौन करेगा इनकी लङकियो से शादी... भईया भी कहने से नही चुकते थे। जागृति को धीरज वधाँने वाला कोई नहीं था....अपनी जिंदगी को वोझ समझने लगी थी, इस वेरंग जिदगी को खत्म करने की सोंच लिए गाँव के पास नहर की तरफ भाग निकली...उधर से जागृति की बहिन कंगार आ रही थी...कंगार कुछ कह पाती ...पुल से चढ कर नहर में छलाग लगा दी....पीछे पीछे कंगार ने भी छलाग लगा दी...और जागृति को डूवने से वचा लिया.अकेले कंधे पर वाँजू को  सहारा देकर घर ले आई।चारपाई पर लिटा दिया...मेला देखने वालो का मजमा जुड गया।जागृति अपने दर्द का हाल करूणा से सुना देती कौन क्या कह रहा हैं।करूणा होशला देती पर आखिर कव तक अपने आप से जूजती रहती लोगो के ताने सुन सुनके रहन शक्ति क्षीण हो चुकी थी, तव फैसला किया, न रहेगा वाँस न वजेगी वासुरी....कंगार को सारी घटना करुणा ने वता दी। क्यो? किस कारण से आज जागृति को यह हाल हुआ है।
कंगार का आज इंतहान था। देखना था कितना सीखा है. अपने तर्क वितर्क से एक निर्जीव हो चुकी साखा में जीने की चेतना जगा सकती है कि नहीं...... कंगार... आप सबके ताने किसी भी जीवित व्यक्ति को निर्जीव बना सकते हैं।यह परिवार है जहाँ मुश्किलो में साथ होना चाहिए था, वहाँ अपनी अंदर दवी सुलगती चिंगारी को प्रंचंड अग्नि बनाने में आप सबको तो निर्पुणता हाशिल हैं। बहिना इनके ताने के कारण अनमोल काया को त्याग करने चली. यह सब तो यही चाहते है कि हम टूट जायें। जब एक औरत होकर दूसरी औरत का दर्द न समझे तो उन सबको समझाना वेकार है। वैसे ही पाषाण पर कहने से चित्र उत्कृष्ठ हो सकें.... यहाँ कहने से नहीं वल्कि तुमको इतना सक्षम बनना है कि खुद ही वोलती वंद हो जायें। बहिना अब तुम यहाँ एक क्षण न रूकोगी चलो मेरे साथ अब कहने सुनने का समय नहीं है कुछ करने का समय है।मम्मी पापा आप चिंता मत करना, इन लोगो का मत सोचों ये होते ही है किसी के दुख को कम नहीं करते है वल्कि और वढा देते हैं।
कंगार जागृति को अपने साथ शहर ले आई और होशला देने लगी।जो खूवी थी उसको अपनी जीने की वजय बनाने के लिए प्रोत्साहित करने लगी।पुरानी जिंदगी को वुरा ख्आव जानकर भूलने को कहती।खुश रखने के लिए बाहर घुमाने ले जाती. पेंटिग करेने का सामान लेके रख दिया और खोई हुई शक्ति को जगाकर ....सुन्न स्थति में चली गई चित्रकार को जगाया, मन के अंदर कल्पनाओ के रंग भरकर चित्रपटल पर उतारने लगी।....कंगार ने उन चित्रो को वेवसाईड पर खाता बनाके चित्रो को अपलोड कर देती. देखते देखते सहारना के साथ पेंटिग ने किस्मत ही वदल दीं। सोहरत दौलत अपना नाम एक अलग ही पहचान बन गई। जो ताने मारते थे सब देखते ही रह गयें। दौलत सब जख्म भर देती है,  उसके अतीत से जायदा आज को महत्व देती हैं। शोहरत दौलत सब बदल लेती है। जिसने कला को पहचाना नहीं अपमान किया आज कला ही उसकी पहचान हैं।अमीर लोगो के घर की सोभा वढाती हैं जिसके लिए कोई भी कीमत चुकाने के लिए सज्ज हैं।उच्च कोटि की प्रतियोगता में सम्मान का प्रतीक रूपी तमंगा मिला। यहाँ तक पहुँचने में समय और संर्घष की सीढी पार कर उसका प्रतिफल मिला हैं।
करूणा के कहे शव्द को मैने अपनी लेखनी दुवारा लिखने की कोशिश की।लिखने के लिए प्रेरित भी करुणा ने ही किया था ।पर मेरे मन में ङर था कि जागृति के साथ इतना कुछ हुआ है, कही मुझे भी उसी तराजू में न तोलने लगे। एकवार विश्वास पर चोट लगें तो दूध का जला छाँच भी फूक फूक कर पीता हैं। कैसे जागृति से कहूँ ,मन की वात क्या समझेगी...उठक पटक व्याकुलता के कारण चैन नहीं था. तभी मन में विचार आया क्यो न करुणा का सहारा लिया जाये।बहुत कुछ सहा है अकेले...हाँ तभी याद आया करुणा ने कहाँ भी था, कि तुम शादी करोगे।
        कही भी मन नही लगता थोङी सी खुशी दे दू तो अपने आपको धन्य समझूगा. डर भी था कही मना कर दिया तो क्या होगा?दूसरे पल ही अगर मना भी कर देगी तो उसका हक है।मुझे जागृति का सम्मान करना होगा। जव करुणा से अपनी मन की वात कह डाली,कि एक वार जागृति से वात करे. मै हाथ थामना चाहता हूँ एकवार और मोका देना चाहिए, अपनी जिंदगी को....हर वार डरावने सपने नहीं आते है कभी तो मीठे सपने आते है जो मुस्कान लाते हैं। करुणा भी यही चाहती थी कि जागृति को समझने वाला ही नहीं वल्कि प्रत्येक औरत का सम्मान करने वाला धर्य जैसा ही व्यक्ति मिले।
करुणा हाँ मै कोशिश ही नही वल्कि राजी भी करुँगी, जव खुशी स्वयं दस्तक दे रही है। तो उसका सम्मान करना चाहिए..निराधर नहीं करना चाहिए।
धैर्य जागृति के ख्यालो में खो गया....
 ठहर जायें नज़र ये इल्म जानती हो..
हो जायें काफिर ये कशिश जानती हों..
तेरे दरिमियान आँके सुध भूल बैठा हूँ,ठहरी नज़र है जग भूल वैठा हूँ!!
पहले विंदाश अलबत्ता परिदां था,तेरी मुडेंर का रहनुमा परिदां हूँ!!
तेरी एक झलक का अक्स ढूँडता हूँ,वार वार बस तुझमें ही तुझको ढूँडता हूँ!!
ज़िंदगी क्या है?आज सबब जानता हूँ,तुझ बिन अंधूरी किताव हिस्सा मानता हूँ!
तू हुई मेरी मंजिल....मैं तेरा राही.....
तुझसे ज़िंदा हूँ ......मैं तेरा राही...
तलब किया इजहार किया सौ वार कहाँ,तेरी खामोशी वार वार हाँ की तरफ़ जायें!
लव्ज को इजहार करने का फरमान दो,मैं व्याकुल हूँ सुनने  का रसपान दों!!
मुस्कराके चली जाना दूर से पलट जाना,तिरछी नजरों से बिन कहें हाल बयाँ करना!
खामोशियो में तेरा आशिकाना पंसद हैं,शकून  मिल जायें बस लव्जो हाल बयाँ कर दो! 
इस पंरिदो को अपने पिजडे में ग़ुलाम कर लो,उमर भर तेरी छाँव का रहनुमा पंरिदा रहूँ!!
बस और क्या? इस हस्ती को अपनी हस्ती में शामिल कर लो!!
बस और क्या?इस हस्ती को अपनी हस्ती में शामिल कर लो!!
तू ही मेरी मंजिल....मैं तेरा राही...
तुझसे ही ज़िंदा हूँ...मे तेरा राही...

करुणा ने जागृति को फोन करके सारी वात कह सुनाई...धैर्य शादी करना चाहता हैं.. सबकुछ को भूलके एक मौका और देना चाहिए।धैर्य ने खुद कहाँ है,तू ऐसे ही बिना सोचे समझे मना मत कर देना. शान्ती मे सोचके..मेरा कहाँ माने तो हाँ कर देना।
जागृति कुछ कहना चाहती थी पर करूणा ने मौका ही नही दिया ।जव करुणा ने सब बात कह ङाली तो कहती है..तू भी कुछ कह ना..एकवार फोन पर बात कर लेना।तु कुछ कहती क्यों नहीं है?
जागृति...और कुछ कहना है, कि अव मै कुछ कहूँ...
करुणा..नहीं कह ना..
जागृति..एकवार ट्रैन छूट जायें फिर रुकने का नाम नहीं लेती है..वक वक लगी रहती है कभी तो सामने वाले की सुनने लिया करो...आखिर करना क्या चाहती हैं.बस अपने ही सवाल और अपने ही जवाव... करूणा मैं भी एकवार धैर्य से मिलना चाहती हूँ..जो भी कहना है मिलके कहेगे।तारवावू खवर पहुँचा देना...फिर दोनो हँसने लगी...
जागृति की आकाँक्षा अनुसार मिलने का कार्यक्रम रखा गया..रेस्तरा में जहाँ पहले से ही धैर्य इंतजार कर रहा था ।इस दुविधा के साथ आखिर मिलके क्या वात करना चाहती है?कही लताङ तो लगाने के लिए  नही वुलाया है.अजीव अजीव नकारात्मक ही विचार आ रहे थे।करुणा के साथ जागृति पास आ कर खङी हो गई..धैर्य को आने की खवर भी नहीं हुई.....
करुणा ने बहुत आवाज लगाई...पर एक वार भी जवाव नहीं दिया..करुणा ने मेज पर रखे पानी के गिलास को उठाकर..पानी को हाथ मे लेकर छीटे चहरे पर मारे....पानी के छीटे पढते ही धैर्य हङवङा गया...यह देखकर करुणा की हँसी छूट गई..जागृति भी मंद मंद मुस्काने लगी. धैर्य भी हँसने लगा...
करुणा कहाँ खोये हुए थे...अभी से शादी के सपने तो नही देखने लगें।
धैर्य.. नहीं तुम्हारी सहेली इतनी जल्दी हाँ कहेगी क्या?
करुणा...ये तो तुमको स्वंय ही पूछँना होगा...और वाजू पकङ के पीछे से सामने खङा किया।
धैर्य टकटकी लगाके देखना चाहता था ,पर मन ने इंजाजत नही दी।पता नहीं क्या फैसला होगा?और नजर चुरा ली सामने देखने की वजाय इधर उधर देखने लगा।
जागृति  फोन में कुछ करने लगीं.एकपल के वाद कहाँ.यह एन जो ओ कौन चलता हैं?नाम है संचालन कर्ता ...धैर्य सिहं..
नाम सुनते ही धैर्य ने कहाँ.हाँ हम सब मिलके चलाते हैं। प्रताङित, असाय, समाज से भहिष्कृति जैसी महिलाओ के लिए ,सक्षम बनाने की एक पहल हैं. पर जागृति इसका क्या लेना देना?.शादी का निर्णय तुम्हारा है।
जागृति..यह भी बता दो इस एन जी वो में हर साल जागृति कलावर्ग से दान दिया जाता है। यह कहाँ से आता है?
धैर्य एक पल के लिए सुन्न रह गया. हाँ मेरे दिमांग में क्यों नही आया तुम्हारा नाम?वो तुम थी…..
जागृति...मैं तो जरिया हूँ ...मुझ जैसे हार चुकी महिलाओ के लिए एक किरण तुम्हारा एन जी ओ दिखाता है, इससे वङी वात क्या हो सकती हैं। तुम्हारे प्रस्ताव पर सोचना कैसा.जव सोंच अच्छी हो, तव ही एक नई पहल कर सकते है।मै तुम्हारी इसी पहल के कारण हाँ कहती हूँ।
जागृति के हाँ कहते ही...धैर्य की नजर जागृति को टकटकी लगाके निहारने लगीं।

मंगलवार, 24 अप्रैल 2018

हसीन बात क्या होंगी

जमींर अगर जाग जायें तो,
इससे हसीन बात क्या होगी।
खुद का करने लगें आंकलन तो,
इससे हसीन बात क्या होगीं।।
जीव पर ऊँगली करने से पहलें,
तीन ऊँगली का हो जायें परिचय।
अंह के भसीभूत होने से पहले,
अंह का बन जायें ग्रास।।
इससे हसीन बात क्या होंगी।।
दोष रोपड करने से पहले,
मानचित्र हो जायें अंकित।
अपशव्द कहने से पहलें,
जिह्वा लडखडाने लग जायें।।
इससे हसीन बात क्या होगीं।।
पथ पर काँटे बिछाने से पहले,
खुद पीणा का एहसास हो जायें।
पथ पर गड्डे करने से पहले,
खुद का अनुभव हो जायें।
इससे हसीन बात क्या होगी।
बेबस का परिहास बनाने से पहले,
खुद के परिहास से बास्ता हों जायें।
लाचारीं पर हट्टाहस करने से पहले,
खुद हट्टाहस का पात्र हो जायें।।
इससे हसीन बात क्या होंगी।।
गरीब को कंकड बतलाने से पहले,
दाल का कंकड मुँह में आ जायें।
गरीब को बोझ समझने से पहलें,
खुद सम्पन्न बोझ हो जायें।।
इससे हसीन बात क्या होगीं।।
श्रृमिक को बधुँआ कहने से पहले
खुद शासन का बधुँआ समझ जायें।
पगार को दासता समझने से पहले
खुद शासन की दासता समझ जायें।।
इससे हसीन बात क्या होगी।।
कर्ज तले गुलाम कहने से पहले,
शासन के कर्ज का गुलाम हो जायें।
वफादार को कुकुर कहने से पहलें,
मालिक खुद कुकुर हो जायें।।
इससे हसीन बात क्या होगीं।।
आँखो से हीनता दर्शाने से पहलें,
हीनता ही दृष्ठिबंध हो जायें।
दुःदृष्ठी से गंध फैलाने से पहले,
काया ही गंधहीन हो जायें।।
इससे हसीन बात क्या होगी।।
धर्म का आडम्वर फैलाने से पहले,
धर्म ही खुद पर श्रापित हो जायें।
धर्म से पथभ्रष्ठ का स्वांग रचतें,
पथभ्रष्ठ से स्वांग का पर्दा उठ जायें।।
इससे हसीन बात क्या होगी।।
धर्म के नाम पर सत्ता चलाने से पहले,
सत्ता ही स्वयं धर्म के अधीन हो जायें।
धर्म के नाम पर रक्तपात करने से पहले,
रक्तपात का ही अंशविहीन हो जायें।
इससे हसीन बात क्या होगी।।
जालसाजी का खेल खेलने से पहलें
खुद जालसाजी का शिकार हों जायें।
छल कपट का जाल फैकने से पहले,
जाल में खुद शिकारी शिकार हो जायें।।
इससे हसीन बात क्या होगीं।।
नारी को बस्तु समझने से पहले,
नर खुद बस्तु से नीलाम हो जायें।
नारी की आत्मा को रुलाने से पहले,
नर से नारी पल छड में हो जायें।।
इससे हसीन बात क्या होगी।।
धरा की सिसकियाँ कहर बनने से पहले,
धरा की सिसकियों से पहचान हो जायें।
धरा के रोम रोम से बहती रक्त धारें,
समय से पहले उपचार हो जायें।।
इससे हसीन बात क्या होगीं।।
24/04/2018
आकाँक्षा जादौन

शनिवार, 31 मार्च 2018

बरवाद न कर

वक्त की नील को वरवाद न कर .....यह देखने में कि रंग की धार कैसी है? कुछ फलसा लिख ऐसा कि मुक्कमल जहाँ तेरा तलवदार हो जायें...वाह। की दाद में तेरे भी नजरदार हो जायें....गुजर गया वक्त रंग की धार देखने में...तेरा जीवन भी बिना किस्सा के न पढ सकें वो लिखावट रह जायें....

लहरो को क्या ताँकना

कंगार पर खङे होकर लहरो को क्या ताँकना,होशलो की उङान को सपनो से क्या बाँधना,माझी सा हुनर हे तो मुकाम तो दो, पंखो को खोलकर उङान तो दो.....,एक नया इतियास को ......अपने नाम का मुकाम तो दो.....।

गुरुवार, 22 मार्च 2018

खून न पिघले वो पानी हैं

नरसंघार देखकर भारतियों का,

खून न पिघले वो पानी हैं।

हम तो सुरक्षित आवाद हैं,

जिनकी उजडी बस्ती हैं।

उनसें क्या लेना देना मेरा,

आने वाली खतरे की घंटी है।

आज उनके बुझे चिरांग,

कल क्या पता हमारी वारी हों।

नरसंघार सुनकर बहरे हुए,

इतियास दुहरा रहा पदचाप है।

जव जव ठण्डा हुआ खून,

तव तव विदेशी सिंगजा जकडा हैं।

आई सी आई ने भाप लिया हैं,

नरसंघार पर करते राजनीति हैं।

आम जनता भी सोई हुई हैं,

हम है सुरक्षित औरो से क्या नाता।

यही खामोशी ही है,

वढे शंकट की आहट हैं।

जाग जाओ सोने वाले ,

फिर रोओगे पछतावोगे।

इस वार आया गजनी,

अस्तत्व ही मिट जायेंगा।

एक छत्र होगा राज,

एक ही धर्म सबका होगा पतन।

समूह में होगा नरसंघार,

नारियों का होगा जौहर।

आत्मा होगी तार तार,

ऐसा दृश्य दुहरायेगा।

आरक्षण की ललक पाने को,

कोहराम खूव मचाते हों।

घाटी में काले झण्डे फहराते हों,

देश द्रोह नारे खूब लगाते हों।

कभी भारतिय होने पर भी,

इस नरसंघार पर उवाल लाओ।

चका जाम,काला शोक ,

शेरो सी दहाड दिखलाओ।

बतलादो विदेशी, नेताओ को,

जो खोये है हमने हमारा ही कतरा।

विगुल फूक दो देशद्रोह के खिलाफ,

जो ऐसी राजनीति करेगा,

वो सत्ता का अधिकार नहीं।

जो देशद्रोह के नारे लगायेगा,

उसका पण्डुचेरी में हो कालापानी,

ऐसा कठोर निर्णय हो पालन।

तव होगा भारत स्वाभिमान,

विषैले सर्प का कुचलो फन।

अव शांती नहीं उवाल लाना हैं,

देश की माँग ही नही अपनी आन है,

शोर्य दिखाने का आया मौका।

खून ठण्डा नहीं उवाल दिखाना है,

गीदड नहीं शेर की दहाड दिखाना हैं।

गुरुवार, 8 मार्च 2018

समाज दर्पण: पोषित अध्याय हूँ।

समाज दर्पण: पोषित अध्याय हूँ।: मैं बंधनो से श्रृजित, पोषित अध्याय हूँ। स्वयं में स्तम्भ, स्तम्भो का आधार हूँ। युग युग से सरोकार, मुखारित करती गाथा हूँ। मैं ना...

पोषित अध्याय हूँ।

मैं बंधनो से श्रृजित,
पोषित अध्याय हूँ।
स्वयं में स्तम्भ,
स्तम्भो का आधार हूँ।
युग युग से सरोकार,
मुखारित करती गाथा हूँ।
मैं नारी के ह्दय में ,
बसती प्रेम की परिभाषा हूँ।
विरल से विकराल,
शून्य से अन्नत हूँ।
शब्दो से परेह,
पूर्ण ममत्व हूँ।
स्वार्थ से निस्वार्थ,
ममता का सागर हूँ।
अपूर्ण से पूर्ण ,
श्रृष्ठी का संचालक हूँ।
मैं नारी के ह्रदय में,
बसती प्रेम की परिभाषा हूँ।
अधिकारो सें वंचित,
स्वयं अधिकारो से श्रृजित हूँ।
अवला से दोषपूर्ण,
सक्षम का प्रतिविम्व हूँ।
नारीत्व अवला पर प्रश्न,
आज उत्तरो की श्रृंखला हूँ।
आगम निगम को स्थापति,
सोर्य की विजय गाथा हूँ।
मात्रृत्व बन कल को उदय,
नारीत्व बन स्वयं को बिखराती हूँ।
मैं नारी के ह्रदय में ,
बसती प्रेम की परिभाषा हूँ।
शीतल अग्नि का समावेश,
नेत्रों से उजागर होती हूँ।
प्रेम से प्रफुल्लित ,
प्रेम ही बरसाती हूँ।
दोष, निःदृष्ठी उपहास,
वंश का विध्वन्स कराती हूँ।
नारीत्व के वल का वल,
नवीन संकल्पना का आगाज हूँ।
दुःचारी से दोषित धरा,
पुःउत्थान का स्थापना हूँ।
शून्य और अन्नत का विम्व,
मैं नारी में बसता प्रेम हूँ।
मैं नारी के ह्रदय में,
बसती प्रेम की परिभाषा हूँ।

आँखो में सम्मान तो हो

चंद शब्दो से सम्मान नहीं,
आँखो में सम्मान तो हो!!
रूढवादी सोंच का बंधन नहीं,
सोच से सोच का समागम हो!!
किताब के दायरे में नहीं,
खुद एक किताब बनने तो दो!!
ख्आब देखने दो तोडो मत,
होशला पस्त नहीं ऊर्जा भरने दो!!
कोई भी डगर मुश्किल नहीं,
हर पथ पर कीर्त बनने तो दो!!
कमज़ोरी का आंकलन नहीं ,
वीरागंनाओ का संचार भर दो!!
पक्षपात नहीं भेदभाव से उच्च,
संकल्पनाओ का विस्तार करने दो!!
आज़ादी के पंखो में बेड़ियाँ नहीं,
होशलो की उड़ान तो भरने दों!!
हर दिशाओ की सैर पर अंकुश नहीं,
दिशाओ को इतिहास बनने तो दों!!
आज के दिन सिर्फ़ सम्मान नहीं,
हर दिन सम्मान को बनने तो दो!!
दिन रात में विचरण निडर करें,
ऐसी स्वाभिमान का अधिकार हो!!
चंद शब्दो से सम्मान नहीं,
आँखो में सम्मान तो हो!!

गुरुवार, 25 जनवरी 2018

आवाहन

जिंदा की ललकार वल कहाँ?
मृत्यु का आवाहन करते हों?
आत्ममंथन कर स्वयं विचार करो?
नारी सम्मान में कितने शीष कटते है?
इतियास पन्नो पर अहाकार करते हो?
मन चंचल क्या क्या उमडता है,
पर कितना पटल पर उतरता है।।
व्यक्ति के प्रति क्या विचार रखते है,
मन की डोर स्वयं के हाथो में रखते है।।
क्यों वनाता भंसाली मसाला ,
यह उस सोच पर तमाचा है?
एक प्रश्न मेरा योद्धाओं से है,
इतियास के आवाहन पर उठी तलवारे?
जिंदा की ललकार का वल वनो।।
यह शोर्य जव पालोगे दिखलाओगे,
तव ही योद्धाओ कहलाओगे।।
 सिर्फ राजनीति करने का खेला है,
तो समझो तुम्हारा अतन नही पतन होगा।।
हर नारी है पद्मावती नही लक्ष्मीवाई का,
आवाहन वीरागना देखना चाहते है।।
जौहर नहीं अवला नहीं मर्दाना का,
चौला चण्डी का आवाहन चाहते है।।
भेडियों के झुण्ड में शेरनी की दहाड,
तलवार की ललकार वल का प्रहार चाहते है।।
जौहर आत्मदाह नहीं भेडियो की मृत्यु,
रक्त से धरा को वतलाना चाहते है।।
दुर्गा लक्ष्मी सरस्वती से निकलके, 
काली चण्डी आक्रोश जगाना चाहते है।।
याद करो द्रोपती को सभा में हुई लाजवत,
आत्मदाह नहीं महाभारत विध्वंस कराया था।।
सीता जी पर दृष्ठी पढी रावण की,
रावण की लंका दहन वध करवाया था।।
याद करो और वीरागंनाओ को वीरा,
रोम रोम में लक्ष्मीवाई सा शोर्य भरना है।।
कलयुग के वार का वार आत्मदाह नही करना हैं,
जीके भेडियों का प्रतिहार करना है।।
रोम रोम में पद्मावती नही लक्ष्मीवाई सा,
जौहर नहीं वीरागंनाओ को भरना है।।
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सोमवार, 18 दिसंबर 2017

याद बहुत आते है वीते पल





जव से एन एन एस( राष्ट्रीय सेवा योजना) का टूरकैम्प’ की भनक काँन में पढी तव से सव लङकियों में फुसफुसाहट शुरू हो गई। वार्षिक टूर पर नहीं गये तो अंक नहीं मिलेगे। इसका महत्व आने वाले समय में पता चलता है।किसी प्रशासनिक नौकरी के लिए पहले कदम में इसका महत्व दिखता हैं। अंक रूप में विद्धार्थी के लिए जल रूपी संरक्षण हैं। अंक के रूप में नौकरी में तय मानक रूपी में यह अनुदान का काम करता हैं। स्नातक के प्रथम वर्ष में प्रवेश के लिए फार्म भरा जाता है, जिसमें कुछ नियम होते है अगर आपने श्रम के रूप में प्रत्येक रविवार को आठ घंटे के रूप में कार्य किया तो विद्धार्थी को  3 से 5 अंक और दो वर्ष में 10  दिन का टूर किया तो 8 से 10 अंक का प्रमाणित रुप में अंक पत्र दिया जायेगा। आठ घंटे के रूप में प्रत्येक रविवार को भाग लेकर श्रम तो कर ही रहे थे, जिसमें पोलियो दवा पिलाना कालेज की साफ सफाई, शिक्षा का महत्व बताना, नशा से हानियों के प्रति जागरूक कराना। इस प्रकार के कार्यक्रम से विद्धार्थी में श्रंम के प्रति चेतना जागती है और भेदभाव का खण्डन होता हैं। सदभावना,सदविचार का उदय होता है। शर्म और अपने विचारो को विना झिझक के  व्याख्या रूप में प्रस्तुति करना ,जिसके लिए सांस्कृति रूप का मंचन किया जाता है। प्रत्येक रविवार को लतीफे, कविता पाठ, कोई नाटक रूप में अपने विचार प्रस्तुति करना ,गीत गजल से अपने सुरो को पहचानना, अपने विचारो को खुले रूप में समाज के सामने प्रस्तुति करना जैसे, निवन्ध, कला के रूप में अपने अंदर के विचारो को रंगो के माध्यम से पटल पर विखेर देना जैसे कार्यक्रम होते थे। इतने सारे विकल्प थे जिससे अपने आप को पहचानना अपने अंदर छुपी प्रतिभा से साक्षात्कार कर सकते थे। पर यह दौर आत्म मंथन का नहीं होता है शर्म और लाज के घूघट में लजाते वाल वालाये है। यह दोर खुद से द्व्द आकृषित मनोदशा में विचलित करने वाले रहस्य से भरा होता हैं।विपरीत की तरफ झुकाव प्रेम में प्रफुल्लित धारावाहिक देखना, फिल्म के गीत गुनगुनाना, फिल्म देखना, अपने सपनो मॆं खोये रहना होता है। कोई लक्ष्य निर्धारित नही होता है क्या करना हैं.कभी यह करना है तो कभी वो करना है। जो दृढं संकल्प से लक्ष्य निर्धारित कर लेते है उनके लिए सुनहरा भविष्य वाँये फैलाके स्वागत करता है। जो भटका होता है उसके लिए भविष्य में कदम कदम पर मुश्किलो का सामना करना पढता हैं।
   इसवार 10 दिन का टूर कैम्प का आयोजंन वृंदावन में होना था जिसमें पाँच कालेज के विद्धार्थी भाग लेना था। उस पाँच में नारायण महाविद्धाल का नाम भी अंकित हुआ। सर ने जव से बताया कि कैम्प में जाना आवश्यक है अगर नहीं गये तो अंक के अनुदान में कटौती की जायेगीं।जितनी सफलता मिलनी चाहिए अपने श्रमदान से वो नहीं मिल पायेगी। छोटे से कसवे में जहाँ अकेले आगरा तक जाने की अनुमति नहीं थी, न स्वयं जा सकते थे वहाँ 10 दिन के कैम्प के लिए कैसे अनुमति मिले? लङको के लिए कोई समस्या नहीं है पर लडकियों के लिए आने वाले भविष्य निर्माण में योगदान देने के लिए पहली सीढी है। अपने परिवार से दूर अकेले अपने मित्रो के साथ 10 दिन के कैम्प में अपने आप को भाग ही नही वल्कि अपने आप को प्रस्तुति भी करना था। हजारो विद्धार्थियो के वीच में अपनी प्रतिभा का अनुसरण भी करना था। सर ने जव कहाँ तव से एक ही वात चल रही थी कि परिवार वाले जाने की अनुसति देगे, या वस लङकी होने का समझोता करना पढेगा।हम सव जो सोंच रहे थे वैसा कोई भी अडचन नहीं हुई वल्कि सहज ही माता पिता से जाने की अनुमति मिल गई। शायद माता पिता जानते थे अंक का अनुदान भविष्य में क्या महत्व रखता है। जहाँ सामान्य वर्ग में कठिनाई से नौकरी मिल पाती है वहाँ यह अंक का अनुदान भविष्य का स्तम्भ है। जिसकी जव आवश्यकता हो तव सिर्फ एक कारण के कारण उम्रभर पछतावा न रह जायें। शायद माता पिता जानते थे, हम सवको जाने की अनुमति मिल गई थी। हम सव सहेलियों में उत्साह भी था और एक अनकहाँ डर भी था जितने विश्वास से माता पिता ने जाने की अनुमति दी है उस विश्वास को वनायें रखना है। जहाँ छोटी छोटी वातो का वतगड वनाके समाज में प्रसाद वितरण कर दिया जाता है वहाँ पर अपने अपने अनुसार मीठे में मसाले मिलाकर चटकारे लेकर वाते कही और सुनी जाती हैं। आज के दौर के सी सी टी कैमरे के रूप में जगह जगह व्यक्ति खुद मिल जायेगे। जिनका यही काम है लडके लडकियो की गतविधियो पर नजर रखना। लोगो का क्या है वस माता पिता पर अपने बच्चो पर विश्वास रखना चाहिए। वही विश्वास को लेकर हम सव वस में वैढकर वृंदावन के रोमाचिंत वृतांत्त पर निकल गये। सहेलियों के साथ पहला और शायद आखरी 10 दिन का जीने और दुनियाँ को अपने अनुसार समझने का मौका था। खुलकर विचारो पर अवव्यक्ति प्रकिया देना, वहस करना तो शामिल ही नहीं था, वस अपने सहेलियों के वीच वाते करना किसी की टाँग खिचाई करना कभी कभी किसी को लेकर परिहास करना तक ही सीमित था। दुनियाँ में क्या हो रहा है क्या सही है क्या गलत है इससे कोई लेना देना नहीं था। शर्म लज्जा तो इस दौर के घूधट है जिससे कभी निकले ही नही कभी निकलने की कौशिश भी करते पर वदनाम के डर के कारण खुद की सुंन्दरता को निखारा ही नही। खुले वाल आँखो में काजल मंद मंद मुस्कान को कभी सामने लाये ही नहीं। हम सव सहेलियाँ एक से एक महान थी अपनी सौंन्दर्य को निखारने की वजाय दवाके छुपाके रखते थे ...अगर सुंदर दिखाई दिये तो कालेज जाना मुश्किल हो जायेगा। मनचले लडके कैसे शव्दो को कह कह के आना जाना दुर्भर कर देगें। अगर किसी तरह की दुराचार की खवर घर पर पढी तो कालेज ही वंद हो जायेगा। हम सव ऐसी भेष भूषा वनाते थे कोई देखे भी नहीं...वालो में तेल डालकर गुथी चौटी ,दुप्पटे को लहजे में सभालके पिनअप करके डालना। सूट सलवार मे कोई विषेश तरह की डिजाईन नहीं वस साधा सूट,वालो को विषेश तरह से कभी सभारा नहीं न कटे न छल्ले निकालना, न हाथो में कंगन वस एक घङी सोभा देती थी। इस तरह का सभारा और इसी रुप में पूरी पढाई कर दी। एक वात जानते थे सजने सभरने के लिए पूरी उम्र पढी है। अव सवकी शादी के वाद व्यक्तत्व में वदलाव है। देखने वाले यही कहते है सव वदल गये है। पोषाक ,अपने सौन्दर्य को कैसे निखारा जाता है, कोई इनसे सीखे। जव जो समय की माँग तव वो करना हमेशा फायदा ही होता हैं।
    हम सव और भी सहपाठी के साथ 10 दिन के कैम्प पर निकल पढे। आर्ट वर्ग और साईस वर्ग के विद्धार्थियो का सम्मिलित कैम्प था। सवके अपने अपने मन में विचारो का आना जाना तो क्रियाशीलता है। वस अपने सफर पर थे हम सव उसके हमसफर लङके लडकियो का संयुक्त रूप से कैम्प था दोनो ही वैठे अपने ही धुन में आंन्नद के साथ सफर पर वढ रहे थे। सिरसागंज से वृंदावन की दूरी 160 किलोमीटर है,आगरा 80 किलोमीटर पढता हैं। आगरा के वाद मथुरा उसके वाद वृंदावन। हम सवकी मंजिल भी वृंदावन में जाके रूक गई।
          वृंदावन के फोगला आश्रम में सवके ठहरने के लिए जगह सुनचित की गई। फोगला आश्रम में जितने भी कमरे थे, सव कमरें राष्ट्रीय सेवा योजना के माध्यम से श्रंमदान विद्धार्थियो के लिए और उनके साथ आये प्रोफेसर के लिए सुनचित की गई थी। एक कमरे में पाँच विद्धार्थी ठहर सकते थे। हमारा कमरा क्रम एक सौ ग्याहर था । यादें जो जुडी थी इसलिए भूलना और भुलाना मुश्किल हैं। लङकियों के लिए अलग और लङको के लिए अलग व्यवस्था थी। एक तरफ लङकियों के लिए क्रम अनुसार आश्रम के दूसरे हिस्से में लङको के लिए। अगर कहाँ जायें कार्य के उपरान्त कोई भी लङका या लङकी एक तरफ से दूसरी तरफ आ जा नहीं सकता था। अनुशासन का पहला पाठ यही था। जितना सरल हम समझ रहे थे उससे कठिन अनुशासन होने वाला था।
      सव महाविद्धालय के विद्धार्थियों को प्रागण में वुलाया गया। 10 दिन की कार्य तालिका और अनुशासन के प्रति नियम वताना था, उन सव नियम का अनुशरण करना था।अनुशासन का पालन नहीं किया तो सजा तो कुछ नहीं थी पर फिर भी भुगतान करना पढता था। अनुशासन और नियम इस प्रकार थे....सुवह की चाय विस्तर पर नहीं मिलेगी इसी प्रागङ में प्रार्थना के उपरान्त चाय नाश्ता मिलेगा। 8 वजे तक सवको उस प्रांगङ में उपस्थित होना था। 9 वजे जो कार्य दिया जायेगा उसका अनुशरण करना था। 2 वजे द्रोपहर का भोजन ....4 वजे कार्य प्रणाली ...6 वजे शाम की चाय, 8 वजे शाम का भोजन,9वजे सांस्कृतिक कार्यक्रम में प्रत्येक महाविद्धालय के विद्धार्थी को भाग लेना था। कैसे कौन कव लेगा इसके लिए एक दिन एक विद्धालय के विद्धार्थी प्रदर्शन करेगे। अपने अपने विद्धालय की तरफ से एक लङकी और एक लङका को संचालन कर्ता की तौर पर नियुक्त किया गया। हमारे विद्धालय की तरफ से माधवी को संडालन कर्ता वनाया गया। जिसका दायत्व था कि समय से प्रागड में उपस्थित रहने के लिए सवको कहना। कहाँ जाये तो अर्लाम का काम करना था। कोई वात अपने विद्धालय के प्रोफेसर से कह सके ...उस संचालन कर्ता से वाकी लोग अपनी वात को रख रखे और उस  समस्या का समाधान किया जा सकें। प्रागंङ में समय का पालन नहीं किया तो सजा के तोर पर चाय के उपरान्त चाय नहीं मिलेगी, भोजन के उपरान्त भोजन नही मिलेगा। समय का विषेश ध्यान रखना था। यह अनुशासन जीवन में हर चींज का महत्व दर्शाने ने लिए व्याप्त थे।
      पहला दिन तो एसे ही वीत कहाँ, दूसरे दिन का आगाज हुआ। सुवह 8वजे प्रागङ में समय से पहुँना था। सव जोश के साथ उठे अपने दैनिक कार्य से पूर्ण होके सवसे पहले पहुँच गयें। सवसे पहले मै उठ गई क्योकि मुझको स्नान करना होता था...वरसो से एक नियम था विना स्नान किए अन्न न ग्रहण करती थी। अव कोई नियम वना लिया है तो उसका पालन करना स्वयं पर होता है। अपने सुविधा के लिए वना लिया अपनी सुविधा अनुसार तोङ लिया। जीवन में कोई संकल्प न करो अगर करो तो उस संकल्प को पूर्ण करना उतना कठिन है जिस प्रकार हिमालय पर चढना। मेरा कोई संकल्प नहीं था वस इतना था स्नान तो रोजाना करना है तो स्नान करके के उपरान्त ही भोजन किया जायें। वस उसका की पालन कर रही थी। आस्था का दीपक कही प्रज्जलित किया जा सकता हैं। वस आस्था होनी चाहिए..यह हमारी आस्था थी कि नवम्वर के महीने में ठण्ङे पानी से सुवह सुवह स्नान करना। जोश के साथ सव प्रागङ में एकत्रित हो गये। प्रार्थना हुई सवको टीम रूपी एक एक दिन प्रार्थना करनी थी। प्रार्थना के उपरान्त चाय नाश्ता किया। 9वजे पंक्तिवंद हाथो मे झाङू लिए, गली गली सङक सङक निकल पढे. यह नजारा देखने वाले की कमी नहीं थी।2002 में अगर मोदी जी प्रधान मंत्री होते तो हम सवका नाम भी स्वच्छता मिशन में अंकित हो जाता। स्वच्छता जैसा कार्य भी किया था। गंधगी से लिप्त गोविद कुंङ को कहाँ जाये तो जीण उद्धार करने का दायत्व हम सवके ऊपर ही था। जिस कुंङ में मिट्टी और कचङे से पटा पढा था उसमें पानी संरक्षण के उद्देश्य से कार्य किया जा रहा था। सव टीम वनाके कार्य कर रहे थे। चैन वनाके तशले में मिट्टी और कचङा वाहर निकाला जाता था। फवङा कुदाल से खुदाई की जाती थी। आश्रम से तो स्वेटर पहनके आते थे और यहाँ मेहनत रुपी पसीने से पहने हुए कपङे भीग जाते थे। पहली वार मजदूर का एहसास हुआ वह कितनी मेहनत करते है और यहाँ थोङी सी मेहनत में माथा पकङ के वैठ गयें। कुंङ का तो पहला ही दिन था तव यह हाल हो गई थी। द्रोपहर के भोजन के समय अनुसार आश्रम में पहुँच गयें। जिसको स्नान करना था जो भी करना था करे। पर आराम का कोई समय नहीं मिलना था। 4 वजे कोई न कोई अतिथि का आगमन होता था, अपने विचारो से चेतना जगाना चाहते थे पर यहाँ सवको उनके गलत समय पर भाषण झुलझुलाहट ही लाते थे।
        भोजन का प्रवंध तो अच्छा था। हर दिन नया नाश्ता,द्रोपहर के भोजन में और शाम के भोजन में अलग अलग सूची अनुसार वनाने का आदेश था। थकान और भूख से व्याकुल भोजन देखकर  पहले पाने की चाह में अनुशासन भूल जाते थे। यह दृश्य शादी समारोह से कम नहीं लगता था। मेहनत करने के वाद का भोजन का स्वाद क्या होता है ,इससे सव भली भाति परिचित हुए थे।
रात्रि को सांस्कृति समारोह में अपने विद्धालय को उच्च दिखाने की प्रतियोगता जन्म ले चुकी थी। हमारे विद्धालय की प्रतिदिव्द्धी आगरा विद्धालय के सेनजोंश से था। हमारे पास कोई अभिनय प्रस्तुति करने के लिए साज सामान नहीं था। उनके पास उस अभिनय को प्रस्तुति करने के लिए साज सामान था। शायद उन्होने पहले से ही रूपरेखा तय करके ही आये थे या साज सामान मंगाया था। अपने विद्धालय को उच्च विजय वनाने के लिए सोये हुए अभिनय जागने लगे, चुप्पी तोङके वोलने लगें। इस तरह के अभिनय निकलने लगे थे जिसको देखकर पहली वार देखने वाले दाँतो तले उँगली दवा लें। अभिनय प्रस्तुति के वाद खुद पर यकीन करना मुश्किल होता था। सरस्वती वंदना, कविता पाठ, गीत ,नाटक प्रस्तुति ,पागल का अभिनय,शरावी का अभिनय। उस वक्त तक मेरी कोई चेतना जागृति ही नही हुई थी अगर हुई होती तो स्वयं रचित कविता पाठ या नाटक की रूप रेखा से परिचय कराते। तव मेरे मन में एक अनयास, डर, शर्म, झिझक ने अपना कव्जा कर रखा था और आज कोई डर नहीं है मेरे यह करने से परिहास का पात्र वनूँगी, या शावाशी का वस अपने अंदर वसते शैलाव, करूणा, मात्रत्व, दोष को शव्दो मे पियोके प्रस्तुति कर देते हैं। जैसे जिसने सांस्कृति के रूप मॆं परिचय दिया आज भी सवके ह्रदय में न मिटने वाली छवि वनके वस गई है।
     अनुशासन ने सवको लाचार वना दिया था। वेचेनी चिङचिङापन सिरदर्द क्रोध ने अपना वसेरा वनाना सुरू कर दिया। गोविंन्द कुंड की सफाई के दोरोन पसीना के दुवारा पानी वाहर निकल जाता है ,ऊपर से गर्मी मेहनत करने के वाद थकान ,न आराम के लिए समय मिलना वस समय प्रणाली के दुवारा कोई न कोई कार्य होता रहता था।जिसके कारण अचेत होते विद्धार्थी की हालत खराव हो रही थी। 2 वजे वाद  थक के चूर हो जाते थे कि आराम मिल जाये थोङा सो लिया जायें पर  कहाँ आराम था। किसी न किसी अतिथि का आगमन होता था, मस्तिष्क को पकाने वाले कोई न अमल करने वाले भाषण से रूवरूह होना पढता था। न भूलने वाली घटना ने अपनी दोस्त से झगङा करक लिया। एक तो सिर में दर्द हो रहा था मेरी वार्तालाप में हिन्दी के समावेश के साथ ग्राम की भाषा का मिलना एक कारण है। मेरी सहेली शुभचिन्तक हमें सुधारने के लिए कहती भी है पर वह समय न सोंचने का न सुधरने का होता है । जव क्रोध पर अंकुश न हो तो सही कथन भी गलत ही लगता है। यह भी तो गलत है हमको कैसी भाषा मे वार्तालाप करनी है. क्षेत्रीय भाषा हमारे शरीर पर रंग रूप के समान है खुद को सुंदर दिखाने के लिए चहरे को सौन्दर्य प्रसाधन दुवारा छुपा लेने से क्या सत्य को छुपाया जा सकता हैं। नही भोजपुरी हरियाणवी जैसी मिठास नही इसलिए व्यक्तत्व निखरने की वजय उस ग्रामीण रुपी भाषा के कारण दव जाता हैं। वह दौर था ही किसी की न सुनना जो हम है वैसे ही खुश है। आज भी जव हम वादविवाद के लय में आते है तव ग्रामीण भाषा का ही प्रयोग करते है। हमको वातों की चाशनी में हिन्दी और अग्रेजी के शव्दो का मिश्रण करके परोशना नहीं आता हैं। इसलिए पहली वार मुझसे मेरी वातो से प्रभावित न होनो स्वाभाभिक है। दिन प्रतिदिन सम्पर्क में रहने से शायद मेरी वातो के साथ जीने की मजवूरी होती है या मेरी आदत से समझोता कर लेते है। मै भी मानती हूँ अपने व्यक्तत्व को निखारना है तो शव्दो की चाशनी में मिश्रण करना ही पढेगा। हमारी वातो में चाशनी न होने के कारण नमकीन मठरी सवको खानी पढती है कोई मीठी खाना चाये उसके लिए मीठी नही है। खा इसलिए कभी नमक का स्वाद वनके रह गई ।  सव शुभचिन्तक होने के वावजूद अकेला महसूस होता हैं। अव यह सव सोंचना छोङ दिया हैं। हमें कोई स्वीकार करे तो ग्रामीण रूप  के साथ न कि रूप पर पर लेप लगाके। हमारी वार्तालाप का क्या स्थर है उसी स्थर के साथ। हमें आज भी पढे लिखे उच्च दिखाने के लिए  हिन्दी कम अग्रेजी का अधिक प्रयोग करते है,या दिखावा करते है कि हम आज के वातावरण के साथ मेल जोल करते है। हिन्दी में वोलना लिखना नीचता दिखना जैसा समझते हैं। अगर ग्रामीण भाषा में वोलने लगे तो उसको जाहिल गवार की उपाधी से सम्मान करते है। यह हमारे देश की सवसे वङी समस्या है इसी के कारण प्रतिभाये पहचान के वावजूद खो जाती हैं। हम भी झूठे दिखावा के वीच में अपने आपको को जकङा सा महसूस करते है। सवके पास सामने को पढने की दृष्ठी है यह तो आप खुद जान सकते है कि सामने वाला कितनी आपको इज्जत दे रहा हैं या अपको नीचता दिखाने की कोशिश कर रहा हैं। हमें अपनी भाषा के कारण अपनी सहेली से झगङा भी करना पढा। वात इसके उपरान्त कुछ और भी थी .. अपनी दोस्त से ही अपेक्षा करते है कि वह समझे, घर पर वंदिश हो,न समझने वाला हो  दोस्त से ही उम्मीद रखते है। जव वह भी परिवार की तरह करने लगे तो क्रोध आ ही जाता है। उसी क्रोध की अग्नि में  अश्को के सैलाव उमङ पढा था । हम दोनो को और सहेली मना रही थी, पर इतना जरूर था किसी ने किसी की गलती नही वताई न किसी का पक्ष लिया। वैसे हम में कभी भी झगडा नहीं होता है। यह भी एक यादगार पल है। मुझे कोद्ध बहुत जल्दी आ जाता है जिससे रिश्ते विगङ जाते है पर दूसरी तरफ धैर्य, शाहस,अपनत्व की कला में पारगंत रूची है सवको मोहने वाली हैं। उसकी वातो से ही लोग प्रभावित हो जाते हैं। मैने कभी उसके चेहरे पर क्रोध की रेखाऐ नही देखी हैं। जहाँ भी जायें सवको मन मुग्ध करने वाली अनौखी छवि है।रश्मी के पास वातो का पिटारा है पर उन वातों में भी एक कला है सवको अपनी तरफ आकृषित करने की। उस दौर में सुनना नई चीजो को जानने की जिज्ञाशा रहती है। सवको उन वातो में वाँध कर रखना। यह एक कला है जो आज कही खो गई है। माधवी वस हाँ में हाँ मिलाने वाली है किसी के प्रति न वढा चिढाकर वयान करना न भडकाना एक दूसरो की गलती नहीं निकालती वल्कि पर्दा डालकर आगे वडती है। सवको  प्रेम से वाँध कर रखना,अलग ही निराला ढग हैं। सीमा अपने नाम के प्रति ही ही कभी सीमा का उंलघन नहीं किया,अपने ऊपर विश्वास का स्थर वरकरार रखा है,चाये वो दोस्ती के प्रति या घर परिवार के प्रति आदार की भावना रही है। अंजुल ने अपने पढाई के क्षेत्र में हर साल उच्च अंक  के कारण प्रतीक रूप में चाँदी के सिक्का के रूप मे सजोके रखे है। हम सव में कभी भी प्रतियोगता किसी भी कार्य के लिए नहीं रही । पढाई के लिए साज सामान में एक दूसरे की मदत के लिए विना कहे खडे रहते थे। पीठ पीछे चुगली करना उसके मुँह पर उसकी तारीफ और उसके मुहँ पर उसकी तारीफ किसी और की चुगली करना, कभी जाना ही नहीं। किसी अन्य को हमारे मध्य हस्तक्षेप करने पर उसको मुहँ की खानी पडती थी । हम सव एक दूसरे की तागत थे। कोई भी एक दिन न कोई आये तो कालेज में मन नहीं लगता था। इन्ही पलो के कारण वीते पल वहुत याद आते हैं। सवको एक दूसरे को सभालने के लिए हम मिलके खङे रहते थे। इसी के कारण कोई सैध न लगा सका, तो आज कैसे अकेले रह सकते थे। हमको और रूची को मनाया गया दोस्ती में जायदा देर तक नाराजगी ठीक नहीं हैं।
        अनुशासन ने जीना दुर्वर कर दिया था पर हमको सीखना जरूरी था कि मजदूर दो वक्त की रोटी के लिए कितनी मेहनत करते है। मेहनत के वाद भोजन का स्वाद वङ जाता हैं।सैनिक अनुशासन का पालन गम्भीरता से करते है उनके सामने तो यह कुछ भी नहीं हैं।
कही कही प्रेम के अंकुर भी फूट रहे थे, पर यह उम्र ही ऐसी है। सवकी अपनी अपनी सोंच है उसको नजर अंदाज करके आगे वढते है या प्रेम के कल्पनाओ में गोते खाते है। घर से अलग रहने की पहली विदाई का एहसास था। कहता कोई नहीं था पर रात को छुप छुपके नीर रिसते जरूर थे। आज के जमाने के फोन की आजादी तो  नहीं थी, टेलीफोन से ही भवनाओ का आदान प्रदान होता था। पर यह सुविधा भी हर घर में सुलभ नहीं थी। आस पङोस या टेलीफोन वूथ का प्रयोग करके ही की जाती थी। जिसके घर पर टेलीपोन था ,उन सवने टेलीफोन वूथ पर जाकर वात की। वात करते करते भावनाओ के नीर रिस कर टप टप गिरने लगें। सबने एक दूसरे को सभाला फिर हँसी के गप्पे वातचीत, टाँग खिचाई मंजाक करने लगें। दिन भर की थकान तो होती थी पर देर रात जागते रहते थे, यह पल जी लेना चाहते थे, कल फिर या दुवारा साथ साथ गुजारने का मौका मिले न मिलें। एक एक कर के दिन गुजरने लगें। आखरी के दो दिन  शेष थे।
         सुवह से शाम तक अनुशासन और समय के अनुकूल सारणी का अनुसरण किया। प्रोफेसर सर ने कहाँ किसी को रंगोली वनानी आती है। हम रंगोली वनाने का प्रयोजन समझ न पायें. सवने मना कर दिया इससे पहले झाडू हाथ में लेकर नारे लगाके गली गली गुजरते थे। नारे लिखने के लिए कहाँ गया था. सिलोगन क्या वला होती है इससे अनभिग्र थे। आज दीवाली पर रंगोली सवसे अलग और सुंदर दिखने के लिए तरह तरह की डिजाईन वनाते है। सिलोगन  वच्चो के कार्यकिय्रा में यह सव सामिल हो चुका है अव कुछ भी नयापन नहीं है। वस हमारे जमाने में नया था। दो लाईन के नारे भी न दे पायें वस हँसना और टाँगखिचाई अपने दिवा स्वप्नो में ही खोये रहते थे। अच्छी तरह सांस्कृतिक कार्यक्रम में भाग लेने के वावजूद दूसरा स्थान प्राप्त कर सकें। आने वाले अतिथि के स्वागत में हमने रंगोली नहीं वनाई वल्कि आगरा विद्धालय से जोन्स के विद्धार्थी ने रंगोली भी वनाई और सिलोगन भी नारे भी लिखे। इसी वजय से उनका प्रथम स्थान आया। कौन अतिथि आने वाला है इन सवसे हम अनभिग्र थें। हम एक दूसरी जगह जाने का आदेश मिला, जहाँ सामने सुंदर सा पार्क था ...पर हमको इधर उधर भटकने की आजादी नहीं थी। एक कक्ष में जाकर वैठ गयें। रोज की तरह अनचाये भाषण सुरू हो गये। इतना कहाँ गया आने वाली अतिथि मान्य उमा भारती है , किसी को भी फोटो खीचने की सक्त मना थी। हम भी कैमरा ले गये थे पर सव फोटो नि किय्र हो गये। तव रील लगाई जाती थी फोटो खीचते समय कैमरा जमीन पर गिर गया और रील वाहर के वातावरण के सम्पर्क में आ कर खराव हो गई। कैम्प की गतिविधी के लिए फोटोग्रापर और रिकोडिग भी होती थी । सव विद्धालय के विद्धार्थी को ग्रुप फोटो खीची गई थी।
      देर तक इंतजार करने के वाद मान्य उमा भारती आई..आते ही अभिन्नदन में सव खङे हो गये फिर अपनी अपनी जगह पर वैठ गये। शांत होने का आदेश और अनुशासन में रहना था। उमा भारती ने सव में से किसी एक को खङे होने का आदेश दिया. यह देखकर हम सव भी नजर चुराने लगे कि हमको खङा न कर दें। कुछ सवाल पूँछे शायद कुछ कार्य चल रहा था उसकी जानकारी के लिए खङा किया था कि कैसा काम चल रहा है। यह सव जाने के वाद पता चला, किसलिए खङा किया था। अव सवको प्रमाण पत्र देने थे.. सवसे अच्छा काम करने के लिए वही प्रमाण पत्र दिया गया। एक उस लङकी को जो काम के दोरान अचेत हो गई थी । दूसरा गुंजन को जव हमने सुना तो दंग रह गये सवके मन में प्रश्न था ऐसा क्या अच्छा कार्य किया जिसके कारण प्रमाण पत्र मिला है। तव मेरी सहेली ने वताया इसके पापा देतागिरी में रहते है। हम जव आश्रम में थे , तव साँझ को इसके पापा यहाँ के संचालन से मिलने आये थे। उस वक्त पहली वार राजनीति का दाँव समझमें आया। अच्छा कार्य नही वाहूवली रूपी नेता की चाकरी से वहुत कुछ वदला जाता है। उसी वदलाव का प्रमाण मेरे नजरो के सामने है नेता आये अपना परिचय दिया और वाह वाह लूटी सर्वोच्च का प्रमाण पत्र  दिलवा दिया।  कभी तो वच्चो को खुद कुछ कमाने दिया करो ...क्या हर जगह राजनीति ठीक नहीं है। हमारे घर से या किसी और के घर से तो कोई आया नहीं था फिर यह क्यो आयें? मौका को भुनाने तो नेता ही जानते है। इतना वढा कार्यक्रम अधिकारी की देखरेख में किया जाता है ऐसे आयोजन सरकार ही कराती है जहाँ कुछ सीखने को मिले सदभावना जागृति हो एक अच्छे इंसान वन सकें। पर हर जगह नेतागिरी बहुत से सवाल छोङ जाती हैं। जो हुआ सो हुआ पर हम सवको इन प्रमाण पत्र से मतलव नही था। वस पल दो पल मायूसी फिर से मुस्कान,इसी के साथ कार्यक्रम की भी समाप्ति हो गई। इतने दिन अनुशासन के दायरे में रहकर सीखा ही था ,वक्त की कदर सिखाती है कल पर नही टालना जो करना है आज ही करो,कल पर टाल दिया तो मुट्ठी से रेत फिसल जाने जैसा अनुभव होता हैं।
             वृंदावन में आये है और मंदिरो के दर्शन न करे तो ऐसे कैसे हो सकता है। वृजवासी होने का आज खुद सजोने का मौका था। थकान और अनुशासन की वेङियो से आज पंछी आजाद हो गया था। कही भी किसी को जाने की अनुमति नहीं थी। संचालन कार्य प्रणाली पर हम सवकी जिम्मेदारी थी। यह दौर ही था मन मर्जियो से जीने का उचित अनुचित में फर्क नहीं कर पाते है वस सव इसमें फँस जाते है एक वार करना तो चाहिए फिर चायें उसका परिणाम उचित हो या अनुचित। इसी को ध्यान में रखकर वृंदावन में घूमने यहाँ वहाँ जाने के अनुमति नहीं था। आज अनुशासन से आजाद है निकल पढे वृंदावन राधा कृष्ण के पावन कण कण से धुन गूजने जैसा महसूस होता है। अव प्रश्न होगा हम तो कही वार गये है हमको तो ऐसा सुनाई नहीं दिया। जव मन में भक्ती की चरम सीमा का आलंघन हो, जग में व्याप्त हर जीव में कृष्ण राधे की अनुभूति होती है तो फिर वस काँनो में एक नाम ही गूंजता है श्री राधे राधे ...... वृंदावन के वासी राधे राधे कह कर ही आभार,सम्वोधन प्रकट करते थे। हाय हैलो नमस्कार, हाथ मिलाना जैसा प्रकट नहीं करते थे। राधे राधे कहने में वृजवासी होने का अपना ही आन्नद है ऐसा लगता है  बहुत कुछ वदल रहे है पर सुंगध तो वही है जिसको कैसे वदला जा सकता है। गुलाव को किसी में सम्मलित करो पर खुशवू को वदला खुद से छलावा करना जैसा है। हम सवके सामने अपने वास्तविक को छुपाके आज के परिवेश में जीने की कोशिश करते ,पर हिन्दुस्तानी ही रहेगे जिसकी पहचान कण कण में ईश्वर वसते है। वृजवासी है तो राधे राधे, रघुवासी है जय श्री राम....राम राम की ध्वनि रोम रोम में वसती ही है। ढोलक मजीरे के संग राधे राधे के कीर्तन गान तो गली गली की सोभा हैं। अग्रेजो ने निर्माण कराया मंदिर प्रसिद्ध है अग्रेज भी वहुत थे जो हमारी संस्कृति में खोते देखे राधे राधे के गान में खुद को सम्मोहित करते देखा। लम्वा टीका केसरिया धोती कुर्ता रंग गोरे से पहचान होती थी कि यह अग्रेज है ....मन में एक अटूट विश्वास की चेतना जाग रही थी ...मुरली वाले की छलिया आकृषित आभा में एक वार कोई आयें तो अपने छलिया में अपना ही वना लेते है इसका प्रमाण हम मंदिर में देख रहे थे। वैसे तो गली गली में मंदिर है ..पर जो हमें विशेष अपनी गाथा कहते थे वहाँ वहाँ गयें। गोविंद कुंड से कही कुंड थे उनमें जल था। हर मंदिर में एक वात थी मंदिर के पट समय समय पर खुलते थे। रास लीला की पोषाको से एक घर शोभामान हो रहा था वहाँ पर हर सामान रखा हुआ था। कठपुतली का सामान वढा सा नगाडा, रंगमच का वङा सा मंच। सवको अपनी और आकृषित करता था। दुकानो पर वाल गोपाल के पोषाको से सजी थी दुकाने, प्रसाद और पूजा सामग्री से गली गली सुंगधित हो रही थी। वृंदावन प्राणी को भक्तिमय के अथार्य सागर में लेती चली जाती है....उस भक्ती को कुछ शव्दो में कहना वेईमाने होगी।

         अव घर लोटने का समय आ गया था, पर जाने क्यों ऐसा लग रहा था जैसे कुछ छूट रहा हैं। ऐसे पल अव कभी नहीं लोट के आयेगे। यह पल जीवन के सवसे खूवसूरत यादे होती है...न कमाने की,न कल के लिए वचत की वस खुद के सपनो में जिये रहते है। घर से जायदा स्कूल कालेज में अच्छा लगता हैं। खुद के अंदर झाँकने का मोका मिलता है, खुद से मिलते हैं। नये परिवेश में जीने का पहला पढाव यही है। अच्छे साथी मिले तो जीवन सार्थक होता हैं। यही संगत गलत हो तो जीवन नासूर वन जाता हैं।बहुत कुछ सीखते है पर यही पल याद आते है। दायत्व के माया जाल मे इस कदर जकड जाते कभी फुरसत के पल भी जी सकें। कभी विछङे मित्र से सामना हो जायें तो वस देखकर यही लगता है काश कोई छडी होती घुमाकर वीते पल मे चले जाते। इस माया चक्र के दायत्व में ऐसे फँसे है कि सुगम सरल नेट के दुवारा भी वातचीत नही हो पाती हैं। बहुत कुछ वदल गया है,सोंच विचार. परिवार माहोल.....इसी वीच में जी भर के हँसना ,टाँग खिचाई,मजाक एक दायरा वन गया है...उस दायरे से निकल कर परिहास किया तो कही रिश्तो में दूरी न आ जायें। इतने सालों मे बहुत कुछ वदल गया है। जो पहले चुप चुप रहती थी वो वोलना सीख गई,सवाल जवाव करना,तर्क वितर्क, सही गलत कहना सीख गई। सवका व्यक्तगति पहले से वदल गया है। भाग दोड की जिंदगी में दोस्तो को याद करने का समय भी नहीं हैं। पर आज खुलके विचारो को कह सकते है पर फिर भी सीख देना दूरी को वढाती हैं। किसी को अपनी वात को थोपना नहीं चाहिए वस आज की यही चाह है। सवको अपने अनुसार जीने का हक है अपने अनुसार वोलने का हक हैं। जो जैसे परिवेश में रहता है उसे वैसे ही आदत हो जाती है। जो तुम अपना समझ के कह रहे हो उसको वही वात गलत लगें। यहाँ शुभचिन्तक का दृष्ठी कोण इतना है जैसे भी हो जहाँ है वहाँ खुश रहो..कोई भी वला न आयें।  साथ में हँसना जीना वो जाने कहाँ गये पल........



शनिवार, 18 नवंबर 2017

होती साकार आशायें

सोशल मीडिया हृदय को गति दे,
वो जीवन दायनीय नेट संचार हे।
सूखे पढे वृक्षो पर कली खिले,
उम्मीद चमकाने का श्रोत है।।
दाम दण्ड भेद से सोशित मनु,
जन जन तक सम्पर्क सुलभ है।
बस एक सवूत ही आधार है,
विद्धुति प्रकाश विखेरता अद्भुत है।।
आम की भी आशा खाश हे,
दृश्यम से शुशोवित अभिनेता हे।
रुप ओर अदाओ का समावेश,
घर 2 बसता अभिनय का संगम है।।
चुप्पी और लाज को छोडकर ,
हृदय में गुलाटी मारती कुंज है।
छुपी प्रतिभाओ का होता आदान प्रदान है,
मिला खुला रंगमच अद्भुत खिलती कलायें है।।
सिसकती कोसती खो जाती वास्तविकता,
नेता, अभिनेता, गायक, कवि इत्यादि।
शिक्षा,सास्कृतिक,क्रयाशीलता घुमडती,
सबकी आशाओ में महकती मेघ हैं।।
प्रेम के अंकुर को फलाती राश है,
एक छोर से उसपार छोर तक जाती।
अभिवेदना विचारो का होता समागंम है,
भिन्न देश,भिन्न सास्कृतिक होता पाणिग्रहण है।।
विवेक,चेतना, रहस्यमय, जागृति होती आत्मा,
स्वंय चिन्तन मनन सोर्यमय प्रज्ज्वलित होती।
साक्ष्य प्रमाण की तय तक जाती ज्ञानेद्रियाँ,
स्वयं विकल्पों से  परेह लेती फैसला।।
हानिकारक.......
वैठे है मस्तिष्क को शून्यहीन की चाल में,
मस्तिष्क पर पंग डालू करु नियंत्रण में।।
जैसा मैं चाहूँ जी हजूरी कराऊँगा।
न दिखलाऊँगा फिर भी मन भटकाऊँगा।।
देश के देश में सपोले को जगाऊँगा, 
वैठकर मैं वंदो को वंदो से झगडाऊँगा।।
मस्तिष्क पर पंग है मेरा जिहाद रचाऊँगा,
देश को देश के वंदो  से ही लडाऊँगा।।
मस्तिष्क में पडौसी षड़यंत्र रचायें वैठा है,

व्लू व्हेल गैम के पीछे शादिश छिछोरी है।।
आत्मदाह का खोपनाक खेल विकराल हो,
मानव वम्व वनाके  स्लीपल सैल वनादे।।
देश भी अपना देशवाशी भी अपने है,
अपनो में जघन्य खेल खेलता दुशाशी हैं।।
वाल्यकाल की अवस्था पर पानसाईड दुराचारी है,
अवस्था चायें कोई भी हो विचलित की भम्रमारी है।।
विश्वामित्र की तपस्या में विध्न अतियारी था,
मानव की चेतना पर यह पहरा भटकाता है।।
रिश्तों की मर्यादाओ को छिन्न भिन्न कर जाता है,
विश्वास पर प्रश्न चिन्ह घृणाशील बना जाता है।।
विचलित क्यों होते हो?भ्रम के अधीर क्यो होते हो?
यह तो व्रह्मा ने  काया में गुण अवगुण समावेश है,
हर वस्तु में दो गुण एक में ही समावेश है।।
जिसका अनुसरण कर लोगे वही निखर जायेंगा,
ईख की परिभाषा से पारितोषित करते है।
ईख से निकले रस से वनी मिठाई का उपभोग करो,
ईख से निकले रस से वनी मधुशाला देह त्याग करो।।
सोचो सोचो......निर्णय है तुम्हारा....
हम तो एक ही वात जाने है,
शोसल मीडिया हृदय को गति दें,
वो जीवन दायनीय जीवन संचार है।।
सरल सुगम आदान प्रदान करे ,
स्वप्न से साक्षातकार करे नेट संचार है।।
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गुरुवार, 21 सितंबर 2017

एक पल ठहरी नज़र

एक पल ठहरी नज़र मुझपर मैं ढूँव गया उनकी नज़रों में,
खुद का पता भूला  ढूँडता फिरता उनका पता गलियों में.!!
मंज़िल तो खुद का भूल वैठा हूँ उनको अपनी मंज़िल बना वैठा हूँ,
वक्त की रफ्तार बड गई है या मेरे सब्र का इंतहा ले बैठा हूँ!!
खुद का पता भूला.......पता गलियों में
फिरती है झलक बस उनकी मेरी आँखो में अपना नाम भी भुला वैठा हूँ,
मिल जायें एक वार पूछूँ तो ऐसा क्या किया जादू तेरी जादू में खो वैठा हूँ!!
खुद का पता भूला .....पता गलियों में
खिलते ओठ सरमाती अदा जुल्फो की बरसती घटा यादें ही याद कियें वैठा हूँ,
उतरता नहीं उसका असर दवा उसी से लेने की दुआ किये वैठा हूँ!!
एक पल ठहरी नज़र मुझपर मैं ढूँव गया उसकी नज़रों में....
खुद का पता भूला ढूँडता फिरता उनका पता गलियों में....

बुधवार, 13 सितंबर 2017

विधा....कुण्डलिया
लिखवत मिश्रण भाष्य,नीर भयो शंरवत।
हिन्दी विदेशी घुलकर,बदलो काया कल्प!
बदलो काया कल्प प्यास में कौन सो उम्वीद।
शान से चलें चौडी छाती लघु भयो गम्भीर!!
विदेशी के लपेङे में शंरवत अंजुमन की शान।
प्यास में करें त्रृप्त शंरवत नहीं नीर की आस।।
  
आकाँक्षा जादौन

मंगलवार, 29 अगस्त 2017

'प' का देखो कारनामा

'प' का देखो कारनामा,
जब2 हद से गुजरता है,
आखों में आसू और,
हृदय पर प्रहार करता है!!
आधा प और हे घातक,
क्या 2कौतक करवाता है!!
प्यास लगें जन सबको,
जन सग्राम करवाता हैं!!
राजा रंक हे अधीर सब,
नत मस्तिक झुकवाता हैं!!
प्यास की ऐसी तृष्णा,राजा को
रंक चौखट पर झुकवाता है!!
प्यार का ढाई आक्षर क्या2,
अपनो से ही विद्रोह करवाता हैं!!
भूल के कर्मानंद होके बसीभूत,
प्यार का रोगी जन बन जाता है!!
छिङ जाते हे युद्ध महा संग्राम,
लाशो के अम्बार लगवाता है!!
कुल के कुल मिट जाते हैं सब,
प्यार की गाथाये अमर करवाता हैं!!
अब एक कढी और जुङी है,
प्याज भी संग्राम करवाता हैं!!
नेताओ का बनके मुद्दा देखो?
सत्ता चौकीदारो को गिरवाता हैं!!
मुद्दा लेके अखाङे सज जाते है,
गिराके खुद राजा बन जाता हैं!!
आधा प जख्मी शेर शा घातक,
खूखार' प 'बन तब जाता हे !!
प का देखो कारनामा,
जब2 हद से गुजरता है!!
आखो में आसू और,
हृदय पर प्रहार करता हैं!!

जिदंगी की रेल हे रिस्तो का मेल हैं

अजब ये खेल हे गजब ये खेल है!
जिदंगी की रेल हे रिस्तो का मेल हैं!!
प्रिया और लाल में कौन करीब हैं!
असमज्स्य में सबकी कैसी प्रीत है!!
जिंदगी का नया पङाव अंजान  है,
थाम के हाथ होता संगम हैं!!
छोङ के मायके की किलकारी,
जिदंगी के बुनते ताने बाने हैं!!
नई पहल को पल पल समझना ,
मन को एक डोर से जोङना है!!
प्रिया की कोई अनछुई बात भी,
जख्म की बजह बन जाती है!!
धीरे धीरे ये तकरार जाने कब,
खुसियो की चाबी बन जाती हैं!!
आगन में आती हे जब खुशी,
मात्रतृत्व का तब सुख देती है!!
वेटे की अठखेली में हम तब,
परम सुख में डूब जाते हैं!!
लाल की हर आकाक्षो में हम,
नत मस्तिक होकर जीते जाते है!!
बचपन में कोई भी बात हमको,
जख्म नहीं सुख की अनुभूती करती है!!
लाख शिकायते आती हे तब,
मेरे लाल को यूही करते बदनाम है!!
पत्ती की अन्जानी बलाओ से बात,
हृदय पर जख्म करती जाती है!!
घर से बाहर जाते हे काम काज ,
डर लग जाता हे अंजानी अनीती से है!!
प्रिया और लाल की आँख मिचौली में,
लाल जीतता हे तो जिया खुश होता हैं!!
समय का चक्र बढता जाता है,
प्रिया का रस गुण बन जाता है!!
लाल बाते छुपाना सीख गया ,
झूठ बोलके बहलाना आता हैं!!
माँ फिक्र करती दिन रात है,
लाल को माँ की स्नेह की नहीं चिंता है!!
प्रिया को अब मेरे झीक पर भी,
डाँक्टर के पास ले जाते है!!
हो अगर कोई पीङा अब तो,
रात जाग कर मेरे साथ काटते है!!
जो चोट देती हे मुझको वो काम,
अब नहीं करते करना चाहते है!!
मेरे कहने से पहले ही सब अब,
इशारो में ही समझते जाते है!!
लाल हो रहा दूर मेरे खेल में,
ममता में कोई नहीं कमी है!!
दुनिया के रंग में रच गया लाल,
आई बहु तो और भी रंग बदला है!!
माना पत्नी संगिनी तुम्हारी है,
कर्तव्य हे सुख दुख को साँझा करना है!!
जितना हे फर्ज लाल का निभाता हैं,
बनता बुढापे की ज्योति लाल है!!
निकळता कोई जालिम लाल है,
तो बीतता बुढाप बृद्धा आश्रम है!!
पर प्रिया बुढापे में हम सफर है,
हम हृदय हे काया रूप प्रिया हैं!!
ज्योति बनाया हे लाल को हमने,
कब छोड दे साथ हमारा है!!
ममता फिर ही निस्वार्थ माँगती,
लाल की सलामत की दुआ हैं!!
प्रिया से बढा न कोई हे हमराज है,
बुढापा देता हे सबसे एसहास है!!
अजब ये खेल हे गजब ये खेल है!
जिदगीं की रेल हे रिस्तो का मेल है!!

बुधवार, 16 अगस्त 2017

कहने को आजाद हूँ,

कहने को आजाद हूँ,
मगर आजाद हूँ कहाँ?
नापने को आकाश हैं,
मगर जमीं का मोहताज हूँ!!
ये कैसा पक्षपात हैं?
आरक्षण की भेट चङता,
सामान्य युगुल समाज है!!
कहने को आजाद हूँ,
मगर आरक्षण विष हैं!!
आज भी हम पर,
कोई करता राज है?
घूस का महाजाल हैं,
हर तमगा बेहाल हैं!!
कहने को आजाद हूँ,
मगर घूस महाजाल है!!
धर्म की औट कर,
दंगा फसाद हैं करते?
सत्ता की रंगरलियाँ ,
जनता पर प्रतिघात करते!!
कहने को आजाद हूँ,
मगर धर्म ही कहर हैं!!
अपृश्यता का बोलवाला,
गरीब का भी कोण भाया?
बाहुवली करते हे राज,
कानून का करते परित्याग!!
कहने को आजाद हूँ,
मगर वाहुवली का राज हैं!!
आंतक का नया हे रूप,
नक्सल आतकवादी कहर हैं?
कब जन बने शमशान ,
हर पल डर का साया है!!
कहने को आजाद हूँ,
मगर दशसत का गुलाम हूँ!!
नारी की दैयनीय दशा ,
हर वर्ग पर प्रहार है?
दहेज भूड हत्या करते पाप,
अश्मत पर होते प्रहार है!!
कहने को आजाद हूँ,
मगर नारी उपभोग है”!!
गरीब की आवाज लुप्त,
अमीन की आवाज झनकार?
पैसे का रूतवा हे आज,
कानून को करे विमुख!!
कहने को आजाद हूँ,
मगर अमीरो का राज हैं!!
अन्न राज हे किसान,
कर्ज बना जी जंजाल हैं?
आत्मदाह करते हैं किसान,
भूमि अधिग्रहण की फास!!
कहने को आजाद हूँ,
मगर किसान बेहाल है!!
कहने को आजाद हूँ,
मगर आजाद हूँ कहाँ?
नापने को आकाश हे ,
मगर जमीं का मोहताज हूँ!!
(आकाँक्षा जादौंन)

मंगलवार, 1 अगस्त 2017

गाँव की छवि

पौ फटते ही पंछीसुर में राग सुनाते है,
खेत खलियानो से खुशबू मंद2 आती है!!
बीगी 2 खुसबू की दस्तक मन को हरसाते है!!
गाँव की छबी मनोरम मन को मोहते है!!
हर घर आगन में तुलसी का पौधा औषधि की याद दिलाती है!!
पंचायत का लगता जमघट भेदभाव भूलजाते है!!
संस्कृति की कल्पनाओ का साक्षातकार रूब रूह देखते है!
धोती कुर्ता सिर पर पंगढी और पाव में जूता देखते है!!
सिर पर पल्लू साडीं में लजाती बलायें लाजबंती देखते है!!
मिट्टी में धमाचौकडी करते बच्चे खूब हरसाते है!!
पेङो से लहराती हवा और कोपले पीयु2  धून सुनाते है!!
कड कड से आती हे सुंगन्ध छाप हृदय में बस जाति है!!
दूध दही छाँच की सरिता घर आगन बहती जाति है!!
आ जाये कोई शहरी बाबु तो दामाद शी खातिर पाते है!!
मातम हो या खुशिया भाईचारा हर बिधि को मिल वाँटते है!!
सध्या बाती की आवाज भी मिठास रस घोलती है!!
खुले आकाश में सोना तारों से बतलाना चाँद को देखते है!!
दादी नानी से किस्से कहाणी सबको खूब भाते है!!
गाँव के बिना भारत की किलकारी अधूरी है!!
खेत खलियान के बिना जीवन का आधार अधूरा है!!
किसान तेरे बिना हर प्राणी ही अधूरा है!!
तुझे करू बंदना बार बार तुझ बिन सब हे सूना सूना,,,,,,!!
(आकाँक्षा जादौन)www.samajakanksha.com

रविवार, 14 मई 2017

माँ को प्रणाम

इक दिन क्या सौ दिन भी कम पढ़ते हैं,
माँ के अभिनंदन में जितना कहो कम है!!
सागर सा आचल हैं आसमाँ सा प्यार,
स्वर्ग सा एहसास हैं सुखमय सा संसार!!
इक दिन क्या सौ दिन भी कम पढ़ते हैं,
माँ के अभिनंदन में जितना कहो कम हैं!!
रक्त से बना हूँ दुग्ध से सीचा है मुझको,
गीले में सोकर रूखे में सुलाया है मुझको!
मल मूत्र को धोया सीने से लिपटाया मुझको!!
अश्क की वेदना करूण  पुकार माँ ने समझा मुझको,
दर्द से कहरा रही माँ चोट लगी है मुझको!
इक दिन क्या सौ दिन भी कम पढ़ते हैं,
माँ के अभिनंदन में जितना कहो कम है!!
निकले कभी हाट पर तपी खुद आँचल की छाँव मुझको!
हट कर मे किये ख़र्च खुद ली न हो बरसो से परिधान!!
पेट काटकर अपना भाग भी अर्पित मुझको!!
मैं आगे आगे माँ पीछे पीछे कैसे कैसे मैने भगाया!
खाने की रुचिकर कब कब रसोई में बदलाया!!
मैं माँ के लिए प्यारी प्यारा दुलारा और कोई न भाया!!
मनमोहिनी बातों में माँ को कैसे करता सम्मोहित !!
अपनी तिजोरी के सिक्के मेरे लिए बन गये मोती!!
नादानियाँ मेरी माँ को देती कैसी मुस्कराटे!!
रात को जागजाग कर मेरे साथ अनौखी करे तपस्यायें!!
नीद से जो होती आँखे बंद चाय झट से माँ बनाती!
जो भी पाया माँ का आसीस बन कर ऐसा छाया!!
मैं क्या दे पाऊँगी उम्र कम माँ का प्यार बहुत गहराया! 
इक दिन क्या सौ दिन भी कम पढ़तें हैं!
माँ के अभिनंदन में जितना कहो कम हैं!!
ईश्वर का रूप माँ तुझमें समाया हैं,
मेरी हर नादानियाँ को माफ़ कराया हैं!